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चन्द्र कुमार की पाँच कविताएँ

फरियाद
(१)
वैभव नहीं है अब ये मेरा
किसी के संग्रह का हिस्सा हो चला है
किसी की विरासत होना
सालता है अब मुझे
सदियों तक थाती रही
इस शहर की
- अब भुरभुरा रही हूँ
क्या मिला मुझे लेकिन
खुद अपने शहर में
रेत के टीलों के बीच
छटपटाते
बेबस, लाचार मैं
अनवरत टूटती-तोडी जा रही हूँ
और आप, बस देख रहे हैं
- क्या आप पत्थर हैं

(२)
आह तक नहीं निकालते
उखाडे-उजाडे जा रहे पत्थर
आँखें लेकिन डबडबा आई हैं
- लाचार हवेली की
नोचते जा रहे हैं हम
उसका गुलाबी चेहरा।

(३)
सूरज की आग
निकल जाती है पार
छेदती हुई
मेरी परछाईं
क्या यही है
देखना
अपनी ही मौत की चहलकदमी
खुद अपने ही आँगन में

(४)
भले ही हो पत्थर
मेरा तो लेकिन ईश्वर था
जुदा होने से जिसके
मौत से वीरानों ने
घेर लिया है अब मुझे
छटपटाती मैं
कब तक बच पाऊँगी
बिना अपने ईश्वर!

(५)
वक्त के थपेडे तो
फिर भी सह लेती
पत्थर जो है
- मेरा हमसाया
खुद खिरता रहेगा मेरे साथ
मिलते हुए मेरी ही मिट्टी में

उपेक्षा लेकिन कैसे सहूँ
उसकी
धूप फाँकते हुए -
गढता रहा जो मुझे सालों तक

उसी की बस चिंता है
खाये जा रही है जो अब मुझे।

युवा कवि, टिप्पणीकार और संस्कृतिकर्मी भी हैं।