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लडकी, शहर और गुम होती खामोशी...

उपासना
दृश्य तेजी से गुजर रहे थे। आँखें अभी द्रष्टव्य को खुद में भर भी नहीं पाती थीं और नया दृश्य सामने आ जाता था। बस की खिडकी पर लगातार पानी टपक रहा था। हवा के साथ आती झपासें शरद के चेहरे और शर्ट को भिगो जाती थी। सीट भीग गयी थी। सभी यात्रियों ने बाज दफे खिडकी बंद करने को कहा। पर शरद मानो कुछ न सुनता निर्लिप्त बैठा रहा।
शायद वह सारी चीजें सुनकर भी अनसुना कर रहा था। उसकी सारी ऐन्द्रिक चेतना और सजगता उसकी आँखों में आकर ठहर गई थी।
मानसून अभी शुरू ही हुआ था। धुली हुई लम्बी सडक पर बस दौडती चली जा रही थी। बारिश ने पत्ते-पत्ते डाल-डाल को धो डाला था। बस की छत पर बजती हुई बूँदें एक उदास संगीत रच रही थीं। शरद जानता है, इस तरह गली-गली, चौराहे-दोराहे उसे ढूँढते रहने का कोई अर्थ नहीं...कलकत्ते जैसे शहर में आखिर इस तरह वह कहाँ दिखेगी...कैसे दिखेगी
उसका आना न आना... निश्चित रूप से उसकी इच्छा पर निर्भर था। विक्टोरिया मेमोरियल के आसपास गलीचे सरीखी घास पर वह देर तक यूँ ही टहलता रहा। बारिश में मिट्टी गीली थी। कहीं- कहीं थोडा पानी ठहर गया था। शरद का उजला पैजामा कीचड के नन्हे-बडे धब्बों से भर गया था। पर वह बेखबर सा भीगता घूमता रहा। अंत में थककर एक बेंच पर बैठ गया।
मामा से शरद का याराना और मामापने के बीच का कुछ था। शरद ताश के पत्ते फेंटे जाते, मामा बढया झालमूढी तैयार करते। उनके प्याज काटने के दरमियान शरद शरतचन्द्र के किसी गल्प का सस्वर पाठ करता होता। नीचे सडक पर लगातार गाडयों की आवाजाही लगी रहती थी। पों-पों से सडक गुंजायमान रहती। मानसून आने को होता... शरद खिडकी के पल्ले खोल दिया करता। नमी भरी हवा कमरा ताजगी से भर देती। वक्त बढया गुजर रहा था। मामा-भांजे के बीच पन्द्रह वर्ष का अंतर उनके खुलेपन के बीच कभी आडे नहीं आता था। ऐसे ही पिछले बरस के मानसून में जब शरद अपनी स्क्रिप्ट पूरी करने में जुटा था ...बारिश की मोटी धार खिडकी के पल्लों पर धाड-धाड वार कर रही थी... मामा दरवाजे पर एक लडकी को लिए खडे थे। काली तात साडी में लगभग भीगी हुई वह सहमी-सकुचाई मामा के पीछे खडी थी। शरद ने उडती नजर से ही ताड लिया था कि गेहुँआ रंग की यह लडकी अद्भुत आँखों वाली थी...
’’इसके माँ-बाप गुजर गए हैं। मामी अपने बूढे शराबी भांजे से इसका ब्याज करवाने पर अडी थी...।‘‘
’’हुम्म!‘‘
’’आज स्कूल से बाहर निकला तो देखा एक कोने में खडी रो रही थी। मैंने कहा चल...रसोई वगैरह ही सम्भाल लेना।‘‘
और इस तरह वह लडकी इनके दो कमरों के दडबे में एक कोना पा गई थी।
मामा-भांजे की रहनवारी में कुछ जरूरी बदलाव हुए। अब भांजे का कमरा रसोईवाली लडकी का कमरा था। शरद ने मामा के कमरे में शरण ली। लडकी बिलाशक कार्यकुशल थी...उसने पूरी तरह रसोई को सम्भाल लिया। शरद का अनुमान भर था कि वह उससे चार-पाँच बरस छोटी ही होगी।
क्या दुनिया में कोई ऐसा शब्द, वाक्य, कविता, गीत बचे थे जो अब तक रचे न गए हों? ऐसा कोई भाव था जो सर्वथा नवीन व अक्षत हो... ना कुछ भी तो नहीं। दुनिया के सारे प्रेम बासी पड चुके थे। शरद सोचता कि वह ऐसा क्या दे सकता है उसे, जो अब तक कभी दिया न गया हो? अपनी समस्त ऊर्जा... अपनी पूरी मानवीय ऊष्मा... से वह उसे घेर देना चाहता था। जहाँ वह पूरी स्वतंत्र होती। जहाँ उसका पूरा-पूरा स्व-स्वीकार्य व सम्मानित होता।
वह पहली लडकी नहीं थी जीवन की... न वह यूँ ही अप्सरा ही थी। सोचकर आश्चर्य होता है कि उसकी याद में भी शरद को उसका पसीना ही याद आता है। चूल्हे की हांडी में कलछुल चलाते वक्त उसकी तीखी शानदार नाक के नीचे इकट्ठा पसीने की नन्ही-नन्ही बूँदें। हमेशा पसीने से पसीजी रहने वाली उसकी गुलाबी हथेलियाँ।
’’एक ठो खेला देखेगा शरद?‘‘
रोचक उपन्यास के क्लाइमेक्स पर पहुँचे शरद ने विघ्न पडने पर भौंहें सिकोड कर देखा। मामा के चेहरे पर शैतान नाच रहा था।
’’अरे! देख तो।‘‘ शरद का आशय समझ कर मामा ने पुचकारा।
रैक पर सजी तमाम किताबें-कॉपियों के ढेर से वे एक रफ कॉपी के कागज का नन्हा टुकडा फाड लेते हैं।
’’चुम्की! अपनी हथेलियाँ तो आगे कर!‘‘
मामा के आदेश पर उसने अनजाने ही दोनों हथेलियाँ आगे कर दी थीं।
शरद ने देखी लम्बी-पतली उँगलियाँ। हथेलियों पर नमी अर्धचन्द्र रेखा... अर्थात् सुन्दर वर का योग। शरद का मन क्षणभर को पुलकित होकर अवसाद के तीव्र ढालों पर सरपट लुढकता चला गया। क्यों...? मालूम नहीं।
मामा की आवाज पर उसने अवकाश ले बाहर झाँका था।
’’देख!‘‘ मामा ने कागज का वह टुकडा लडकी की हथेली पर रखकर उसकी मुट्ठी बंद कर दी थी।
मिनट भर बाद उसने मुट्ठी खोली। कागज का वह टुकडा बुरी तरह भीग गया था। शरद मामा का मुँह देखने लगा। मामा हँस पडे।
’’इतना पसीना क्यों होता है तुम्हें?‘‘
शरद पहली बार प्रत्यक्षतः लडकी से मुखातिब था। सम्भवतः उसके लहजे में अवश्य चिंता का पुट भी रहा होगा, तभी तो मामा गम्भीर हो गए थे।
मासूमियत से कंधे उचकाकर लडकी कच्चे केले उबालने में लग गई।
हर आदमी के अंदर एक शहर था जैसे और हर शहर एक आदमी का चेहरा था।
’’आपको देखकर मुझे आसनसोल क्यों याद आता है?‘‘
पहली दफे लडकी के इर्द-गिर्द सायास बाँधी शिराएँ जरा देर को ढीली पडी थी। खुशगवार हैरत से शरद ने लडकी को देखा था। उसके धुले-रूखे बाल चेहरे को ढँकते-सहलाते फरफरा रहे थे। कुछ सघन सा तिरने लगा।
’’माँ बाबा के साथ मैं वहीं रहती थी न!‘‘
शरद लडकी को देखता रहा। उसके देखने में कुछ था। लडकी सकुचाई। फौरन से पेश्तर ही उसने अपने गिर्र कसे बंधनों को दुगुनी सख्ती से कस लिया था। खिडकी ही कमबख्त हवा का बायस थी। लडकी ने भडाक से पल्ले लगा दिये। कोई मतलब नहीं था, फिर भी शरद को लगा जैसे भीतर कहीं बहुत भीतर धक से चोट लगी हो। लडकी को मानो इतने भर से संतोष न हुआ हो। उसने अपने बाल बेदर्दी से मरोडकर जूडा कस लिया।
शरद गहरी साँस भरकर रह गया।
बिल्डिंग से उतरकर शरद जैसे गली में बढता, उसे लगता कि एक दृष्टि लगातार उसका पीछा कर रही है। अनायास उसकी नजरें अपने कमरे की खिडकी पर उठ जाया करती। फौरन ही उठा हुआ पर्दा गिरा दिया जाता। खिडकी पर शून्यता छा जाती। मुस्कुराता हुआ शरद आगे बढ जाता। बेशक यह खामोशी का एक लुभावना खेल था। वे दो लोग अपना-अपना एकांत रच रहे थे... स्वयं से भी छुपाए! यह खामोशी दिनों- दिन ठोस व सघन हुई जाती थी।
शरद इसे खामोशी ही नहीं रहने देना चाहता था। पर अभी उसका खुद का क्या निश्चित ठिकाना था
’स्वप्नलोक‘ के एक सहायक संपादक की आखिर क्या हैसियत थी
बेशक आरम्भिक संघर्षों के पश्चात् शरद को एडिटिंग रूम में प्रवेश मिल गया था...पर किसी शर्त पर? उसे रील के बंडल एडिटिंग रूम से धुलाई के लिए लैब में पहुँचाने होते। एडिटर महोदय के रील एडिटिंग के दौरान प्रोजेक्टर के नीचे लेटकर लीवर खींच उसे रोकना होता। यह एक सख्त काम था।
इतने संघर्षों के बीच वह लडकी को कहाँ से एक सुंदर जीवन के सपने दिखाता?... उसने खुद को समझाया... ’खामोशी को और पकने देना चाहिए।‘
इस बीच उसे यूनिट के साथ शूटिंग के लिए सुंदरवन जाना पडा। बेहद मेहनती व परफेक्शनिस्ट डायरेक्टर महोदय ने सही ढंग से ’सूर्योदय‘ को कैमरे में कैद करने में तीन सुबहें लगा दीं। चौथे दिन वह घर पहुँचा। घर वाकई घर बन चुका था। दपदपाते हुए सिंदूर में चुप-चुप सी गृहस्थिन चाय छान रही थी। मामा अखबार पढ रहे थे।
शरद दरवाजे पर ही ठिठक गया...
’’लोग बातें बनाने लगे थे शरद!‘‘
उसके चेहरे पर द्रुत गति से आते-जाते रंगों को देखकर मामा ने मुस्कुराने की चेष्टा की।
शरद समझ पा रहा था कि मामा पैबंद लगाने की कोशिश कर रहे हैं। ठीक इसी क्षण उसे खुद से भय लगा। भीतर से यह तीव्र इच्छा हिलोर ले रही थीं कि वह पैबंद नोचकर मामा को उनकी असलियत दिखा दे। वह कुछ क्षण चुप खडा रहा, फिर उसने मामा की दायीं हथेली थाम ली...
’’बधाई मामा! आप दोनों को शुभकामनाएँ!‘‘
कहकर शरद रुक नहीं पाया। जल्दी-जल्दी अपने कागज-पत्तर समेट निकल गया...
’’स्टूडियो पहुँचना जरूरी है। चार-पाँच दिनों बाद लौटूँगा।‘‘
वह हफ्ते भर बाद लौटा। चीजें बदल चुकी थीं। घर में खामोशी की सघनता कम न हो रही थी। मामा इसे समझते। इससे डरते भी...और भरसक इस खामोशी को छिन्न-भिन्न कर डालना चाहते थे।
बारिश के साथ हवा भी थी। बेंच के पास एक काला पॉलिथीन पडा था। पॉलिथीन का एक सिरा पत्थर से दबा था। दूसरा सिरा स्वतंत्र हवा में झूल रहा था। हवा के दबाव से फूली हुई पॉलिथीन स्वतंत्रता के लिए मानो पत्थर से संघर्ष कर रही थी। शरद ने पैर बढाकर पत्थर खिसका दिया। पॉलिथीन दूर तक उडती चली गई। शरद ऊबर वहाँ से चल पडा। फिर वही बस का सफर। वही भीगी सडक और लोगों का हुजूम।
धर्मशाला पार हो रहा था। बारिश की बौछारों के बीच भी लोग छाते, रेनकोट से लैस बाजार में टूट पडे थे। सूखे दिनों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नरमुंड दिखते थे... आज रंग-बिरंगे छाते दिख रहे हैं। एक पुरानी इमारत की जर्जर दीवार में पीपल का एक नया पौधा बढ रहा था।
’’ऐसा भी होता है?‘‘ शरद सोचकर रह गया।
उसने याद करने की कोशिश की...कि आखिरी बात क्या थी? परसों शाम ही तो!
रात के साथ बादल का अंधेरा घुलमिल गया था। सीढयों पर पीले बल्ब की बीमार रोशनी टिमटिमा रही थी।
शरद ने भीगा हुआ काला छाता दरवाजे के बगल में ही टिका दिया। छाते की नोक से टपकती हुई पानी की बूँदों ने एक पतली-सी रेखा बना दी जो सीढयों से नीचे बहती गई। शरद ने दरवाजा खटखटाने को हाथ उठाया ही था कि कमरे से बाहर तक एक जनाना खिलखिलाहट तैर गई। शरद वह आवाज पहचानता था। उसका हाथ अधर में ही ठहर गया। खिलखिलाहट कुछ देर बाद ही मद्धम हो पाई। उसने दस्तक दी। कुछ क्षण का अंतराल और लडकी दरवाजा खोले खडी थी।
शरद ने उसे देखा, अपनी सम्पूर्ण उपेक्षा व वैराग्य के साथ। लडकी के होठों पर खेलती हँसी के बचे-खुचे कतरे सहसा ही लुप्त हो गए थे। अजीब से तास्सुरात लिए शरद का चेहरा विकृत दिखने लगा।
वह भीतर चला आया।
’’अरे! आओ शरद...आओ! मैं चुम्की को तुम्हारे बचपन की शरारतें ही सुना रहा था।‘‘
’’.............‘‘
’’किस प्रकार तुम साबुन के खाली खोखे में कागज, बालू और कंकडया डालकर सडक पर रखते और लोग-बाग उसे असली साबुन समझकर उठा लिया करते थे।‘‘ मामा हलके से हँस पडे थे।
’’वर-वधू के बीच मेरी कैसी बात?‘‘
शरद के लहजे में अनचाहे ही तुर्शी आ गई।
मामा शायद अपनी धुन में थे। उन्होंने सुना नही... पर शरद ने कनखियों से देखा, लडकी का चेहरा उतर गया था।
बस झटका खाकर रुक गई थी।
’’बांसद्रोनी! बांसद्रोनी!‘‘*कर्कश आवाज से शरद की तंद्रा भंग हुई। वह चुपचाप नीचे उतर आया।
बच्चू दा की ’टी-शॉप‘ एक अलहदा चीज ही है। शरद टिन के शेड में बैठ गया। बारिश के कारण लोग नगण्य थे। शरद गिलास में उडती भाप के परे अपने संघर्ष के शुरुआती दिन देख रहा था। इसी ’टी-स्टॉल‘ पर उसे भानु मिला था। भानु ’बंसल प्रोडक्शन‘ में लाइटमैन था। शरद को लगा था मानो एक सिरा मिल गया हो।
जिस दिन भानु ने शरद को ’माणिक दा‘ के सामने खडा किया... शरद अपने सर्वश्रेष्ठ कपडों में था। माणिक दा ने एक नजर में उसका तामझाम देखा।
’’ऐसे कपडों में तू काम क्या करेगा?‘‘
’’कुछ भी करूँगा दादा!‘‘ शरद की आवाज में उत्साह था।
दादा ने शरद को जो काम सौंपा उसे सुनकर कुछ लोग कुटिलता से मुस्कुराए, कुछ दया भाव से! शरद के चेहरे पर एक शिकन तक न थी। उसने उन्हीं कपडों में स्टुडियो ऑफिस में पोंछा लगाया। कुछ दिनों तक चाय सर्व करता रहा।
शरद देखता माणिक दा छः-छः, सात-सात घंटे लगातार काम करते और आखिर में थक कर फर्श पर चित्तान लेट जाते। वह कोमलता से उनके कंधे, बाँह दबाता रहता। इसमें उसका कोई स्वार्थ न था। बस शरद को कर्मठ लोगों पर ऐसे ही स्नेह हो आता था।
माणिक दा उसका स्नेह भाव समझते थे। वे धीरे-धीरे उसे डायरेक्टर व एडिटिंग की बारीकियाँ समझाते जाते। वह तन्मयता से सुनता...
’’तेज बारिश आने वाली है बाबू! दुकान बंद होगी अब!‘‘ बच्चू दा उसे वर्तमान में खींच लाये।
चाय के पैसे चुकाकर वह डेरे की तरफ चल पडा। घुप्प अंधकार को स्ट्रीट लाइट्स अपने दम पर चीर रही थी। कुछ देर से वह लडकी को भूले हुए था। ’शंकर घोष लेन देखकर उसे लडकी, छटपटाहट, उदासी और तीन दिनों से मारे-मारे फिरने की यंत्रणा सब याद आ गए।
मन-मन भर भारी पैरों से वह सीढयाँ चढता गया। दरवाजा खुला था।
शरद दरवाजे पर खडा रहा। उसका मन हुआ कि अभी और एकदम अभी यहाँ से चला जाये। कहीं भी... पर यहाँ नहीं। वह यह सब सोच ही रहा था कि कमरे के एक कोने से घंटी टुनटुनाने की आवाज आई। शरद ने झाँककर दरवाजे के पीछे देखा...लडकी ठाकुर जी को दीया दिखा रही थी। शरद हकबक-सा खडा रहा। हठात् उसे मालूम हुआ कि वह कितना थका है। उसके पैर दर्द से फटे जा रहे हैं। अब तक मन उद्विग्न था तो वह कुछ समझ नहीं पा रहा था... अब मन शांत हुआ तो देह अपने कष्ट दिखाने लगी। शरद थस्स से चौखट पर ही बैठ गया। लडकी ने मुडकर देखा, शरद को बैठे देखकर वह ठिठकी। फिर उससे एक हाथ की दूरी पर बैठ गई। शरद ठाकुर जी के सामने जलते दीये को देखता रहा। उसकी आँखें नामालूम दुःख से छलछला आईं। लडकी के खामोश आँसू धीमे-धीमे बह रहे थे...
लडकी ने घुटनों में सिर रख दिया। उसकी देह रह-रहकर हिल रही थी। शरद खामोश दीये की टिमटिमाहट को तकता रहा...कई क्षण बीत गए। सहसा लडकी ने घुटनों से सिर उठाया...
’’तुम...तुमने ऐसे क्यों देखा था? इतनी घृणा से!!‘‘ आगे के शब्द लडकी के रुँधे हुए गले में ही घुट गए।
दीया सहसा अपने सम्पूर्ण लौ पर भभक उठा। उसका अवसान समीप ही था।
’’अरे भाई शरद...तुम आ गए। इनको अपने मामा की याद आ रही थी। सो बिना बताए ही बोका लडकी गायब हो गई। देखो तो मौसम कितना बढया हुआ है। मैं तो सिंघाडा और चमचम लेता आया।‘‘
हाथों में थैले लटकाए मामा हँसते सीढयों पर बढे चले आ रहे थे।
लेखन और पेंटिंग में सक्रिय उपासना की पहली कथा पुस्तक एक जिंदगी... एक स्क्रिप्ट भर! पर भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार। वे अध्ययन-अध्यापन से जुडी हैं। फिलहाल स्वतंत्र लेखन में रत हैं।