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तकषी शिवशंकर पिल्लै की कहानियाँ ः केरलीय जीवन का प्रामाणिक यथार्थ

डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ
ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित मलयालम के यशस्वी कथाकार तकषी शिवशंकर पिल्लै की तीस कहानियों का संग्रह ’मंगलसूत्र‘ भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली से १९९१ ई. में प्रकाशित हुआ है। इसमें प्रो. जोसफ मुण्टशेरि की ’भूमिका‘ और रचना-प्रक्रिया से सम्बन्धित तकष्ाी की दो टिप्पणियाँ रचनाकार और उसकी कहानियों को समझने में सहायता देती हैं। इनसे ज्ञात होता है कि श्री तकष्ाी ने लगभग पाँच सौ कहानियाँ लिखी हैं। हालाँकि वे अपने उपन्यासों के लिए बहुत जाने गये हैं, लेकिन स्वयं उनका विचार है कि उन्हें उनकी कहानियों में बेहतर ढंग से देखा और समझा जा सकता है। तकष्ाी का विचार है कि उनकी कहानियों में मामूली और गरीब लोगों का दुःख-दर्द केन्द्र में है। प्रो. जोसफ मुण्टशेरि ने पाया है कि गरीबों की जन्दगी से साक्षात् करते हुए कहानीकार ने मुख्यतः नारी जीवन की विषमताओं को रेखांकित किया है। ’अंधे की धन्यता‘, ’बेटियाँ, ’गोरा बच्चा‘, ’मंगलसूत्र‘ आदि कहानियाँ इस कथन को प्रमाणित भी करती हैं। लेकिन अन्य कहानियों को पढ जाने के बाद लगता है कि तकष्ाी की कहानियों को कुछ निश्चित विषयों तक सीमित रखना बेमानी है। उनकी कहानियों में पर्याप्त वस्तु-वैविध्य है, जो उनके अनुभवों की व्यापकता को सूचित करता है।
’मैं कैसे कहानी-लेखक बना‘ शीर्षक टिप्पणी में तकष्ाी ने स्वयं को प्रतिबद्ध लेखक मानते हुए लिखा है, ’’मैंने केवल सामाजिक समस्याओं को ही उठा लिया है। कुछ गम्भीर हो सकती हैं और कुछ हलकी। पर मेरी हर कहानी में कोई समस्या अवश्य रहती है।‘‘ कहानीकार की यह स्वीकारोक्ति ध्यानाकर्षक और महत्त्वपूर्ण है। कहानीकार का लेखन सोद्देश्य है। वह जिन समस्याओं और विसंगतियों को कहानियों म रेखांकित करना चाहता है, उनमें से अधिकतर का सम्बन्ध अधिसंख्यक समुदाय की भूख, अभाव और निर्धनता से है। प्रो. मुण्टशेरि ने यदि तकष्ाी की कहानियों के केन्द्र में ’गाँव की चीखों और दुखों की जन्दगी‘ को माना है, तो यह अयथार्थ नहीं है। ’विरासत‘, ’मात्तन की कहानी‘, ’फौजी‘, ’अनाथ की मृत्यु‘, ’अंधे की धन्यता‘, ’बेटियाँ‘ आदि कहानियाँ केरल की जनजीवन में वर्ग-विषमता और आम आदमी की नियति से सम्बन्धित हैं। लेकिन स्थानों और व्यक्तियों के नाम बदल दिये जायें तो ये न केवल केरल अपितु समूचे भारत के दीन-हीनों की दुर्गति और दुर्दशा का प्रामाणिक बयान लगती हैं। ’मात्तन की कहानी‘ पढते हुए प्रेमचन्द की ’सवा सेर गेहूँ‘ और ’सद्गति‘ सरीखी कहानियाँ बरबस याद आती हैं। मेहनतकश मात्तन और उसका पूरा परिवार जन्दगी भर चाक्को के लिए बेगार करता रहता है और अपनी अर्जित राशि भी वहीं जमा कराता रहता है। लेकिन चाक्को उसका धन हडप कर जाता है और मात्तन और उसका सारा परिवार भूख और निराशा में घुटने के लिए अभिशप्त रहता है।
तकष्ाी की कई कहानियों में भीख माँग कर गुजारा कर रहे पात्र हैं। ’एक दिन सवेरे वह भिखारी धानी पर पीठ लगाये मृत दिखाई दिया‘ (विरासत), ’बचपन में जब भीख माँगता गली-गली दिखता था‘ (फौजी), ’क्या तुम भीख नहीं माँग सकते‘ (अंधे की धन्यता), ’भिखारिन ने दुनिया के प्रति घृणा की हँसी हँस दी‘ (बेटियाँ), ’एक अज्ञात भिखारी बच्चे को कूडा-करकट के बडे से पीपे के निकट दूसरा भिखारी दोस्त मिला‘ (कराची से), ’भीख में जो हाथ लगता‘ (चुकौती), ’तभी से वह भीख माँगता रहा है‘ (अनाथ की मृत्यु) आदि उद्धरण गवाह हैं कि तकष्ाी ने गरीबी की रेखा से बहुत नीचे का नारकीय जीवन जी रहे प्राणियों की जन्दगी पर विस्तार से लिखा है। इस तरह का लेखन प्रत्यक्ष अनुभव गम्भीर समाज-संपृक्ति और मानवीय सदाशयता के अभाव में सम्भव नहीं है। इन कहानियों में एक ओर वर्ग-विषमता का लोमहर्षक यथार्थ हमारे सामने आया है, दूसरी ओर समानता, ईश्वरभक्ति, सदाशयता आदि अवधारणाएँ और मूल्य-मर्यादाएँ भी कसौटी पर चढी हैं। भीख माँगने की स्थिति आने के लिए जिम्मेदार तत्त्वों की खोज में कहानीकार ने पाया है कि समृद्धजन अपनी पिपासा शांत करने के लिए गरीब युवतियों का यौन-शोषण करते हैं और उसके फलस्वरूप उत्पन्न संतान अनाथ होकर अंततः भीख को ही एकमात्र विकल्प पाती हैं। ’फौजी‘ में ’कहीं होगी यह अभागिन नारी‘ और ’गोरा बच्चा‘ में सोने के सिक्के देकर लूट ली गई चिरूता का प्रसंग यही प्रमाणित करता है। ’बेटियाँ‘ में माँ इसलिए अपनी बेटियों को बेचने के लिए विवश है कि वह विधवा, दहेज की व्यवस्था नहीं कर सकती - ’’माँ कैसे दहेज इकट्ठा करे? माँ ने बहुत कोशिश कर देखी। पैसे के बिना कोई शादी नहीं करेगा, मेरी विधि ही ऐसी है, बेटी! अपनी संतानों के पास न रहते मैं मर जाऊँगी। हम गरीब जो ठहरे।‘‘ कालिदास ने ’एकोहि दोषो गुण सन्निपाते‘ कहकर दारिद्र्य की भयावहता की ओर जो संकेत किया था, वह तकष्ाी की कहानियों में प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह व्यक्त है। समाज, विशेषतः सम्पन्न वर्ग की मानसिकता पर प्रत्यक्ष-परोक्ष आरोप, आक्षेप और प्रहार करते हुए तकष्ाी ने एक तरह से अभियुक्तों की शिनाख्त करने की कोशिश की है। ’अनाथ की मृत्यु‘ में मक्कार की मृत्यु के बाद लोगों की सदाशयता पर कहानीकार की टिप्पणी है - ’’जन्दा मक्कार को कुछ देने को हिचकते थे। जन्दा मक्कार दूसरों से माँगता रहा। अब मुर्दा मक्कार को देने को लोग तैयार थे...‘‘। यह कहानी ’कफन‘ (प्रेमचन्द) की याद दिलाती है, जिसमें घीसू ने सम्पन्न लोगों की इसी तरह की मानसिकता का उल्लेख किया है। इस कहानी का ’मक्कार‘ ’जिन्दगी और जोंक‘ (अमरकांत) के रजुआ का ही कोई भाईबंद लगता है, जो जन्दगी से जोंक की तरह चिपका हुआ था।
हालाँकि तकष्ाी की इन कहानियों में केन्द्रस्थ सामान्यजन बहुत निरीह और कमजोर हैं, उसमें अपनी दुर्गति के लिए जिम्मेदार तत्त्वों के विरोध की चेतना का अभाव है, फिर भी ’वह लौट आयेगा‘ जैसी एक-दो कहानियों में श्रमजीवियों के विद्रोह और विरोध का संदर्भ है। विरोध करने वालों का नेता श्रीधर उस विपन्नता की गोद में पैदा हुआ है, जिसमें फँसी हुई ममता बेटे को कभी-कभार यह आश्वासन दे पाती थी - ’मेरे लाल! आज तुझे माँड छुडा कर भात खिलाऊँगी।‘ जहाँ ’भात‘ खाना भी घटना है, उत्सव है, वहीं से गरीबों के सही प्रतिनिधि का जन्म सम्भव था। लेकिन पूँजीपतियों, जमींदारों और मजदूर विरोधी सरकार का गठजोड उसकी जान ले लेता है। फिर भी विद्रोही भाव खत्म नहीं होता है, कत्लेआम का फैसला जनता की अदालत में होता है। तकष्ाी ने ’वह लौट आयेगा‘ की माँ के रूप में एक सबल और सकारात्मक चरित्र की रचना की है और इसे पढकर गोर्की की ’माँ‘ का स्मरण अस्वाभाविक नहीं है।
तकष्ाी ने ’कराची से‘ एवं ’गाँधी जी का अंत‘ शीर्षक कहानियों में साम्प्रदायिक विद्वेष के कारणों और नतीजों पर विचार किया है। लेकिन यह विचार-विमर्श भी विपन्नजनों के संदर्भ में ही है। साम्प्रदायिक विद्वेष की संक्रामकता को उभारते हुए दिखाया गया है कि दो भिन्न सम्प्रदायों के भिखारी भी कुत्सित प्रचार के शिकार हो जाते हैं। लेकिन अब्दुल्ला की पाकिस्तान से वापसी सिद्ध करती है कि सियासती कुचक्रों से आम आदमी का कोई हित-साधन नहीं होता। ’गाँधी जी का अंत‘ में माँ का कथन - ’अलग-अलग कोई किसी का बैरी नहीं, तुम एक मुसलमान होते तो भी मेरा कुछ नहीं बिगाडते‘, सकारात्मक दृष्टिकोण की गवाही देता है। इस कहानी में कथाकार के भावुक हो जाने की पूरी सम्भावना थी, लेकिन कहानी का समापन अंश बताता है कि तकष्ाी ने अपनी गाँधी-निष्ठा और यथार्थ-बोध दोनों की रक्षा की है - ’’क्या पूँजीपतियों का दिल बदल सकता था? बदले तो भी क्या इस व्यवस्था में परिवर्तन आ सकता था? यों गाँधी जी एक क्रांति के मार्ग में बाधा देकर खडे हो गये थे।... पर जो हमारी आँखों की ओट हो गये, वह हमें प्रिय थे।
तकष्ाी की कुछ कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों के संकट पर आधारित हैं और कुछ किसी न किसी मनोवैज्ञानिक सत्य के आसपास बुनी गई हैं। ’तहसीलदार के पिता‘, ’खून का रिश्ता‘, ’पडोस की बात‘, ’मांगल्य की माला‘, ’पतिव्रता‘ आदि कहानियाँ इस सिलसिले में पठनीय हैं। ’तहसीलदार के पिता‘, ’खून का रिश्ता‘, ’पडोस की बात‘ आदि में दो पीढयों की सोच का टकराव है और कहानीकार ने किसी एक पक्ष के एकांगी समर्थन से बचते हुए संतुलन का निर्वाह किया है। वह आपसी सौमनस्य को इस द्वंद्व के समाधान के लिए महत्त्वपूर्ण मानता है। ’पतिव्रता‘ में एक विवाहित युवती परपुरुष से प्रेम के बाद अपने पति से यौन-सम्बन्ध नहीं रखती। ’नानी मर गई‘ में पति के लिए चरित्र सुरक्षित रखने वाली पत्नी की चर्चा है। ’एक मामूली फाँसी‘, ’लम्बा सफर‘, ’चाय के बाग में‘, ’मुक्ति‘ आदि कहानियाँ सम्भवतः तकष्ाी की प्रारम्भिक कहानियाँ हैं लेकिन इनमें घटनाओं का हस्तक्षेप कम, मानसिकता का उद्घाटन प्रमुख है। ’लम्बा सफर‘ जन्दगी का सफर है और यदि पति-पत्नी दोनों आत्मीयता और लगाव के साथ दाम्पत्य की गाडी खींचते रहें तो यह अंतिम क्षणों तक ऊबाऊ नहीं होगा। ’मुक्ति‘ में संकेत है कि एक लम्बे समय तक बंधन में रहने के बाद प्राप्त मुक्ति बहुत आश्वस्त नहीं कर पाती क्योंकि तब तक बंधन की आदत पड जाती है।
’मेरे साहित्य में आँचलिकता‘ शीर्षक टिप्पणी में तकष्ाी ने लिखा है - ’’भारतीय कहानियाँ और उपन्यास सब भारतीय जीवन पर आधारित हैं। पर सब पाश्चात्य रीति में लिखे हुए हैं न! पाश्चात्य रीति यानी कि पाश्चात्य शिल्प। यदि समकालीन हिन्दी कहानी के पाठकों को कई कहानियों का विन्यास कुछ अटपटा और विचित्र लगता है तो इसका एक कारण यह है कि उन्होंने केरलीय जीवन के यथार्थ को व्यक्त करने के लिए भाषा-कथन-पद्धति का चुनाव भी वहीं से किया है। केरल की मिट्टी, परम्परा और परिवेश से लिए गए शब्दों में ’ओणम‘, ’पुलिश्शेरी‘, ’कम्पा‘, ’परा‘, ’चक्र‘, ’रौका‘, ’कमर‘, ’सोरही‘, ’कुटी-पल्ली‘, ’तुंचाणी‘ आदि शब्द हिन्दी अनुवाद में भी ज्यों के त्यों हैं और अपने परिवेश का अनुभव कराने में सहायक हैं। ’गंधर्व‘ और गंधर्व-मंदिर का उल्लेख कई कहानियों में हुआ है। ’आम के पेड तले‘ और ’गोरा बच्चा‘ में लोकगीत और लोकगाथा का उपयोग केवल आँचलिक स्पर्श के लिए नहीं है। ’गोरा बच्चा‘ में चिरूता बार-बार उस लोकगाथा को सुनना चाहती है, जिसमें एक परया जाति की युवती के पथभ्रष्ट होने का जिक्र है। इस गाथा की उपस्थिति ने कहानी को नया रंग दे दिया है।
अधिकतर कहानियों में तकष्ाी ने लेखकीय सर्वज्ञता के अधिकार का उपयोग किया है। ’पतिव्रता‘ और ’ताडीखाने में‘ आदि कुछ कहानियाँ पात्र विशेष के अवलोकन बिन्दु से कही गई हैं। ’राष्ट्रपति बनने लायक‘ जैसी कहानियों में संवादों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। अप्रस्तुतों और बिम्बों के माध्यम से अनुभूति, विचार और क्रिया को और स्पष्ट एवं मूर्त करने में कहानीकार को कई जगह सफलता मिली है। कहानीकार ने क्रियाओं का बिम्ब-ग्रहण कराने में अधिक रुचि दर्शाई है। ’एक जानवर के समान घूरता रहता‘, ’एक पीतल के समान दाँत निपोर रहा था‘, ’लगा जैसे दिल पर अंगारा पडा हो‘, ’मेरा दोस्त एक खंभे के समान ऊपर उठ रहा था‘, ’उसने इस ढंग से पूछा मानो दवा पीने को हिचकने वाले बच्चे से माँ पूछ रही हो‘ आदि उदाहरणों को इस संदर्भ में देख सकते हैं। ये सब ’कथ्य‘ और ’स्थिति‘ के अनुरूप प्रयुक्त हैं। अतिरिक्त शिल्प-सजगता ने इन्हें नहीं गढा है।
आखिर में कुछ पंक्तियाँ कहानियों के अनुवाद को लेकर। चूँकि कई व्यक्तियों ने अलग-अलग कहानियों का अनुवाद किया है, अतः सर्वत्र एकरूपता का अभाव है। कहीं-कहीं अनुवाद में शिथिलता दिखाई देती है। ’राष्ट्रपति बनने लायक‘ में कई जगह एक पंक्ति वर्तमान कालिक क्रियाओं ’पीता हैं, चल देते हैं‘ आदि के रूप में है और तत्काल बाद की पंक्ति ’गये‘, चला गया आदि क्रिया पदों से निर्मित है। ’वह पानी पीता है‘ जैसे वाक्य कहानी के बजाय नाटक के किसी अंश का अनुवाद लगते हैं। ’बदचलन‘ के लिए ’बदचली‘ का प्रयोग भी सटीक नहीं लगता। इस तरह की कुछ आपत्तियों को अलग कर देने पर इन कहानियों का अनुवाद सम्प्रेषण की दृष्टि से सफल है। केरली जनजीवन से साक्षात् कराने के उद्देश्य से रचित तकष्ाी की अधिकतर कहानियाँ संवेदना और बोध के स्तर पर पाठक को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ हिन्दी में पठन-पाठन के साथ-साथ लेखन एवं आलोचना में भी सक्रिय हैं।