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लाल्टू की पाँच कविताएँ

(१)
जाते हुए अच्छा या चलूँ जैसा कुछ कहा था तुमने
आने वाले तूफानों से अनजान वह लम्हा था
हम अलग-अलग यात्राओं पर निकल पडे थे
मैंने जेह्व में सम्भाल रखी थीं तुम्हारी नाजुक भंगिमाएँ

तुम्हारे चुप-चुप नयन मेरे हर तजरबे में साथ चल रहे थे
मेरी आँखों में कैसी हसरत बस गई थी
हर मंजर में खून दौडता था
हर सिम्त तुम्हारी महक थी

दरख्तों के पत्तों में बेसब्र सिहरन थी
हर पल लगता था कि कहीं से तुम देख रही हो मुझे
कि मुझे धरती पर खुला छोडने के लिए बेताब हो तुम
जितना कि मैं तुमसे बँधा रहना चाहता था

या कि तुम भी मुझे बाँध रखना चाहती थी
और मैं तुम्हें पँखुडयों सा खोलना चाहता था

(तुम्हारी चुप आँखें कह रही हैं मुझे कि मैं वही हूँ
कितना चाहा था मैंने तुम्हें इसका हिसाब लगा रहा हूँ)

(२)
कल शाम देर तक बिजली कडकती रही
दूर चट्टानों पर बादल बिछ गए थे
गीली हवा थी और मैं प्यासा था
तुम्हारे बिन मेरा बदन बेजान-सा फर्श पर टिका था

गरज-गरज बादल अँधेरे की चुप्पी तोड रहे थे
हवा के साथ बौछारें आ-आ मुझे भिगोती रहीं

छुअन की याद थी या वह सचमुच अगन थी
प्यास थी या बिजली की चाह थी कि मुझमें से गुजर कर धरती को चूमे
झुलस जाऊँ, तुम्हारे स्वाद-गंध के तीखेपन में हुलस जाऊँ
उन अकेले गलत लम्हों में झूठ-सच सब कुछ पिघल रहा था
कायनात भर में फैला भारी अहसास था कि तुम मेरे पास नहीं थी

(३)
बादल लिपटे हुए हैं आपस में
दूर कहीं उनमें से कोई धरती को चूम रहा है
आसन्न रति की उमंग में लाल हो चुकी है पीठ
अनजाने ही बादल उमड-घुमड रहा है

जैसे मेरे खयाल हैं बार-बार तुम्हें ढूँढते
बादल के बदन में धरती चुभोती है काँटे
हवा साँय-साँय मुझ तक ले आती है सुखभरी पीड
एक टिमटिमाता तारा वक्त से पहले ही मुस्कुरा उठता है

आह! बहार के आखिरी और ग्रीष्म के पूर्वाभासी मेघ
क्या तुम मेरे मेघदूत हो
आषाढ से पहले ही पूछ रहे
मेरे छंदहीन संवाद जो ढो कर ले जाने हैं तुम्हें

जाओ कह देना उसे कि चट्टानों में देखता हूँ उसे
तडपता हूँ पर जानता हूँ कि तुम्हारी तरह उच्छृंखल है वह भी
इसीलिए डूबा रहता हूँ जो है नहीं पूर्णता के एहसास में कि
वह है तो सभी मौसम मेरे पूरे हैं

वह है तो मेरे दिन और रात हैं
ले आना उसे अपने साथ
आषाढ के मत्त घुमड में
उसकी चुभन के इंतजार में जीता हूँ बसंत और ग्रीष्म।

(४)
जुलूसों में मजलूमों के बीच
भरी दीर्घाओं में समागामों में
हर कहीं जहाँ कहीं जाता हूँ
तुम साथ होती हो

जुल्मों के पहाड खडे हैं हर ओर
हमारे पास इतनी ही ताकत है कि हम साथ हैं
अकेले में भी सभी बंद दरवाजे हमारे लिए खुल जाते हैं
कुदरत को मालूम है कि हम जामे-फना पी चुके हैं
हमारी हर साँस साथ-साथ चलती है

और धरती पर पौधा-पौधा खिलखिला उठता है
जहाँ कहीं भी तुम हो
जानता हूँ कि साथ गा रही हो तराना
कि दुनिया में हर किसी को प्यार मिले
खत्म हो जाएँ कौमों के बीच दुश्मनी
हर कोई जन्दगी की जीत गाए
हर कोई जन्नत है प्रीत गाए।

(५)
तुम नदी हो, आस्मां हो
बादल, दरख्तों के बीच से गुजरती हवा हो
छाया-सी हो मुझे अपने अंदर समेटती
मुझमें समा जाती
खालिस अगन हो
खून हो मुझमें बहता हुआ
मुझमें असंख्य दीप जलाती चिनगारी हो

मैं खरबों साल पहले लिखा गया समीकरण हूँ
तुम आई और मेरी सरहदें खुल गईं
जाने कितने परिन्दे आ बस गए मुझमें
मैं उड चला अनंत असीम की ओर
सुपरिचित कवि लाल्टू अपनी प्रेम कविताओं के लिए माने-जाने जाते हैं। वे पेशे से वैज्ञानिक हैं, पर उनकी रुचि और अध्ययन के क्षेत्र में साहित्य और दर्शन भी शामिल हैं।