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पहला दिन मेरे आषाढ का

श्यामसुन्दर दुबे
भारतीय कालगणना के अनुसार छः ऋतुओं का आवर्तन बारह महीनों के अंतराल क्रम में होता है। इस प्रकार एक ऋतु दो महीनों की मानी जाती है। वर्षा ऋतु श्रावण और भाद्रपद मास के समन्वय से बनती है। ऋतु-चक्र में यद्यपि प्रकृतिजात परिवेश की ही प्रमुखता है, किन्तु प्रकृति घडी के समय से नहीं बँधी है, वह अपने आचरण में मास अतिक्रमिणी भी होती है, यही वजह है कि लोक जीवन में तीन ऋतुओं की अवधारणा ही प्रचलित है। वर्षा, शीत और ग्रीष्म ये तीन ऋतुएँ ही प्रत्यक्षतः रहती हैं। षड्त्र*तुओं की संक्रमणशीलता ही इन तीन ऋतुओं में ही अभिव्यक्त होती है। इस रूप में वर्षा का विस्तार आषाढ से लेकर क्वार तक रहता है। वर्षा इन चार महीनों में अपनी उपस्थिति किसी न किसी रूप में कराती रहती है। भले ही श्रावण और भाद्रपद महीने वर्षा के कोटे में आये हों किन्तु आषाढ और क्वार को भी वर्षा-विगत नहीं माना जा सकता है। आषाढ वर्षा के प्रवेश का सिंहद्वार है। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ। हमारे कवि कुलगुरु कालिदास ऐसा कह रहे हैं। ’मेघदूत‘ का प्रारम्भिक श्लोक आषाढ के स्मरण के साथ होता है - ’आषाढस्य प्रथम दिवसे।‘ कहकर कवि ने वर्षा का आगमन आषाढ कृष्ण प्रतिपदा से ही माना है।
आषाढ का पहला दिन स्मृतियों को बार-बार लौटाने का दिन है - आषाढ स्मृतियों का महीना है। मैं भी अक्सर आषाढ की प्रथम बौछार में स्मृतियों से भीग उठता हूँ। मैं सरगुजा में रहा - कालिदास भी सरगुजा में थे। सरगुजा की रामगढ पहाडी पर ही कालिदास ने ’मेघदूत‘ काव्य रचा था। हुआ यों था कि कुबेर यक्ष को इस आधार पर हिमालय से निष्कासित कर देता है कि यक्ष अपनी नवविवाहिता के प्रेमालाप में आबद्ध होकर भूल ही गया कि अलसुबह उसे कुबेर के पास पूजन हेतु पुष्प पहुँचाने थे। इसी अपराध की सजा यक्ष सरगुजा की रामगढ पहाडी पर काट रहा था। आषाढ में बादल घिरते हैं और यक्ष डूब जाता है अपनी यक्षिणी की यादों में। हजारों किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलकापुरी तक यक्ष अपनी प्रिया को अपने विरह-विगलित हृदय की अनुभूतियों को भेजने में इसलिए असमर्थ था कि उस समय न तो तार था, न डाकिया था और न मोबाइल था। यक्ष पसोपेश में था कैसे अपना संदेश अपनी प्रिया को भेजे! तभी उसे आवाजाही करता आकाशचारी बादल दिख गया। उसने बादल से प्रिया तक संदेश भेजने का जबर्दस्त निहोरा किया। यक्ष तो बहाना था - कवि की कल्पना का विरही बंदा था। ’मेघदूत‘ रच तो कालिदास रहे थे। कवियों को मेघ की अपार संचरणशीलता संवेदित करती रहती है। घनानन्द भी तो मेघ को देखकर कह उठे थे कि हे! पर्जन्य तुम यथार्थ में देशांतरचारिणी यात्राएँ करते हो। कभी मेरी उस कठोर हृदय सुजान के आँगन में मेरे आँसुओं को लेकर इनकी वर्षा कर दो‘‘, कबहूँ बा बिसासी सुजान के आँगन मो अँसुआन को ले बरसो।‘‘ कवियों के लिए बादल हरकारा बनता रहा है। कालिदास ने भी यक्ष के बहाने बादल को हरकारा बनाया।
मैं स्मृतिविद्ध हूँ, मुझे याद आ रहा है, वह आयोजन जो मध्यप्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा सम्पन्न होता था। इस आयोजन का नाम ही था ’आषाढस्य प्रथम दिवसे‘। यह आषाढ के प्रथम दिवस ही आयोजित होता था। हम अम्बिकापुर से रामगढ की दिशा में अग्रसर हो रहे थे। मेरे साथ अकादमी के सचिव डॉ. भास्कराचार्य त्रिपाठी थे। बादल उमड-घुमड रहे थे, बिजली चमकती तो लगता जैसे सघन घनों से उपजे अँधेरे के बीच वह हमारी गाडी को मार्ग दिखा रही है। हम रामगढ के करीब थे। डॉ. त्रिपाठी ने मुझे उस पर्वत आकृति की ओर इशारा किया जो दूर से शुंड उठाये बैठक लिए हाथी की प्रतिकृति लगती थी। कालिदास ने ’मेघदूत‘ में पहाड की इसी आकृति का वर्णन किया है। हम रामगढ पहाडी पर थे। मेघ हमारे कंधों पर से गुजर रहे थे। यहाँ जो फूल खिल रहे थे, उनकी चर्चा ’मेघदूत‘ में भी है। यह परिवेश स्पष्ट करता है कि कालिदास रामगढ पहाडी पर रहे हैं। ’मेघदूत‘ में इस स्थल को ’रामनिर्याश्रयेषु‘ कहा गया है। दरअस्ल, रामगढ पहाडी एक आश्रम ही है। इस पहाडी पर दो गुफाएँ हैं, जिन्हें सीता बेंगरा और लक्ष्मण बेंगरा कहते हैं। बगरा का अर्थ गुफा है। ऐसा माना जाता है कि वनवास के समय यहाँ राम, लक्ष्मण, सीता ने कुछ समय के लिए निवास किया था। इसी पहाडी पर विश्व की पहली रंगशाला स्थित है। इस रंगशाला में हजारों वर्ष पूर्व नाट्य प्रसंग आयोजित होते थे। यहाँ कवि गोष्ठियों के आयोजनों का भी उल्लेख है। रंगमंच एक ओपन ऐयर थियेटर ही है। गुफा को काटकर मंच बनाया गया है - इसके आजू-बाजू नेपथ्य की संरचना है। मंच के सम्मुख एक ढलवाँ पहाडी को काटकर दर्शक दीर्घा का निर्माण सोपान बना कर किया गया है। इसी रंगमंच की एक दीवार पर ब्राह्मी लिपि में किसी ’रूपदक्ष‘ का उल्लेख है। इसके विवरण को पढा गया है। किसी दूर देश से यहाँ पात्रों की सज्जा करने वाला रूपदक्ष आया था, जो किसी नायिका की सज्जा करते-करते उसे अपना दिल दे बैठा। ये प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि यह स्थल एक आश्रम ही था। इसी स्थल पर हम ’आषाढस्य प्रथम दिवसे‘ को रूपायित कर रहे थे। रिमझिम की ध्वनि और बूंदों की फुहार में हम मेघदूत की संगीतमय प्रस्तुति के श्रोता बनकर आकाश और पृथ्वी के बीच रचे जाने वाले मेघ-आख्यान का आस्वादन कर रहे थे। आषाढ के मेघ रामगढ की पर्वतश्ाृंखला को पवनवाही होकर आम्रकूट या अमरकंटक पहुँचते हैं, वहाँ से उज्जैन काम मार्ग पकडते हैं। मालव भूमि पर पहुँचे मेघ की चर्चा करते हुए कालिदास मेघ से कहते हैं - यहाँ तत्काल जोते गये खेतों की मिट्टी से जो सौंधी गंध निस्रत हो रही है, उसे अपने नासारंध्रों में भर लेना किन्तु रुकना नहीं।
ग्रीष्म ऋतु में धरती सूर्य की प्रखर किरणों को अपने अंतर में समाहित करती रही। निदाघ के दाघ से दग्ध होकर वह तपस्विनी बनती है। तप ही सृजन का आधार है। ब्रह्मा ने सृष्टि करने का मन बनाया। अपने पुत्रों को पृथ्वी पर सृष्टि-रचना के निमित्त भेजा, किन्तु कुछ दिनों बाद ये पुत्र खाली हाथ लौट आए। उन्होंने बताया कि वे सृष्टि-रचना में असमर्थ हैं। ब्रह्मा समझ गए कि सृष्टि-रचना का आधार तप है। तब ब्रह्मा ने उन्हें उपदेश दिया कि वे तप करें, उनमें से एक ने तप किया। ’सः तपः अतप्यत‘ तप करने से ही वह सृष्टि-रचना में समर्थ हुआ। धरती, रचनाक्षम बनने के लिए ग्रीष्म का ताप सहती है। अपने भीतर सृजन-सम्भावनाओं को सँजोती है। सूर्य द्वारा जलाकर्षण से निर्मित मेघ जब पहली बार दौंगरे के रूप में आषाढी प्रतिपदा को धरती के होंठ छूते हैं, तब पपडाये होठों की पर्पटी विदीर्ण होती है और एक सुवास एक सौंधी गँध धरती के अधरों से फूट पडती है। यह सुगंध और विस्तारित होती है - जब हल के फाल से जोती गयी मिट्टी के रंध्रों से जागृत होती है। कालिदास मेघदूत में इसी को ’सद्यः सीरोत्कर्षणी‘ गंध कहते हैं। यह धरती की जातीय स्मृतियों का झौंका है, ऐसी जातीय स्मृतियों का जिनमें कृषि संस्कृति के सृजन व्याकुल संदर्भ समाये हैं। मैंने अपने गाँव में इस सौंधी गंध का अनुभव न जाने कितनी बार किया है और वह मुझे हर बार नई-नई ही लगती रही है। सृजन का लीला-विलास सदैव नवोन्मेषी ही रहता है। यह धरती की सौंधी गंध अनेक जीवन-गंधों की सृष्टि करने वाली है। परिमल पोषित वासंती गंधों की यह धात्री है। धरती के भीतर जो नमक है, वही नमक आषाढी बूँदों का स्पर्श पाकर महमहा उठता है। सौंधा शब्द नमक से ही बना है, सिंधु देश के नमक को सैंधव कहा जाता है। वैसे सिंधु देश के घोडों को भी सैंधव बोला जाता है। शब्द की महिमा देखिए कहाँ नमक और कहाँ घोडा। संस्कृत के विद्वान ससुर जी भोजन कर रहे थे। भोजन में नमक कम लगा तो ससुर जी ने नई नवेली बहू से कहा, ’सैंधवमानय‘ नमक लाओ। बेचारी बहू शब्द-मर्म की कम जानकार थी, वह घुडसाल से घोडा ले आई। विद्वान ससुर जी ने माथा ठोक लिया। शब्द का मर्म विरले ही जानते हैं। सौंधी गंध से महमहाती धरती आषाढ में सृजन सक्षम बनती है। वह इस बहाने प्राप्त हुए नमक की अदाई करती है। आषाढ के पानी ने धरती को हरा-भरा बना दिया। उसका तप सृजन में प्रत्यक्ष हुआ।
आषाढ में काम का आवेग बेलगाम हो उठता है। वसंत में जनमा काम आषाढ आते-आते यौवन उन्माद का पर्याय बन जाता है। वसंत में जो काम ललित लवंग लता परिशीलन शीतल मलय समीरे के सहारे नर्म-विलास की बंकिम भंगिमाएँ रच रहा था, वही काम आषाढ लगते-लगते गजब ढाने लगा है। वह विकट योद्धा बनकर विरही जनों से दो-दो हाथ करने का समुद्यत हो गया है। वह अकेला नहीं है - उसका कटक उसके साथ है। वह बादलों की दुंदुभि बजाता आ रहा है। महाकवि जायसी यही कह रहे हैं, ’चढा अषाढ गगन घन गाजा। मानहुँ मदन दुंदुभी बाजा।‘ मौन केवल कामदेव, आषाढ में बगुलों की पंक्तिबद्ध ध्वजाएँ आकाश में फहरा रहा है। वे क्रेंकार करते हुए उड रहे हैं। यह बगुलों के गर्भधारण का काल होता है। आषाढ लगते ही आवागमन समाप्त हो जाता था। पगडंडियाँ कीचड से लथपथ हो उठतीं। नदी-नाले अलंघ्य हो जाते। सडकों, पुलों और रेल की पटरियों का उन दिनों अभाव था। यही वजह थी कि आषाढ से लेकर क्वार तक चार महीनों की यात्राएँ स्थगित हो जाती थीं। साधु-संतों के यहाँ यह ’चौमासा‘ था। विचरणशील साधु-संत इस काल में एक ही स्थान पर निवास करते थे। यह परम्परा आज भी चल रही है। साधु-संत यात्राएँ स्थगित करते हैं, किन्तु जिनके प्रियतम व्यापार और नौकरीपेशा के चलते इस चौमासा में फँस गये हैं, वे कैसे धैर्य धारण करें? वर्षाजनित व्यवधान भौतिक यात्राएँ रोक सकता है, किन्तु स्मृति की यात्राएँ कौन रोक पाया है? यह यात्रा बादल की बूँद-निपात से और तेज हो जाती है। इस बूँद का जबर्दस्त आघात विरहिणी के हृदय पर होता है। वह अपने परदेशी प्रियतम की याद में एक अलग वर्षा में डूब जाती है। हृदय के ताप-जनित भावोच्छ्वासों की वाष्प जब नयन के आकाश में मेघ-खंड बनकर छाने लगती है, तब आँसुओं की झडी लग जाती है। मुझे फिर से जायसी याद आ रहे हैं। ’’बरसे मघा झकोर झकोरी! मोरी दुई आँख चुएँ जस ओरी।‘‘ मघा नक्षत्र में झकोरा मार कर बादल बरस रहे किन्तु अचरज यह है कि इन बादलों की बूँदें विरहिणी की आँखों से झर रही हैं - झर क्या रही हैं, आँखों से आँसू इस तरह बह रहे हैं, जैसे खपरैल घर की ओलती से पानी की धार उलंग रही है। कविता यही तो करती है कि बाह्य जगत् का सम्पूर्ण कार्य व्यापार हमारे अंतर्जगत् में अभिव्यक्त करने लगती है। जो वर्षा बाहर हो रही है, वही वर्षा व्यक्ति-चेतना में घनघोर मचाये हुए है।
युगों-युगों की कविता के पृष्ठ-दर-पृष्ठ व्यक्ति और प्रकृति की साझेदारी में सम्पन्न होने वाली वर्षा से गीले हैं। प्राकृत और अपभ्रंश की कविता लोक की अनुभूतियों से परिपूर्ण है, इसलिए इसमें वर्षा से विगलित विरहिणियों की चर्चा अधिक है। इन भाषाओं में वर्षाकालीन अनेक गाथाओं की रचना की गई है। निशीथ भाष्य की एक वर्षाकालीन गाथा में विरहिणी अपनी स्मृति-दंशित अवस्था में उस सखी को सुखी मानती है, जिसके साथ चौमासे भर उसका प्रियतम है। ’काले सिहि णंदिकरे, मेह निरुद्धम्मि अंवर जलम्मि। मित मधुरम ंजु भासिणि ते धन्या जै पिया सहिता।‘‘ वर्षा का हर्ष और वर्षा का विषाद लोक ने अधिक अनुभव किया है। लोक तो सम्पूर्णतः खुला हुआ है। खेत-खलिहान यहाँ तक कि आवास-मचान सब वर्षा को अपने अंतरंग तक में अनुभव करते हैं। वर्षाकाल लोक को उज्जीवित करता है। हमारी खेती अभी भी वर्षा आधारित है। आषाढ में वर्षा अच्छी हो गई तो फसल अच्छी आने की सम्भावना बन गई। आषाढ बोहनी का काल है - बीज-वपन का काल है। बोहनी सही नक्षत्र में हो गई तो फसल खूब आएगी। हमारे घाघ-भड्डरी लोक कवि ही थे। उनकी अनुभव-दीप्त कविताएँ वर्षा-अनुमान पर ही आधारित हैं। वे ही कहते हैं कि ’नखते खेती बखते राज‘ यदि नक्षत्र के अनुसार खेती की जाती है तो खेत भरपूर देगा। राजा समय की पहचान करना जानता है, तो उसका राज्य सुरक्षित रहेगा। अब यही लीजिए कि भड्डरी निर्देश देते हैं कि आर्द्रा नक्षत्र में धान की बोवनी हो जाना चाहिए। आर्द्रा नक्षत्र आषाढ में ही पडता है। इसी महीने में सूखे खेत गीले होते हैं और किसान का मन उल्लास से भर उठता है। आकाश में घिरते बादल उसकी आँखों की चमक बढा देते हैं। निराला का किसान बादलों को आमंत्रित करता है। ’’अस्थिमात्र रह गया शरीर। हिल-हिल खिल-खिल तुझे बुलाते। ऐ बादल वीर।‘‘ लोक में वर्षा मंगल विधायी है। भड्डरी ने वर्षा-संयोगों में ऐसे अवसर खोजे हैं जिनसे वर्षा आनन्द विधायिनी हो जाती है। वे कहते हैं कि यदि आषाढ की पूर्णिमा को खूब बादल घिरें, वे खूब गर्जना करें और बिजुरी खूब चमके तो मानकर चलिए कि सभी जगह सम्पूर्ण वर्ष आनन्द बरसता रहेगा। ’’आषाढी पूनौं दिना गाज बीज बरसंत। ऐसा बोले भड्डरी आनन्द मानो संत।‘‘ आषाढ ही वह महीना है जिसमें हमारे देवता शयन करने चले जाते हैं। वे भी फिर चौमासे भर सोते ह। वे इसलिए सो जाते हैं कि मनुष्य वर्षा-काल में अपने बलबूते अपना पुरुषार्थ जाग्रत् करे।
आषाढ भीग गया। धरती में अंकुर जागे, वह रोमाँचित हो उठी। ताल-तलैयाँ, नदी-नाले जल से लबालब भर कर इठलाने लगे। झिल्लिय की झंकार, मेंढकों का वेद-पाठ, बादल और बूँदों की जुगलबंदी ने एक प्राकृतिक सिम्फनी रच दी है। जब सम्पूर्ण प्रकृति गा रही हो, तब मनुष्य क्यों न मुखरित हो उठे। आप को अटपटा लग रहा होगा कि मैंने मेंढकों को वेद-पाठी कह दिया। ये तो मैंने दुहराया मात्र है। इस वेद-पाठ के प्रमाण स्वयं ऋग्वेद में मिलते हैं। ऋग्वेद के मण्डूक सूक्त में इसकी चर्चा की गई है। एक ऋचा में मण्डूक ध्वनि की विचित्रता की तुलना करते हुए स्पष्ट किया गया है कि मण्डूक ध्वनि को सुनकर ऐसा लगता है, जैसे यज्ञभूमि पर बैठे पुरोहित तालाब के किनारे बैठे वेदपाठ कर रहे हों। कौन जाने हमारे महाकवि संत तुलसीदास ने भी यह पढा हो इसलिए वे लिखते हैं, ’दादुर धुनि चहुँ ओर सुहाई। वेद पढे जनु वटु समुदाई।‘ यह आषाढऋतु का अपना वेद-पाठ है, यह आषाढ का अपना प्राकृतिक सहगान है। किन्तु लोक ने अपने ढंग से अपने संगीत से वर्षा के आनन्द को अभिव्यक्त किया है।
वर्षा ऋतु में कजरी की बनक-ठनक प्रस्रवित परिवेश को और आर्द्र और आत्मीय बना देती है। कजरी, कज्जली तीज से गाया जाने वाला लोकगीत है। मुझे लगता है कि जब आकाश की तश्तरी में मेघों की कालिमा से निर्मित काजल, दिशाएँ अपने नयन-कोरकों में आँजती हैं - तब ’कज्जली तीज‘ का पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर गाये जाने वाले लोक गीत ’कजली‘ या ’कजरी‘ नाम से पहचाने जाते हैं। कजरी गायन में आँख का काजल घुलने लगता है। कजरी एक हूक है जो प्रवृट् के सघन परिवेश के भीतर से विरह की व्याकुलता को जगाती है। कजरी में केवल वियोग ही नहीं है, उसमें संयोग की भी हजारों छायाएँ हैं। उसमें सामाजिक दबावों के भी अनेक अंतरंगों की धडकने हैं। छांदोग्योपनिषद् में मेघों के बरसने को उद्गीथ कहा गया है। वर्षा प्रकृति की छांदासिक रचना तो है ही, वह उसे गाती भी है, इसलिए वर्षा अनेक लोक-राग-रागनियों के संगुंफन से अपना एक विराट् राग-चक्र निर्मित करती है। यह राग-चक्र वेद और लोक की दो धुरियों पर निरन्तर आघूर्णित होता रहता है। वर्षा का एक राग है - मलार, जिसे मल्हार भी कहा जाता है। यह उमड-घुमड कर गाया जाने वाला राग है। बाद में यह शास्त्रीय रंगत में निबद्ध हो गया, जिसे मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार भी कहा गया। ’कजरी‘ का एक संदर्भ ’कजलियों‘ से जुडता है। कजलियों की कथा परमाल रासो का अंश है - यही परमाल रासो ’आल्हा खंड‘ जैसे लोकगायन में पर्यवासित हो गया। आल्हा का गायन वर्षाकाल में सम्पूर्ण उत्तर भारत में किया जाता है। आल्हा का छंद ’वीर छंद‘ है। आल्हा का केन्द्रीय रस वीर ही है। इसकी गायकी सुनकर श्रोताओं के भुजदंड फडक उठते हैं। वर्षाकाल की उफनती नदी की मरोड हो या क्षितिज पार तक जाती बादलों की कडकडाहट से मघा नक्षत्र के समय अर्श कर बरसती बूंदों का अनुवाद हो - इन सबका मिलाजुला प्रभाव आल्हा गायकी के मूल में है।
अब न गाँव में वे लोग रहे जो कजरी, सैरा, सावनी और आल्हा गाते थे, न वे अमराइयाँ रहीं, जिनकी डालों पर झूले डालकर पूरे गाँव की किशोरियाँ पेंगे भरती थीं और जिनकी हर पेंग पर एक नया गीत हुमस उठता था। अब न वे बरसातें भी रहीं जो धारासार बरसती थीं तो महीनों बरसने का क्रम चलता था। नदियाँ-नाले, तालाब-पोखर सूख रहे हैं। भर बरसात में भी वे प्यासे रह जाते हैं। न वर्षा का आना पता चलता है, न वर्षा का जाना पता चलता है। किसान सूखा की मार से संत्रस्त होकर बैंकों के चक्कर काट रहे हैं। कभी मेरे मित्र नईम ने लिखा था ’पहला दिन मेरा आषाढ का कभी हुआ सूखा का कभी हुआ बाढ का।‘ अब बाढ, आषाढ क्या सावन-भादो में भी नहीं आती है। केवल सूखा-सूखा ही है - इस सूखे ने आदमी की संवेदनाओं को सुखा दिया है, उसकी आँखों के पानी को सुखा दिया है। फिर भी हम आश्वस्त हैं कि अबकी आषाढ मेघों का मेला लेकर आयेगा। ये मेघ ऐसे बरसेंगे कि धरती का कोना-कोना हरष उठेगा।
हिन्दी के प्रसिद्ध गद्यकार, अपने ललित निबन्धों के लिए विशेष पहचान श्यामसुन्दर दुबे की अब तक तीस से ज्यादा पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं। वे अनेक सम्मानों से अलंकृत भी हैं। सम्फ*ः श्रीचंडी जी वार्ड, हटा, जि. दमोह (म.प्र.) -४७०७७५, मो. ०९९७७४२१६२९