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याद रह जाती है

राधावल्लभ त्रिपाठी
(१)
हम सभी भाई और हमारी एक बहन उन्हें बाऊजी कहते थे। हमारे घरों में पिता के लिये बाऊजी और माँ के लिये बाई ये शब्द हमारी पीढी के साथ ही प्रचलन में आये। खुद बाऊजी अपने बाऊजी को या हमारे पितामह को बाऊजी नहीं कहते थे, वे उन्हें दायजी कह कर बुलाते थे, जबकि हम उनके दायजी को ’बा‘ या ’बा सा‘ब‘ कहते थे। उनकी पीढी तक पिता लोग बाऊजी नहीं बने थे। बाऊजी (बाबूजी) शब्द संस्कृत की मूल परम्परा से (बप् धातु से बापक - बप्पा - बब्बा - बाप - बाबा - बापू - बाबू बनकर) चलता हुआ फारसी से जरीये हिन्दी में और हमारी बोलियों में आया। अंग्रेजी राज में मैकाले की शिक्षानीति के तहत पढाई-लिखाई करने वाले शिक्षितों को भी बाबू कहा गया। बी.ए. पास कर के बाबू हो जाना समाज में सर्वोच्च प्रतिष्ठा का एक लक्षण था। इसीलिये तो इस दौर में हिन्दी के नामी समीक्षक श्यामसुंदर दास अपने नाम के पहले सदा बाबू लगाते थे और नाम के आगे बी.ए.। रामचन्द्र शुक्ल भी उनके साथ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आचार्य थे, पर रामचन्द्र शुक्ल को केवल रामचन्द्र शुक्ल भर कहना काफी था, पर बाबू श्यामसुंदर दास, बी.ए. को केवल श्यामसुंदर दास नहीं कहा जा सकता था। आखिर रामचन्द्र शुक्ल न तो बी.ए. पास थे, न बाबू थे।
उस जमाने में पढे-लिखे शान-शौकत वाले युवकों को भी बुजुर्ग लोग मुस्कुरा कर बाबू कहकर पुकारते थे। बाद में इन बाबू लोगों में से कुछ तो बाबूगिरी करते हुए दयनीय दशा को प्राप्त हुए, कुछ झूठी और खोखली शान में जगहँसाई के पात्र बने और रवीन्द्रनाथ की ’बाबू ऑफ नयनजोर१ जैसी कहानियों में और किस्सों में जा कर मर मरा गये।
पर हमारे यहाँ बाऊजी सारे घर की धुरी और केन्द्र ही नहीं, हमारे सारे संसार में सर्वोच्च सत्ता के अटल प्रतीक बने रहे। सारे घर की आँखें उन पर लगी होतीं, कान उनकी आहट सुन रहे होते। हम लडें-भिडें, हँसें, बोलें, फुसफुसायें - सबके भीतर कहीं न कहीं यह अहसास रहता कि बाऊजी हैं, हमारी हर हरकत के अंतिम निर्णायक वे ही हैं।
(२)
फरवरी १९४९ म बाऊजी की नियुक्ति सुठालिया के माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के रूप में हुई। इसी महीने में इसी साल मेरा जन्म हुआ, उनकी नियुक्ति के करीब आठ दिन बाद। इत्तफाक से बाऊजी और मेरी जन्मतिथि एक ही है - १५ फरवरी। मेरा दाखिला इसी विद्यालय में कक्षा एक में हुआ और तीसरी कक्षा तक की पढाई मैंने वहाँ की। इस बीच बाऊजी इसी विद्यालय में प्रधानाध्यापक हो गये थे। प्राईमरी की कक्षाओं में हिन्दी और गणित का आरम्भिक ज्ञान हमें कराया जाता था। अंग्रेजी और संस्कृत ये दो भाषाएँ कक्षा छह से आरम्भ कराई जाती थीं। पहली कक्षा में होते हुए भी मुझे अंग्रेजी सीखने का बडा चाव था। अंग्रेजी बोलने-लिखने की काबिलियत आ गई तो साहब बनने के रास्ते खुल जाते हैं - यह समझ उस उम्र में कैसे और कहाँ से आ गई - यह तो याद नहीं। पर बाऊजी घर में आने वाले छात्रों को निःशुल्क अंग्रेजी पढाया करते थे। मैं दरवाजे के पीछे खडा वे जो कहते उसे सुन-सुन कर एक कॉपी में नोट कर जाता। अंग्रेजी में लिखे साइन बोर्डस् की इबारत पहचानने की कोशिश करता। मेरी कॉपी में अंग्रेजी की वर्णमाला और कुछ टूटे- फूटे वाक्य संचित हो गये थे। इस कॉपी को चोरी के माल की तरह मैं बडे जतन से छिपा कर रखता, क्योंकि यह अनधिकार चेष्टा थी।
एक बार घुटने पर कॉपी रखे उकडूं बैठा मैं कहीं से सुने अंग्रेजी के वाक्य नोट कर रहा था। बाऊजी ने देख लिया। एकदम से ’क्या लिख रहे हो - देखें‘ - यह कहकर उन्होंने कॉपी मेरे हाथ से लेने के लिये झपट्टा मारा। मैंने कॉपी घुटनों और पेट के बीच दबा, घुटने दोनों हाथों से दबा कर रोंआसे स्वर में भिनभिनाते हुए कहा - कइँ नी - कइँ नी।
फिर तो बाऊजी ने - ’देख जो, खना कइँ लिख र्यो यो राधू ओर बता नी र्यो‘ - बाई से यह कहते हुए अपनी गुप्त निधि की रक्षा के लिये मेरी सारी व्यूहरचना को तोड हँसते-हँसते उसमें से कॉपी सुरक्षित निकाल ली। ’अच्छा, अंग्रेजी सीखना है‘ - कुछ ऐसा उन्होंने उस कॉपी को देखकर कहा और फिर एक-एक हिज्जा, वाक्य पढकर, जहाँ गलतियाँ की थीं, वहीं सुधारते गये। उसके बाद कॉपी उन्होंने मुझे लौटा दी। बात आई गई हो गई, पर इसका एक परिणाम यह हुआ कि अपने बडे भाई साहब, जो मुझसे एक कक्षा आगे थे, और इस घटना के साक्षी रहे थे, उनके ऊपर मैं अपने अंग्रेजी के ज्ञान का सिक्का जमा सकता था। इसका एक नमूना, जो मुझे अभी तक याद है - कुछ इस तरह है कि घर में सत इसबगोल का डिब्बा रहता था। उस पर रोमन वर्णमाला म छपे श्ैंज.पेंइहवसश् को मैंने पढ लिया और उसकी व्याख्या भाई साहब के आगे इस तरह की - एस-ए-टी सेट का मतलब है बैठा हुआ। आइ.एस. इज का मतलब हुआ - है। ’ए-बी‘ अब तो समझ लो हम जो हिन्दी में ’अब‘ कहते हैं, वही है। और ’जी.ओ.एल.‘ - गोल का मतलब भी गोल ही हुआ। तो जो कुछ इस डिब्बे पर लिखा है उसका मतलब यह है कि अब इसमें कोई गोल वस्तु विराजी है। यह मुझे अब याद नहीं कि बडे भाई मेरी इस व्याख्या से कितने प्रभावित हुए।
इस घटना का सार यह है कि गुजरी सदी के पचास के दशक में हम लोगों के परिवारों में किसी का कुछ भी गोपनीय नहीं हो सकता था। बाऊजी का खुद का जीवन खुली किताब की तरह था। उन्होंने अपने जीवन का कोई प्रसंग (हमारी पहली बाई के निधन के प्रसंग को छोडकर) मन के किसी कोने में दबा कर छिपा कर रखना चाहा हो ऐसा नहीं लगा, चाहे वह दुःखद से दुःखद प्रसंग हो या परम सुखद। हम लोग बडे हुए, तो हमारी डायरियाँ और कॉपियाँ बाऊजी जब कभी उठाकर साधिकार देखते, उन पर नजर डालते। उन्हीं की नकल करते हुए अपने राम भी उनकी डायरियों और नोट्स की कॉपियों पर उनकी अनुपस्थिति में दृष्टिपात करने की अनधिकार चेष्टा करते, इसमें किसी बाग से खट्टे आम चुराने जैसा सुख होता।
पुरानी पेचिश की बीमारी, कमजोर लिवर और उदर विकार की वजह से बाऊजी चिंतित रहते। तिस पर खाने-पीने के वे शौकीन थे। नवरात्र में महाअष्टमी के दिन और भी कुछ त्योहारों के दिन घरभर के लिये कंडों पर बाटियाँ वे ही बनाते थे। दिवाली दशहरे के तीज-त्योहारों पर गुलाबजामुन वगैरह बनाने के सफल-असफल प्रयोग भी वे करते। ऐसे मौकों पर मसक कर सूतने का संस्कार भी हमें उन्हीं से मिला। कल्याण पत्रिका के अलावा आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की किताबें घर में रहतीं। इलाज के सिलसिले में बाऊजी ने दो जगह लम्बी खतोकिताबत की थी - एक तो लाहोर वाले वैद्य लाला हरनामदास जी से, दूसरे गोरखपुर के विट्ठलदास मोदी से। वैद्य हरनामदास जी से जो खतोकिताबत हुई थी, वह काफी पहले की थी। प्राचीन इतिहास के दस्तावेजों की तरह उसके पुराने मटमैले कागज बाऊजी की फाइलों में सुरक्षित थे। इस फाइल के पत्र बहुत खूबसूरत अक्षरों में एक-एक अक्षर कुशल चित्रकार की तरह सजा-सजा कर रचते हुए दो भाषाओं में लिखे गये थे - अंग्रेजी तथा उर्दूबहुल हिन्दी। कक्षा सात या आठ में जब मैं पहुँचा, ये सारे पत्र मैं पढ चुका था। मेरे लिखन और बोलने में उर्दू का छोंक जरूरत से ज्यादा रहता है। शायद उसके पीछे बाऊजी के इस तरह के पत्रसाहित्य का अध्ययन ही कारण हो। वैद्य हरनामदास जी को अंग्रेजी में लिखे पत्रों से बाऊजी ने अपने बचपन से लेकर विवाह के बाद तक की सारी रामकथा बेबाक बयान की थी, जिसमें कुटेवों और मिठाईखोरी ने किस तरह स्वास्थ्य बिगाडा इसकी भी चर्चा थी। उनके पट्टशिष्य बिरमाल जी ने एक बार बताया कि इन पत्रों को वो भी चाट चुके हैं - वह भी गुरुदेव की सहर्ष अनुमति पर।
स्कूल में कक्षा में प्रथम आने पर बाऊजी को एक रुपये महीने का स्कालरशिप मिलता था - वे बताते। इस एक रुपये के सोलह आनों से वे आधे-आधे पैसे की दोनाभर जलेबी खाते। यह बात राजगढ के उस हलवाई के नामोल्लेख के साथ वे बताते जहाँ स्कूल जाते समय यह अनुष्ठान सम्पन्न होता था।
मैट्रिक पास करते ही उन्नीस साल की उम्र में उन्हें क्लर्क की नौकरी करनी पडी। वेतन शायद दस रुपये महीना मिलता था। इसके कुछ साल बाद पहला विवाह हुआ। स्वास्थ्य बिगडते जाने और लाहोर वाले वैद्य लाला हरनामदास से खतोकिताबत का काल इसके आसपास का रहा होगा।
वैद्य लाला हरनामदास इश्तहारों में अपने नाम के पहले लाहोर वाले लिखवाते थे, हालाँकि विभाजन के समय के दंगों और भगदड में वे लाहोर छोड चुके थे और उस वक्त पंजाब के किसी शहर में थे। उनके इश्तहारों की प्रतियाँ भी बाऊजी की इसी फाइल में नत्थी थीं, जिनमें ऊपर एक गोले के भीतर बेहतरीन पगडी बाँधे लाहोर वाले वैद्य लाला हरनामदास की स्वास्थ्य सम्पदा से दमकती फोटो भी थी। वैद्य जी ने बाऊजी के रोग और स्वास्थ्य का सारा हाल उनके पत्रों के माध्यम से जान समझ कर लिखा था कि वे कुछ महीने उनके यहाँ आकर रहें। इलाज का जो खर्च बताया गया था, वह तो बूते के बाहर था। पर बाऊजी किसी प्रकरण को इस तरह समाप्त नहीं होने देते थे। उन्होंने अपनी सारी आर्थिक स्थिति का भी ब्योरा वैद्य लाला हरनामदासजी को लिख भेजा, इस निष्कर्ष के साथ कि उनके लिये पंजाब आकर इलाज कराना सम्भव नहीं है। यहीं से इस कहानी में मोड आता है। वैद्य लाला हरनामदास बाऊजी की अंग्रेजी और उर्दू दोनों के कायल हो गये होंगे। उन्हने जवाब में लिखा था कि आपको स्कूल की नौकरी में जो तनख्वाह मिलती है, उसके बराबर हम आपको यहाँ देंगे और इलाज भी करेंगे, बस हमारे दफ्तर में जो देश-विदेश से इलाज चाहने वालों की चिट्ठियाँ आती हैं, उनके जवाब लिखने पडेंगे। इस पत्र के जवाब में बाऊजी ने वैद्य जी को जो लम्बा पत्र भेजा था, उसमें इंवर्टेड कामा के भीतर कुछ अधिक बडे अक्षरों में अंकित एक वाक्य था, जो मुझे याद आ रहा, वह था - अंधा क्या चाहे - दो आँखें। मेरे हिन्दीलेखन में मुहावरे काफी आते हैं, शायद उनका संस्कार इस तरह के उनके पत्रों को पढने से बना हो।
यह बीसवीं सदी का चौथा पाँचवा दशक था, जिसमें न जेराक्स मशीनें थीं, न टाइपराइटरों का ज्यादा रिवाज था। कम्प्यूटर जैसी चीज की तो कल्पना ही नहीं हो सकती थी। बाऊजी जैसा बेहतरीन ड्राफ्ट लिखने वाला कर्मचारी खतोकिताबत निपटाने के लिये मिल गया, तो वैद्य जी के तो पो बारह। तो वैद्य हरनामदास वाले प्रसंग की परिणति इस तरह हुई कि नौकरी से अवकाश लेकर बाऊजी इलाज के लिये पंजाब जाकर उनके पास रहे, इलाज से उन्हें कितना फायदा हुआ यह तो पता नहीं चलता, पर इस प्रसंग की जो चर्चा बाऊजी हम लोगों के बीच करते थे, उसके अनुसार वैद्य के पत्राचार का काम जिस दक्षता से उन्होंने किया कि वैद्य जी उन्हें नौकरी छोडकर उनके पास रहने का ही आग्रह करने लगे और बाऊजी किसी तरह उनसे पीछा छुडाकर लौट आये।
विट्ठलदास मोदी के गोरखपुर स्थित प्राकृतिक चिकित्सालय में वे सुठालिया के सेवाकाल में गये थे - शायद एक महीने के लिये। बाऊजी के गोरखपुर से पत्र आते। फाउंटेन पेन से बहुत करीने के बनाये अक्षरों में सुंदर खुशखत में। इन पत्रों में एक पत्र कुछ अजीब सी स्याही में लिखा था। हमें तो उस जमाने में फाउंटेन पेन नसीब नहीं होते थे, सुलेख की कॉपी में हम लोग हाथ से बनाई बर्रू से लिखते, बाकी काम दवात और होल्डर से करते। इस पत्र के अक्षरों की बनावट अलग तरह की थी। बाद में जब बाऊजी लौट कर आये, तो हमें यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि एक नये तरह का पेन चला है, जिसमें स्याही भरने की जरूरत ही नहीं पडती। उसमें प्लास्टिक की पतली नली रहती है, जिसमें से उतनी ही स्याही निकलती है, जितनी से कागज पर अक्षर बने। दवात ढुल जाने से पाजामे के गंदे होने का खतरा तो दूर, इसमें तो फाउंटेन पेन से लीक होती स्याही से अँगूठे और उसके साथ जुडने वाली दो अँगुलियों के गंदे होने की भी कोई बात नहीं। पर रिफिल पेन हमारे लिये केवल दर्शनीय चीज बना रहा। यह सुनने में आया कि इस पेन से खुशखत खराब हो जाते हैं। सारे विद्यार्थी जीवन में और विश्वविद्यालय में नौकरी लग जाने तक पाँच-सात वर्षों तक भी फाउंटेन पेन छोड कर रिफिल जिसे अब लीड भी कहा जाने लगा है, उसे मैंने नहीं छुआ।
इसी समय प्राकृतिक चिकित्सा पर कुछ साहित्य भी हमारे घर में आया। विट्ठलदास मोदी और उनकी आकर्षक हिन्दी शैली से मैं परिचित हुआ। हाल में कांतिकुमार जैन का विट्ठलदास मोदी पर संस्मरण पढते हुए पाँच-छह साल की उम्र में पढे हुए मोदी जी के साहित्य की बात याद आई। मोदी जी का गद्य आकर्षक था - चटपटा और मजेदार। इसलिये उनकी जितनी किताबें घर में आतीं, मैं सब पढ लेता। गोरखपुर के उनके प्राकृतिक चिकित्सालय की प्रचार सामग्री घर में थी, उसमें किसी व्यक्ति के दो चित्र आमने-सामने थे, एक में उसका कृशकाय शरीर - जिसमें हड्डी-हड्डी गिनी जा सके, दूसरे में उसी की हृष्ट-पुष्ट काया। दोनों चित्रों के नीचे क्रमशः शीर्षक थे - प्राकृतिक चिकित्सा के पहले और प्राकृतिक चिकित्सा के बाद। इन सबको देखपढकर बाबूजी के गोरखपुर प्रवास के समय सुठालिया में हम लोग सोचते रहते थे कि जब वे आयेंगे तो एकदम हट्टे-कट्टे होकर।
एक दिन देखा कि बाऊजी बक्सा हाथ में लिये सीढयाँ चढकर चुपचाप ऊपर चले आये हैं और हम यह देखकर कुछ चकित हुए कि वे हू-ब-हू वैसे के वैसे ही रखे हैं - गालों में वैसे ही गड्ढे, वही कृशकाय शरीर।
बाद में बाऊजी बताते कि प्राकृतिक चिकित्सा से लाभ तो बहुत हुआ था, पर उसके बाद भोजन में जैसा संयम रखना चाहिये था, वैसा वे रख नहीं पाये।
(३)
सुठालिया के स्कूल में बाऊजी प्रधानाध्यापक थे। ब्यावरा में कुछ महीनों की पढाई के बाद उसी स्कूल में पहली कक्षा में मेरा दाखिला हुआ। अध्यापक थे मुनव्वर अली। उस जमाने में पूरी एक क्लास एक अध्यापक के हवाले कर दी जाती थी। वहीं सारे विषय निपटा देता और लडकों को पीट पाट कर आदमी बनाने की कोशिश भी करता। मुनव्वर अली हमें जल्लाद जैसे लगते। उनका सामना करते समय रूह काँपती। बच्चों को पीटने की विविध विधियों का आविष्कार करने में वे माहिर थे। उनका एक थर्ड डिग्री मैथड था - दो अँगुलियों के बीच पेंसिल फँसा कर फिर दोनों अँगुलियों को कस कर दबाना। मुर्गा बनते समय घुटनों के अंदर से निकाल कर कान तक पहुँची हथेलियाँ अगर कानों की पकड छोडती, तो पीछे से नितंबों पर उनके डंडे की मार पडती। सुठालिया के उस स्कूल में वे बारी-बारी से हम तीन भाइय के शिक्षक रहे। मुनव्वर अली ईमानदार बहुत थे, छात्रों की धुनाई के मामले में भेदभाव कर ही नहीं सकते थे। हम हेडमास्टर साहब श्रीयुत गोकुलप्रसाद त्रिपाठी जी के बेटे हैं - यह जान-समझ कर भी हमारी पिटाई करने में उन्होंने कभी रहम नहीं खाया। हम घर में आकर उनके द्वारा दी गई सजाओं की चर्चा भी करते थे। बाऊजी के कानों तक भी ये चर्चाएँ पहुँचती ही थीं, पर वे तो स्वयं ही -*लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्*- पुरखों के इस वचन के कायल थे और एक अध्यापक के रूप में मुनव्वर अली के प्रशंसक भी।
स्कूल के सारे अध्यापक उनके परिवार के हिस्से थे। घर में अक्सर सारे अध्यापकों के लिये चाय पार्टी का आयोजन होता। मुस्लिम अध्यापकों के लिये चाय के कप-प्लेट एकदम अलग रखे जाते। इन्हीं पार्टियों में साँवरलाल जी माट्साब भी आते थे। वे निहायत सज्जन आदमी थे। रिश्ते में हमारे मौसा जी भी लगते थे। उठा कर के - यह उनका तकिया कलाम था, उनका हर वाक्य उठा कर के से शुरू होता, जिसको लेकर उनकी नकल उतारी जाती। इस बात को लेकर उनसे बाऊजी भी मजा लेते।
साँवरलाल जी माट्साब कक्षा दो में मेरे अध्यापक रहे। वे अक्सर हम लोगों को पाठ्यपुस्तक से किसी पाठ की स्लेट पर नकल करने का काम बताकर टेबल पर पाँव रखकर सोने लगते। बीच-बीच में चैतन्य होकर किसी भी छात्र को बुलाकर उसकी लिखी इबारत की जाँच करते। मैं कक्षा में अव्वल रहता था, मेरी इबारत जाँचने के लिये तो वे मुझे कभी बुलायेंगे नहीं - इस भरोसे में एक दिन धोखा खा गया। साँवरलाल जी माट्साब ने किसी पाठ की स्लेट पर नकल करने का आदेश दिया। मैं ऐसे पाठ खूब पढ चुका था, मुझे उसकी स्लेट पर नकल उतारने का काम निरर्थक लगता था, तो बजाय पाठ की नकल उतारने के मैंने स्लेट पर साँवरलाल जी माट्साब पर ही एक लघु निबन्ध लिख मारा। इसमें मैंने शायद इस तरह की बातें लिखीं कि साँवरलाल जी माट्साब अजीब मूर्ख हैं, पढाते हैं नहीं, सोते रहते हैं और लडकों से किसी भी पाठ की नकल लिखने का काम करवाते हैं।
ऐन उस वक्त जब मैं इस निबन्ध के उपसंहार भाग तक जा पहुँचा था। साँवरलाल जी माट्साब की आवाज सुनाई दी - ’राधावल्लभ, लाओ देखें, क्या लिखा है तुमने!‘
मुझे काटो तो खून नहीं। पिटाई करने में साँवरलाल भी कम नहीं थे, डील-डौल भी उनका भगवान की दया से कुछ ऐसा था कि मेरे जैसे मरियल लडके को एक ही झापड मार दें, तो वह वहीं ढेर हो जाये।
मैं डरते-डरते उठा और स्लेट उनके सामने पेश की। साँवरलालजी माट्साब ने उस पर नजर डाली और पढने लगे, तभी मेरे अक्ल ने कुछ काम किया। मैंने कहा - माट्साब, जल्दी-जल्दी में अच्छा नहीं लिख पाया, दुबारा अच्छी तरह लिख कर लाता हूँ। साँवरलाल जी माट्साब ने कहा - हाँ, हाँ, ले जाओ दुबारा लिखो और स्लेट लौटा दी। मेरे आजू-बाजू बैठने वाले लडके, जो मेरे रहस्य के भागीदार थे, मुँह दबाकर हँसने लगे। तब से लेकर आज तक यह मेरे लिये रहस्य बना हुआ है कि क्या साँवरलाल जी माट्साब ने मेरे लिखे उस निबन्ध के कुछ वाक्य पढ लिये थे अथवा बिना पढे ही स्लेट लौटा दी थी।
प्रधानाध्यापक के रूप में बाऊजी तो सारे अध्यापकों को साथ लेकर चलने वाले प्रशासक थे, वे बहुत लोकतांत्रिक थे, सारे अध्यापकों से बहुत सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध उनके थे।
(४)
सुठालिया से ब्यावरा की दूरी कोई सोलह मील रही होगी। बाऊजी अक्सर सुठालिया से ब्यावरा के नारायण आश्रम चले जाते, जहाँ स्वामी हरि ओमजी महाराज का डेरा था। ब्यावरा से सुठालिया के बीच बसें बहुत कम थीं, शायद शाम के बाद कोई बस मिलती नहीं थी। किसी रविवार को दिनभर आश्रम में बिताने के बाद सुठालिया लौटने के लिये जब बस नहीं मिलती तो बाऊजी पैदल ही सुठालिया के लिये चल पडते, चलते-चलते आधी रात को वे लौटते।
दो एक बार इस आश्रम में हम लोगों को भी रहने का मौका मिला। उसके बारे में फिर कभी। पर बाऊजी को आश्रम के स्वामी श्री हरिओमजी से, जिन्हें सब भगवन् कहकर सम्बोधित करते थे, कितना लगाव था और ये भगवन् भी उन पर कितना स्नेह रखते थे, यह इस बात से साफ है कि आठ-दस दिन आश्रम में रहकर जब हम लोग चल रहे थे, तो बाऊजी और भगवन् दोनों बिलख कर रो पडे। फिर बाऊजी झट से अपने आँसू पोंछते हुए हम लोगों के साथ हो लिये और सहज होने की कोशिश करते हुए उन्होंने कहा था, ठीक ही रहा तुम लोग यहाँ रह लिये... भोजन तो ठीक ही मिला यहाँ...
सच्चे साधु-संतों की उम्र में भले ही खोज रहती हो पर ढोंगियों से चिढते थे। सुठालिया का ही वाकया है। दोपहर का समय रहा होगा। एक महात्मा जी सीधे हमारे घर में आ घुसे। बासा‘ब से बात करने लगे। वे पूछ रहे थे कि आफ बेटे की कमाई कितनी है, कितना दान-पुण्य करता है वगरह। तभी मने देखा कि बाऊजी तमतमाये हुए अंदर के कमरे से निकले और चार आने का सिक्का महात्माजी की हथेली पर रखकर आवेश के साथ बोले - ’आपको तो सिर्फ यह चाहिए, इसको लीजिए और चुपचाप यहाँ से चले जाइये।‘‘
महात्मा जी अकबका गये। ’अरे-अरे‘, उन्होंने कहा और चवन्नी लिये हुए चुपचाप उठकर चलते बने।
बाऊजी जहाँ भी रहते कल्याण पत्रिका नियमित मँगाते, उसमें वे लेख भी भेजते थे। कल्याण के हर अंक में पढो, समझो और करो - शीर्षक से स्तम्भ रहता था। घर में अंक आते ही वह स्तम्भ मैं तुरन्त पढ जाता, क्योंकि उसमें कोई न कोई रोचक घटना रहती थी। फिर संक्षिप्त महाभारतांक आया, तो उसे पढने की कोशिश की। इस तरह एकदम कच्चे बचपन में मैं उस संसार का हिस्सा बनता गया, जो बाऊजी का सिरजा हुआ संसार था।
हारमोनियम को बाऊजी बडी नियामत की तरह सँभाल कर रखते। उस पर खाकी कपडे का कवर बंद करने के बाद चढाया जाता, फिर उसे लकडी की पेटी में रखा जाता। भाई साहब को और मुझे उन्होंने हारमोनियम बजाना सिखाया, अपनी निगरानी में वे हमें बजाने देते, बार-बार हिदायत देते कि धौंकनी जोर से नहीं धोंकना है, वह जर्मन रीड का बाजा है, तेज धोंकने से अगर रीड फट गई, तो बाजा गया। कभी थोडी तेज धौंकनी हो जाये, तो जैसे उनके प्राण गले में आ जाते।
बाऊजी ने हमें हारमोनियम बजाने के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के थाट सिखाये, कुछ रागों के जो भजन सिखाये, उनकी शिक्षा का ही नतीजा है कि शास्त्रीय संगीत के लिए अनुराग मेरे मन में आज तक बना रहा है। राग काफी में प्रभु तेरी दया है अपार और यमन में चरण कमल बंदौ हरि राई आदि उनके सिखाये कई भजन मैं हारमोनियम पर खूब बजाता। मीरा के भजन खासतौर से राग देश और मालकौंस में अधेड होने तक मेरे सुख-दुःख के संगी बने रहे। मेरे स्कूल के कार्यक्रमों में कक्षा दस तक अपनी पतली महीन आवाज में मैं हर तरह के गीत गाता और सराहा जाता। ताल में बाऊजी खुद ही कमजोर थे, तो ताल में मैं भी एकदम फिसड्डी बना रहा। सात-आठ साल की उम्र में हारमोनियम ने जैसे दूसरी दुनिया में पहुँचा दिया, आलम यह कि हारमोनियम हमें मुश्किल से आधे घंटे के लिये रोज उपलब्ध करवाया जाता, बाकी दिन अक्सर अपने राम हवा में हारमोनियम बजाते रहते। स्कूल जाते हुए या चलते हुए दाहिने हाथ की अँगुलियाँ काल्पनिक की-बोर्ड पर सरकती रहतीं और बायें हाथ का पंजा धौंकने की कुचेष्टा करता। एक बार बाऊजी ने इस भावातीत दशा में मुझे टहलते हुए देख लिया, तो बडे नाराज हुए और बोले - यदि हारमोनियम सीखने की वजह से दिनभर इस तरह अँगुलियाँ चलाते रहोगे, तो बंद कर दो सीखना।
घर में नित्य सुबह प्रार्थना होती थी। इसमें ईश्वर तू है सबका स्वामी क्षमासिंधु और अन्तर्यामी आदि हिन्दी के पदों, मीरा या नरसी मेहता के भजनों के अलावा गीता का एक अध्याय पढा जाता था। इसी सिलसिले में शायद बाऊजी ने मार्क किया हो कि मैं संस्कृत के श्लोक जल्दी याद रख लेता हूँ। उन्होंने मेरे ऊपर प्रयोग करना शुरू किया - पूरी गीता रटा देने का। उन्हें खुद पूरी गीता याद थी और रामचरितमानस पूरा कंठस्थ कर रहे थे। गीता का एक अध्याय लगातार कई दिन सुबह की प्रार्थना में पढा जाता, जब वह मुझे कंठस्थ हो जाता तो अगला अध्याय आरम्भ कर दिया जाता। यह सिलसिला शायद मैं तीन-चार साल का था, तब से शुरू हुआ होगा और जब मैं कक्षा छह में था तो मुझे पूरी गीता आद्यंत कंठस्थ थी। मैं सुबह एक घंटा पद्मासन में बैठकर धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे से आरम्भ करके अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक तक सारी गीता बिना पुस्तक के आँखें बंद किये मन में रोज दोहराता, क्योंकि बाऊजी चाहते थे कि मेरा अभ्यास बना रहे। इसमें रोज मुझे करीब सवा घंटा लगता। इसके साथ ही मुझे रामचरितमानस भी कठस्थ कराने की प्रक्रिया आरम्भ की गई, मैं उसमें से अयोध्याकांड के आधे हिस्से तक रट चुका था। दस-ग्यारह साल की उम्र में मुझे एक चमत्कारी बालक की तरह लोगों के सामने पेश किया जाता, जिसे पूरी गीता आद्यंत कंठस्थ थी और रामचरितमानस का भी एक बडा भाग याद था। तब तक हम लोग छतरपुर आ गये थे और वहाँ वकील श्रीनिवास शुक्ल जी मानस-सम्मेलन कराते थे। मेरा मुँह-जबानी गीता या मानस का पाठ उस सम्मेलन में रखा जाता, एक बार मेरा प्रवचन भी रखा गया। माध्यमिक विद्यालय तक यह क्रम चला, बाऊजी इस पर गर्वित रहते थे। रामचरितमानस पर प्रवचन की तैयारी के लिये वे मुझे सामग्री उपलब्ध करवाते।
मैं कक्षा नौ में आया, तो मेरा संसार बदलने लगा। भौतिकशास्त्र, रसायन और गणित मेरे विषय थे। विज्ञान की किताब से एक अलग दुनिया खुलने लगी। इस दुनिया का उस अध्यात्म के उस रहस्यमय संसार से तो कोई मेल ही नहीं था, जो बाऊजी का दिया हुआ था, जिसमें किसी ईश्वर ने सूरज-तारे-चाँद बनाये तथा जल, थल, अनल, पवन प्रकटाये थे। मेरे मन में सवाल बुदबुदाने लगे। हिम्मत कर के एक दिन उनके सामने जाकर सवाल दाग दिया - हमारी विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में लिखा है कि पृथ्वी आग का गोला थी, वह ठंडी हुई, तो पहले जलचर प्राणी उत्पन्न हुए, फिर बाकी सृष्टि आई। तो पुराणों में लिखी बातें सच हैं या यह सच है
बाऊजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया - जब विज्ञान पढो तो उसको सही मानो और जब पुराण पढो, तो उनको सही मानो।
इससे मेरा समाधान नहीं हुआ। मैं धीरे-धीरे उस संसार में और दूर तक चला गया, जिसमें ईश्वर के लिये जगह नहीं थी।
जो बात बाऊजी ने उस समय कही थी, उसे तो मैं अब अपने व्याख्यानों और लेखों में अपने शब्दों में प्रकारांतर से खूब कहता रहा हूँ कि सत्य इकहरा नहीं होता, परमसत्ता अपने को अनंत रूपों में व्यक्त करती है, यह सृष्टि ही विविधता पर टिकी है - वगैरह। पर उस समय तो यह पूर्वग्रह था कि यह भी सच और वह भी सच, ऐसा कैसे? बहुत बाद में मैटर पहले या चेतना पहले - इस सवाल का जवाब मुझे रामावतार शर्मा के परमार्थदर्शन में मिलता दिखा या अभिनव गुप्त के दर्शन में। परमार्थदर्शन पर मेरे लेख देखने के लिये बाऊजी इस संसार में नहीं थे, वे होते तो उसकी बातों को भी सत्य ही कहते।
(५)
बाऊजी काम के धुनी थे - आज की भाषा में जिसे वर्कोहोलिक कहा जाता है। पठन-पाठन, लेखन स्वाध्याय के अलावा कई तरह की सांस्कृतिक शैक्षणिक गतिविधियों के काम वे खुद अपने ऊपर ले लेते। छतरपुर में संस्कृत परिषद् के संचालन का काम ऐसा था, जिसमें उनका बेहद शारीरिक और मानसिक दोहन हुआ। संस्कृत परिषद् की गतिविधियों में एक संस्कृत पाठशाला की स्थापना भी थी। संस्कृत पाठशाला कायम की गई। राजगढ में बाऊजी के गुरु रह चुके हेडपंडित जी को उसमें अध्यापक नियुक्त किया गया। पाठशाला में छात्रों की आवश्यकता थी। मेरा और बडे भाई साहब का उसमें दाखिला दिलवा दिया गया। हम लोगों के कहने पर धीरेन्द्र सोनी आदि कुछ और विद्यार्थी उस पाठशाला में आ गये। स्कूल के अतिरिक्त वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के लिये शाम के समय उस पाठशाला में हम पढाई करने जाते।
हेड पंडित जी (रामसेवक मिश्र) लँगडा कर चलते थे, बोलते बहुत थे। उनसे कुछ सीखने समझने की बजाय हम लोग उनकी हँसी उडाने में ज्यादा सक्रिय रहते। बाऊजी अपने संस्कारों के चलते उन पर सहज श्रद्धा रखते थे, वे अक्सर सेठ मन्नी शुक्ला के मकान में हमारे घर पर आ जाते, बाऊजी उन्हें सादर प्रणाम करते, फिर उनके लिये चाय की व्यवस्था की जाती। उस पाठशाला में एक और पंडित चतुर्वेदी जी की नियुक्ति हुई, जो दिन में खादी ग्रामोद्योग में काम करते थे। वे केवल मध्यमा पास थे, पर व्याकरण उनकी पक्की थी। लघुसिद्धान्तकौमुदी जितनी जो कुछ उनसे उस समय पढ ली, वह मेरे अब तक काम आती रही है।
पाठशाला के इन दोनों पंडितों के अलावा खाली समय में बाऊजी स्वयं भी घर पर हम लोगों को वहाँ का कोर्स पढाते। प्रथमा में ही रघुवंश के पाँच सर्ग थे, जिन्हें पढाने का जिम्मा उन्हने ले लिया। रघुवंश के चौथे सर्ग में रघु की दिग्विजय का प्रसंग चल रहा था। उस प्रसंग में श्लोक है*-
दिशि मन्दायते तेजो दक्षिणस्यां रवेरपि।
तस्यां एव रघोः पाण्ड्याः प्रतापं न विषेहिरे।।
ताम्रपर्णीसमेतस्य मुक्तासारं महोदधेः।
ते निपत्य ददुस्तस्मै यशः स्वमिव संचितम्।।
स निर्विश्य यथाकामं तटैष्वालीनचन्दनौ।
स्तनाविव दिशस्तस्याः शैलौ मलयदर्दुरौ।।
इनमें कहा गया है कि दक्षिणायन होने पर तो सूर्य का भी तेज मंदा हो जाता है, उसी दक्षिण दिशा में रघु जब दिग्विजय के लिये गया तो उसका प्रताप पांड्यवंश के राजा सह न सके। ताम्रपर्णी नदी तक पहुँचने पर उन्होंने मुक्ताओं के रूप में महासागर का सार उसे अर्पित कर दिया। फिर जिनकी ढलानों पर चंदन लिपटा है या चंदन के पेड हैं, ऐसे मलय और दर्दुर इन दो पहाडों पर रघु ने डेरा डाला, जो उस दक्षिण दिशा के दो स्तन जैसे थे।
बाऊजी कालिदास को पढाते हुए मग्न हो जाते थे, कई बार श्लोक गा-गाकर पढाते थे। पर इन श्लोकों को पढने के बाद वे अटके। दो चार सैकण्ड संकोच में उनका चेहरा झुका रहा और मुँह से निकला - ओ-हो-हो...। फिर उन्होंने संकोच एक तरफ हटाकर रखा, पूरा अर्थ बताया और आगे बढ गये।
अपने समय के दिये हुए शर्म के नकली और झूठे आवरण उतार कर संस्कृत कविता को किस तरह पढना है, यह मैंने तभी से यह समझ लिया।
कक्षा छह में मुझे कुछ छात्रवृत्ति मिली। पाँच रुपये जब मेरे पास जमा हो गये, तो मैं जिला पुस्तकालय का सदस्य बन गया। पहली पुस्तक जो ईश्यू कराई, वह थी देवकीनंदन खत्री का भूतनाथ। भूतनाथ की ख्याति से बाऊजी अपरिचित तो थे नहीं, पढक्कड भी वे बहुत थे, पर राजगढ, ब्यावरा या सुठालिया में तो कायदे के पुस्तकालय थे नहीं, इसलिये बहुत सी पुस्तकें जो वे पढना चाहते रहे होंगे, पढ नहीं पाये होंगे। मेरा लाया भूतनाथ उन्होंने भी पढने के लिये उठा लिया। इसके बाद मेरी लाई हुई पुस्तकों को वे भी पढते जाते, समय की तंगी रहती तो कई बार भोजन करते समय भी जितना पढ लिया होता, उसके आगे का हिस्सा मुझसे पढवा कर सुनते। जब तबादला होने पर वे पन्ना में थे और मैं छतरपुर से बी.ए. करके पन्ना आया, तो पन्ना के जिला पुस्तकालय का भी मैं सदस्य बन गया। वहाँ मुझे अमृतराय की लिखी प्रेमचन्द की जीवनी कलम का सिपाही मिल गई। मैं इसे पढ रहा था, बाऊजी ने मुझसे किताब के बारे में चर्चा सुनी, फिर यह काफी मोटी किताब भी उन्होंने पूरी पढ डाली।
पढने की आदत उन्हीं से मिली। जो भी किताब हाथ में आती पढकर देखता। छतरपुर में मैं नौवीं कक्षा में रहा होऊँगा, एक बार घर पर शाकुंतल पढ रहा था। बाबूजी कॉलेज से लौट कर आये। उन्होंने देखा, फिर कहा - शाकुंतल पढ रहे हो? मुझे लगा वे फिर कहेंगे - बेटा, अभी तुम्हारी उम्र इस किताब को पढने की नहीं है। पर उन्हने धीरे से कहा - ’’ठीक है, पढ लो।‘‘
संस्कृत परिषद् की गतिविधियों में उसके कार्यक्रमों में बाहर से अनेक विद्वानों को व्याख्यान के लिए बुलाया जाता। इन्हीं में से इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत दीक्षित आए। घर पर उनका भोजन हुआ। ऐसे लोग घर आते, तो मैं उत्सुकता से सत्संग व चर्चा सुनता।
कृष्णकिशोर द्विवेदी जी और लक्ष्मीकांत दीक्षित जी उस दिन घर में भोजन के बाद चर्चा कर रहे थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बडे प्रोफेसर हैं - यह सोचते हुए बाऊजी ने अमृतलता में छपी अपनी कविताएँ दीक्षित जी को दिखाईं। दीक्षित जी ने कविताएँ पढीं, धीरे से कहा - अच्छा लिखा है, सरल है।
जी, मैं तो इसलिए बताना चाहता था कि कहीं कुछ त्रुटियाँ रह गई हों - बाऊजी ने बेहद संकोच और विनम्रता के साथ कहा।
कृष्णकिशोर द्विवेदी जी ने कहा, यह तो आपकी विनम्रता है।
अब दीक्षित जी अपनी सुनाने पर आ गये। उन्होंने कहा कि उन्होंने लोकभाषा के एक दोहे का संस्कृत में अनुवाद किया है। दोहे में मणि से जडे नहाने के लिये बदन घिसने के काम में आने वाले खालरगडू की व्यथा है -
अधमया ननु सेविकयाऽनया
चरणयोर्मृदितोऽस्मि न तद् व्यथे।
गुणविदाऽपि पदा दलितो यदा
किमविदा हृदयं न विदीर्यताम्।।
जिसका मूल दोहा यह है -
जब चेरी एडी दई भई कछू ना पीर।
जानि जौहरी पग दियो फाट््यो मोर शरीर।।
दीक्षित जी ने इसकी व्याख्या की, फिर गा-गाकर अपना अनुवाद और मूल दोहा सुनाया। बाऊजी बहुत मुग्धभाव से दीक्षित जी की सराहना करते रहे।
वर्षों बाद सागर विश्वविद्यालय की नौकरी में पंडित बच्चूलाल अवस्थी जी से परिचय हुआ। उनके साथ चर्चाएँ होती रहती थीं। एक दिन उन्होंने बताया कि उनके सहपाठी थे लक्ष्मीकांत दीक्षित, जो बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गये थे। छात्र जीवन में अवस्थी जी ने एक दोहे का अनुवाद संस्कृत में किया था - अधमया ननु सेविकयाऽनया। दीक्षित जी ने कहा कि यह अनुवाद हमें अर्पित कर दो। अवस्थी जी ने कहा - चलो, कर दिया। दीक्षित जी ने पूछा - तो हम इसे अपना लिखा बताकर सुना सकते हैं? अवस्थी जी ने कह दिया - हाँ।
यह इस घटना का अवस्थी जी का बताया वर्जन है। लक्ष्मीकांत दीक्षित जी बहुत लोकप्रिय अध्यापक रहे हैं और उनके शिष्य इस पर उत्तेजित होकर इस वर्जन को मिथ्या घोषित कर सकते हैं। पर मुझे विश्वास है कि आचार्य अवस्थी, जो बीसवीं शताब्दी के सबसे बडे महाकवियों में एक हैं। एक जरा से श्लोक को लेकर झूठ नहीं बोलेंगे। प्रोफेसर लक्ष्मीकांत दीक्षित उस झूठ को सच बनाकर जिंदगी भर भले उसका तमगा लगाये रहें।
छतरपुर में एक अप्रैल को सरस्वती वाचनालय के प्रांगण में मूर्ख सम्मेलन होता है। एक से एक शरीफ सज्जन लोग उसमें हद दर्जे की बेशर्मी और नंगई पर उतर आते। जो श्रीनिवास शुक्ल जी मानस सम्मेलनों के आयोजन के रूप में धर्मप्राण परम ज्ञानी नजर आते थे। उनकी निहायत चुगद आदमी के रूप में जमकर खिंचाई होती। पिताजी की ओर से कभी रोक थी ही नहीं कि हम बच्चे उसमें न जाएँ। पूरा मूर्ख सम्मेलन हम सुनते, हँसते-हँसते लोट-पोट होते रहते। चतुरेश जी बुंदेली और हिन्दी के सरस कवि थे। आजादी की लडाई के दौर में उनका परदेसी अपने घर जाओ जैसे गीत लोग रुच-रुच कर सुनते थे। आवाज उनकी दबंग, सुरीली और मीठी थी, काया लहीम शहीम - हाथी की तरह। मूर्ख सम्मेलन में वे हास-परिहास के सबसे ज्यादा विषय बनते, चतुरेश चूतियों के राजा जैसी काव्य रचनाएँ उन्हें लेकर प्रेम से सुनाई जातीं। उपाधियाँ दी जातीं। बाऊजी इस सम्मेलन के लिये भी अपनी कविता लिखते। कॉलेज में संस्कृत नाटक उनके निर्देशन में होते।
इस सबके बीच उनके भीतर एक अलग संसार था, जिसमें उनके मन में एक कोना लिखने के लिये सदा तैयार रहता, एक और कोना अध्यात्म-साधना के लिये। बाऊजी की कई छवियाँ मन में हैं। नीचे बैठकर हारमोनियम की संदूक को टेबल बनाकर लिखते बाऊजी, घंटों एकांत में साधना और ध्यान करते बाऊजी। रोज की आपाधापी में कॉलेज देर से पहुँचने पर खिन्न होते बाऊजी। भजन गाते प्रवचन करते बाऊजी और इस बीच वे अपने भीतर के अध्यात्म के निगूढ अनुभव व्यक्त करते हुए कुछ लिखते रहने वाले बाऊजी। वे रोजमर्रा के अनुभवों पर कुछ न कुछ लिख देते। साधना के अपने निगूढ अनुभवों को भी कभी रचनाओं में अभिव्यक्ति देते। जैसे इस अशआर में -
नम हुई माचिस नहीं जलती कभी
वासनामय साधना चलती नहीं कभी।
संस्कृत में डायरी वे लिखते थे। एक बार उनकी डायरी में मैंने यह वाक्य लिखा देखा - ’अद्य प्रभृति महाविद्यालयात् श्वेतमृत्खण्डानयनं न करिष्यामि इति निश्चितम्‘। यानी कि आज से कॉलेज से खडया के टुकडे लेकर नहीं आऊँगा, यह तय कर लिया। इसमें खडया या चाक के लिये संस्कृत में लम्बा शब्द बनाया गया है - श्वेतमृत्खण्ड। बहरहाल इस प्रविष्टि का रहस्य यह है कि बाऊजी की कक्षा में पढाते समय खडया के जिन टुकडों का ब्लेकबोर्ड पर लिखने के लिये इस्तेमाल करते थे, उनमें से कुछ उनकी पेंट की जेबों जाने या अनजाने पडे रह जाते, वे टुकडे घर में आ जाते। घर में हम भी उन्हें किसी काम में ले सकते थे। अब इस पर बाऊजी की नैतिक चेतना ने उन्हें कचोटा होगा कि इस तरह तो कॉलेज की सरकारी सम्पत्ति का उपयोग करने का पाप उन्हें लग रहा है।
छतरपुर में प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराने के लिए छात्र आते रहते। इसके लिए ट्रू कॉपी की एक रबर की मोहर बनाई गई। पिताजी के नाम की मोहर अलग थी। एम.ए. करने के बाद नौकरी के आवेदन के लिये जब अपने प्रमाणपत्र और अंकसूचियों की प्रतियाँ सत्यापित कराने के लिये मुझे दर-दर भटकना पडा, तो समझ में आया कि बाऊजी की यह अहैतुकी कृपा गरीब छात्रों के लिये कितना सहारा रही है। इसी समय का उनका यह अशआर है -
क्या लगाते सील ट्रू कॉपी पे तुम
खुद न ट्रू कॉपी हो जब इंसान की।।
आर्थिक तंगी ने जीवनपर्यन्त उनका पीछा नहीं छोडा। बडा कुनबा था, हमारी बुआओं में दो - चंदाबाई और भगवतीबाई को छोडकर बाकी उनसे बडी थी। उनको छतरपुर में लाकर उनकी सेवा करना, बासा‘ब के इलाज का खर्चा, सबसे बढकर हम सब भाइयों के स्कूल की फीस वगैरह - इस सबके चलते हाथ तंग ही रहता। छतरपुर की कई दुकानों पर उधार चलता था, महीने की पहली तारीख को बिना नागा उन सबका हिसाब चुकता किया जाता। उस पर भी गरीब विद्यार्थियों की मदद तो वे करते थे, बशर्ते कि ऐसी असमंजस की हालत न आ जाये, जिसे उन्होंने अपने अशआरों में बयां किया है -
सर, मुझे पन्द्रह रुपये दे दीजिये।
पहले हफ्ते में कहा तुमने न क्यों।।
सिर्फ पन्द्रह ही रुपये की बात है।
आखिरी हफ्ते में कुछ माँगो न यों।।
हालातों के चलते वे चिढचिढे भी हो गये थे, कई बार अपने मन के एक कोने में अपना एक लाकर बनाकर उन्होंने अपने कुछ दुःख उसमें रख दिये थे। प्रेमशंकर शुक्ल के शब्दों में, कभी-कभी उसमें से कोई दुःख निकाल कर वे उसे अपने किसी गीत में डाल देते और गीत और दुःख दोनों को भूल जाते। हमारी पहली बाई की बरसी पर एकांत में हार्मोनियम निकाल कर यह गीत गाते थे -
दिल भर आता, दुःख छा जाता,
जब याद तुम्हारी आती है।
यह गीत किसी और को सुनाने के लिये नहीं था। यह एक लम्बा गीत था, कालिदास के रघुवंश में अजविलाप की तरह। यों यह उस समय के फिल्मी गाने तन डोले मन डोले की धुन पर रचा गया था। यह उनकी किसी कॉपी में नहीं मिला। इसकी न कहीं चर्चा होती थी, न इसे अन्यत्र कहीं गाया जाता था।
है बडी गर्मी उमस भी खूब है।
सब से सहती वो नन्हीं दूब है।।
कलाम-ए-गोकुल की ये पंक्तियाँ शायद उन्होंने अपने खुद के लिये लिखी हों।
साहित्य के अध्ययन और लेखन में उनका दायरा बडा था, वे फिल्मों के गानों की तर्ज पर भजन भी खूब लिखते, उपनिषदों का अध्ययन भी करते और गंभीर विवेचनात्मक निबन्ध भी लिखते। ’लीजिये पान!‘ और ’लो पियो चाय!‘ जैसी उनकी लम्बी कविताएँ कवि सम्मेलनों में लोकप्रिय होतीं। इन्हीं के बीच बहुत महीन बात करती, ऐसी पंक्तियाँ भी वे लिख जाते।
वे नौकरी करते हुए विनम्र बने रहे, जिन महाविद्यालयों में सेवा की। उनके प्राचार्य के समक्ष वे सदा विनम्र बने रहे। बहुत सारी बातों के ढकते और धकते जाने देते रहे। उनके भीतर के संत और फक्कड ने उनसे यह भी लिखवाया ही -
जब तलक ’धक‘ ’धक‘ ये दिल कहता रहेगा।
तब तलक यह जिंदगी धकती रहेगी।।
एक दिन दिल धक से जब रह जाएगा।
सब यहीं उस दिन पडा रह जाएगा।।
मनुष्य स्मृतियों का पुतला है। स्मृतियों के द्वारा हम अपने आपको पहचानते हैं, अपने अतीत को पहचानते हैं। इस पहचान के क्रम में हम अपने को रचते हैं, अतीत को रचते हैं। क्या हम वही होते हैं जो हम स्मृतियों के वातायन से झाँक कर अपने को देखते हैं? स्मृतियों में जो हमारा रूप झलकता है, क्या वही हम हैं? स्मृतियों के द्वारा हम अतीत को रचते हैं। हम और हमारा अतीत सब उस दृश्य के हिस्से बन जाते हैं, जो स्मृतियों के पर्दे उघडने से खुलता है। हर बार पर्दे नये सिरे से खुलते हैं, दृश्य हर बार फिर नये सिरे से खुलता है। इस क्रम में स्थिर कुछ नहीं रह पाता - न हम, न अतीत। द्रष्टा और दृश्य दोनों बदलते जाते हैं।
आत्मा वै जायते पुत्रः - उपनिषद् कहते हैं। आदमी की आत्मा उसके बेटे के रूप में उतरती है। हम संतानों की अस्थि, मांस, मज्जाओं को हमारी माताएँ अपना तिल तिल देकर रचती हैं। हमारे आत्मा में अक्स पिता का उतरता है। यह अक्स धुँधला होता जाता है। पर वह उतने गहरे तक हमारे भीतर पैठा होता है। वह हमारे अस्तित्व का हिस्सा बना रहता है। इस तरह पिता की स्मृतियाँ कहीं व्यक्त, तो कहीं अव्यक्त, कहीं बहुत प्रकट तो कहीं बहुत धधली होकर हमारे भीतर समायी रहती ह। इनमें जो स्मृतियाँ जितनी ही धूमिल और अव्यक्त होती हैं, उतनी ही भीतर गहरी खुभी हुई और ताकतवर वे होती हैं।
बाऊजी की ज्यादातर व्यक्त स्मृतियाँ उस काल की हैं, जो भारत के इतिहास में नेहरू का युग था। यह राजनीति में रूमानियत का युग था, फिल्मों में रूमानियत का युग था। बाऊजी तो खुद मोहम्मद रफी या दूसरे फिल्मी गायकों के गाने अपनी धुन में मगन होकर यों ही कभी-कभार गाने लग जाते थे। इस समय फिल्मों में रूमानी संसार में अपनी बहुत नाजुक, महीन मखमली आवाज से मन को छूने वाले गायक हुआ करते थे - तलत महमूद। तलत महमूद के गाये गीत इसी रूमानियत के युग की उपज थे। उन्हीं के एक गीत की पंक्तियाँ हैं -
याद रह जाती है और वक्त गुजर जाता है
फूल खिलता भी है और खिल के बिखर जाता है
सब चले जाते हैं, कब दर्द-ए-जिगर जाता है...
मैं सागर विश्वविद्यालय में एम.ए. कर रहा था। हॉस्टल में रहता था। भीषण आर्थिक तंगी थी। उन दिनों महीनों मैंने उन्हें पत्र नहीं लिखा। एक दिन उनका पोस्टकार्ड आया, जिसमें बहुत दिनों तक मेरे द्वारा पत्र न लिखने की शिकायत के बाद चार शब्दों का यह वाक्य था - ’इतने निर्मम न बनो।‘
यह वाक्य मेरे भीतर अमिट याद बनकर धँसा रह गया है। अंततः इस तरह की ही याद, याद की तरह साथ रह जाती है।
संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ आधुनिक साहित्य के गंभीर अध्येता प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे हैं। फिलहान वे पुणे में रहते हैं।