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बेचैनियों का अक्षर पर्व

शालिनी मूलचन्दानी
’फिर कब आओगे‘ बहुमुखी प्रतिभा की धनी डॉ. सुदेश बत्रा का चौथा कहानी-संग्रह है। आपने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया है तथा यात्रा-वृत्तांत, सस्मरण, रिपोर्ताज और राजस्थानी- पंजाबी गीत भी लिखे हैं। ’नासिरा शर्मा-दो भाग‘ का संपादन भी किया है।
’फिर कब आओगे‘ कहानी-संग्रह का मूल स्वर सामाजिक सरोकार एवं पारिवारिक सम्बन्धों के गहन मानवीय धागों से बुना है। ये परिवार भारत में भी हैं और सुदूर विदेश में भी। ये कहानियाँ एक ओर व्यक्ति के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आस्था-अनास्था, कुण्ठाओं, समस्याओं और जय-पराजय को रेखांकित करती हैं, तो दूसरी ओर समाज के मध्य रहते एकाकी संघर्षरत व्यक्ति की आशा-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी करती हैं। साथ ही जीवन यथार्थ की अवसंगत मूल्य स्थितियों में संघर्षरत संवेदनशील व्यक्ति की संक्रान्त चेतना को भी अभिव्यंजित करती हैं।
संग्रह की ’पानी के सात रंग‘, ’सागर, चट्टानें और लहरें‘, ’कुछ दिन तो रुको यहाँ‘, ’आस-पास‘, फिर कब आओगे‘, ’सहेजे हुए पल‘, ’वह लम्बा सप्ताह‘ और ’एक भरोसा राम का‘ कहानियाँ विदेशों में रह रहे भारतीयों के पारिवारिक सम्बन्ध, वहाँ रह रहे प्रवासी भारतीयों के मध्य पारस्परिक सौहार्द्र और विदेशों में भारतीय संस्कृति के विविध रूप प्रस्तुत करती हैं।
’धुंध‘, ’डर‘, ’पुनर्जीवन‘ और ’अंतिम फैसला‘ कहानी पति की क्रूरता के प्रति विद्रोह के स्वर को वाणी देती हैं।
’हद से परे‘, ’रविवार का दिन‘, ’निष्कासन और आँख मिचौली‘ कहानी मध्यवर्गीय परिवार और माँ-पुत्र सम्बन्धों का विश्लेषण करती हैं। ’सीढी‘ कहानी प्रतिभा के दोहन, ’घर-वापसी‘, ’दहशतगर्दी‘, ’ईद‘, ’साम्प्रदायिक सद्भाव‘ और ’उपचार‘ एवं ’वन-उपवन‘ कहानियाँ मानवीयता और परदुःख कातरता को प्रस्तुत करती हैं।
’पानी के सात रंग‘ की अकेली स्त्री जो पति की मृत्यु के बाद, बच्चों के विदेश चले जाने के बाद अकेलेपन की पीडा को भोग रही है। यह अकेलापन उसे सालता अवश्य है पर यह उदासी के बादल जल्दी ही छँट जाते हैं, ’’शायद १० दिन हो गए थे, वह घर से बाहर नहीं निकली थी, न उसने किसी को फोन किया था, वह सोच रही थी। यह मौसम का अवसर था या उम्र या परिस्थितियों का, सिर्फ मरने के इंतजार में तो नहीं जिया जा सकता। बल्कि ७० के बाद मिली उम्र तो ईश्वर बोनस के रूप में देता है, उसे पल-पल सार्थक करना चाहिए।‘‘
ऐसी सोच के साथ मन को आश्वस्त करता व्यक्ति अपने अंदर के अकेलेपन और खालीपन को भरने के लिए, घर की दीवारों की घुटन से मुक्त होकर बाहर भागता है। पर यह अकेलापन बाहर और अधिक उजागर हो जाता है। ’’यह उम्र का भी अकेलापन है और परिस्थिति का भी।‘‘
सिल्विया की आयु की परिपक्वता निराशा से उबरकर जीवन के हर पल को, वर्तमान को जीना चाहती है। आत्मसात करना चाहती है। खिली धूप को पीने के लिए वह अपनी मित्र केटी और विलियम को लेक पर आमंत्रित करती हैं। यह धूप अपनेपन की धूप है, जो इन कहानियों में चेहरों पर मुस्कान के रूप में चमक उठती है। इस पूर्ण एकांत में ’’घर में दूसरे की उपस्थिति और सुख-दुःख की शेयरिंग ही जीवन को सार्थकता तथा गतिशीलता देती है।‘‘ परिवार में सभी हैं - पुत्री-दामाद, पुत्र-पुत्रवधू, नाती-पोते आदि। लेकिन परिवार में ये खप नहीं सकी।‘‘ ७० पार की जिंदगी सिर्फ ’बोनस‘ होती है, जिसके एक-एक पल को पकडकर शिद्दत से जीने का मन करता है किन्तु दुनिया उसे फालतू सामान समझकर उपेक्षित कर देती है।‘‘ कैटी के कहने पर कि ’’अकेली क्यों रहती हो। चली जाओ न बेटी-दामाद के पास।‘‘ अपराधी बन सिल्विया कहती है, ’’गई तो थी। वहाँ तो मेरा वजूद ही गुम हो जाता है। न कोई दोस्त, न कोई पहचान। बस चुपचाप पडे रहो, कमरे में बंद। एकदम परनिर्भर हो जाती हूँ। ...वह सिल्विया, जो इतनी स्नेहिल, उदार और ममतामयी है, लोग जिसके प्यार का उदाहरण देते हैं, वह अपने ही घर में एकाकी।‘‘
दया और सहानुभूति से परे यह जीवन के प्रति गहरा पीडा बोध है। वृद्धावस्था में ये अकेलापन जैसे अपरिहार्य है - अकेलेपन से निष्कासन चाहते हुए भी पुनः उसी एकाकीपन का वरण करने के लिए विवश हैं। ’निष्कासन‘ की सत्यवती गाँव से पोते-पोतियों का सुख पाने और अकेलापन दूर करने के लिए बेटे दीपक के पास शहर आती है, लेकिन बहू आरती का व्यवहार उसे मर्माहत कर देता है। ’’लगता है, अम्माजी जल्दी अपना बोरिया-बिस्ता समेटने को तैयार नहीं। दूसरे दिन बाथरूम से साबुन, शैम्पू, तेल सब गायब।‘‘ पर सत्यवती छोटी-छोटी बात को भूलकर हर तरह से समझौता करने की कोशिश करती है, लेकिन...’’मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए - तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं - न इज्जत, न प्यार, न मीठी जबान। तुम्हें तो सास से बात करने की भी तमीज नहीं है।‘‘ अंततः सत्यवती को अपना सामान समेटकर वापस गाँव जाने को विवश होना पडता है।
डॉ. बत्रा की कहानियों में छोटी-छोटी घटनाओं के दृश्य-चित्र हैं, जो समग्र रूप में एक स्थिति की सर्जना करते हैं। कहानी में वर्णन कम और चित्र अधिक है। इनमें संयोग और आकस्मिकता कम हैं, जो इन्हें यथार्थ बनाते हैं। ’’कुछ यादें, कुछ अनुभूतियाँ, कुछ उलझनें, कुछ संवेदनाएँ, कुछ जन्दगियाँ और कुछ बिम्ब मन की सुरंग में उतरते चले जाते हैं। किसी का सिर्फ एक सिरा पकड में आता है, किसी का कोई छोटा-सा टुकडा और कुछ मीठे अहसास भी अक्सर खलबली मचाते रहते हैं। इन सबको रूपाकार देना मेरी चेतना का दुर्निवार आग्रह बन जाता है। सचमुच बिखरे हुए कणों से, उलझे धागों से एक डिजाइन तैयार करने के लिए कलम उतावली हो उठती है और फिर कहीं कोई तस्वीर उभरने लगती है, शब्द लडयाँ बन चमकने लगते हैं।‘‘ स्मृतियों की यात्रा पर निकली यह कथाकार अपने अन्दर न जाने कितनी अनुभूतियों को सहेजे हैं। कहानियाँ कथाकार की मानस सन्तति हैं जो अनेक दिनों, महीनों और वर्षों तक उसके उदर में पलती हैं। उसके अनुभव संसार से परिचित होने पर पाठक इस तथ्य से अवगत होता है कि ये अनुभूतियाँ यथार्थ की उपज हैं, जो उसके और रचनाकार के मध्य सेतु का कार्य कर रही हैं। रचना प्रक्रिया से जुडे तत्त्व संवेदना और चिंतन, स्मृति और अनकहे संवेगों से होकर गुजरते हैं, वे एक लम्बे समय तक स्टिल फोटोग्राफी की तरह दिमाग में टंगे रहते हैं। एक छवि, दूसरी छवि से भिन्न आकार और पहचान ग्रहण करती हैं। कुछ खट्टी-मीठी यादें होती हैं, तो कुछ सुदूरवर्ती पीडा के दंश होते हैं, तो कुछ भोले मासूम संवेग होते हैं। मैं कोशिश करती हूँ, इन संवेगों को मानवीय और सामाजिक सरोकारों के साथ प्रकृति में प्रतिबिम्बित कर सकूँ।‘‘
इन कहानियों के पाठक को ये चरित्र और घटनाएँ अपने आस-पडोस में घटित होने लगती हैं। जिनसे वह रोज दो-चार होता है और उनसे पूरी तरह वाकिफ है।
दरवाजा खुलते ही ’हौ‘ की आवाज के साथ खिलखिलाने की आवाज और बच्चों का सत्यवती की टाँगों से लिपट जाना और दादी का भी बैग में से सामान निकाल-निकाल कर बच्चों को देना। परिवार में एक खुशनुमा माहौल के दृश्य चित्र को उपस्थित करता है। तभी आरती का खुरदरा व्यवहार सत्यवती की खुशी के चमकते बल्ब को बुझाने लगता है।
’वह लम्बा सप्ताह‘ की अनुपमा भी शान्ति, शीतलता और अपनेपन के अहसास को पाने के लिए सुदीर्घ यात्रा कर विदेश आती है। पर - ’’ऐसा कैसे हो सकता है, हम एक घर में रहें और आमना-सामना न हो। आमना-सामना हो और बात न हो, बात हो और...... कहीं काँटे न चुभें, फिर या तो सन्नाटे बुनते रहें, एक-दूसरे से मुँह चुराते रहें, या.... या गायब हो जायें - पर कब तक और क्यों?‘‘
यह अकेलापन बहुत व्यापक है - जो कहीं न कहीं हम सबके अंदर मौजूद हैं। ’’साँझ का अकेलापन हमेशा जानलेवा होता है - उदासी और अवसाद भरा हुआ। दिलो-दिमाग में जैसे एक जंग छिडी थी। उषा परास्त होने को तैयार नहीं थी - मगर साँझ का अँधेरा और अंदर की दीवारों का निचाटपन उससे पंजा लडा रहा था।‘‘
परिवार की याद, अपनापन और खालीपन - ’रविवार का अवकाश‘ की उषा छुट्टी या त्योहार के दिन अपने सारे काम निपटाकर अपने दोस्तों से बात करना चाहती है, लेकिन किसी के पास समय नहीं। ऐसे में अपने पुत्रों का फोन आते ही आल्हादित हो उठती है और सब कुछ भूल जाती है।
डॉ. बत्रा की कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों की मधुरता विशेष रूप से दादी-पोते के सम्बन्धों का मधुर आख्यान है। ’आँख मिचौली‘ का शिवम, ’सहेजे हुए पल‘ का अक्षय, ’निष्कासन‘ का स्वस्तिक और आस्था में जैसे दादी के प्राण समाये हैं। बच्चे चाहे विदेश में हो या भारत के ही किसी शहर में। ये बच्चे दादी के साथ नहीं रहते। दादी को उनका स्नेह ऊर्जा प्रदान करता है और इनसे हुआ संवाद उसके आनन्द के पलों में वृद्धि करता है। यहाँ भावबोध के, भाव-विभोर होने के क्षण हैं। ’’मेरी तो उपलब्धि ही यही है। कम से कम परिवार के साथ तो हूँ। यही अहसास मेरे लिए बहुमूल्य है।‘‘
कहानी में भावुकता को किसी भी स्तर पर परिलक्षित किया जा सकता है। यह भावुकता भाषा और कथ्य दोनों स्तर पर है। कभी कथाकार अत्यन्त मार्मिक प्रसंग की संवेदनशीलता को लेती हैं तो कभी झकझोर देने वाले विचार को लेती हैं। अत्यन्त मार्मिक घटना-प्रसंग चरम तक आते-आते एक सारगर्भी विचार के रूप में प्रकट होता है और यथार्थ के रूप में भी। ये घटना प्रसंग पाठक की चेतना में समाहित हो जाते हैं, क्योंकि उसके परिवेश से ही उपजे हैं। कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों की मिठास, आशा, आत्म-सम्मान, कोमलता, विश्वास और प्रेम के ताने-बाने से बुनी हैं। समय और परिस्थिति के ताप से इस बुनावट में छेद दिखाई देने लगे हैं।
कथाकार के प्रवास यात्रा के अनुभवों से कहानियों का रूप और कलेवर व्यापक हो गया है। इसमें स्केच, संस्मरण और रिपोर्ताज भी आ गए हैं। प्रवासी जीवन का एक लघु प्रसंग, विचार अथवा व्यक्ति विशेष ही कथानक बन गया है। इन कहानियों में विदेश प्रवास के अनुभवों के साथ विदेश में रह रहे भारतीयों की सोच और मानसिकता के विविध स्तर भी दिखाई देते हैं। ये कहानियाँ मानवीय मूल्य, प्रेम और आत्मीयता से सराबोर है। भारत से आई मनीषा अपनी दोनों बहनों आरती और प्रिया को देखकर उल्लास और मुक्ति का अनुभव करती हैं। संस्कृति की भिन्नता, व्यक्तित्व की भिन्नता के बाद भी - ’’फिर भी ये क्षण रक्त और स्नेह की अन्तर्धारा में बँधे थे। बहिनों का यह प्यार शायद मित्रता और आत्मीयता में सर्वोपरि था - निश्छल, निर्द्वन्द्व और एकाकार, बिना किसी उलाहने और बिना किसी कुंठा के वे लम्बे क्षण अनमोल थे।‘‘ सच सिर्फ एक था - मन में प्यार का सैलाब और दुआएँ। प्रवासी जीवन के ये पात्र अकेलेपन और असुरक्षा के भाव से भरे हैं और वहाँ के भारतीय समाज के मध्य ही सुरक्षा का अनुभव करते हैं - ’’हाँ! खुश तो ह, पर हर समय एक अकेलेपन का, असुरक्षा का अहसास रहता है। न जाने कब सरकार के नियम बदल जाये, न जाने कब, कौन-सी सेंसरशिप लग जाये। फिर माता-पिता से दूर होने का एक गिल्ट अलग से होता है।‘‘ प्रवासी भारतीयों को इस बात का भी खेद है कि उनके बच्चे भी विदेशी भाषा, भोजन और शिक्षा पाकर अपनी संस्कृति से बहुत दूर चले गए हैं - ’’हाँ! अब तो यही देश हमारा हो गया है। वक्त बहुत बदल गया है। हमारे मन में जो ’भारत‘ की कल्पना है, वह यहाँ के नये आये भारतीयों के मन में नहीं है। हालाँकि वे अपने देश की हर बात में रुचि लेते हैं, लेकिन यहाँ की सुविधाओं में खुश हैं।‘‘ ’कुछ दिन तो रुको यहाँ‘ सम्पन्न भारतीय व्यवसायी की सफलता की कहानी है। भारतीय संस्कृति के रंग प्रत्येक कहानी में दिखाई देते हैं।
’हद से परे‘ कहानी भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की विडम्बना का वर्णन करती है। पाँच बहिनों का एक भाई - तीन बहनें ऊपर दो नीचे। सबका लाडला, दुलारा। माता-पिता बहुत चाव से उसका विवाह करते हैं, परन्तु बहू अलका के असंगत व्यवहार के कारण परिवार बिखरने लगता है। ’’आशीष के माँ-बाप किंकर्त्तव्यविमूढ थे। बहिनें हँसना, खिलखिलाना भूल गई थीं, खाना बेस्वाद हो गया था और जन्दगी बेमजा। आशीष के चेहरे की चमक बुझ गई थी और खर्चे तथा तनाव बढते जा रहे थे।‘‘ कहानी के विन्यास और भाषा में भी संवेदनशीलता के अनेक रूप दिखाई देते हैं। अंत में लेखिका की टिप्पणी पाठक को द्रवित करने, उकसाने और समझाने हेतु होती है - ’’क्या कानून इतना अंधा होता है कि इकतरफा शिकायत पर दूसरों को दोषी बना दे। औरतों को अधिकार उनको शक्तिशाली बनाने के लिए दिए थे, न कि साजिश करके खुशहाल परिवार को पतझर बनाने के लिए।‘‘
इन कहानियों में कथानक सुगुम्फित, चरित्र-चित्रण में अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के चित्र हैं और शैली विवरणात्मक। डॉ. बत्रा सिर्फ परिस्थिति का बिम्ब ही नहीं खडा करती वरन् उस परिस्थिति पर पाठकों को जागरूक करने का प्रयास भी करती हैं।
’धुंध‘, ’पुनर्जीवन‘ ’डर‘ और ’अंतिम फैसला‘ कहानी स्त्री की विषम और दयनीय स्थिति का प्रामाणिक चित्रण करने में सफल है। डॉ. बत्रा की कहानियाँ स्त्री के उन भारतीय संस्कारों की ओर भी संकेत करती हैं, जहाँ पति, पुत्र तथा अन्य पारिवारिक रिश्तों के अतिरिक्त प्रेम का कोई भी रूप दिखाई नहीं देता। ’’पति का साथ होना ही घर को घर बना देता है। जहाँ एक-दूसरे की जरूरत, खुशी, नोंक-झोंक और सुरक्षा का नया अध्याय लिखा जाता है।‘‘
स्त्री की पहली टकराहट उसके स्वयं के अन्तस से है। उसके अन्तस के अनेक रूप हैं - उसके अन्तर की असुरक्षा, भय और हीनता ग्रंथि। वह यथासाध्य कोमलता से परिवार और सम्बन्धों को जोडे रखती है यद्यपि अकेलेपन और बेचारगी की पीडा उसे तमाम उम्र सालती रहती है। यहाँ उत्तर-आधुनिकता वाली कहानियों की तरह छिछला प्रेम, विकृत यौन सम्बन्ध और उच्छृंखलता नहीं है। आद्यन्त मर्यादा दिखाई देती है। ’’पिछले दस सालों की घुटन, अभाव, उपेक्षा और समझौता भरी जिंदगी के कितने ही दृश्य, कितनी बातें उसे रह-रहकर याद आ रही थीं।‘‘
’डर‘ की रश्मि को दो पुत्रियों को जन्म देने का दण्ड भुगतना पडता है - ’’उसके गाल पर, गरदन पर, माथे पर चोट के निशान थे, आँखों में आँसू।‘‘
’पुनर्जीवन‘ की पूजा पति और ससुराल वालों की उपेक्षा के कारण मशीनी और दमघोंटू जन्दगी जीती है। ससुराल वाले उसका शोषण करते हैं। वह अपने ही घर में कैद है, न किसी से बात कर सकती है और न मायके ही जा सकती है। ’’पूजा का तनाव बढने लगा था, उसे अक्सर माइग्रेन हो जाता। ....लेकिन अन्दर कुछ दहकने लगा था। समझौता करते-करते उसकी कोमल भावनाएँ कठोर होने लगी थीं।‘‘ ’अंतिम फैसला‘ की शिक्षित वृन्दा बडी उम्र में विवाह करने के नाम पर मूर्ख बना दी गई। उसका पति अखिलेश उसका मकान और सम्पत्ति चाहता है, उसके मना करने पर उसे छोड चला जाता है। ’’औरत कितनी बेबस और कमजोर होती है। चाहे पैसा कमा ले, चाहे अकेली रहने का दावा कर ले, वह अन्दर ही अन्दर टूटने ही लगती है और औलाद के बिना तो उसका वजूद ही नहीं रहता।‘‘
स्त्री थोडी-सी जमीन और थोडा-सा आसमान चाहती है, जहाँ उसकी आशाओं-आकांक्षाओं को सपनों की छोटी-सी उडान भरने का अवसर मिले। ’’नहीं हर इंसान को साथ चाहिए - कुछ गतिविधि चाहिए, अपनी सार्थकता चाहिए, सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं।‘‘
ये कहानियाँ जिजीविषा और जीवन सत्य की ऐसी अभिव्यक्ति है, जिनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो नया हो या जिसके बारे में पहले कभी सुना न हो। इसी कारण कहानी के चरित्र पाठकों के जीवन के अंग बन सके हैं। ’धुंध‘ की सुशीला में अतिक्रमण का हौंसला नहीं है। ’डर‘ की रश्मि हौंसला दिखाती है और डर से मुक्ति पाती है। ’पुनर्जीवन‘ की पूजा भी इस दोहन के प्रति विद्रोह कर एक नया जीवन प्रारम्भ करती है। ’अंतिम फैसला‘ की वृन्दा अपने शेष जीवन को एक नये बडे परिवार के साथ बिताना चाहती है। यह स्त्री को मानव समझने की अनुभूति प्रवणता के प्रसार का आग्रह है।
कहानी में स्वस्थ सामाजिक मूल्य भी मौजूद हैं। ’ईद‘ की आयशा ’वन-उपवन‘ की सुश्री अस्मिता, ’उपचार‘ कहानी के डॉ. आशीष साम्प्रदायिक सद्भाव, मानवीयता और नैतिक मूल्यों के प्रति आस्था जगाते हैं।
’घर-वापसी‘ कहानी दहशतगर्दी का जीवन्त चित्रण है। ’’रास्ते भर तोडफोड, दीवारों में गोलियों के सुराख, छोटे-छोटे ईंटों के घर कहीं कच्चे, कहीं अधबने, उजडे हुए खेत-मैदान, बाग-बगीचों के लिए जाना जाने वाला यह क्षेत्र कैसा वीरान हो गया है।‘‘
कहानियों में आयु की परिपक्वता का स्थान-स्थान पर उल्लेख है - ’’उम्र और वक्त की खरोंचों के निशान नजर आने लगे थे। ...क्या मेरे अनुभव और संघर्ष इनकी यात्रा और संघर्ष से अधिक हैं - मैं वक्त के लम्बे अंतराल के बाद अपनी बहिनों से मिल रही थी। उनके जीवन की घटनाओं की मैं साक्षी नहीं थी।‘‘
वृद्धावस्था का अहसास संग्रह की अधिकांश कहानियों में है, साथ ही जीवन के प्रति उत्कट लालसा भी है। ’’अक्सर ही तो वह कहती रही है, हम तो धूप के पाले हुए हैं - पर अब उम्र की ढलान पर शरीर सधता नहीं। सोचा, किसी हिल स्टेशन चली जाए - पर कितने दिन और कहाँ*- अकेले जाने की तुक ही क्या है? फिर भी उसका मन करता ऐसी जगह हो, जहाँ कम से कम दो महीने रह सके, शान्ति हो, शीतलता हो और आसपास अपनों का अहसास हो।‘‘ कथाकार कहती भी हैं, ’’एकान्त मुझसे साधना करवाता है, बहुत तपाता है मुझे, बस यही बेचैनियाँ अक्षरों में ढल जाती हैं।‘‘
डॉ. बत्रा की कहानियों में परिवेश शब्द से प्रकृति का भी बोध होता है, साथ ही देश-विदेश के भीतरी जीवन का भी। कथाकार को ’’प्रातः, दोपहर, संध्या, रात्रि, धूप, आँधी, बारिश, सर्दी-गर्मी इत्यादि सभी आयाम मनुष्य की अन्तःवृत्तियों से प्रभावित होते हैं। अतः प्रकृति एक सहायक उपादान के रूप में मुझे प्रेरित करती है।‘‘
’सागर, चट्टानें और लहरें‘ कहानी की नायिका मनीषा प्रकृति में डूब जाती है, ’’लहरों का नर्तन तुमुल कोलाहल भी उत्पन्न कर रहा था - पर वहाँ का शीतल वातास जैसे सघन आनन्द में डूबकर मन को निःशब्द भी बना रहा था। बस ऐसा लग रहा था, जैसे जडचेतन सब एकाकार हो गए हैं। एक चेतना आनन्दमयी होकर आत्मलीन हो गई थी - उस समय न द्वन्द्व था, न तनाव, न तेरा, न मेरा। उस विशाल सागर की तरंगें जैसे मूक संवाद कर रही थीं - आसपास का कलरव कहीं अनुभव ही नहीं हो रहा था। दूर-दूर तक लोग कहीं बैठे थे, कहीं खडे थे - मनीषा को लग रहा था - तपस्वी यूँ ही तो प्रकृति की विराट सत्ता को देखकर समाधिस्थ नहीं हो जाते।‘‘
यहाँ प्रकृति कहानीकार की आध्यात्मिक चेतना की सूचक है। कहानीकार की संवेदनशीलता कहानियों के परिवेश को उतना ही मार्मिक और सजीव बना देती है। ’घर वापसी‘ कहानी परिवेश का इन्द्रिय बोधजनित बिम्ब प्रस्तुत करती है - ’’वह जड हो गया। दरवाजे पर ही अम्मी बैठी थी। सीने में गोली लगी थी। सिर एक ओर लुढका था। आँखें खुली थीं - दरवाजा खुला था - आँगन के चूल्हे की आग बुझी थी; एक रोटी तवे पर सूख गई थी, दूसरी चकले पर बेली रखी थी - जैसे वह अपना घर छोडकर भागा था। लेकिन अम्मा...अम्मा ने घर की रखवाली पूरी मुस्तैदी से की थी।‘‘
धूप, चट्टान, सागर और लहरें मानव के अदम्य उत्साह, उल्लास का प्रतीक बन जाती है। संसार के दुःख दर्द ओर बेचैनियाँ इन लहरों में समाकर नर्तन कर उठती हैं। सागर संवाद करता हुआ प्रतीत होता है और उसकी नर्तन कर रही लहरें जैसे अठखेलियाँ कर उठती हैं और ऐसे में निर्द्वन्द्व और निर्बाध मन, मुक्ति के क्षणों को महसूसता कह उठता है, ’आज फिर जने की तमन्ना है।‘
निश्चित रूप से ’फिर कब आओगे‘ संग्रह की कहानियाँ अपनी सरलता, सहजता, मार्मिकता और सरल शैल्पिक गठन के कारण प्रभावी बन पडी है। कथाकार ने जीवन के सच और बेचैनियों को साकार कर दिया है। इन अनुभव खण्डों की सींझती धूप पाठकों की चेतना में तपिश पैदा करती है।
कहानियों की भाषा भावबोध से जुडी अनुभूतिप्रवण है, जो कथा-विन्यास के अनुरूप है। कहानियाँ छोटे-छोटे संवेगों को माला के मनके की तरह पिरोकर अनुभूति करा देती है। मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों और विडम्बनाओं को अभिव्यक्त करता यह कहानी-संग्रह निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय है।
पुस्तक ः ’फिर कब आओगे‘ (कहानी संग्रह), डॉ. सुदेश बत्रा, मोनिका प्रकाशन, जयपुर, संस्करण २०१९ (प्रथम), मूल्य २९०/- रुपये
शालिनी मूलचंदानी कथा साहित्य में विशेष रुचि रखती हैं। बीकानेर के राजकीय डूँगर कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं।