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नागर सभ्यता का पुनर्पाठ

आशिष मिश्र
कहानी पर सोचते हुए मेरे मन में हमेशा एक बहुत सामान्य-सा प्रश्न आता है - कहानी में सच्चाई का क्या मतलब होता है? जब हम कहते हैं कि फलाँ कहानी बहुत सच्ची है, तो दरअस्ल क्या कह रहे होते हैं? क्या इसका मतलब यह होता है कि कहानीकार के अनुभूत सत्य और पाठक के अनुभव में साम्य है? या इसका यह मतलब होता है कि कहानी में कारणभूत संदर्भ और उसके परिणाम में संगतता है? मुझे लगता है कि कहानी में सच्चाई पर बात करते हुए हम कहानी में घटनात्मक सुसंगति और कहानी से बाहर प्रवहमान समय में साम्य की भी बात करते हैं। कहानी के इतने लम्बे विमर्श में यह बात इतनी मूलभूत और सहज-सामान्य है, कि उपेक्षित है। लेकिन बिना घटनात्मक सुसंगति और अनुभव साम्य के कहानी अविश्वसनीय और निष्प्रभावी हो जाएगी। कहानी में विश्वसनीयता और प्रभावशीलता इसी अंतरबाह्य सच्चाई से आती है। अगर आप राकेश मिश्र की कहानियाँ पढें तो पता चलेगा कि उनका सबसे ज्यादा बल इस अंतरबाह्य सच्चाई पर ही है। इस सच्चाई के प्रति आकर्षण ही है जो कहानियों में एक वाक्य भी अतिरिक्त नहीं आने देता। इसका दबाव ही है कि कहानीकार बिंदास विचरण नहीं करता, वह हमेशा यह दबाव महसूस करता है कि उसे पाठक के सामने हर वाक्य का हिसाब और संगति साबित करना होगा। इस समय मेरे सामने राकेश मिश्र का नया संग्रह है - नागरी सभ्यता। इसके पहले उनके दो संग्रह - ’बाकी धुआँ रहने दिया‘ और ’लाल बहादुर का इंजन‘ - प्रकाशित और चर्चित हो चुके हैं।
इस संग्रह में छोटी-बडी कुल आठ कहानियाँ हैं। आठों कहानियों में एक चीज कॉमन है - इनकी समयबद्धता। वैसे तो संग्रह की सभी कहानियाँ अपने तरीके से समय को ही पकडने की कोशिश करती हैं। इस संदर्भ में मूलतः आर्थिक, कोई एक जगह, छल आदि कहानियों का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन अगर प्रतिनिधि कहानी की तरह किसी एक कहानी को चुनने की अनिवार्यता हो तो वह कहानी होगी - नागरिक सभ्यता। वह अपने छोटे कलेवर में ही गठी हुई औपन्यासिक कहानी है। यह नातिदीर्घ कहानी पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में विकसित हो रही पूँजी के चरित्र और सभ्यता की समीक्षा है। इस कहानी के केन्द्र में तथ्यतः टाटा नगर है। लेकिन यह टाटानगर जैसे हर नगर की कहानी है। इसकी व्यंजनाओं को थोडा और विस्तार दें तो यह बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के भारत की कथा है। इस कहानी को पढते हुए देश की आर्थिकी में आ रहा बदलाव दिखाई पडता है। उदारीकरण के साथ पूँजीवाद का रहा-सहा कल्याणकारी मुखौटा भी उतरने लगता है। दिखाई देने लगता है कि पूँजीवाद अब उसका ओट भी जरूरी नहीं समझती। वह अपने हित के लिए हर तरह के छल-छद्म का सहारा लेती है। झारखण्ड मुक्ति आंदोलन में कम्पनी की भूमिका दिखाकर कहानीकार इसे संकेतों में उद्घाटित करता है। अब लाभ का केन्द्रीय विचार ही नैतिकता बन गया। इसे छिपाने की जरूरत नहीं रही, इसे जोर-जोर से कहा जाने लगा। लोगों की छंटनी होने लगी। जो कम्पनी के लिए बहुत लाभदायक नहीं थे, उन्हें जीवन के अंधेरे में झटक दिया जाता। हर दिन शहर का कोई न कोई हिस्सा इस अंधेरे में डूबता रहा। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अनाचार बढता हुआ दिखाई पडता है। इन्हीं परिस्थितियों की उत्पाद है धीरेन्द्र मामा और स्वयं नैरेटर जैसे लोग। उनके सामने से यथार्थ और ठोस दुनिया छीनकर रातों-रात भाग्य खुलने की फंतासी रची जा रही है। पूँजी ने जितनी तेजी से बेरोजगारी और अनिश्चितता को रचा, उतनी ही तेजी से इस फंतासी को मजबूत किया। बल्कि एक मिथ्या दर्शन गढ दिया गया, जहाँ आप अपनी इच्छा से सब कुछ पा सकते हैं और अगर आप नहीं पाते हैं तो माना जाएगा कि आपमें इच्छाशक्ति की कमी है। हर तरफ सफलता का गुरुमंत्र बँटने लगा। हर तरफ शिव खेडा और संजय चड्ढा दिखाई पडने लगे। रॉन्डा बर्न्स और उसकी रहस्य शीर्षक किताब बेस्ट सेलर हो गई। यह वह समय था जब जिंदा बचे रहने के हर रास्ते छीने जा रहे थे और दूसरी तरफ रातों-रात अमीर बन जाने का स्वप्न रचा जा रहा था। कथावाचक कहता है कि ’मैं गौर कर रहा था कि शहर में धीरेन्द्र मामाओं की संख्या बढ रही थी। हर चौराहे पर लोग शेयर मार्केट की चर्चा करते हुए मिल जाते थे। बाजार में ऐसी जगहें खुल गई थीं, जहाँ लोग एक-दो कम्प्यूटर रखकर बाकायदा शेयर ब्रोकर बन जाते। वहाँ कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजर गडाए दर्जनों लोग उजबक की तरह खडे रहते। किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चलता था कि क्या हो रहा है, या क्या होने वाला है, लेकिन उत्तेजना और रोमांच बाजार में हमेशा महसूस किया जा सकता था।‘‘ वह उत्तेजना और रोमांच ही बाद की सभ्यता का सार बन गया, अब वह बाजार से लेकर राजनीति और सामान्य जीवन-व्यवहार तक का हिस्सा है। जीवन जितना असुरक्षित होता गया है, उत्तेजना और रोमांच उतनी ही तेजी से बढा है। नई आर्थिक व्यवस्था ने जीवन और मन के आंतरिक हलकों तक को प्रभावित किया। यह बात कहानी के चरित्रों में दिखाई पडती है, लेकिन यह सब विवरण में नहीं व्यंजनाओं में है। इसके दबाव में भाषा बहुत मार्मिक और काव्यात्मक हो जाती है। नैरेटर अपने निम्न मध्यवर्गी बाप का चित्रण करते हुए कहता है कि ’’रिटायरमेंट की तरफ तेजी से बढ रहे हमारे पिता की जलती आँखें धीरे-धीरे बुझने लगतीं और फिर धुआँने लगतीं। धुआँ धीरे-धीरे हमारे छोटे-छोटे क्वार्टरों में जहरीली गैस की तरह फैल जाता, घरों में हमारा दम घुटने लगता और हम अक्सर देर तक घरों से बाहर ही रहने लगते।‘‘ यह सिर्फ नैरेटर की या उसके पिता की मनस्थिति नहीं है, बल्कि हर निम्न मध्यवर्गीय परिवार की सच्चाई है। इस मनस्थिति और उसकी अनंत व्यंजनाओं को दीप्त करने के लिए इसी भाषा की दरकार थी, जो राकेश मिश्र में है।
इस नातिदीर्घ कहानी में बदलते हुए समय के इतने संकेत और सूत्र मिलते हैं कि आश्चर्य होता है। इस कहानी में जनसंचार माध्यमों का छोटा सा संदर्भ आता है, लेकिन इस छोटे से संदर्भ में भी कहानीकार जनसंचार की नैतिकता में आ रहे बदलावों को संकेतित करने से नहीं चूकता। यहाँ इसमें सनसनी, उत्तेजना और उगाही का जो व्यापार दिखाई पडता है, वह सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट के साथ कई गुना तेजी से बढा। आज के न्यूज चैनल उसी सांध्यकालीन अखबार के विकास हैं, लेकिन इस सबके बीच कहानीकार अपनी द्वंद्वात्मक दृष्टि के चलते देख पा रहा है कि यह पूरी नागरी सभ्यता जिस आधार पर टिकी है, जिस जमीन पर खडी है, उसमें हलचल हो रही है। इस तरह आप देखें तो यह कहानी बहुत गतिशील और वाइब्रेंट समय को पकडती है।
कुछ कहानियों के केन्द्र में जाति व्यवस्था है। ’छल‘ और ’कोई भी एक जगह‘ शीर्षक कहानियाँ इसी कोटि में रखी जाएँगी। लेकिन यह जाति शास्त्रों में मौजूद इतिहास-निरपेक्ष जाति-व्यवस्था नहीं है, बल्कि उदारवाद के भीतर से अपना स्वरूप बदल कर आ रही जाति-व्यवस्था है। जो ज्यादा महीन और हिंसक है। जो ज्यादा अमानवीय और नई तरह की राजनीतिक गोलबंदी का आधार है, लेकिन कथाकार यह लक्षित करता है कि दलित समाज में आत्मविश्वास और नैतिक बल बढ रहा है। यही भविष्य को ढालने वाली ऊर्जा है। ’अस्मिता विमर्श‘ और ’इतिहासबद्ध‘ शीर्षक कहानियाँ मनुष्य के भीतर; उसकी नैतिकता, मनुष्यता और संवेदनशीलता में आ रहे बदलावों को रेखांकित करती हैं। लेकिन इन बदलावों के कारणभूत संदर्भों को कहानीकार कहीं ऊना नहीं छोडता। फलतः कहानियों के चरित्र टाइप न होकर, विश्वसनीय और अपने संदर्भों के भीतर से ही पैदा मनुष्य लगते हैं। इन चरित्रों के साथ एक बडा सभ्यतागत संदर्भ खुलता है। ’अस्मिता विमर्श‘ शीर्ष कहानी का अनमोल आदिवासी है। वह जिन व्यक्तिगत सुखों की चाहत में अपनी प्रेमिका को भूलता है, वे चाहतें बाजार द्वारा ही रची जाती हैं। अनमोल ब्रांडेड जिंदगी की चाहत में धूसर अतीत को भूल जाना चाहता है। दूसरी तरफ दिव्यांशु कबीर जैसा सत्यवादी, गाँधीवादी-सा चरित्र है जो अपने वर्तमान और परिवार के प्रति संवेदनशीलता और अपने भाई की मृत्यु से भी उपराम होकर इतिहास के प्रति संवेदनशीलता की बात करता है। यह ऐसा समय है जब इतिहास और व्यतीत असंवेदनशीलता की शरणगाह है।
इस संग्रह के चरित्रों पर अलग से ध्यान जाता है या फिर कह सकते हैं कि उस रास्ते भी अपने समय को समझा जा सकता है। इन कहानियों के केन्द्रीय चरित्र नई पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर के युवा चरित्र हैं। कई बार उन चरित्रों में उदारवादी व्यवस्था के पहले की नैतिकता और प्रतिरोध भी मौजूद है, लेकिन नई व्यवस्था द्वारा रचे जा रहे स्वप्न और दुश्वारियों ने इसे बहुत कुछ सुलझा दिया है। फलतः चरित्र कोई ’टाइप‘ या इकहरे नहीं रह जाते। उनमें एक ही साथ आलोचनात्मक विवेक भी है और बाजार के प्रति अवश आकर्षण भी। उनमें कहीं प्रतिरोध की दिपदिपाहट भी है और परिस्थितियों से पटरी बैठाने और अपने छोटे-से अहं को बचाने का प्रयास भी। चरित्रों में यह संक्रान्ति समय की संक्रान्ति का परिणाम है, बल्कि इस दृष्टि से संग्रह की पहली कहानी - मूलतः आर्थिक - का किसन बहुत ट्रेजिक चरित्र है। उसका हार जाना, उसका टूट जाना रही-सही सम्भावना के अंत की तरह दिखाई पडता है। दिव्यांशु कबीर इसके बाद का चरित्र है, जो अपने परिवार और परिवेश से निस्संग ही पैदा हुआ है।
अगर इस संग्रह की ’पिता और राष्ट्रपिता‘ शीर्षक कहानी को छोड दें तो बाकी सातों कहानियाँ बहुत कसी हुई और पठनीय कहानियाँ हैं। किसी भी संग्रह की आठ कहानियों में से अगर सात कहानियाँ इतनी अच्छी और उल्लेखनीय हों तो उस संग्रह को कथा साहित्य के लिए उपलब्धि ही कहा जाएगा। इसे आधार प्रकाशन ने छापा है। प्रोडक्शन ठीक है और दाम भी ज्यादा नहीं है, लेकिन वर्तनी की अशुद्धियाँ खटकती हैं।