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लीलाधर जगूडी की तीन कविताएँ

(१) शून्य का सूनापन
जितनी खाली जगह है, वही शून्य काम का है
पृथ्वी के लिए और मनुष्यों के लिए भी

रेल, हवाईजहाज और बसों के लिए भी
वही खाली जगह काम आती है
एक साइकिल के लिए भी और सिलाई मशीन के लिए भी
एक टांके से दूसरे टांके के बीच जो खाली जगह होती है
वही सिलाई को जगह देती है
कोई भी जगह अपने लिए इसी शून्य को बचाती है

इन्हीं खाली जगहों के जुड जाने से
बनता है महाशून्य
शब्दों और ध्वनियों की तरंगें हमें
शून्य का धनी बना देती हैं

पृथ्वी से सटे धूलसने शून्य के मुँह को
बादल और हवा धो-पोंछ देते हैं
दिमाग को वायुमण्डल और हृदय को
जलाशय बनाते हुए

सोचता हूँ, क्या कोई ऐसी जगह भी होगी शून्य में
जहाँ उलटी बारिश होती हो अंतरिक्ष की ओर
कौन से समुद्र में समाता होगा
वहाँ की नदियों का वेग
शायद हर ग्रह का अपनी सीमा में ही होता होगा
अपना पाताल

बहुत से धरातलों के बावजूद
अंतरिक्ष में खाली जगहों की कमी नहीं होगी
क्या वहाँ भी कोई - बहुत रात हो गयी - कहता हुआ
शून्य में लगे अपने बिस्तर पर
अगले दिन की चिंता में सो पाता होगा

नींद में तो और भी बढ जाता होगा
शून्य का सूनापन
जो रात में पृथ्वी पर बरसता है अंधेरे की तरह
अपने को फैलाता रहता है शून्य का सूनापन।

(२) भूगोल की हवाएँ
भूगोल की टेढी-मेढी हवाएँ जब तक
सीधी कर पाती हैं अपनी कमर
तब तक कई और सांसारिक झंझावात आ जाते हैं
जिनके बीच पृथ्वी से चिपक कर
घरेलू दिव्यांग हवाओं को
कई मोडों से मुड जाती गलियाँ ही ठीक लगती हैं
जहाँ उलट-पुलट में भी चिडयाँ घोंसले बनाना नहीं छोडतीं

वे सौवीं मंजिल पर भी अपनी जमीन
अपना आसमान ढूँढ लेती हैं
उनकी उडान देखकर, पूरे दृश्य में
खुशबुओं के पर निकाल कर
अपनी जगह रहकर भी उड जाते हैं फूल

फलों सी झरती पकी हुई पत्तियाँ भी
नंगे होते जाते पेडों के बीच नाचने लगती हैं
(शायद इसी को कहते होंगे
हर हाल में खुश रहना)

कुछ पत्तल जैसे पात भी, जमीन छू-छू कर
आसमान चलकर दिखाते हैं
हर समृद्धि का शोकभरा श्राद्ध भी
उत्सव जैसा ही होता है

बच्चों की तरह दिखते पौधे भी
हाँ में ना, ना में हाँ कह कहकर
दुनिया में चमत्कार की तरह
अपने झगुले बदल ही लेते हैं

गलतफहमी की खुशफहमी में
हवा चीरते पहाड समझते हैं
कि दोनों ओर से नहीं चारों ओर से उड रहे हैं वे

जन्म के पहले दिन से ही
आग और पानी के दो डैने लेकर
ये नहीं, वो नहीं - की - जद्दोजहद में
उन्हीं के सिर पर नाच रही है हवा

कुछ चीजों से पसीना, कुछ से बसंत
कुछ से लगातार खून टपक रहा है।

(३) खेल-खेल में
एक लडकी पुलिस बनी है
एक लडका चोर

वह उसे पकडती है, पीटती-घसीटती ले जाती है
खेल में दरोगा बनी दूसरी लडकी के पास

चोर बना लडका प्रतिकार नहीं कर रहा
जैसे जानता हो कि पकडे जाने पर एक चोर को
अनकी‘ चोरियाँ भी कबूलनी पडती हैं
ऐसे में कम मार ही न्याय लगने लगती है

अलग-अलग नामों और परिस्थितियों के बावजूद
सारी चोरियाँ, चोरों ने ही की हुई होती हैं
इसलिए भाईचारा और समाजदारी का भाव
चोरों पर शोध का विषय बन जाता है

...बच्चों तक में चला गया
चोर और पुलिसिया तिकडमों का सांस्कृतिक ज्ञान

लडकी पुलिस ने इस तरह बहुत से लडके पकड लिये हैं
दरोगा लडकी ने - स्त्री-विमर्श के तहत
बुरी तरह फँसा दिये हैं सारे लौंडे

चोर व्यवस्था में कमाई भर उत्कर्ष का
पैमाना छलक रहा है

वैध और अवैध कमाई का फर्क मिटाते हुए
कभी इधर, कभी उधर सक्रिय दिखती है पुलिस

वरिष्ठों के खेल प्रतिबिम्ब जैसे
बच्चों के इस खेल को क्या नाम दिया जाय

मगर यह भी निवेदन है
कि आर्थिक तनाव और लैंगिक भेदभाव के नाम पर
खेल-खेल में निपटारे की खानापूर्ति करते हुए
इसे स्त्रियों के प्रति अन्याय कहकर न टाल दिया जाय!

‘ अनकी = जो नहीं की है।

हिन्दी के वरिष्ठ कवि-आलोचक लीलाधर जगूडी अनेकानेक सम्मानों से अलंकृत हैं। वे हिन्दी में अपनी रचनाशीलता के लिए जाने-माने जाते हैं।