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मँगते

प्रभात
नट, बंजारों और रैबारियों की तरह हमारे भी डेरे हो गए हैं। हम एक बस्ती से बाहर के उजाड में पेड के नीचे रहते हैं। खाने के लिए कहीं से कुछ मिल जाए, इस तलाश में मैं सुबह जगते ही निकल पडता हूँ। आज जब इधर आ रहा था तो बाबा खाट में पडे-पडे बडबडा रहे थे - ’जंगली जीवों की सुरक्षा के नाम पर सरकार ने हमारी जमीन को जंगल में ले लिया। हमारे खेत हमसे छिन गए। घर-बार छीन लिया। ...अब वहाँ फौजी रहते हैं, ठेकेदार रहते हैं और उनके मजदूर और उनके ट्रक। ...हमारे वहाँ से हटते ही जंगल में बाघ घट गए। पेड कट गए। होटल बन गए। जंगल अमीरों की सैरगाह बन गया।‘
सरकार ने जब हमें बेघर कर दिया तो सब बिखर गए। कुछ दिन तो बाबा ने पहाडी खदान से खडी निकाल कर गाँव-गाँव बेचने का काम किया, लेकिन पुलिस ने खदान से खडी खोदने पर भी रोक लगा दी। जैसे-तैसे चूल्हा जल पाता। कभी किसी दिन चूल्हा नहीं भी जलता। इसलिए कभी आसपास तक के भी किसी गाँव में जब कोई धरम होता, शादी-ब्याह होता, मृत्युभोज होता तो हम लोग बिना बुलाए ही जीमने जाने लगे। ऐसा हम पहली बार ही कर रहे थे। मन को मार-मार कर किसी तरह खाने के लिए जाते। गाँवों के लोग हमें मँगते (माँगकर खाने वाले) कहकर पुकारने लगे।
इस सूनी जगह की तरह ही हमारा घर भी बिल्कुल सूना है। कच्ची दीवारों पर टाट के पाल डाले हुए थे। मकान के नाम पर यही है। थोडी सी जगह को झाडकर पत्थरों की बाड की हुई है। यह आँगन है। आँगन में मेहन्दी की कुछ झाडयाँ रोप लीं। एक नीम का पेड भी लगाया, जो अब छह महीने बडा हो गया है।
गर्मियों के दिन हैं। दिनभर धूल के भरभूडे उडते हैं। अगर किसी भरभूडे में फँस जाऊँ तो मेरे जैसे दुबले-पतले तेरह साल के लडके को तो वह न जाने कितनी दूर तक उडाता हुआ ले जाए। इन धूलभरी आँधियों से बचने के लिए मैं सुबह-सुबह ही ठकुराइन के बाग वाले रास्ते से चला जा रहा हूँ।
यह खजूरों का बाग है। इसकी ऐसी कोई बाडबंदी नहीं है। यह जंगल का ही हिस्सा है। मगर ठकुराइन का कब्जा होने की वजह से यह ठकुराइन का बाग कहलाता है। गर्मियों में खजूरों के फल आते हैं। ठकुराइन इन दिनों में अपने कुत्ते और आदमी यहाँ छुडवा देती है। मुझे खजूरों के बाग जाता देखकर ठकुराइन के आदमी ने मुझे घुडकी लगाई - ’ओ मँगते! माँगखाणी जात कहीं के। बाग में क्या कर रहा है बे?‘ मैंने पगडण्डी में खडे-खडे ही पूछा - ’क्या है?‘
उसने फिर घुडकी दी - ’अगर खजूर के फल बीने तो यहीं गड्ढा खोदकर गाड दूँगा, समझा! खजूर उग जाएगी साले पर।‘
मैंने कहा - ’मेरा इनसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं तो अपने रस्ते जा रहा हूँ।‘ उसने मुझे जाने दिया। मेरे पीछे कुत्ते भी नहीं छोडे।
जब भी कोई इस तरह का बर्ताव मेरे साथ करता, बाबा की बातें मेरे कानों में गूँजने लगतीं - ’सुबह से भोजन और काम की खोज में इधर-उधर भटकते हैं। कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा, क्या मिलेगा, कुछ मिलेगा भी या नहीं, कोई ठिकाना नहीं। अनेक बार पूरे परिवार को खाली पेट पर हाथ रखकर सोना पडा है। हमसे अच्छे तो कुत्ते-बिल्लियाँ हैं, उन्हें कोई चोर तो नहीं कहता। माँगकर खाने वाली जात तो नहीं कहता। उन पर पग-पग पर किसी तरह का शक तो नहीं किया जाता। उनकी पहचान तो साफ है। हमसे बार-बार हमारी पहचान पूछी जाती है।‘
जब तक मैं तालाब पर पहुँचा, तीखी धूप की चिलकियाँ मेरी नंगी पीठ में चुभने लगीं। यह तालाब भी ठकुराइन का है। उसके मजदूर यहाँ से मछली पकडते हैं। ट्रकों में भरकर शहर भेजते हैं। अभी दूर-दूर तक कोई नहीं है। इस डर से कि कोई देख न ले। कोई आ न जाय। मैंने जल्दी-जल्दी कुछ मछलियाँ पकडीं, थैले में छुपाई और तेजी से तालाब से दूर चला आया।
आगे जंगल था। खूब तेज पड रही दोपहरी में भागता-हाँफता घर पहुँचा। झोला खूँटी पर टाँगा और मचोले में ढह गया। थकान इतनी भर गई थी कि मेरी आँख लग गई।
’यह मोर कहाँ से ले आया बेटा?‘ बाबा ने पूछा।
’मैं जब लौट रहा था। मुझे जंगल की गढार में एक बैलगाडी मिली।‘ मैंने बताया, ’उसमें औरतें बैठी हुई थीं। उन सबने रंग-बिरंगी लूगडयाँ ओढी हुई थीं। मैं बैलगाडी के पीछे-पीछे चल रहा था। मैंने गाडीवान से पूछा - ’क्या मैं पीछे लटक जाऊँ?‘
गाडीवान ने मुझसे कहा, ’दूर हट साले मँगतों की औलाद।‘
मैं बुदबुदाया - ’तुमसे कब और क्या माँगकर खाया?‘
बैलगाडी में यह घायल मोर था। उन औरतों ने कहा - ’यह हमारे किसी काम का नहीं, मगर यह बैलगाडी से उतर ही नहीं रहा। तू इसे ले जा।‘ कहते हुए उन्होंने वह मोर मेरी ओर बढा दिया। मैंने उसे ले लिया और कंधे पर बैठा लिया। वह मेरे कंधे पर से उडा नहीं। जैसे बैलगाडी में बैठा था, वैसे ही कंधे पर बैठा रहा।‘
तभी मुझे बाबा दौडते हुए आते दिखे। चौकी का सिपाही उनके पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने देखा कि बाबा हाँफ रहे हैं। मैंने जो डण्डा रख छोडा था, उसे उठाकर वे बोले - ’वहीं रुक जाओ।‘
मैंने भी हाथ में पत्थर उठा लिया और बोला, ’आगे बढे तो मैं तुम्हारी आँख फोड दूँगा।‘
सिपाही पर हमारी धमकियों का कोई असर नहीं हुआ। बल्कि वह पूछने लगा - ’क्या पका रहे हो? तुम छोंकने के लिए तेल लाने गए, मैं उसी से समझ गया था कि आज जरूर कुछ मजेदार फगा तुम्हारे यहाँ।‘
’मगर हम तुम्हें नहीं खिलाएँगे।‘ बाबा ने चीखते हुए कहा।
सिपाही अपने साथ कुत्ता भी लाया था। उसने वह मेरे पीछे लगा दिया। कहने लगा, ’तू मेरी आँख फोड देगा। आँख फोडेगा तू मेरी। जा शेरू बता इसे एक पुलिस के सिपाही की आँख फोडने की जुर्रत करने की क्या सजा है कानून में।‘
मैंने एक ईंट का टुकडा उठाकर कुत्ते पर मारा लेकिन वह तो मेरी ओर भौंकता हुआ आता ही जा रहा था। बाबा कुत्ते से मेरी रक्षा नहीं कर पा रहे थे, जबकि मैं उनकी ओर रोंआसी आँखों से देख रहा था। तभी कुत्ते के आक्रमण से मेरे दिल की धडकन ही जैसे रुक गई और आँखें आसमान की ओर फट गई। कुत्ते ने मेरे ऊपर छलाँग लगा दी।
’बाऽऽऽबाऽऽऽ!‘ मैं चीखते मचोले में उछल पडा।
’क्या हुआ बेटा! क्या सपने में डर गए?‘ बाबा ने मुझे झिंझोड कर जगा दिया।
’हाँ ऽऽऽक...कुछ नहीं...कुछ भी नहीं। डर गया था हाँ...।‘ मैं उठकर बैठ गया फिर बाल्टी से पानी लेकर मुँह धोया।
’थाली ले आ। खाना खाते हैं।‘ बाबा ने कहा।
’हाँ, अभी लाता हूँ।‘ डर अभी मेरे भीतर बना हुआ था।
हम जैसे ही खाने बैठे, पगडण्डी में चौकी की ओर से एक पुलिस वाला आता दिखा। बाबा ने उठकर उसकी अगवानी करते हुए कहा, ’आओ साब, आओ। आज तो आपकी पसन्द की चीज बनी है - मछली।‘
’मैंने तुम्हें गाँव से छोंकने के लिए तेल लाते देख लिया था। तभी समझ गया, कुछ फगा तुम्हारे यहाँ। क्या मस्त पकाते हो यार तुम। जा रे छोरा, एक थाली और उठा ला।‘
सिपाही ने मेरी तरफ लाल आँखों से देखते हुए और स्प्रीट की जैसी बदबू से भरा मुँह खोलते हुए कहा।
’थाली तो और नहीं है। यह ढक्कन है। इसमें खा लो, मैं बाद में माँज कर खा लूँगा।‘ मैंने सूखी हुई आवाज में उससे कहा।
’चलो ठीक है।‘ कहने के बाद वह दो रोटी और सारा साग भकोस गया।
शाम होते-होते रेतीली आँधी चलने लगी। रात तक आँधी चलती रही। पेड तले खुले में पडे हमारे घर की जगह रेत से भर गई। रात बहुत हो चली थी। मेरी आँखों में दूर-दूर तक नींद नहीं थी। बाबा घायल मोर की तरह छटपटा रहे थे। कभी खडे होकर घूमने लगते, कभी बैठ जाते। मैं धूल से अटे आसमान में पीले चाँद को देखता रहा।
कविता, कहानी लेखन में समान रूप से सक्रिय प्रभात हिन्दी के समर्थ युवा रचनाकारों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।