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वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र एवं आख्यान का विमर्श

मिथिलेश कुमार
राष्ट्र एक संकल्पना के रूप में ः
राष्ट्र एक ऐसा शब्द है, जिसकी कल्पना मात्र से एक मनुष्य को अपना दर्जा काफी ऊँचा और विश्वसनीय लगता है क्योंकि इससे मानव जाति की पहचान निर्मित होती है। राष्ट्र को राज्य के स्थान पर अवधारणा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसकी उत्पत्ति के विषय में यह कहा जा सकता है कि मानवजाति के नृजातीय इतिहास में सामूहिक पहचान के रूप में ’राज्य‘ को स्वीकृति मिली। यह सबसे पहले एक परिवार, फिर समाज तत्पश्चात् राज्य के रूप में विकसित हुआ। विश्व में अपनी संस्कृति, परम्परा, विचारधारा, पहचान और धर्म तथा न्याय के आधार पर राज्य को राष्ट्र का नाम दिया गया। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद को विशिष्ट पहचान के रूप में चिह्वित करने के बाद इसे इसके आख्यान को लेकर विद्वानों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं समाजशास्त्रियों के बीच काफी रोचक बहसें सामने आई हैं। हाल के कुछ वर्षों में भारत राष्ट्र के विचार को लेकर कई महत्त्वपूर्ण आलोचनाएँ सामने आई हैं, जिनमें दो पुस्तकें ’नेशनलिज्म विदाउट ए नेशन इन इंडिया‘ (एलॉयसियस, १९९९) तथा ’डी-ब्राह्मनाजिंग हिस्ट्री‘ (ब्रजरंजन मणि, २००६) प्रासंगिक हैं, क्योंकि ये दोनों ही उत्पीडतों की दृष्टि से राष्ट्र के विचार को नये सिरे से प्रस्तुत करते हैं। एलॉयसियस अन्य विद्वानों की अपेक्षा जो भारत राष्ट्र को एक बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में समझते हैं, के बरक्स इसकी संकल्पना को अधिक व्यापक बनाते हुए उन सभी समूहों को भी शामिल करते हैं जो किसी न किसी रूप में अवधारणा के स्तर पर भारत राष्ट्र की कल्पना कर रहे थे। उनकी दृष्टि में राष्ट्र दरअस्ल उन चंद लोगों का समूह था, जिसमें बुर्जुआ, अंग्रेजीदा लोग, सरकारी अधिकारी एवं नये व्यापारी थे, जिनका राष्ट्रवाद निहायत परम्परागत, साम्प्रदायिक एवं उनके सीमित हितों की पूर्ति के साथ जुडा हुआ मसला था, जिसमें समाज की आम जनता (स्त्रियाँ, दलित समुदाय तथा अल्पसंख्यक समूह) की भागीदारी लगभग अदृश्य थी। हालाँकि एलॉयसियस उस संकीर्ण सबल्टर्न समझ की भी आलोचना करते हैं जो राष्ट्र और राष्ट्रवाद को सत्ता एवं संस्कृति सापेक्ष समझने की बजाय सिर्फ ब्रह्माण्डवादी रूप में देख रहा था। बावजूद इसके उनकी आलोचना नए विमर्शों के लिए एक पुख्ता जमीन उपलब्ध कराती है।
राष्ट्रवाद और राष्ट्र के संदर्भ म कई प्रकार की धारणाएँ प्रचलित हैं। पश्चिमी देशों में किसी एक ही वर्ग अथवा समूह के लोग अधिकतर निवास करते हैं, यथा - जर्मनी में जर्मन लोग, फ्रांस में फ्रेंच लोग अधिकतर रहते हैं, अतः उन्हें एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता प्रदान की जाती है। वहीं भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं है। यहाँ विविधता है। कई धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों, समूहों, संस्कृतियों आदि से सम्बन्धित लोग यहाँ रहते हैं। कुछ लोगों द्वारा राष्ट्रवाद का आशय निवासियों के धर्म, भाषा, प्रजाति आदि मामलों में साझेपन से है। यदि इस आधार को विश्लेषित किया जाए तो भारत एक राष्ट्र न होकर कई राष्ट्रों का एक समूह है। इस संदर्भ का दूसरा तथ्य राष्ट्र राजनीतिक संकल्पना नहीं है, अपितु यह एक सांस्कृतिक संकल्पना है। अब सवाल यह आता है कि क्या भारत एक राष्ट्र नहीं है? सामान्य तौर पर भारत जैसे देशों के लिए राष्ट्र-राज्य की शब्दावली को प्रयोग में लाया जाता है। राष्ट्र- राज्य में निम्न प्रमुख आवश्यक तत्त्व होते हैं*-
भाषा
इतिहास एवं *राष्ट्र-राज्य राष्ट्रवाद
धर्म
राष्ट्र को सामान्यतः दो संदर्भों में परिलक्षित किया जाता है - पहला, राष्ट्र को सांस्कृतिक समुदाय के तौर पर देखा जाता है और इसमें निजतिया बंधनों और निष्ठा पर जोर दिया जाता है तथा दूसरा, राष्ट्र एक राजनीतिक समूह होता है और यहाँ नागरिक बंधनों और समर्पण को महत्त्व दिया जाता है। राष्ट्रवाद बहुत जटिल और आपस में गुंथी हुई संकल्पना है। राष्ट्रवाद पर कई तरह के विचार दिये गये हैं। कुछ विद्वान इसे आधुनिक समाज के संदर्भ से व्याख्यायित करते हैं, तो कुछ इसको पुरातन के रूप में प्रस्तुत करते हैं और मानते हैं कि आधुनिक काल में मात्र इसका रूप परिवर्तित हुआ है। अर्नेस्ट गैलेनर अपनी पुस्तक नेशन एंड नेशनलिज्म में कहते हैं कि सामंतवादी समाजों में सामंतवादी बंधन और सम्बन्ध होते हैं और आधुनिक समाज अपेक्षाकृत अधिक गतिशील व प्रतिस्पर्धी होने के कारण किसी भी स्थाई बंधन का मोहताज नहीं है। अतएव सांस्कृतिक साम्यता को बनाए रखने के लिए कुछ मूल्यों और विचारधाराओं का होना अत्यन्त आवश्यक है, जिसका आधार राष्ट्रवाद हो। इसके विपरीत एंटनी डी स्मिथ द्वारा अपनी पुस्तक द इथनिक ओरिजिन ऑफ नेशंस में स्पष्ट किया गया कि आधुनिक युग में राष्ट्रवाद की भावना अचानक से उत्पन्न नहीं हुई है, वरन् यह पुराने समाजों से क्रमिक विकास के तहत आई है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद एक आधुनिक संकल्पना है। व्यक्ति के अंदर राष्ट्र के प्रति समर्पण, त्याग की भावना निहित रहती है, वह स्वयं को राष्ट्र से जोडकर देखता है, वह निजी हित के स्थान पर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देता है।
अब यदि हम पुनः राष्ट्र की अवधारणा पर विचार करें कि राष्ट्र क्या है? यह राष्ट्र-राज्य की संकल्पना के साथ कैसे जुडता है? तो हम पाते हैं कि वस्तुतः प्रारम्भिक दौर से ही राष्ट्र-राज्य की बहस में राष्ट्र की अवधारणा हमेशा बदलती रही है। साहित्य तथा समाजशास्त्र की अन्य विधाओं ने राष्ट्र को एक अनिवार्य हिंसक इकाई के रूप में परिभाषित किया है। यूरोपियन तथा अफ्रीकन समाजों में हुए अध्ययन यह बताते हैं कि राष्ट्र की निर्मिति दरअस्ल समाज के कई समूहों के हाशियाकरण, उनकी आवाजों, उनकी तकलीफों और उनके संघर्षों को दरकिनार करते हुए होती है जो हिंसक, असमानतामूलक है।
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्र-राज्य की अवधारणाओं पर बहस का इतिहास हमें गेल्नर तथा हॉब्सबॉम के लेखन में भी देखने को मिलता है, जिसमें वे बताते हैं कि आरम्भिक दौर में राष्ट्रवाद अपने मूल से जुडे रहने की कवायद था, जो उस समूह विशेष के इतिहास, संस्कृति तथा उसके भौगोलिक अस्तित्व से गहरे रूप में गुँथा हुआ था। यह भावनात्मक स्तर पर तो स्वीकार्य था परन्तु राष्ट्र की यथार्थपरक निर्मिति में असफल था। इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द श्छंजपवश् से हुई थी, जिसका अर्थ था, ’जो पैदा हुआ हो‘। खासतौर पर यह शब्द अपने प्रारम्भिक दौर में उन विदेशियों के लिए प्रयुक्त किया जा रहा था जो रोमन लोगों से निम्न श्रेणी के माने जा रहे थे। ग्रीनफिल्ड ने इस राष्ट्र की अवधारणा को उन विद्यार्थियों के समूह के साथ भी जोडकर देखा है, जो सुदूर देशों से उच्च शिक्षा के लिए पाश्चात्य देशों के महान विश्वविद्यालयों में जा रहे थे। ये विश्वविद्यालय ही विद्यार्थियों के लिए राष्ट्र का पर्याय थे, जिसके कारण राष्ट्र की संकल्पना में और इजाफा हुआ और अब राष्ट्र किसी समूह विशेष में जन्म के अस्तित्व से जुडा न होकर वैचारिक एवं उद्देश्यगत रूप में समान समुदाय का द्योतक था, जो सीमित दायरे में था। जिस राष्ट्र के हम नागरिक हैं, वह ’भारत‘ अपने भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा अवधारणात्मक रूप में हमेशा से एक ही रूप में मौजूद नहीं था। अन्य देशों की तरह भारत के राष्ट्र निर्माण कार्य में भी विभिन्न प्रवृत्तियाँ, कामनाएँ और प्रयास आपस में टकराए। कुछ विजयी हुए, तो कुछ पराजित, लेकिन हमारे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर इस द्वंद्व की छाप हमेशा बनी रही। राज्य, आदर्श नागरिकता और सम्बन्धित की गारन्टी नहीं दे सकता है, लेकिन राष्ट्रवाद एक ’कल्पित समुदाय‘ पैदा कर सकता है, जिससे लोगों को राज्य की सीमा के भीतर संघीय सदस्यत्व के रूप में एकजुट किया जा सकता है। जिसका अर्थ है राष्ट्रीय सदस्यता (गुप्त, १९९२ः६७) के जरीये राष्ट्र-राज्य द्वारा इस ’कल्पना समुदाय‘ को वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पहचान के स्रोत के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
राष्ट्र बनाम आख्यानों की दुनिया ः
आख्यान (नैरेटिव) मनुष्य की संवेदनाओं, अनुभूतियों, स्थितियों-परिस्थितियों, घटनाओं की व्यवस्थित अभिव्यक्ति है। संक्षेप में आख्यान का उद्देश्य विश्व में बौद्धिक-आध्यात्मिक-व्यावहारिक संवेदनाओं के रचना-संसार का निर्माण करना है।
एक कथा या कहानी से जुडी घटनाओं, वास्तविक या काल्पनिक, लिखित या बोले गए शब्द या फिल्मी छवियों या एक दृश्य के रूप में प्रस्तुत की जाने वाली एक रिपोर्ट को हम आख्यान कह सकते हैं। यह मूल रूप से तथ्यों का एक संगठन जिसमें रचनात्मकता, व्यवहार, सहजता, एकत्व का जुडाव होता है। दूसरे शब्दों में यदि कहा जाए तो यह शब्दों, चित्रों, विचारों का एक सचित्रण है, जिसकी सहायता से मनुष्य अपने भावों, विचारों की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करता है। आख्यानपरक लेखन कथात्मकता के बोध से निर्मित होता है, जिसमें कथ्यों का आधार उसके निर्धारित दर्शकों, पाठकों के लिए सहज और लुभावना होता है।
आख्यानों के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक अभिभावकों द्वारा राष्ट्रीय कथाएँ अलग- अलग तरीकों से और अलग-अलग व्याख्याओं में इस्तेमाल की जाती रही हैं और उनसे छेडछाड भी की जाती रही है, लेकिन राष्ट्रवाद स्वाभाविक रूप से प्रवासन और राष्ट्र-राज्यों की प्रवास नीति की पहचान से जुडा हुआ मसला है। इसका कारण यह है कि प्रवासन/स्थायित्व राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा है और राष्ट्र-राज्य द्वारा कुछ समूहों के बहिष्कार और समावेश को राष्ट्रीय आख्यानों और राष्ट्रवादी व्याख्याओं के हेरफेर के कारण अपरिहार्य और प्राकृतिक लगता है। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र-राज्यों को एक रक्षात्मक स्थिति में आगे बढकर बहुलवाद की ओर आगे बढाने के लिए अग्रेषित करना है। एक वैश्वीकरण दुनिया में पराराष्ट्रवाद ;ज्तंदे.दंजपवदंसपेउद्ध का उदय राष्ट्रवाद के खतरे स्पष्ट हैं। खासकर वैश्विक दक्षिण के संदर्भ में (दक्षिण एशिया) हिंसा का निर्माण करने के लिए राष्ट्रवादी आख्यानों की प्रवृत्ति का मतलब है कि राजनीतिक अभिभावकों को इस प्रकार की व्याख्याओं में हल्के ढंग से हेरफेर करने से बचना चाहिए, जिससे राष्ट्र के अंदर समुदाय को आकर्षित करने और संकट की स्थिति में इसे एकजुट करने में मदद मिल सकती है। लेकिन राष्ट्रवादी आख्यानों का उपयोग अवांछित परिणामों का उत्पादन कर सकता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक राष्ट्रवाद के पतन की चर्चा जोरों से शुरू हो गई थी। २१वीं सदी के एक दशक तक दुनियाभर में कई ऐसे परिवर्तन हुए, जिसे राष्ट्रवाद की पुनर्वापसी कहा जाने लगा। अमेरिका में ०९ सितम्बर २००१ के हमले ने वैश्विक राजनीति को ठीक उसी तरह रूपायित किया जैसा कि २०वीं सदी की शुरुआत में दो विश्व-युद्धों ने किया था। इसका तात्कालिक प्रभाव भारत के करीबी देश अफगानिस्तान पर सबसे पहले पडता है और पहले दशक तक विभिन्न चरणों से होकर गुजरते हुए उत्तरी-अफ्रीका और मध्य-एशिया तक नजर आने लगता है। राष्ट्र-राज्य के बदलते स्वरूप में अरब-क्रांति की परिघटना की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस क्रांति की शुरुआत ट्यूनीसिया से होती है और लीबिया, मिश्र और सीरिया के देशों में फैल जाती है। क्रांति में लगभग सभी विचारधाराओं के लोग शामिल होते हैं। लगभग सभी जगहों पर लोग भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और लम्बे तानाशाही काल से आक्रोशित थे। इन सभी देशों में क्रांति ने तानाशाही शासन को तो उखाड फेंका, लेकिन जल्दी ही अरब-क्रांति अरब की ठिठुरन में तब्दील हो गई। कई देशों में छोटे-छोटे आतंकी समूह ने तेल भण्डार एवं अन्य संसाधनों पर अपना कब्जा जमा लिया और लगभग सभी जगहों पर हिंसा और अस्थिरता का शासन हो गया। अरब की क्रांति जिस भ्रष्टाचार और गरीबी के मुद्दे पर खडी हुई थी वह ’फेनोमेना‘ पृथक नहीं है।
समकालीन समय में सैद्धान्तिक तौर पर राष्ट्र- राज्य की मृत्यु की बात कही जा रही है। ०५ अप्रैल २०१८ के ’द गार्डियन‘ में राना दासगुप्ता का एक लेख श्जीम क्मउपेम व जीम छंजपवद ैजंजमश् प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने यूरोप के कई देश अमेरिका, भारत, म्यांमार, हंगरी, रूस, अफ्रीका इत्यादि में प्रकट राजनीतिक परिस्थितियों को ’राष्ट्र-राज्य की मृत्यु‘ के रूप में चिह्वित किया, (दासगुप्ता, २०१८)। यह घोषणा अत्यन्त विरोधाभासी ढंग से विमर्श का विषय बनी। २०१६ के अमेरिकी चुनाव के संदर्भ में रश्मि रोशन लाल ने राष्ट्रवाद को वैश्विक राजनीति का ’न्यू-नॉर्मल‘ बताया (लाल, २०१६)। रश्मि रोशन लाल जिसे ’न्यू-नॉर्मल‘ बता रही थीं, वह एक प्रकार से राष्ट्र-राज्य के तानाशाही स्वरूप की ओर इशारा था। एक खास प्रकार के उग्र राष्ट्रवाद की प्रवृत्तियाँ ही ’न्यू-नॉर्मल्स‘ कही जा रही थीं। दूसरी तरफ, राना दासगुप्ता ने भी इसी तरह की प्रवृत्तियों को ’राष्ट्र-राज्य की मृत्यु‘ के रूप में प्रस्तुत किया। यह एक ही प्रकार की ’परिघटना‘ के भिन्न-भिन्न तरह के आख्यानों का अच्छा उदाहरण है। समाजशास्त्रीय नजरिये से बीसवीं सदी में राष्ट्र-राज्य एक अवश्यम्भावी परिणाम के रूप में प्रकट होता है और सदी के अंत तक यह संकट और संशय के तौर पर राजनीति विज्ञान का प्रश्न हो जाता है। राष्ट्र के मरने की घोषणा और राष्ट्र के और भी मजबूत (’न्यू-नॉर्मल) होने की घोषणा के बीच की दुविधा केवल अपने-अपने आख्यानों के अंतर की है। बीसवीं सदी का राष्ट्र-राज्य, जो अपनी निर्माणाधीन प्रक्रिया में था, महा-आख्यान की हैसियत में रहा। दुनियाभर के नए-पुराने राष्ट्रों के आख्यान शास्त्रीय और कुलीन कथ्यों से खुद को परिभाषित कर रहे थे। ’महा-आख्यान‘ के खिलाफ एक भीतरी बगावत करने का एक उपक्रम प्रति-आख्यान के रूप में सामने आया है। महा-आख्यान जब सांस्कृतिक या वैचारिक दायरे से निकल कर राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं का आधार बनने लगता है तो उसके आधार को संस्कृति के जगत् में विचलित करने के लिए प्रति-आख्यान की रचना की जाती है। राष्ट्रवाद एक ऐसा ही महा-आख्यान है जो छोटी-छोटी पहचानों की दावेदारी को दबा देता है। उपराष्ट्रीयताओं के संघर्ष, उपेक्षित भाषाओं और संस्कृतियों की जद्दोजहद, वंचित तबकों की आवाजें इन प्रति-आख्यानों का केन्द्र बनती हैं। मिशेल फुको की मान्यता थी कि प्रति-आख्यानों के जरीये महा-आख्यानों के प्रच्छन्न पक्षपात, अपर्याप्तता और स्थायित्व को रेखांकित करके उनके आधारभूत सत्ता सम्बन्धों को स्पष्ट किया जा सकता है।
भारत एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के साथ एक पौराणिक परम्परा और संस्कृति का देश भी रहा है। इस तरह के राष्ट्र के आख्यान की विशेषता उसके द्विस्तरीय लक्षण में प्रकट होती है। आधुनिक ज्ञानानुशासन में दुनिया के ज्यादातर देशों की स्मृतियाँ उत्तर-औपनिवेशिक ठहरती हैं। उत्तर-औपनिवेशिक स्मृतियों में अपने अतीत (परम्परा) और आधुनिक श्रेष्ठता के द्वंद्व की सम्भावना ज्यादा बनी रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि राष्ट्र और आख्यान का रिश्ता अपने प्रकृति और सिद्धान्त में ’बनाम‘ ;अमतेनेद्ध का बनता है। दरअस्ल राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में यह द्वंद्व अन्तर्निहित होता है। एक तरफ वह आधुनिक मूल्यों के राष्ट्र का स्वप्न होता है, दूसरी तरफ इस स्वप्न में शामिल सामूहिक दावेदारी का जो आख्यान ;छंततंजपअमेद्ध बनता है, वह दरअस्ल सभी वास्तविक जन-भागीदारी का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। लेकिन राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया चूँकि एक सतत प्रक्रिया होती है, इसलिए इस सतत प्रक्रिया में नए-नए आख्यान, अस्मिता और राजनीति का हस्तक्षेप भी निरन्तर जारी रहता है।
बीसवीं सदी तक दुनियाभर की व्यवस्थाओं में राष्ट्र-राज्य सामान्य जनसंख्या में स्वप्न की तरह बसा हुआ था। इसलिए अधिकांश आबादी अपने राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की ओर अग्रसर थी या फिर संघर्षरत थी। २१वीं सदी के भूगोल पर राष्ट्र-राज्य का फैलाव काफी विस्तृत हो चुका था, लेकिन २१वीं सदी और बीसवीं सदी के राष्ट्रों का आख्यान बदल चुका था। बीसवीं सदी में ’राष्ट्र‘ स्वयं को महा-आख्यान के रूप में स्थापित कर चुका था, जबकि अगली सदी की यात्रा करते-करते यह अपने ही क्षेत्रों, लोगों, भाषाई एवं कई सांस्कृतिक पहचानों की आवाजों के उप-आख्यानों और प्रति-आख्यानों से पट चुका था। यह केवल एक ही देश में नहीं हो रहा था। यू.एन. हाई कमीशन के मुताबिक सन् २०१७ ई. तक पूरी दुनिया में हिंसा, संघर्ष की वजह से बलपूर्वक अपने मूल स्थान से हटाए गए लोग अथवा विस्थापित लोगों की संख्या कुल ६५.५ मिलियन हो चुकी थी। अर्थात् ६५.५ मिलियन लोग बगैर किसी राष्ट्र-राज्य के जी रहे थे। ये किसी न किसी देश के नागरिक तो हैं मगर इनकी अपनी कोई जमीन नहीं है।
प्रत्यक्ष तौर पर ’राष्ट्र की मृत्यु‘ और ’न्यू नॉर्मल‘ का अंतर दरअस्ल महाआख्यान और उसके प्रति-आख्यान के गतिकी की वजह से उत्पन्न है। बीसवीं सदी के राष्ट्र का महाआख्यानात्मक स्वरूप दरअस्ल औपनिवेशिक सर्वव्याप्तता एवं उसके प्रति संघर्ष की समान प्रकृति की वजहों तथा उसके अनुभवों के फलस्वरूप बनता है। भूमडलीकरण और राष्ट्र-राज्य के प्रभावों से राष्ट्रों के आंतरिक आख्यानों में खासा बदलाव हुआ। लोगों के निर्णयों, क्रय-विक्रय की पहुँच, पसन्द, उपयोगिता, जिज्ञासा और सोचने-समझने के तरीकों ने जनमत को संचालित करना आसान किया। दूसरी तरफ क्षेत्रीय स्मृति और संस्कृतियों में स्थगन के बोध ने बहुत सारे उपआख्यान और प्रति-आख्यानों का निर्माण किया। यह कहना अनुचित होगा कि राष्ट्र-राज्य के प्रति-आख्यान राष्ट्रद्रोह या एक विरोध है। यहाँ यह भी दर्ज करना आवश्यक है कि ’राष्ट्रवाद‘ एक विचारधारा है और कोई भी विचारधारा अपने लिए किसी न किसी प्रकार की अस्मिता रचती है। अस्मितावादी राजनीति की शुरुआत यहीं से होती है। न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इस तरह की राजनीति की शुरुआत होती है, जो २१वीं सदी के पहले दशक तक लगभग अपने चरम और पूर्णता तक पहुँचती है। बीसवीं सदी के ९० के दशक के अंत और २१वीं सदी की शुरुआत में कई देशों के अस्तित्व में आने के पीछे इसी अस्मितावादी राजनीति की प्रमुख भूमिका रही है। इसी अस्मितावादी राजनीति की वजह से ही महाआख्यान अपने सांस्कृतिक- वैचारिक दायरे से निकल कर राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं का आधार बनने लगता है। इसके बाद के विकास में अस्मितावादी राजनीति भी सामाजिक घटकों एवं परिस्थितियों को सम्पूर्णता से प्रदर्शित नहीं कर सकती है। आख्यान की अपनी व्यवस्था किसी भी विचारधारात्मक सत्ता को प्रकट करने का बेहतर माध्यम बन रही है। प्राप्त तथ्यों और घटनाओं के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय परिदृश्य में घटित होने वाली घटनाओं का स्वरूप लगभग एक समान है। इसका अर्थ बिल्कुल नहीं है कि उसके सामाजिक, राजनीतिक असर भी एक समान ही होंगे। किन्तु यह निश्चित हो जाता है कि वह अपने स्वरूप के आख्यान होंगे। सन् २००१ में अमेरिका पर आतंकी हमले (०९/११) के बाद की परिस्थितियों में ’वार अगेंस्ट टेररिज्म‘ को प्रमुख बना दिया। इसी वर्ष २००१ के दिसम्बर में भारत की संसद पर आतंकी हमले हुए। इस हमले का पैटर्न आने वाले सालों में कई देशों में देखा गया। फ्रांस, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन कई ऐसे देश थे, जहाँ इस तरह के हमले हुए। इसके बाद २००८ (२८/११) में मुम्बई हमला, फ्रांस में चार्ली हेब्दो के कार्यालय का हमला भी आख्यानों के स्वरूप को प्रभावित करने वाला साबित हुआ है। २८/११ के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों में ’अरब स्प्रिंग‘ एक ऐसी घटना साबित होती है जो आने वाले समय में राष्ट्र के आख्यानों को पूरी तरह से बदल डालती है। रूस और चीन में राष्ट्रपति के कार्यकाल को लेकर संवैधानिक तब्दीली जिस सर्वसत्तावाद की ओर इशारा करती है, वह कई अन्य देशों में ’उग्र राष्ट्रवाद‘ की तरह प्रकट हुआ।
राष्ट्रवाद एक प्रकार की भावना है, जो अपने राष्ट्र के प्रति व्यक्ति की निष्ठा को प्रदर्शित करती है। यह राष्ट्र के साथ एक मनोवैज्ञानिक बंधन को सृजित करता है। भारत एक सांस्कृतिक, धार्मिक व भाषायी विविधता वाला देश है, यहाँ अनेक प्रकार की संस्कृतियाँ व जीवनशैली देखने को मिलती है। राष्ट्रवाद ही एक ऐसा धागा है जो विविध सांस्कृतिक-जातीय पृष्ठभूमि से सम्बन्धित होने के बावजूद लोगों को एकता के सूत्र में पिरोता है। यह एक जटिल और बहुआयामी संकल्पना है जो राष्ट्र से एक साझी साम्प्रदायिक पहचान विनिर्दिष्ट करती है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू के अंदर राष्ट्रवाद का विकास एक भावना के रूप में हुआ और यह भारत के अलौकिक प्राचीन इतिहास व संस्कृति से प्रस्फुटित हुआ था। इसके अलावा यह राष्ट्रवाद तत्कालीन समय के गुलामी-आजादी के विमर्श से भी प्रभावित था। उस समय का संदर्भ अलग था और राष्ट्रवाद की भावनात्मक प्रवृत्ति भी उसी के अनुरूप भिन्न प्रकृति की थी।
२१वीं सदी का राष्ट्रवाद पिछली सदी के राष्ट्रवाद से सर्वथा भिन्न स्वरूप का है। राष्ट्रवाद की प्रारम्भिक अवस्था में यह कई तरह से परिभाषित किया गया ’प्रतिदिन की रायशुमारी‘ या ’कल्पित समुदाय‘ ;।दकमतेवदए १९९१द्ध ;त्मदंदए २०१२द्ध। क्योंकि राष्ट्रवाद में कल्पना और जनमत या रायशुमारी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए नये समय के राष्ट्रवाद में जो प्रमुख तब्दीली दिखाई दे रही है, वह उसके प्रत्यय को लेकर है। एक समुदाय के तौर पर राष्ट्र के आख्यान में जो तब्दीली है वह यह कि बहुत तरह के आख्यान सत्ता से प्रतिरोधी होते हुए नए तरह से अपनी भागीदारी तय कर रहे हैं। ’कल्पित समुदाय‘ दरअस्ल शासकीय मानसिकता से बनी अस्मिता पर आधारित थी। आज की अवस्था में भिन्न-भिन्न अस्मिताई राजनीति ने राष्ट्र के आख्यान को बदल दिया है। वर्तमान अस्मितामूलक परिवर्तन केवल क्षेत्रीय घटकों का परिणाम नहीं है बल्कि एक बहुत विशाल नेटवर्क से जुडे संचालन से भी संचालित है।
आख्यान और प्रति-आख्यान (Narratives and Anti-Narratives)
वैश्विक व्यवस्था में राष्ट्रवाद महा-आख्यान की तरह है। पूरी दुनिया में नारीवाद, दलितवाद, हिन्दुत्ववाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांस्कृतिक शुद्धतावाद, पर्यावरणवाद, मानवाधिकारवाद जैसे कई आख्यान हैं जो राष्ट्रवादी आख्यान के प्रति- आख्यान हैं। वैश्विक एकरूपता के तौर पर देखा जाए तो राष्ट्रवाद भी ’वसुधैव कुटुम्बकम्‘ का प्रति-आख्यान ही है। ठीक इसी तरह, इस तरह के तमाम वाद प्रति-आख्यान की तरह राष्ट्रवादी आख्यान से भिडते हैं। भारतीय राष्ट्रवाद की परिस्थिति में यह बेहतर स्थिति है कि इस प्रति- आख्यान की वजह से राष्ट्रवादी आख्यान का दायरा काफी वृहत् हुआ है। यह जरूर कहा जा सकता है कि यह वृहत् होने की प्रक्रिया समन्वयवादी तरीके से नहीं होकर संघर्षपूर्ण रही है।
आख्यान के बदलते हुए स्वरूप में राष्ट्र के नेतृत्व की छवि भी बदली है। दूसरे शब्दों में कहें तो नये तरह के राष्ट्रवाद के नेतृत्व में दुनियाभर में परिवर्तन आया है। यह बदलाव इतना व्यापक है कि राष्ट्र को समझने के मौलिक तौर-तरीकों को प्रभावित कर रहा है (Lall, 2016) (Dasgupta, 2018)। इस परिवर्तन ने कई तरह की बहसों को छेडा, मसलन ’राष्ट्र-राज्य का अंत‘ या ’नए तरह के राष्ट्रवाद का जन्म‘। इस वैश्विक परिवर्तन से लोकतांत्रिक देशों में सत्ता नेतृत्व की छवि भी प्रभावित हुई। इसी वजह से दुनिया के कई देशों में शीर्ष नेतृत्व में बडा परिवर्तन देखने को मिला तो कई ऐसे भी देश (रूस, चीन आदि) थे, जिन्होंने नेतृत्व में परिवर्तन न करके नये तरह से प्रकट हो रही सत्ता को ही स्वीकार कर लिया।
राष्ट्र बनाम आख्यान के बारे में समाजाशास्त्री बद्रीनारायण का मानना है कि - ’’जिसके पास राष्ट्र है उसके पास आख्यान नहीं है, जिसके पास आख्यान है उसके पास राष्ट्र नहीं है।‘‘ (राष्ट्र बनाम आख्यान पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी, २६ नवम्बर २०१६) दरअस्ल बद्रीनारायण राष्ट्र के महा-आख्यान में, जो खुद को शामिल कर नहीं देख पाते हैं, उनकी बात कर रहे हैं। अर्थात् इस महा-आख्यान के पीछे के इतिहास में वो नहीं हैं या दूसरे शब्दों में कहें कि राष्ट्रवाद के महा-आख्यान ने जिन अस्मिताओं/पहचानों (Identity) को नजरअंदाज कर दिया है बद्रीनारायण दलित राजनीति के अपने अध्ययन के आधार पर बताते हैं। इन वंचित तबकों के राष्ट्र में शामिल होने के अपने प्रतिरोध के तरीके भी वही हैं ’जो इलिट्स नेशन मेकिंग के तरीके हैं।‘ राष्ट्रवाद के महा-आख्यान में अपने आख्यानों की पुनर्रचना का स्रोत कॅलोनियल एथनोग्राफी, सेंसस या किसी लिखित दस्तावेज से हासिल करते हैं। भारत में हो रहे इस आंतरिक परिवर्तन को प्रो. सलिल मिश्रा वैश्विक परिवर्तन के साथ मिलाकर देखते हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रवाद के जो वैश्विक सिद्धान्त हैं उनमें भारत के राष्ट्रवाद का अनुभव (पिछले दो सदियों में) उन वैश्विक सिद्धान्तों से बहुत करीब का है। उनके मुताबिक पिछली दो सदियों में इस दुनिया की ’कम्युनिटी प्रोफाइल‘ में एक बडा रूपान्तरण हुआ है और यह रूपान्तरण दरअस्ल ’छोटी कम्युनिटी प्रोफाइल‘ से ’बडी कम्युनिटी प्रोफाइल‘ का रूपान्तरण है और यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में चल रही है। ये दोनों (बद्रीनारायण और सलिल मिश्रा) का नजरिया शोध प्रविधि के अलग मेथड से एक ही तरफ इशारा करते हैं। ’इलिट्स नेशन मेकिंग के तरीके‘ से महा-आख्यान में शामिल होना या ’छोटी कम्युनिटी प्रोफाइल‘ से ’बडी कम्युनिटी प्रोफाइल‘ में रूपान्तरित (Transform) होना राष्ट्रवाद के महा-आख्यान के बडे होते आकार (’साइज‘) को प्रमाणित करता है।
साहित्य और समाज विज्ञान दर्शन के क्षेत्र में सक्रिय मिथिलेश अपने विषय पर गहरी पकड रखते हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।