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साहित्यिक परिदृश्य

’लेखक से मिलिए‘ कार्यक्रम का शुभारम्भ
चुनौतियों के भीतर ही सृजना के अंश मौजूद होते हैं ः डॉ. हरीदास व्यास
जोधपुर। ’’आज रचनाकार के सामने केवल साहित्यिक चुनौतियाँ ही नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया, खबरिया चैनल, वैचारिक असहिष्णुता, लोकतंत्र का नकारात्मक उपयोग आदि भी सृजन के आगे बढी रुकावटें बनकर खडे हैं। हमारी संवेदनाओं को डिसेंसेटाइज करने वाले इस समय में शब्दों के दुरुपयोग से शब्द अपनी सार्थकता खोकर एक बार ’जबदी मनोवृत्ति‘ को प्राप्त हो रहे हैं। रचनाकार के मानसिक कलेवर को ये सभी चुनौतियाँ बाधित करती हैं।‘‘ ये विचार गाँधी भवन में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद के तत्त्वावधान में आयोजित ’लेखक से मिलिए‘ कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कथाकार डॉ. हरीदास व्यास ने व्यक्त किए। आगे आपने कहा कि ’’इस सबके बावजूद यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि चुनौतियों के भीतर ही सृजना के अंश मौजूद होते हैं।‘‘ उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की विकट चुनौतियाँ इतिहास में भी साहित्यकार के समक्ष कई बार उपस्थित हुई हैं। उन्होंने रूस के शासक स्टालिन के समयकाल और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित ’राम की शक्ति पूजा‘ के उदाहरण इस तर्क को पुष्ट करते हुए प्रस्तुत किए। आपने मौजूदा दौर में चुनौती बन चुके सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद के अध्यक्ष जाने-माने आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने कहा कि ’’यह विवशता ही है, जो रचना की जननी होती है। आप जब अपने को व्यक्त किए बिना रह नहीं सकते, तब आज सर्जक होते हैं और जब अपने सृजन पर विचार करते हैं और पाते हैं कि मैंने जो कुछ लिखा है अंतराल के बाद उसे देखता हूँ तो लगता है कुछ छूट गया है। सही ढंग से नहीं कह सका। मुझे शब्द बदलने की आवश्यकता है। तब आप समझें आफ भीतर आलोचक जाग गया है। आलोचना यहीं से ही प्रारम्भ होती है।‘‘
परिषद की महामंत्री डॉ. पद्मजा शर्मा ने बताया कि कार्यक्रम के ’प्रश्नोत्तर सत्र‘ में मुरलीधर वैष्णव, डॉ. नरेन्द्र कुमार मिश्र, डॉ. माहिर, डॉ. निसार राही, डॉ. नीना छिब्बर, दशरथ सोलंकी, संतोष चौधरी, सुनील चारण, रामकिशोर फिडौदा, गौतम गट्स, सुशील एम व्यास, दीपा परिहार, छगन राव, तारा, डॉ. एफ.एस. भाटी, प्रजापत आदि के प्रश्नों के जवाब डॉ. हरीदास व्यास ने दिए। कार्यक्रम में डॉ. सत्यनारायण, हबीब कैफी, डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय, डॉ. भावेन्द्र शरद जैन, हरिप्रकाश राठी, भानुमित्र, डॉ. कमल मोहनोत, सुषमा चौहान, डॉ. एफ एस भाटी, बसंती पंवार, संगीता सेठी, डॉ. शालिनी गोयल, रेणु वर्मा, डॉ. बीना चूंडावत, लीला दीवान, कल्पना तोमर, संध्या शुक्ला सहित कई साहित्यकार उपस्थित थे। डॉ. पद्मजा शर्मा ने कार्यक्रम का संयोजन किया।
प्रस्तुति ः डॉ. पद्मजा शर्मा, जोधपुर
स्व. धन्नालाल मेहर की स्मृति में सम्मान समारोह
प्रो. मेहर व कमसिन को ’चम्बल साहित्य श्री सम्मान‘ २०१९







कोटा। चम्बल साहित्य संगम कोटा द्वारा स्व. श्री धन्नालाल मेहर की स्मृति में ’चम्बल साहित्य श्री सम्मान २०१९‘ वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. राधेश्याम मेहर व वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती कृष्णा कुमारी ’कमसिन‘ को उनकी उत्कृष्ट साहित्य सेवाओं के लिए दिया गया। समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. चन्द्रशेखर सुशील थे। अध्यक्षता जितेन्द्र निर्मोही वरिष्ठ साहित्यकार ने की तथा विशिष्ट अतिथि भगवती प्रसाद गौतम व रामेश्वर शर्मा रामू भैया थे। कार्यक्रम का संचालन हास्य-व्यंग्य कवि हलीम आईना ने किया। संस्था के अध्यक्ष व वरिष्ठ कवि बद्रीलाल दिव्य ने प्रतिवर्ष दो साहित्यकारों को माँ चर्मण्वती की पावन धरा पर अपने पिता श्री स्व. धन्नालाल मेहर की स्मृति में ’चम्बल साहित्य श्री सम्मान‘ देने की घोषणा की। इस अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें सभी कवि-शायरों ने समसामयिक रचनाएँ प्रस्तुत कीं।
प्रस्तुति ः बद्रीलाल दिव्य, कोटा
लोकार्पण
स्पंदन महिला साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थान जयपुर के तत्त्वावधान में लेखिका आभा सिंह की दो पुस्तकों - ’भोर गंध‘ कविता संग्रह एवं ’स्वप्न दिशा की ओर‘ यात्रा संस्मरण का लोकार्पण एवं कृति चर्चा का आयोजन पिंकसिटी प्रेस क्लब, नारायणसिंह सर्कल जयपुर में किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री नंद भारद्वाज, वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व निदेशक, जयपुर दूरदर्शन, अध्यक्ष देवर्षि कलानाथ शास्त्री, पूर्व निदेशक राजस्थान संस्कृत अकादमी, स्पंदन अध्यक्ष नीलिमा टिक्कू, विशिष्ट अतिथि डॉ. नरेन्द्र शर्मा ’कुसुम‘, वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व अंग्रेजी व्याख्याता एवं डॉ. जयश्री शर्मा, साहित्यकार एवं सम्पादक ने आभा सिंह की दोनों पुस्तकों का लकार्पण किया।
इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत करते हुए स्पंदन अध्यक्ष नीलिमा टिक्कू ने कहा कि आभा सिंह हमारी वरिष्ठ सदस्य हैं, इनके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह, एक लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ’भोर गंध‘ आभा जी का नवीनतम कविता संग्रह है, जिसमें कविताएँ दो रूपों में प्रस्तुत हैं। प्रथम ३२ कविताएँ जहाँ एक ओर प्रकृति के दृश्य उकेरती हैं, वहीं जीवन से जुडी समस्याओं-रिश्तों, विशेषकर बेटियों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करती, मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं, जो आत्ममंथन को मजबूर करती हैं। वहीं दूसरे भाग में छंदबद्ध रचनाएँ दोहे, चौपाई, छंदों, मुक्तक, माहिया आदि के रूप में प्रकृति, बसंत, होली, बचपन, प्रेम से आप्लावित करती हुई, वीर जवानों की गाथा भी कह जाती हैं। एक संग्रह में विभिन्न रसों का आस्वाद अपने आप में अद्भुत है। आभा जी का यात्रा संस्मरण बेहद सरस रूप में हमें अमेरिका, लंदन, कनाडा की सैर कराता, जहाँ एक ओर हमारा ज्ञानवर्द्धन करता है, वहीं पारिवारिक रिश्तों की मधुर मिठास का अहसास भी कराता है।
लेखिका आभा सिंह ने कहा कि ईश्वर का धन्यवाद है कि मेरी लेखन यात्रा का सफर खरामा-खरामा चल रहा है। भाव बिंदु वह क्षण है जो अंतस में अनयास ही बह जाता है और कविता में ढल जाता है, कभी-कभी क्या खूब ढलता है। आश्चर्य होता है पढकर कि यह मेरी रचना है। जीवन जीते हुए कितने सुख-दुःख से मन गुजरता है, मन कभी उत्सव मनाता है तो कभी पीडा की झंझा में उद्वेलित हो जाता है, साथ-साथ परिवेश चलता है। इसी हलचल से दो-चार होते हुए अनुभूतियाँ जागती हैं और कविता मन की इन्हीं कोमल अनुभूतियों का नाम है। भाषाशैली और शिल्प के प्रयोग से समाजोपयोगी हो जाती हैं।
कहानी कविता रचते-रचते अपनी लिखी पुरानी डायरी हाथ लग गई और यादों के दरीचे खुल गये और अपनी विदेश यात्रा के संस्मरणों को, अनुभव की कडी में उतार कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है।
डॉ. जयश्री शर्मा ने कहा कि आभा जी की दोनों किताबें अपने आप में अनूठी हैं, जिन्हें पढने लगे तो बीच में से छोडकर नहीं उठा जा सकता है। डॉ. नरेन्द्र शर्मा ’कुसुम‘ ने कहा कि आभा जी की ये कविताएँ उनकी सहज काव्य प्रतिभा और अनवरत काव्य अभ्यास की उपज है, ऐसा सृजन हर एक के बूते की बात नहीं होती, उनके काव्य में प्रयोगशीलता द्रष्टव्य है, बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति है।
श्री नंद भारद्वाज ने कहा कि साहित्य संस्कृति और अपने समय की केन्द्रीय चिंताओं का गहरा लगाव ही किसी रचनाकार के लेखन को प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण बनाता है। हिन्दी की प्रतिष्ठित कथाकार आभा सिंह अपनी सात दशक की जीवन यात्रा में मौलिक लेखन के माध्यम से जो सक्रियता बनाए हुए है, वह निश्चय ही जीवन और साहित्य के क्षेत्र में उनके गहरे लगाव को प्रकट करती हैं। उनका कविता संग्रह और यात्रा संस्मरण, उनके जीवन अनुभव और रचनाशीलता के नये आयाम उजागर करते हैं। ये कविताएँ प्रकृति और जीवन के अन्तरसम्बन्धों को गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनके यात्रा संस्मरण भी अपनी अनूठी भाषा शैली और कथा संवेदना के कारण बेहद रोचक और सरस बन पडे हैं।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सन्नी सुवालका ने किया।
प्रस्तुति ः नीलिमा टिक्कू, जयपुर
भगवान अटलानी की पुस्तक विमोचित
तिरानवे वर्षीय बहुमुखी व्यक्तित्व, स्वतंत्रता सेनानी श्री सलामतराय गुरबानी ने होली, बुधवार (२० मार्च, २०१९) के अवसर पर हिन्दी व सिंधी के प्रतिष्ठित लेखक भगवान अटलानी की पुस्तक का विमोचन किया। संग्रह ’रंग ऐं नक्श‘ में देश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित संगोष्ठियों में प्रस्तुत तेरह शोधपत्र शामिल किए गए हैं। बाल साहित्य, बाल नाटक, उत्तर-आधुनिक साहित्य, उपन्यास, नाटक, अनुवाद आदि विषयों पर लिखे गए ये आलेख गहन अध्ययन के परिणाम हैं। अब तक अटलानी की तेरह हिन्दी में, दस सिन्धी में और नौ अनूदित पुस्तक प्रकाशित हुई हैं।
भगवान अटलानी राजस्थान सिंधी अकादमी के अध्यक्ष, ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति के संयोजक, केन्द्रीय साहित्य अकादमी के सलाहकार बोर्ड के सदस्य और एन.सी.पी.एस.एल. की वित्त समिति के अध्यक्ष रहे हैं। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी व राजस्थान सिंधी अकादमी के सर्वोच्च सम्मान मिल चुके हैं। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान के सौहार्द्र सम्मान और आकाशवाणी वार्षिक पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।
प्रस्तुति ः भगवान अटलानी, जयपुर
रामशरण युयुत्सु को सम्मान
अभिनन्दन ग्रंथ का विमोचन हुआ
जींद। स्थानीय बुलबुल रेस्टोरेंट में हरियाणा के वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण युयुत्सु के अभिनंदन में एक राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं विख्यात साहित्यकार डॉ. लालचन्द गुप्त ’मंगल‘ ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में राजस्व विभाग हरियाणा के विशेष सचिव तथा कला एवं संस्कृति कार्यों के निदेशक महेश्वर शर्मा कार्यक्रम में उपस्थित रहे। इस आयोजन में बांसवाडा, राजस्थान से पधारे विख्यात साहित्यकार डॉ. अशोक पंड्या तथा प्रमुख साहित्यकार डॉ. रत्नचन्द ’विषहर‘ ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत की। जींद जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिन्दी साहितय प्रेरक संस्था जींद के पूर्व अध्यक्ष रामफल सिंह खटकड ने देशभर से आए साहित्यकारों का स्वागत करते हुए अपने सम्बोधन में बताया कि रामशरण युयुत्सु साहित्य के क्षेत्र में जींद जनपद का गौरव है। उन्होंने जीवनभर साहित्य के संवर्धन के लिए कठोर साधना की है। इनके द्वारा लेखन, निर्देशन व सम्पादन के माध्यम से लगभग चार दर्जन पुस्तकें प्रकाश में लाई जा चुकी हैं। साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों से ’अंगिरापुत्र‘ नामक मासिक पत्रिका का सफल प्रकाशन भी कर रहे हैं। हरियाणा सरकार द्वारा ’विशेष साहित्यसेवी सम्मान‘ से सम्मानित रामशरण युयुत्सु की साहित्यिक यात्रा न केवल आज की अपितु आने वाली पीढयों को भी सद्साहित्य लेखन के लिए प्रेरित करती रहेगी।
प्रस्तुति ः कृष्णा पांचाल, जींद
डॉ. छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला
साहित्य की जिम्मेवारी समाज एवं सियासत से पहले संस्कृति के प्रति है ः शीन काफ निजाम







बीकानेर प्रौढ शिक्षण समिति, बीकानेर की ओर से १० म*, २०१९ को स्थानीय धरणीधर रंगमंच सभागार में डॉ. छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला की १८वीं कडी का आयोजन किया गया। व्याख्यानमाला की इस कडी के मुख्य वक्ता साहित्य अकादमी व राष्ट्रीय इकबाल सम्मान प्राप्त, संयोजक (उर्दू) साहित्य अकादमी, ख्यातनाम शाइर, आलोचक-चिंतक श्री शीन काफ निजाम थे और व्याख्यान का विषय था - ’साहित्य क्यों?‘
शीन काफ निजाम ने डॉ. छगन मोहता की स्मृति को नमन करते हुए कहा कि शहर कोई भी हो - ईंट, पत्थर, गारे या इमारतों से शहर नहीं होता - शहर तो शख्सियतों से शहर होता है।
श्री निजाम ने अपने व्याख्यान के प्रारंभ में साहित्य में शब्द के विभिन्न अर्थ और उसके प्रयोग के कौशल की महत्ता से अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि आदमी भाषा से ही आदमी होता है। भाषा ही उसकी संस्कृति का परिचय देती है। साहित्य की रचना समाज या सियासत के लिए नहीं बल्कि संस्कृति के उन्नयन के लिए की जाती है। जब साहित्य समाज की अपेक्षाओं के अनुसार अथवा सियासत की मांग के अनुसार लिखा जाने लगे तब वह अपना अदब खोने लगता हैं। मन की बात मुँह तक आ*, लेकिन मन में वह बात आ* कहाँ से - यही जिज्ञासा साहित्य का लक्ष्य है। अपनी अनुभूति को संस्कृति के उन्नयन के लिए नए-नए आयामों से अभिव्यक्ति देना ही साहित्य का प्रयोजन होता है। लेकिन ये हमारी बदनसीबी है कि आज के तकनीकी युग में हमने शब्दों को इकहरे मायनों तक ही सीमित कर दिया है। हमने शब्दों से बात करना तो बंद ही कर दिया है। किसी चीज की सीमा कितनी होती है वही उसका अदब होता है। उर्दू में साहित्य को अदब कहा गया ह। जिसका एक मायना कायदा भी होता है। इसलिए अदब और साहित्य का संबंध सीधे तौर पर जबान से होता है। साहित्य में जबान का मायना शब्द से है।
उन्होंने जिज्ञासा के संबंध में कहा कि प्राचीन ग्रंथों में लिखा गया है कि इस सृष्टि का सृजन ही शब्द से हुआ है। तब जिज्ञासा उठती है कि शब्द से पहले क्या सन्नाटा था? क्या सन्नाटे की सरसराहट और सरगोशी ने जब मूर्त रूप धारण किया तो वो शब्द नहीं हो गया? जब उस शब्द के साथ आपकी शिद्दत और आपका अहसास शामिल हुआ तब वह साहित्य हो गया। इस प्रकार साहित्य से हमें शब्द के विभिन्न अर्थ और उसके प्रयोग का अनुशासन सीखने को मिलता है। क्योंकि एक ही अहसास को अलग-अलग लेखक अलग-अलग जुबान में अलग-अलग अर्थ के साथ लिखते हैं।
इसी क्रम में श्री निजाम ने अपनी विशिष्ट शैली में कईं शेरों, नज्मों को संप्रेषित करते हुए यह जोर देकर कहा कि अखबार की कतरन और इल्म की उतरन कभी भी साहित्य नहीं होती। साहित्य इल्म नहीं उलूम का इत्र है। क्योंकि कृत्रिम व्यवहार कभी भी अदब की श्रेणी में नहीं आता। कृत्रिम व्यवहार या कहें कि मजहब में आदमी जन्नत से निकलकर जन्नत में जाना चाहता है और अदब में जन्नत खुद आदमी तक आना चाहती है। बहुस्यामी से एक होना ही अदब का प्रयोजन है। साहित्य भाषा की आत्मानुभूति है और भाषा के रूप का प्रकाशन है। हम यह हमेशा याद रखें कि तसवीर में तस्सवूर शामिल होता है। जो प्रेमी अपनी जान पे जान न्यौछावर नहीं कर सकता वह प्रेम करने का हकदार नहीं। उन्होंने कहा कि प्रेम का बंदा हो जा, ये वंशावली का चक्कर छोड दे। यही स्थिति साहित्य के प्रति समर्पण की है। साहित्य इमीटेशन नहीं - मेडिटेशन है। उधार की उतरनों से साहित्य नहीं बनता। सच की यह खुशकिश्मती होती है कि उसके पास एक सपना होता है, लेकिन सपने की बदकिस्मती है कि उसके पास सच नहीं होता।
व्याख्यानमाला की अध्यक्षता करते हुए कवि-चितक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि एक पाठक साहित्य क्यों पढे, एक लेखक साहित्य क्यों रचे और साहित्य स्वयं अपने होने का प्रयोजन ढूंढे - इन सभी प्रश्नों का उत्तर निजाम साहब ने अपने व्याख्यान में बखूबी ढंग से अभिव्यक्त किया है। डॉ. आचार्य ने कहा कि साहित्य तो एक तलाश है - एक जिज्ञासा है। जिसे आप सूचनात्मक ज्ञान से नहीं वरन् ज्ञाता और ज्ञेय के आंतरिकीकरण से प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान प्राप्ति के वैध अनुशासनों से जो कुछ छूट जाता है उन प्रश्नों का उत्तर हमें साहित्य से मिलता है। इसलिए साहित्य अनुभव के ढंग का अनुभव है।
व्याख्यानमाला के जिज्ञासा सत्र में गोपाल जोशी, देवीसिह भाटी, अविनाश व्यास, कमल पारीक और जुगलकिशोर पुरोहित द्वारा रखी ग* जिज्ञासाओं का भी मुख्य वक्ता निजाम द्वारा उत्तर दिया गया।
व्याख्यानमाला के प्रारंभ में समिति के मानद सचिव डाॅ. ओम कुवेरा ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए व्याख्यानमाला की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. छगन मोहता अद्भूतों में अद्भुत थे। उल्लेखनीय है कि डॉ. छगन मोहता की स्मृति में अब तक १७ व्याख्यान संपन्न हो चुके हैं। व्याख्यानमाला की शुरूआत इतिहासवेत्ता धर्मपाल के व्याख्यान से हुई थी। इस व्याख्यानमाला को अब तक विचारक रमेशचंद्र शाह, अर्थशास्त्री प्रो. विजयशंकर व्यास, दर्शनशास्त्री प्रो. चदमल, कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी, समाजशास्त्री रामाश्रय राय, शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार, कवि-चिंतक डॉ. नंदकिशोर आचार्य, पत्रकार राजकिशोर, रंगमर्मज्ञ नेमीचंद्र जैन, शिक्षाविद् अनिल बोर्दिया, कवि गिरधर राठी, अधिष्ठाता तेरापंथ धर्मसंघ आचार्य श्रीमहाप्रज्ञ, कला समीक्षक विजयशंकर, इस्लाम अध्येता प्रो. अख्तरूल वासे, कलाविद् मुकुंद लाठ एवं साहित्य- आलोचक डॉ. पुरूषोत्तम अग्रवाल के प्रभावी व्याख्यानों ने विशिष्ट गरिमा प्रदान की है।
कार्यक्रम का प्रारंभ माँ सरस्वती एवं डॉ. छगन मोहता के छायाचित्रों के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण कर किया गया। इस क्रम में आगंतुकों द्वारा डॉ. छगन मोहता के छाया चित्र के समक्ष पुस्पांजलि अर्पित की ग*। कार्यक्रम के अंत में समिति के अध्यक्ष डॉ. श्रीलाल मोहता ने संस्था की ओर से आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर शहर के गणमान्य महानुभावों की उपस्थिति ने व्याख्यानमाला को सार्थकता प्रदान की।
- ओम प्रकाश सुथार, बीकानेर