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हिन्दी कथा साहित्य एवं यौन विकलांग विमर्श

राजेन्द्र सिंह गहलोत
एक जमाने में शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को उनकी शारीरिक विकलांगता के नाम से सम्बोधित कर उन्हें उपेक्षित उपहासित किया जाता था। एकाक्षी (एक आँख वाले स्त्री, पुरुष) का सुबह-सुबह मुँह देखना अशुभ माना जाता था। विकलांग व्यक्तियों को उपहासित कर लोक जगत् में ’लंगडदानी करे किसानी लडका लूल मेहरिया कानी‘ जैसे कटाक्ष किये जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे मानव समाज ने उनकी पीडा को समझा, विकलांग होते हुए भी उनके संघर्ष, उनकी जिजीविषा को सराहा, सम्मानित किया, उन्हें सहारा दिया। शासन एवं समाजसेवी संस्थाओं ने उनकी मदद की, उनके हितों को सुरक्षित करने एवं उन्हें प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्हें सुविधाएँ दीं तथा नौकरियों में कोटा फिक्स किया गया। बस, ट्रेन में उनके लिए सीट एवं कूपे आरक्षित किये गये, उनके लिये यात्रा किराये में छूट दी गई। लेकिन मानव समाज में रामायण एवं महाभारत काल से ही अस्तित्व में आ चुके यौन विकलांग इस कदर उपेक्षित, उपहासित एवं अपमानित नजर से देखे गये कि उन्हें जन्म लेते ही सामान्य मानव समाज से निर्ममता के साथ अलग कर, अलग से अपना एक समाज बना कर जीने के लिये मजबूर कर दिया गया। जन्मना शारीरिक रूप से विकलांग किसी व्यक्ति को कोई भी माँ-बाप, परिवार अपने आप से अलग नहीं कर देता, लेकिन निर्ममता की हद है कि यौन विकलांग शिशु को उसके परिवार के लोग उस यौन विकलांग समाज को सौंप देते हैं, जिसके कई अपमानजनक नाम हैं, जिनमें से सर्वाधिक प्रचलित एवं अपमानजनक सम्बोधन ’हिजडा‘ है।
यौन विकलांगों के लिये देश की प्रांतीय भाषाओं में अलग-अलग अपमानजनक सम्बोधन सुरक्षित हैं, मसलन तेलगू में कोचालू, नपुस्कुड, कोच्चा, मद्दा, तमिल में तिरुनंग्गै, अरावन्नी, अरुयनी, पंजाबी में खुश्त, गुजराती में पावया, उर्दू में ख्वाजसरा, कोचीन में मेनका, बंगला में दुरानी, संस्कृत में वृहन्नला, कर्नाटक में मंगलामुखी, जनखा, हिजडा, खसुआ, खुसरा, खोजा, कोथी, कथोम, मुखन्नस, ओडीसी में जिगोलो (पुरुष वेश्या) एवं माइचीआ, महाराष्ट्र मुम्बई में छक्का आदि। इनके नाच-गा कर जीविकोपार्जन की वजह से इन्हें ’किन्नर‘ सम्बोधन से भी सम्बोधित किया जाने लगा, जो कि अन्य सम्बोधनों की अपेक्षा कुछ सम्मानजनक था, लेकिन धर्मग्रंथों में यक्ष, गंधर्व एवं किन्नर का उल्लेख मिलता है जो कि यौन विकलांग नहीं थे लेकिन उनकी रुचि नृत्य, गायन एवं वादन में थी। अतः इन्हें किन्नर कहना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता जबकि इन्हें इस सम्बोधन से सम्बोधित करने पर किन्नौर जिले के लोग को भी आपत्ति है। शारीरिक एवं मानसिक रूप से यौन विकलांगों की ६ श्रेणियों के बाबत जानकारी मिलती है - १. बुचरा - वास्तविक हिजडा, २. मनसा - मानसिक रूप से स्त्रियों के नजदीक रहने वाला, ३. नीलिका - किसी कारणवश हिजडा बनने को मजबूर, ४. हंसा - यौनक्षमता की कमी के कारण, ५. छिबरा - जबरन हिजडा बनाये गये, ६. वे जिन्हें पुरुष होते हुए भी स्त्री की तरह वस्त्र पहनना, सजना, सँवरना अच्छा लगता है, इन्हें नपुंसकों के ८ प्रकारों में से एक प्रकार षंड की श्रेणी में भी रखा जाता है। लेकिन सम्भवतः नपुंसक (यौन सम्फ करने में अक्षम) एवं यौन विकलांग में फर्क है। नपुंसक यौनांग के होते हुए भी हो सकता है, जबकि यौन विकलांग यौनांगों की विकलांगता एवं शरीर में विपरीत लिंगी चिह्वों के प्राकट्य की वजह से होता है। कालान्तर में अलग समाज होने से इनके अलग रीति-रिवाज, प्रथाएँ, धर्मगुरु ही नहीं अखाडे एवं मठ संत महात्मा भी बन गये जिनकी एक झलक प्रयागराज कुम्भ में दिखलाई पडी, लेकिन सिफर् यौन विकलांगता की वजह से एक अलग ही समाज का निर्मित होना तथा यौन विकलांगता की वजह से पैदा होते ही उस समाज में किसी शिशु के शामिल कर दिए जाने की बाध्यता क्या मानव समाज की संवेदना पर प्रश्नचिह्व नहीं लगाती? क्या इन्हें भी अन्य मनुष्यों की भाँति जीवनयापन करने, शिक्षा ग्रहण करने, नौकरियाँ करने तथा सम्मान से जीने का हक नहीं है
ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर देखें तो मुगलकाल में मुगल बादशाहों ने पश्चिमी मुस्लिम देशों से हब्सी गुलाम और ईरानी यूनक बुलवाये थे। ये खोजा दिल्ली दरबार और शाही हरम के बीच संदेशवाहक का काम करते थे। मुगलकाल में खोजा या ख्वाजसरा की शासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। चौदहवीं सदी में बलवन के शासन काल में अवध की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त होने पर दिल्ली की तरफ से सरवर नाम के एक खोजा ने व्यवस्था सम्हाली। जवाहर अली खां, अंबर अली खां तथा निशात अली खां इतिहास- प्रसिद्ध ख्वाजसरा हुए। नवाब सफदरगंज के पुत्र शुजाउद्दौला जब फैजाबाद को राजधानी बनाकर गद्दी पर बैठा तो ये खोजा ख्वाजसरा कहे जाने लगे तथा महलों की पहरेदारी, ड्योढीदारी, दरोगाई, बावरचीखाने का इंतजाम, मालियों की अफसरी, आमदानी वसूली, जागीरों की देखभाल आदि का काम इन लोगों के जिम्मे था। लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समय अल्मास अली खां एवं दाराब अली खां ख्वाजसरा का बोलबाला था। नवाबगंज लखनऊ में अल्मास अली का शानदार इमामबाडा और मस्जिद है तथा मौलवीगंज में मिया दराब का इमामबाडा है। वाजिद अली के समय से बशीरुद्दौला ख्वाजसरा बादशाह को उनके ऐश के सामान मुहैया कराता था। २ जनवरी १८५६ को स्लीमन ने गवर्नर जनरल को अपने एक पत्र में लिखा था, ’’बादशाह मुहर्रम के अवसर पर गले में ढोल बाँध कर घूमता-फिरता है, वह शायद लखनऊ का सबसे बडा ढोलकिया बनना चाहता है, उसे हिजडे और गवैये हर वक्त घेरे रहते हैं।‘‘ अवध के नवाबों के अनुसार ख्वाजसरा पढे-लिखे गुणवान और वफादार होते थे। मुगल बादशाहों, नवाबों के ऐशपरस्त होने के फलस्वरूप स्थापित किये गये, पनपे एवं बढे ख्वाजसरा बादशाहों, नवाबों के पतन के बाद सम्भवतः अपराधी प्रवृत्ति के माने जाने लगे, जिससे कि अंग्रेजों के शासनकाल में १८७१ में इन्हें क्रिमिनल ट्राइब का दर्जा दिया गया, जबकि नाच- गाकर जीविकोपार्जन मुगलकाल से ही उन्हें विरासत में मिला, जो कि वर्तमान तक उनमें है। १९५१ में किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स से तो निकाल दिया गया लेकिन उनको मौलिक अधिकार से वंचित रखा गया। १५ अप्रैल २०१४ को सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर के रूप में स्वीकार कर इन्हें समस्त अधिकार दे दिये।
यौन विकलांगों को समस्त मौलिक अधिकार दिया जाना तो निहायत जरूरी था, लेकिन उन्हें ’थर्ड जेंडर‘ या ’ट्रांस जेंडर‘ की श्रेणी में रखकर सामान्य मानव समाज में स्त्री-पुरुष से अलग ही उभयलिंगी के रूप में नामांकित कर उसमें रखना औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यौनांगों की विकलांगता स्त्री-पुरुष दोनों ही लिंगों में समान रूप से परिलक्षित है। अतः जो यौन विकलांग जिस लिंग का है उसी लिंग के यौन विकलांग के रूप में जाना जाना चाहिये तथा उनकी पहचान स्त्री या पुरुष लिंग के तहत ही की जानी चाहिये, जिससे कि वे स्त्री या पुरुष के रूप में आसानी से मानव समाज में घुलमिल जाएं तथा अलग से उनकी पहचान उभयलिंगी के रूप में कर उन्हें अपमानित ना किया जा सके। जब तक मानव समाज से उनका अलगाव परिलक्षित होता रहेगा वे मानव समाज में एक साधारण मानव की हैसियत से ना तो घुलमिल सकेंगे और ना ही सम्मान पा सकेंगे। गौरतलब है कि अन्य शारीरिक अंगों के विकलांग मसलन लूले, लंगडे, अंधे आदि क्या अपनी विकलांगता की वजह से मानव समाज में अलग श्रेणी में रखे जाते हैं? यदि नहीं तो फिर यौनांग भी तो मानव शरीर के ही अंग हैं, तो फिर उन अंगों की विकलांगता की वजह से यौन विकलांगों को अलग श्रेणी में क्यों रखा जा रहा है तथा उनकी एक अलग ही अपमानजनक पहचान हेतु उन्हें ’थर्ड जेंडर‘ से क्यों सम्बोधित किया जा रहा है? क्या इसे उचित ठहराया जा सकता है? बेहतर तो यही है कि उन्हें भी विकलांगों की श्रेणी में वे सभी सुविधाएँ मिलनी चाहिये जो विकलांगों को मिलती हैं तथा उन्हें या अन्य किसी विकलांग को अपमानजनक सम्बोधन से सम्बोधित नहीं किया जाना चाहिये। ना ही एक पैर या एक हाथ न रहने पर उस व्यक्ति को लंगडा-लूला कहकर सम्बोधित किया जाना चाहिये और ना ही यौनांगों से विकलांग को हिजडा, जनखा, किन्नर या थर्ड जेंडर सम्बोधन से सम्बोधित किया जाना चाहिये। विकलांगों को उनकी शारीरिक अंगों की विकलांगता की पहचान वाले शब्दों से सम्बोधित करना क्या उनके लिए अपमानजनक नहीं है? इस बाबत कडे कानून बनाये जाने चाहिये कि ना तो परिवार द्वारा यौन विकलांग शिशु को पारम्परिक हिजडा समाज को सौंपा जाये और ना ही पारम्परिक हिजडा समाज जबरन ऐसे यौन विकलांग शिशु को उनके माता-पिता परिवार से हासिल कर सके। इसके अलावा शासन और समाजसेवी संस्थाओं के साझा प्रयास से पारम्परिक हिजडा समाज के सदस्यों को उनकी योग्यता के अनुरूप नौकरी एवं व्यवसाय के अवसर उपलब्ध कराये जाएं तथा योग्य न होने पर उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे कि मानव समाज के चेहरे पर लगा हिजडा समाज का बदनुमा धब्बा मिटाकर मानव समाज को सिफर् दो ही लिंग स्त्री एवं पुरुष के रूप में जाना जा सके। विकलांगता एक शारीरिक कमी है जबकि यौन विकलांगता शारीरिक कमी के साथ ही हारमोन्स का असंतुलन है, जिसके लिये यौन विकलांग को सहारे, सहानुभूति की जरूरत है, अलग श्रेणी में रखकर मानव समाज से दूर कर देने की नहीं।
यद्यपि ’यौन विकलांगता‘ तथा ’यौनांग विकलता‘ में फर्क है। किसी दुर्घटना में या किसी बीमारी की वजह से यौनांग के क्षतिग्रस्त हो जाने की वजह से यौन क्रिया में असमर्थ हो जाने वाले स्त्री या पुरुष ’यौनांग विकल‘ है जबकि ’यौन विकलांग‘ जन्मना दूषित यौनांग की वजह से ही नहीं हारमोन्स के असंतुलन की वजह से दोनों ही लिंगों (स्त्री तथा पुरुष) के गुणों को धारण करने वाले होते हैं। कानपुर से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ’नवनिकष‘ के जुलाई २०१६ के अंक में नीलम देवी ने अपने शोध आलेख ’हिन्दी उपन्यास और उभयलिंगी समाज‘ में लिखा है ’’हार्मोन सिद्धान्त के अनुसार हार्मोनों के संतुलन का ही परिणाम होता है कि प्राणी नर या मादा के रूप में जन्म लेता है। लिंग का निर्धारण केवल क्रोमोसोमो से ही न होकर उनमें पाये जाने वाले जीनों की तथा आलिंगसूत्रों में पाये जाने वाले जनकों की अंतःक्रिया से भी होता है। अतः शुक्राणु तथा डिंब के संयोजन से युग्मज बनता है जिसमें नये जीवन की उत्पत्ति होती है। इस प्रक्रिया में शुक्राणु के क्रोमोसोम तथा डिंब के क्रोमोसोम एक साथ मिलकर विभाजित होते रहते हैं। विभाजन की इस प्रक्रिया में अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे एक केन्द्र में २२ क्रोमोसोम चले जाएं तथा दूसरे में २४ या कोई अन्य दुर्घटना घट जाए तो इसे अवियोजन कहा जाता है। अवियोजन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लैंगिक असामान्यताएँ हो जाती हैं। ये असामान्यताएँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं - स्त्री पुरुषता, उभयलिंगी तथा मध्यलिंगी मनुष्यों में हिजडों की यही अवस्था होती है।‘‘ (पृष्ठ ६६)
सबके हितों की बात करने वाले साहित्य ने भी इन यौन विकलांगों के हित की बातें की हैं। उसने इन यौन विकलांगों की पीडा, जिजीविषा, संघर्ष के ही चित्र अपनी रचनाओं के फलक पर नहीं उकेरे हैं बल्कि इनकी सहृदयता की भी चर्चा की है। इनको केन्द्र में रखकर कई कहानियाँ, उपन्यास एवं आलेख लिखे गये तथा इनके साक्षात्कार प्रकाशित कर इनकी जिंदगी के विभिन्न रंगों से मानव समाज को रू-ब-रू कराया गया। सम्भवतः सर्वप्रथम सन् १९३९ में निराला जी ने अपने संस्मरणात्मक उपन्यास ’कुल्ली भांट‘ में इनके जीवन के चित्र रोचक ढंग से प्रस्तुत किये थे। उसके बाद इन यौन विकलांगों को केन्द्र में रखकर कई साहित्यिक कृतियाँ लिखी गईं, जिनमें से शिवप्रसाद सिंह की ’बहाव वृत्ति‘ और ’विंदा महाराज‘, पारु मदन नाइक का ’मैं क्यों नहीं‘, नीरज माधव का ’यमद्वीप‘, प्रदीप सौरभ की ’तीसरी ताली‘, निर्मला भुराडिया का ’गुलाम मंडी‘, महेन्द्र भीष्म की ’किन्नर कथा‘, अनसूया त्यागी का ’मैं भी औरत हूँ‘, बांग्ला कहानीकार कमलेश राय की ’द्रौपदी‘, पंजाबी कहानीकार एस. बलवन्त की ’मृगतृष्णा‘, गिरिजा भारती का ’अस्तित्व‘, डॉ. लवलेश दत्त की ’नवाब‘, ’नेग‘ तथा ’तराजू‘, लता शर्मा की ’कहीं भी नहीं है जो‘ से लेकर अभी कुछ समय पूर्व ही साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत चित्रा मुद्गल के उपन्यास ’पो.बा.नं. २०३ नाला सोपरा‘ का जिक्र किया जा सकता है। जबकि पहली ट्रांसजेंडर प्राचार्य मानवी वंद्योपाध्याय ने अपनी आत्मकथा ’पुरुष तन में फंसा मेरा नारी मन‘ तथा ट्रांसजेंडर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा ’मी हिजडा मी लक्ष्मी‘ में अपने जीवन संघर्ष के चित्र प्रस्तुत किये। उज्जयिनी सिंहस्थ २०१६ में लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी को महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान की गई। यौन विकलांगों पर लिखे उपन्यास एवं कहानियों में इनके जीवन को मुख्यतः ६ श्रेणियों में रखकर विश्लेषित किया गया है - १. बतौर अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध की सामग्री, २. यौन विकलांग होने की वजह से समाज में उपेक्षित एवं अपमानित किया जाना, ३. यौन विकलांगों की सहृदयता, ४. यौन विकलांगों का अपराध की ओर अग्रसर होना, ५. यौन विकलांगों की सामान्य जीवन जीने की जिजीविषा, ६. यौन विकलांगता के बावजूद भावनात्मक सम्बन्ध।
(१) यौन विकलांगों पर प्रारम्भिक दौर में लिखी जाने वाली रचनाओं में इन्हें अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध की एक सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों हेतु इन्हें प्रयुक्त किये जाने तथा यौन विकलांगता से यौनक्रिया में अक्षम होने की वजह से स्वयं को अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों हेतु प्रस्तुत करने, उस तरह के यौन सम्बन्धों के आदी होने एवं उस विकृत यौन सम्बन्धों की मानसिकता में जीने के दृश्य चित्रित किये गये हैं। निराला के संस्मरणात्मक उपन्यास ’कुल्ली भांट‘ में उपन्यास का नायक कुल्ली एक ऐसा ही पात्र है। यद्यपि कुछ विद्वानों ने उसे समलैंगिक बतलाया है जबकि समलैंगिकता एवं यौन विकलांग का अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध हेतु प्रयुक्त होने या प्रस्तुत होने में फर्क है। समलैंगिकता समान लिंग वालों (स्त्री स्त्री या पुरुष पुरुष) के मध्य स्थापित होने वाला अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध है, जबकि यौन विकलांग अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध की एक सामग्री के रूप में प्रयुक्त होते हैं, वह भी सिर्फ पुरुषों हेतु। कुल्ली जिस भाँति ग्राम में उपेक्षित, उपहासित एवं बदनाम है, उससे उसकी यौन विकलांग के रूप में ही छवि प्रस्तुत होती है। जबकि प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ’कथाक्रम‘ के अप्रैल २००३ अंक में प्रकाशित लता शर्मा की कहानी ’कहीं भी नहीं है जो‘ में पुलिस अधिकारी द्वारा थाने के मुआयने के दौरान अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध हेतु अधीनस्थों से ’हिजडे‘ की माँग की जाती है। कहानी में कांस्टेबल का यह कथन ’’पन ये साला हरामी! मिनिस्टर का बहनोई। साला हिजडा बुलाने को बोला। हम सरकारी नौकर हैं या रंडियो के दलाल... साब जास्ती मगज खराब करने का नहीं। ये हिजडा लोग धंधा करता बरोबर धंधा करता।‘‘ (पृष्ठ २६) यौन विकलांग का अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध की सामग्री के रूप में प्रस्तुतीकरण का प्रमाण है। सुभाष अखिल के उपन्यास ’दरमियाना‘ में भी कुछ इसी तरह के यौन विकलांगों की चर्चा की गई है।
(२) यौन विकलांगता की वजह से मानव समाज में उनके उपहासित, उपेक्षित एवं अपमानित किये जाने के दृश्य कई कहानियों एवं उपन्यासों में रचनाकारों ने अपने कथानक में चित्रित किये हैं। पारु मदन नाइक के उपन्यास ’मैं क्यों नहीं‘ में नाज नामक हिजडी मंत्री से कहती है, ’’क्या बताऊँ सर, किसी डॉक्टर के पास जाना पडे तो ठीक से ट्रीटमेंट तक नसीब नहीं होता। सहानुभूति से पेश आने वाला आप जैसा कोई मुश्किल से मिलता है। शिक्षा पाना तो दूर, ऐसा जबरदस्त मखौल उडाया जाता है कि पूछिये मत।‘‘ हिजडों का समर्थन करने वाले भी समाज में उपहासित होते हैं, इसका प्रसंग इसी उपन्यास में विधानसभा में हिजडों के पक्ष में प्रश्न उठाने वाले मंत्री की खिल्ली उडाने के दृश्य में चित्रित है जबकि ’तीसरी ताली‘ उपन्यास में आनन्दी की बेटी निकिता हिजडी है इसके बावजूद आनन्दी समाज की परवाह किये बिना उसे घर में पढाती है, लेकिन जब उसे स्कूल में भर्ती करना चाहती है तो किसी स्कूल में उसे दाखिला नहीं मिलता।
(३) यौन विकलांग होने के बावजूद उनकी मानव समाज में सहृदयता के दृश्य कई कहानियों में दर्ज किये गये हैं। ’कथाक्रम‘ अक्टूबर-दिसम्बर २०१८ अंक में प्रकाशित डॉ. लवलेश दत्ता की कहानी ’नवाब‘ में यौन विकलांग नवाब अनाथ बच्ची जया की परवरिश करता है, पढाता-लिखाता है, उसके भविष्य का ख्याल कर उसे नारी निकेतन को सौंप देता है तथा उस बच्ची का गुर्दा खराब होने पर उसे अपना गुर्दा दान कर देता है। दत्त की ही एक अन्य कहानी ’नेग‘ में पुत्री के जन्म लेने पर जब परिवार के सदस्य हिजडों को कोई नेग नहीं देते, तो वे स्वयं बच्ची को नेग देकर आशीर्वाद देते हैं तथा उनकी कहानी ’तराजू‘ में जिस परिवार से यौन विकलांग को उसकी यौन विकलांगता की वजह से निकाल दिया जाता है, उसी परिवार के वयोवृद्ध मुखिया को वह यौन विकलांग अपने घर में पनाह देता है।
(४) सामान्य मानव की भाँति यौन विकलांगों में भी भले-बुरे, अपराधी सभी प्रवृत्ति के लोग हैं। अंग्रेजों के शासनकाल में अंग्रेजों ने इनकी आपराधिक गतिविधियों को देखते हुए इन्हें ’क्रिमिनल ट्राइब‘ घोषित किया था, जो कि बाद में हटा दिया गया, लेकिन देश की स्वतंत्रता के बाद भी इनके द्वारा नेग की जबरन वसूली, ट्रेन में यात्रियों को परेशान कर पैसे वसूली, यौन विकलांग शिशु को जबरन परिवार से ले लेना से लेकर इनके हत्थे चढे युवक को बधिया बनाकर अपने समाज में शामिल कर लेने की घटनाओं का जिक्र कई कहानियों में किया गया है, लेकिन इतना ही नहीं है किन्नरों में भी कई वर्ग होते हैं, कई किन्नर पूँजीपति होते हैं तो कई गरीब। पूँजीपति किन्नरों का दबदबा रहता है तथा उनमें से कई आपराधिक कृत्यों में भी लिप्त रहते हैं। इस बाबत वाराणसी से प्रकाशित ’सोच-विचार‘ पत्रिका के मार्च २०१६ के अंक में किन्नर मनीषा महन्त (हरियाणा) का साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है जिसमें वे एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहती हैं, ’’कुछ पूँजीपति किन्नर पूरा का पूरा जिला अकेले माँगते हैं और किसी दूसरे बेचारे किन्नर को वहाँ फटकने भी नहीं देते। अगर कोई बेचारा गरीब किन्नर अपने हक के लिए आवाज उठाता है तो इन पूँजीपति किन्नरों द्वारा या तो उसका कत्ल करवा दिया जाता है या पुलिसकर्मियों को पैसा खिलाकर उलटा उसके ही खिलाफ तरह-तरह के मुकदमे दर्ज कर उसको ही फँसा दिया जाता है... (पृष्ठ ३३-३४)। चित्रा मुद्गल के उपन्यास ’पो.बॉ.नं. २०३ नाला सोपरा‘ में ठिकाना सरदार की दबंगता तथा उसकी अपराधी प्रवृत्ति का चित्रण किया गया है। कई कहानियों में भी इनके अपराधी प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है लेकिन सम्भवतः किसी अपराधी किन्नर पात्र को केन्द्र में रखकर कोई चर्चित कृति नहीं लिखी गई (या मेरे पढने में नहीं आई)।
(५) बदलते जमाने के साथ परिवार की सोच भी बदली है। अब यौन विकलांग शिशु के माता-पिता अपने उस शिशु को पारम्परिक हिजडा समुदाय को न सौंप कर उसकी परवरिश सामान्य शिशु की भाँति ही करना चाहते हैं, लेकिन समाज की सोच में पर्याप्त बदलाव नहीं आया। इस बदलाव को रेखांकित करते हुए ’तीसरी ताली‘ उपन्यास में जहाँ आनन्दी अपनी यौन विकलांग पुत्री निकिता को सामान्य पुत्री की ही भाँति पढाना-लिखाना चाहती है, उसकी परवरिश करना चाहती है, वहीं समाज से सकारात्मक सहयोग न मिल पाने तथा लगातार विरोध का सामना करने के फलस्वरूप अंत में थक-हार कर अपनी पुत्री को पारम्परिक हिजडा समुदाय को सौंपने के लिए विवश हो जाती है। इसी भाँति अभी हाल ही में प्रकाशित प्रतिष्ठित साहित्यकार चित्रा मुद्गल के साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यास ’पो.बॉ.नं. २०३ नाला सोपरा‘ में यौन विकलांग विनोद (बिन्नी) को अपनी यौन विकलांगता की वजह से अपने परिवार से अलग होकर पारम्परिक हिजडा समुदाय में रहना पडता है लेकिन वह पारम्परिक हिजडों की भाँति नाच-गाकर अपना जीविकोपार्जन नहीं करता बल्कि सामान्य व्यक्ति की भाँति विभिन्न कामों को करता हुआ अपना जीविकोपार्जन का संघर्ष करता है तथा अपने संघर्ष एवं व्यथा को अपने पत्रों के माध्यम से अपनी माँ, जो कि मुम्बई लोकल ट्रेन के वेस्टर्न उपनगर के अंतिम स्टेशन नालासोपरा में रहती है, व्यक्त करता है। उपन्यास में यौन विकलांग के सामान्य व्यक्ति की तरह जीवनयापन की जिजीविषा बडे प्रभावशाली स्वरूप में अंकित की गई है। उस उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए प्रतिष्ठित साहित्यकार ममता कालिया ने कहा, ’’हम लेखकों ने हिजडा समुदाय पर यदा-कदा लिखा है। इन पर फिल्में भी कभी-कभार बनी हैं किन्तु उनकी पीडा, परेशानी और प्रत्याशाओं को उठाने का तार्किक प्रयत्न नहीं किया गया। प्रस्तुत उपन्यास में लिंगदोषी समाज की समस्याओं को अत्यन्त मानवीय दृष्टि से उठाया गया है।
(६) भावना का उद्गम स्थल मन है, शरीर किसी भी लिंग का हो या उभयलिंगी हो, विकलांग या यौनांग विकलांग हो सबमें भावनाओं का स्रोत उमडता है तथा उसकी अभिव्यक्ति भी उसकी शारीरिक क्षमता के अनुरूप होती है। भावनाओं के प्रवाह में उसकी किसी भी तरह की विकलांगता पूर्ण बाधक नहीं बन पाती। यही कारण है कि वात्सल्य भावनाओं के आवेग में ’नवाब‘ कहानी का यौन विकलांग नवाब अनाथ बच्ची जया की परवरिश करता है, पढाता-लिखाता है तथा उसका गुर्दा खराब होने पर अपना गुर्दा उसे दे देता है। लेकिन सिर्फ वात्सल्य भाव ही नहीं स्त्री-पुरुष के मध्य जो प्रेम भावना होती है वह इन यौन विकलांगों के मध्य भी पनपती है, वह भी परस्पर किसी भी तरह के यौन सम्फ न बना पाने की विवशता के बावजूद। यौन विकलांगों के मध्य पनपे इस तरह के भावनात्मक सम्बन्धों को केन्द्र में रखकर लिखी गई रचनाओं के बाबत बात करने से पहले पंजाबी कहानीकार वीना शर्मा की कहानी ’रजाई‘ का जिक्र करना चाहूँगा जिसमें फौजी करनैल सिंह, जो कि यौनांग विकलांग (यौन विकलांग नहीं) है, युद्ध में उसके यौनांग में गोली लगने से वह किसी भी स्त्री से यौन सम्बन्ध बनाने में समर्थ नहीं है, पति परित्यक्ता हरबंश कौर और उसके दो बच्चों को अपने घर में आश्रय देता है। हरबंश कौर द्वारा जब भावनाओं के प्राबल्य में फौजी से चादर डाल कर विवाह करने का प्रस्ताव रखा जाता है तथा प्रत्युत्तर में जब फौजी अपनी यौनांग विकलांगता की बात उसे बतलाता है तो हरबंश कौर का यह जवाब गौरतलब है, ’’मुझे और किसी मर्द की जरूरत नहीं है जी। ना ही अंगों की घिसडन को प्यार कहते हैं... मुझे किसी मर्द की जरूरत नहीं किसी गुनगुने सेंक की जरूरत थी, जो तेरे पास था सिर्फ तेरे पास।‘‘ (वर्तमान साहित्य, शताब्दी पंजाबी साहित्य विशेषांक, मार्च-अप्रैल २०००, पृष्ठ १३३) प्यार की यही परिभाषा, प्यार का यही गुनगुना सेंक दो यौन विकलांगों के बीच प्यार की भावना को जन्म देता है। कथाक्रम अप्रैल-जून, २००३ अंक में प्रकाशित लता शर्मा की कहानी ’कहीं भी नहीं है जो...‘ में यही प्रेम की भावना राधा (स्त्री यौन विकलांग) एवं मोहना (पुरुष यौन विकलांग) के बीच पनपती हुई दिखाई पडती है। थाने में यौन विकलांग राधा का विलाप करते हुए अपने यौन विकलांग प्रेमी मोहना को याद करने का यह दृश्य ’’ऐ! मोहना... मोहना तू किदर रे! मैं क्या करूँ? बोल तू तो कबी मुजकू धूप और पाउस में निकलने नईं दिया। अबी इदर कौन देकेगा मुजकू बोल?... ताप चढेला ए! कितना भला मानुस! ...कइसा प्यार से रकता ए मुजकू! अबी तो उदर जलता... ईदर मै।... मोहना मुजकू प्यार करता मै मोहना को। खिट खिट कायकू? प्यार तो जानवर बी करता अपने सगा वाले को। फिर अमको क्यों नई होना?‘‘ (पृष्ठ २४) हिजडा राधा का यह कथन यौन विकलांगों के मध्य पनपते प्यार की हिमायत करता है और अपने प्रेमी हिजडा मोहना के मरने के बाद हिजडी राधा का विलाप तथा उसके गम में पागल होकर ट्रेन के आगे कूद कर जान दे देने का मार्मिक दृश्य क्या सामान्य स्त्री-पुरुष की प्रेम कहानी से किसी भाँति कम है? ’’वो साला हीजडा मोहना मर गया... राधा ने यह सब देखा तो पागल हो गया। मार छाती पीटना और सिर कूटना! खूब रोना धोना। हिजडों ने समझाया बुझाया भी। मगर उसका एक ही राग मेरा मरद मर गया अब मैं जी कर क्या करूँगी?... क्या कोई सुहागन रोयेगी, वो साला हीजडा रोया। रुक गया रामखिलावन! लाचारी से दोनों हाथ फैलाकर बोला, कैसा झंझट में डाल दिया साले ने... अगस्त क्रांति के सामने कूद पडा... मर गया।‘‘ (पृष्ठ २७)
वर्तमान साहित्य में देहवादिता एवं प्रेम में यौन सम्बन्धों को अहमियत देने वाली यथार्थवादी विचारधारा को यौन विकलांगों की यह प्रेम कहानी प्रेम की भावना को फिर से समझने का आग्रह करती प्रतीत होती है। जबकि गिरजा भारती का उपन्यास ’अस्तित्व‘ अपने कथानक में स्त्री किन्नर ’प्रीत‘ का पुरुष किन्नर ’अमन‘ के साथ विवाह कर दाम्पत्य जीवन बिताना तथा एक लडकी को गोद लेकर बतौर अपनी संतान पालन-पोषण करना किन्नर स्त्री एवं किन्नर पुरुष के बीच भावनात्मक सम्बन्धों को यथार्थपरक नजरिये से विश्लेषित करते हुए, यौन सम्बन्धों के बिना भी भावनात्मक सम्बन्धों पर दाम्पत्य जीवन जिया जा सकता है, का संदेश देता है। लेकिन पंजाबी कहानीकार एस. बलवन्त की कहानी ’मृगतृष्णा‘ एक पुरुष यौन विकलांग का सामान्य स्त्रियों के प्रति आकर्षण, उनके प्रति उसके अंदर कामेच्छा जगना तथा भावावेश में उस पुरुष यौन विकलांग वसु द्वारा जो कि सामान्य पुरुष की ही भाँति ऑफिस में काम करता है तथा ऑफिस में किसी को ज्ञात नहीं है कि वह यौन विकलांग है, मिसेज रमाकान्त को चूम लेना इस बात को बतलाता है कि यौन सम्फ करने में समर्थ न होने के बावजूद पुरुष यौन विकलांगों में सभी भावनाएँ (काम भावना भी) सामान्य पुरुषों की ही भाँति जगती है तथा स्त्री यौन विकलांगों में सामान्य स्त्रियों की भाँति भले ही उसकी तुष्टि करने में वे सक्षम न हों, इसी मृगतृष्णा को कहानीकार अपनी कहानी में बतलाने का प्रयास करता है।
समाज के दो उपेक्षित, तिरस्कृत एवं अपमानित वर्ग हिजडा एवं वेश्या की एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति की भावना को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रतिष्ठित बांग्ला कहानीकार कमलेश राय ने अपनी कहानी ’द्रौपदी‘ में चित्रित किया है, जिसका हिन्दी में अनुवाद प्रतिष्ठित साहित्यकार अमर गोस्वामी ने किया तथा नया ज्ञानोदय के अप्रैल २००९ के अंक में उक्त कहानी प्रकाशित हुई। उस कहानी में हाट में तीन हिजडे झूमर गाते हुए द्रौपदी के वस्त्रहरण की नौटंकी प्रस्तुत करते हैं। उनमें से एक नचनिया, दूसरा ढोलकिया तथा तीसरा दोहरिया है। दर्शकों से विवाद में उनकी पिटाई हो जाती है तथा घायल हिजडा नचनिया, झोपडपट्टी में देह का धंधा करने वाली ’वेश्या लडकी‘ की झोपडी में आश्रय लेता है। कहानी में पहले तो वे एक-दूसरे की जिंदगी से तुलना करते हुए अपनी जिंदगी को बदतर बतलाते हैं। हिजडा कहता है ’’नहीं रे हम लोग न मर्द हैं न औरत। भगवान के मुँह में आग ई साले विष का जीवन लेकर खाली जल ही रहा हूँ।‘‘ जवाब में वेश्या लडकी कहती है, ’’तुम लोग पाँच भरतार वाली द्रौपदी की नौटंकी दिखाते फिरते हो जरा मुझे देखो हाट के दिन बारह भरतारी होती हूँ। इस जीवन पर थूकने की इच्छा करती है।‘‘ लेकिन दूसरे पल ही दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति की भावना जगती है। ’’उस औरत ने सनाकी में भात परोस कर नचनिया को बुलाया आकर थोडा खा ले भात परोस दिया है।‘‘ उपेक्षा भरे जीवन में एक नये प्रकार की बुलाहट थी, दिल से निकली आवेग भरी पुकार। खजूर की चटाई पर बैठते ही अचानक अकारण ही नचनिया की आँखें भर आईं। आँखों के सूखे काजल सूरमे को बहाते आँसू टपकने लगे। वह लडकी अपने मैले आँचल से उन आँसुओं को पोंछते हुए एक उदास मुस्कान से बोली, ’’ऐ बाबा रोती क्यों है? लो अब खा लो। (पृष्ठ २६) और अर्ध रात्रि को ही हिजडे को चिन्ता होती है कि ’’एक हिजडे मरद का किसी औरत के साथ रात बिताने की खबर फैलने पर उसका धंधा ही चौपट हो जायेगा। उसने एक बार उस लडकी को देखा, वह निश्चिंत सो रही थी, उसके चेहरे पर पाप और मलीनता का कोई चिह्व नहीं था। ...नचनिया ने अपने कमर में बंधे बटुए को टटोल कर सौ रुपये का नोट निकाला। काफी दिनों से थोडा-थोडा कर उसने जमा किया था। उस नोट को उसने तकिये के नीचे रख दिया। ...सिर्फ एक रात के लिये ही सही, जीवन की उष्णता से भरकर हाट ताल से होता हुआ चुपचाप पक्की सडक की ओर चल पडा।‘‘ (पृष्ठ २७)
’हिजडा‘ शब्द सम्भवतः उर्दू के हिज्र शब्द, जिसका अर्थ अलग होता है, से जन्मा है यानी कि स्त्री पुरुष दोनों ही लिंग से अलग एक लिंग के रूप में जो पहचाने गये। विभिन्न भाषाओं के सम्बोधनों में भी यह वर्ग उपेक्षित, उपहासित, अपमानित ही नजर आया। ओडिसी भाषा में ’जिगोलो‘ यानी पुरुष वेश्या तथा ’माइचिआ‘ दोनों ही सम्बोधन इनके लिए प्रयुक्त होते हैं। कुछ समय बाद इनके प्रति सहानुभूति के चलते तथा इनके नाच-गाकर जीविकोपार्जन को देखते हुए इन्हें ’किन्नर‘ शब्द से भी सम्बोधित किया जाने लगा और अंततः ’थर्ड जेंडर‘ या ’ट्रांसजेंडर‘ के रूप में इन्हें स्वीकार कर कानून ने इन्हें एक अलग लिंग के रूप में समस्त मौलिक अधिकार दे दिये। वर्तमान समाज की सोच बदल रही है, अब यौन विकलांग शिशु को उनके माता-पिता पारम्परिक हिजडा समुदाय को ना सौंप कर उनकी परवरिश कर रहे हैं, उन्हें शिक्षित बना रहे हैं, जिसके फलस्वरूप इन यौन विकलांगों की सम्मानजनक स्थिति के चित्र उभर कर सामने आ रहे हैं। १८ अक्टूबर २०१७ को पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में लोक अदालत में जोयिता मंडल पहली यौन विकलांग जज बनी हैं तो अभी हाल ही में मध्यप्रदेश में भोपाल में पहली पैरालीगल वालंटियर (पीएलवी) ट्रांसजेंडर संजना बनी हैं। अब लोक अदालत में खंडपीठ सदस्य बन कर वे सुनवाई करेंगी। इनके पूर्व बंगाल में एक यौन विकलांग की प्राचार्य पद पर नियुक्ति हुई तथा पद्मिनि प्रकाश के भी न्यूज एंकर बनने के आशाप्रद समाचार सुनने में आये। राजनीति में भी यौन विकलांगों ने अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। जिस क्षेत्र का मैं रहने वाला हूँ, उसी क्षेत्र की सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र से किन्नर शबनम मौसी विधायक रह चुकी हैं तथा समीपस्थ कटनी शहर की महानगर पालिका की महापौर किन्नर कमला मौसी रह चुकी हैं। हरियाणा की शोभा नेहरु तथा छत्तीसगढ की मधु ने भी राजनीति में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है।
ऐसी स्थिति में क्या यह जरूरी नहीं हो जाता कि इन्हें अलग किसी अपमानजनक सम्बोधन से ना तो सम्बोधित किया जाये और ना पहचाना जाये बल्कि इन्हें सामान्य स्त्री-पुरुष के रूप में स्वीकारा जाये। ना ही इनके लिये तीसरे लिंग (थर्ड जेंडर) का अलग से निर्धारण किया जाये, बस जिस लिंग म वे जन्मे हैं उन्हें उस लिंग (स्त्री या पुरुष) के यौन विकलांग के रूप में स्वीकारा जाये, जिससे कि वे मानव समाज में किसी अपमानजनक पहचान को लिये अलग-थलग नजर न आयें बल्कि आसानी से सबके बीच घुल मिल जायें, साथ ही समाज के हर क्षेत्र, नौकरियों आदि में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से कार्य करने के अवसर प्रदान किये जायें। उल्लेखनीय है कि महाभारत काल में जब शिखंडी युद्ध कर सकता था, मुगल शासन में खजावसरा के रूप में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहते हुए वे शासन एवं प्रबन्ध सम्हाल सकते थे, तो क्या ये वर्तमान समय के यौन विकलांग शिक्षा ग्रहण कर सामान्य रूप से नौकरियाँ भी नहीं कर सकते? सिर्फ वे यौन विकलांग हैं जन्मतः उनके यौनांग दूषित हैं अथवा दोनों लिंगों के चिह्व एवं प्रवृत्तियाँ उनमें निहित हैं, लेकिन इसके बावजूद वे मानसिक तथा शारीरिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
कई यौन विकलांगों ने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास लिखकर वर्तमान साहित्य में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। इनके जीवन के संघर्ष की गाथा यौन विकलांगता के बावजूद इन्हें सामान्य मानव की भाँति मानव समाज में घुलमिल कर जीवनयापन करने के साथ ही नौकरियों में उच्च पदों पर पदासीन होने एवं समाज, राजनीति, धर्म, पत्रकारिता हर जगह सक्रिय होने से भविष्य में लिखे जाने वाले साहित्य के फलक पर इनके जीवन के उजले आशाप्रद पक्ष के चित्र अंकित करने की माँग करती है।
अन्वेषीवृत्ति से सम्पन्न राजेन्द्र सिंह की नजर नये विषयों पर रहती है। वे शहडोल में रहते हैं।