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महात्मा गाँधी और शरीर-श्रम

डॉ. शम्भू जोशी
महात्मा गाँधी द्वारा प्रस्तुत ’शरीर-श्रम‘१ का सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।२ सामान्यतः इसे गाँधी जी के आर्थिक दृष्टिकोण की व्याख्या करते समय एक बिंदु के रूप में (मुख्यतः स्वदेशी एवं न्यासिता सिद्धान्त के साथ) बताया जाता है। यह सिद्धान्त - या कहना चाहिए गाँधी जी की श्रम-दृष्टि - एक अत्यन्त व्यापक सिद्धान्त है, जो उनके समस्त विचारों में अन्तर्गुम्फित है। उनकी श्रम-दृष्टि का विचार भी उनके विचारों की तरह एक विकासशील प्रक्रिया का परिणाम है। अपने प्रारम्भिक जीवन के विभिन्न अनुभवों एवं विशेषतः दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दौरान इस श्रम-दृष्टि का विकास हुआ। इस दृष्टि के विकास में पाश्चात्य एवं पूर्वी दोनों ही स्रोतों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।
गाँधी जी के शरीर-श्रम सम्बन्धी विचारों पर लियो टॉलस्टॉय, जॉन रस्किन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। गाँधी जी शरीर-श्रम के संदर्भ में लियो टॉलस्टॉय, रूसी विद्वान टी.एम. बोंदारेफ एवं जॉन रस्किन का उल्लेख कई बार करते हैं। उन्होंने लिखा*-
’’रोटी के लिए हर एक मनुष्य को मजदूरी करनी चाहिए; शरीर को (कमर को) झुकाना चाहिए, यह ईश्वर का कानून है। यह मूल खोज टॉलस्टॉय की नहीं है; लेकिन उनसे बहुत कम मशहूर रूसी लेखक टी.एम. बोंदारेफ की है। टॉलस्टॉय ने उसे रोशन किया और अपनाया।‘‘३
सत्याग्रह आश्रम के इतिहास की चर्चा करते हुए वह स्पष्ट करते हैं कि बोंदारेफ का शरीर-श्रम के बारे में क्या मत था और वह क्या स्पष्ट करना चाह रहे थे -
’’हर स्त्री-पुरुष शरीर से मेहनत करे, इसे आश्रम अपना धर्म मानता है। इस उसूल की जानकारी या सूझ-बूझ मुझे टॉलस्टॉय के एक लेख से हुई। उन्होंने रूस के एक लेखक बोन्दरेफ के बारे में लिखते हुए बताया कि रोटी-श्रम की जरूरत इस लेखक की इस युग की बहुत बडी खोजों में से एक थी। उसका मतलब यह है कि हर तंदुरुस्त आदमी को अपने गुजारे के लायक शरीर-श्रम करना ही चाहिए। मनुष्य को अपनी बुद्धि की शक्ति का उपयोग आजीविका प्राप्त करने या उससे भी ज्यादा प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए, परोपकार के लिए करना चाहिए।‘‘४
टॉलस्टॉय शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में अपने भाषण में उन्होंने अपने जीवन पर उनके प्रभावों की बात करते हुए स्पष्ट किया कि यदि हम उनके जीवन से लाभान्वित होना चाहते हैं, तो उनके जीवन से उल्लिखित तीन बातें सीखनी चाहिए*-
१. संयम का मार्ग
२. सत्य की आराधना
३. शरीर-श्रम (ब्रेड लेबर)५
दक्षिण अफ्रीका के अपने प्रवास में उन्होंने टॉलस्टॉय की पुस्तकों का अध्ययन काफी बढा लिया था। उसमें टॉलस्टॉय को गोस्पेल्स इन ब्रीफ (नये करार का सार), व्हाट टु डू (हम क्या करें) आदि पुस्तकों ने उनके मन पर गहरी छाप छोडी।६
जॉन रस्किन को गाँधी जी ने टॉलस्टॉय का व्यापक अध्ययन करने के बाद पढा था। आत्मकथा में उन्होंने लिखा था कि ’अन्टु दिस लास्ट‘ पुस्तक को पढने से पहले उन्होंने रस्किन की एक भी पुस्तक नहीं पढी थी।७ ’अन्टु दिस लास्ट‘ को १९०४ में जोहान्सबर्ग से डरबन की यात्रा करते समय उन्हें अपने दक्षिण अफ्रीका के सहयोगी हेनरी पोलाक ने दी थी। इस पुस्तक से उन्होंने शारीरिक श्रम के महत्त्व और उसके सामाजिक संदर्भ को जाना। आत्मकथा में गाँधी जी ने इस पुस्तक के चमत्कारी प्रभाव को इस तरह लिखा कि*-
’’इस पुस्तक को हाथ में लेने के बाद मैं छोड ही न सका। इसने मुझे पकड लिया...मैंने पुस्तक में सूचित विचारों को अमल में लाने का इरादा किया। ...मेरा विश्वास है कि जो चीज मेरे अंदर गहराई में छिपी पडी थी, रस्किन के ग्रंथरत्न में मैंने उसका स्पष्ट प्रतिबिम्ब देखा। ...मैं सर्वोदय के सिद्धान्तों को इस प्रकार समझा हूँ -
१. सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है।
२. वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक-सी होनी चाहिये, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको एक समान है।
४. सादा मेहनत-मजदूरी का, किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है।
पहली चीज मैं जानता था। दूसरी को मैं धुँधले रूप में देखता था। तीसरी का मैंने कभी विचार ही नहीं किया था। ’सर्वोदय‘ ने मुझे दीये की तरह दिखा दिया कि पहली चीज में दूसरी दोनों चीजें समाई हुई हैं। सवेरा हुआ और मैं इन सिद्धान्तों पर अमल करने के प्रयत्न में लगा।‘‘८
गाँधी जी और जॉन रस्किन के आपसी सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए मार्जरी साइक्स ने ’अन्टू दिस लास्ट‘ के प्रभाव को निम्नानुसार बताया है*-
’’वर्षों के विचार और प्रयोग तथा पर्वत प्रवचन की अपनी टॉलस्टॉय की व्याख्या की गहरी छाप वाले गाँधी के मानस के लिए ’अन्टू दिस लास्ट‘ ने बारूद में चिनगारी का काम किया।‘‘९
इस तरह जॉन बांडूरेंट ने रस्किन के विचारों का गाँधी पर प्रभाव का विश्लेषण करते हुए लिखा कि राजनीतिक अर्थशास्त्र पर रस्किन के विचारों ने तथा ’अन्टु दिस लास्ट‘ की प्रेरणा ने गाँधी जी को बहुत प्रभावित किया और प्रथमतः फिनिक्स आश्रम की स्थापना की प्रेरणा दी और आगे के विचारों के लिए एक आधारभूमि प्रदान की -
’’यहाँ मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य यह है कि रस्किन के राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विचारों को न कि उसके अधिकारवाद को, गाँधी जी ने अपने निजी चिंतन में समाविष्ट किया। रस्किन ने गाँधी जी को ऐसे विचार प्रदान किए जिन्होंने सम्पूर्ण गाँधी प्रगति में आश्रम संगठन के आर्थिक सिद्धान्तों को मजबूत बनाया और बढाया।‘‘१०
हम देख सकते हैं कि शरीर-श्रम की अवधारणा पर लियो टॉलस्टॉय और जॉन रस्किन का बहुत प्रभाव पडा और गाँधी जी ने इसे स्वीकार भी किया। डॉ. बी.एन. गांगुली ने शरीर-श्रम के विचार पर थोरो के प्रभाव को भी प्रकट किया है।११ एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह स्वीकार पूर्णतः यथावत् (एज इट इज) नहीं है गाँधी जी अपनी आवश्यकता एवं परिवेश के अनुसार उसमें बदलाव करते हैं। साथ ही इन प्रभावों, स्रोतों के अतिरिक्त एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत गाँधी जी के लिए ’गीता‘ भी रही है। गीता के अध्ययन से उन्होंने उन समस्त विचारों और सिद्धान्तों के मूल को प्राप्त किया, जो उन्हें प्रभावित करते थे। ये विचार और सिद्धान्त गाँधी जी के मन में अस्पष्ट और धुँधले तौर पर मौजूद अवश्य रहे थे। टॉलस्टॉय एवं रस्किन या अन्य स्रोतों से गाँधी जी के मन में मौजूद उन विचारों और सिद्धान्तों को अभिव्यक्त करने में सहायता की, इस कारण उनका महत्त्व असंदिग्ध है। परन्तु गीता की व्याख्या में इन सिद्धान्तों की उपस्थिति ने गाँधी जी को भारतीय परिवेश में इनकी उपस्थिति की सार्थकता प्रदान की।
शरीर-श्रम सम्बन्धी गाँधी जी के विचारों में भी हम एक अनवरत विकास देखते हैं। जब इस धारणा की पुष्टि रस्किन के ’अन्टु दिस लास्ट‘ द्वारा हुई, तब गाँधी जी ने फिनिक्स आश्रम की स्थापना कर एक सामुदायिक जीवन का प्रयोग किया, जो शरीर-श्रम आधारित था। एक विद्वान ने फिनिक्स आश्रम को ’कृषि आधारित एक धार्मिक समुदाय‘ कहा।१२ इसी तरह के प्रयोग टॉलस्टॉय आश्रम में भी जारी रहे। इन दोनों आश्रमों में यह बात स्पष्ट है कि यह विचार एक सामुदायिक जीवन व्यतीत करने हेतु एक प्रयोग था। उसका वृहत् स्तर पर प्रयोग एवं सम्भावना अस्पष्ट थी।
गाँधी जी के भारत आगमन एवं उनके द्वारा आश्रम स्थापित किए जाने पर शरीर-श्रम उसका एक अभिन्न नियम बना। उन्होंने भारत की गरीबी, बेरोजगारी, शोषणकारी अर्थव्यवस्था, भेदमूलक समाज, शारीरिक एवं मानसिक श्रम का भेद इत्यादि विभिन्न समस्याओं के निवारण के तौर पर एक अहिंसक समाज का आदर्श रखा। यह अनुभव किया कि श्रमाधारित व्यवस्था इन सब समस्याओं का निवारण कर सकती है। अतः हम देख सकते हैं कि शरीर-श्रम का विचार किस प्रकार व्यक्तिगत, फिर आश्रम जीवन तथा आगे चलकर वृहत्तर भारतीय समाज के कर्त्तव्य के रूप में वैचारिक एवं व्यावहारिक तौर पर रूपान्तरित और परिपक्व हुआ।
गाँधी जी के अनुसार अहिंसा या कहना चाहिए प्रेम, जीवन को संचालित करने वाला नियम है। यह एक वैज्ञानिक नियम भी है। अतएव जीवन में अहिंसा या एकत्व की साधना होनी चाहिए। प्रेम को प्रदर्शित करने की सर्वाधिक मुखर अभिव्यक्ति त्याग है। अतएव जीवन त्यागपूर्ण होकर ही एकत्व की साधना करता है। यह त्याग ही प्रेम है, क्योंकि हम किसी से कितना प्रेम करते हैं, यह इस बात से ज्ञात हो सकता है कि हम उसके लिए क्या त्याग कर सकते हैं। अतः गाँधी जी के लिए जीवन में त्याग बहुत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है। वह कहते हैं ’सुखी जीवन का रहस्य त्याग में निहित है। त्याग ही जीवन है।‘१३ इस त्यागपूर्ण (प्रेमपूर्ण) जीवन की अभिव्यक्ति व्यक्ति समाज में अन्यों की सेवा के जरीए कर सकता है। अतः गाँधी जी के अनुसार जब व्यक्ति सम्पूर्ण त्याग के आदर्श तक पहुँचने की कोशिश करता है और अपने शरीर को सेवा के लिए काम में लाता है तो जीवन का आधार रोटी (या कमाई) के स्थान पर सेवा ही बन जाती है।१४ साथ ही यह सेवा निःस्वार्थ भाव से की जाती है।
शरीर-श्रम की अवधारणा को गाँधीजी ने ’यज्ञ‘ के साथ जोडकर प्रस्तुत किया है। वह ’यज्ञ‘ का अर्थ स्पष्ट करते हुए पारमार्थिक सेवा के साथ उसे संयुक्त करते हैं -
’’यज्ञ का अर्थ है कोई ऐसा कृत्य जो फल की कामना किए बगैर दूसरों के कल्याण के लिए किया गया हो... यज्ञ का जन्म सृष्टि के साथ-ही- साथ हुआ। इसलिए यह शरीर हमें केवल इसीलिए मिला है, हम इससे सृष्टि मात्र की सेवा करें। इसीलिए गीता में कहा गया है कि जो यज्ञ किए बिना खाता है, वह चोरी का भोजन खाता है। शुद्ध जीवन वाले व्यक्ति का हर काम यज्ञ स्वरूप होना चाहिए।‘‘१५
इसी उद्धरण में गाँधी जी यह तर्क भी प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य और समाज की रचना में इस यज्ञ (त्यागपूर्ण कर्म) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनके अनुसार हमारा अस्तित्व ही ऋणपूर्ण है, फिर चाहे वह प्रकृति हो या समाज। अतः हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह त्यागपूर्ण कर्म करते हुए इस ऋण से उऋण हो। हर व्यक्ति अपने जीवन में अस्तित्व को बनाए रखने के लिए और सामाजिक प्राणी होने के नाते त्याग तो करता ही है, तब उसे क्यों न जीवन का नियम ही बना लिया जाए। शरीर-श्रम का सिद्धान्त इस ’यज्ञ‘ (त्यागपूर्ण कर्म) को विचारपूर्वक तरीके से स्वीकार करने का परिणाम है। परमार्थ हेतु त्यागपूर्ण कर्म व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि एक सामाजिक कर्त्तव्य भी हो जाता है।
शरीर श्रम का व्यापक आयाम है। व्यक्तिगत मूल्य से आगे बढकर सार्वजनिक मूल्य हो जाने पर इसका प्रभाव काफी व्यापक होगा। भुखमरी की समाप्ति, विश्राम की उपलब्धता, आरोग्यता, लोक कल्याण, सामाजिक समानता आदि लक्ष्यों की स्थापना में शरीर-श्रम की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।
शरीर-श्रम को जीवन का नियम स्पष्ट करते हुए वह इसे राष्ट्र निर्माण के साथ भी जोडते हैं और राष्ट्रीय जीवन में महत्त्वपूर्ण बताते हैं। उनके अनुसार किसी भी राष्ट्र के लिए आवश्यक है कि वह मनुष्य रूपी सजीव मशीनों का सम्पूर्ण सदुपयोग करे। यदि एक व्यक्ति ऐसा करने से मना करता है तो वह देशद्रोह के समान माना जाना चाहिए*-
’’एक अमेरिकी लेखक का कहना है कि भविष्य उन राष्ट्रों के हाथों में है, जो शारीरिक श्रम में विश्वास करते हैं। दुनिया के देश उन निर्जीव मशीनों की पूजा से थक गए हैं जो निरन्तर संख्या में बढती जा रही हैं। हम लोग अप्रतिम सजीव मशीनों को अर्थात् अपने शरीर को निकम्मा बनाकर और उसकी जगह निर्जीव मशीनों को देकर शरीर को नष्ट कर रहे हैं। यह एक ईश्वरीय नियम है कि शरीर से पूरा काम लिया जाए और उसका उपयोग किया जाए। हम उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। चरखा शरीर का शुभ प्रतीक है। जो मनुष्य बिना श्रम का भोग चढाए भोजन करता है वह चोरी करके खाता है। शरीर-श्रम से बचना देशद्रोह और ड्योढी पर खडी भाग्यलक्ष्मी को ठुकराने के समान है।‘‘१६
गाँधी जी के अनुसार शरीर-श्रम नीरस नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार यदि कोई काम एक तरह का होने के कारण निरुत्साही एवं थकाऊ हो परन्तु इस काम को करने से सृजनात्मकता का आनंद अनुभव होता है तो वह नीरस नहीं है। एक व्यक्ति द्वारा अपने श्रम से किसी वस्तु का सृजन किया जाना उस कार्य की थकान एवं निरुत्साह को भुला देता है। एक उदाहरण के रूप में इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि एक जूते की बडी फैक्टरी में जहाँ जूते का हर भाग अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग जगह पर बनाया जाता हो वहाँ काम एक व्यक्ति के लिए निरुत्साही, ऊबाऊ एवं थकावट देने वाला हो सकता है परन्तु एक मोची द्वारा पूरा जूता स्वयं बनाने से यह काम नीरस नहीं रहता है, क्योंकि उसमें उसे सृजनात्मकता का आनन्द प्राप्त होता है। मोची के शरीर-श्रम की यह स्थिति तब तक मानी जा सकती है जब तक वह उसे (अपने कार्य को) कौशलपूर्ण बनाए, अपना कौशल बढाए और उसमें सृजनात्मकता का आनन्द ले। किसी भी कार्य निष्पादन में भावना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है जो किसी भी कार्य का प्रेरक होती है। सभी तरह के श्रम बुद्धिपूर्वक और उच्च भावनाओं के साथ किए जाते हैं, तो सृजन बन जाते हैं। यही सृजनात्मकता का आनन्द शरीर-श्रम का महत्त्वपूर्ण अंग है।
प्रो. डी.एन. चतुर्वेदी१७ ने शरीर-श्रम के सृजनात्मक आनन्द पर प्रकाश डालते हुए बताया कि शरीर-श्रम का कलात्मक विकास इस युग की माँग है। वह सजा, मजदूरी, बेगार और आनन्द में अंतर स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि जो काम हम अपनी इच्छा से नहीं करते, वह सजा है। पैसों के लिए किए जाने वाला उत्पादन कार्य मजदूरी है। दूसरों की इच्छा अनुसार किया गया उत्पादन कार्य बेगार है। जो कार्य अपनी इच्छा व अपने अनुसार किया जाता है वही कार्य का आनन्द है। गाँधी जी ने शरीर-श्रम के जरीए इसी आनन्द की सृष्टि की, यह उनकी कला है।
प्रो. बैद्यनाथ घोष ने गाँधीवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र पर विचार करते हुए उसके प्रविधिक आधारों (मैथेडोलॉजिकल फाउडेशन्स) को खोजने का प्रयास किया है।१८ इस प्रयास में शरीर-श्रम पर विचार करते हुए गाँधी जी को उद्धृत करते हुए वह बताते हैं कि श्रम की सर्वाधिक विशिष्टता इस बात में है कि वह मूल्य का निर्माता है। वास्तव में श्रम के द्वारा ही व्यक्ति सृजन के कार्य में भागीदार होता है और श्रम और आत्म-अनुभव (सेल्फ रीयलाइजेशन) का भी माध्यम बनता है।१९ गाँधी जी के लिए श्रम अच्छे जीवन का अन्तर्भूत अंग तथा प्रकृति व समाज के साथ एकत्व एवं सौहार्द स्थापित करने का माध्यम है। श्रम करते हुए व्यक्ति समाज सेवा का आनन्द अनुभव कर सकता है। शरीर-श्रम से उनका ऐसा ही आशय था। अपनी जरूरतें पूरी करने के अलावा भी शरीर-श्रम का विचार काफी व्यापक है। शरीर-श्रम करते हुए व्यक्ति सृजन एवं समाज सेवा का अनुभव करता है। शरीर-श्रम एक अस्मिता निर्धारक गतिविधि है, जिसमें वह एक सार्थक अस्मिता का अनुभव करता है, जहाँ वह समाज एवं प्रकृति के साथ सामंजस्य से रहता है।
कार्य संस्कृति के प्रति गाँधीवादी दृष्टि की व्याख्या करते हुए प्रो. जे. एस. माथुर२० ने कार्य संस्कृति (वर्क कल्चर) की दो विशेषताओं का उल्लेख किया है*-
१. श्रम एक पीडादायक अनुभव है। हर कोई इससे बचना चाहता है। श्रम से दूरी यानी ज्यादा आराम यानी ज्यादा सुसंस्कृत। श्रम संतुष्टि का माध्यम नहीं है।
२. श्रम के साथ मुनाफे का जुडा होना। हर व्यक्ति मुनाफे की वृद्धि का ध्यान रखता है। व्यक्ति या समाज पर इस प्रक्रिया का क्या प्रभाव पडेगा, यह कोई सोचना नहीं चाहता है।
इसके बाद प्रो. माथुर ने यह स्पष्ट किया कि गाँधी जी की शरीर-श्रम की अवधारणा एक ऐसी कार्य संस्कृति का निर्माण करने का प्रस्ताव करती है जिसके आधार पर ये दोनों कमियाँ दूर की जा सके।
गाँधी जी ने यह स्पष्ट किया कि शरीर-श्रम के नियम का पालन स्वेच्छा से किए जाने पर ही स्वास्थ्य, संतोष की प्राप्ति होती है अन्यथा अरुचिपूर्वक, जबर्दस्ती किया गया पालन दुष्प्रभावों को जन्म देता है जिसमें गरीबी, बीमारी और असंतोष शामिल है।
एक समतापूर्ण समाज के लिए आवश्यक है कि इस सिद्धान्त का पालन स्वेच्छा से किया जाए और श्रम की गरिमा स्वीकार की जाए। इसके पीछे सामाजिक उद्देश्य और समाज में योगदान का भाव होना चाहिए। गाँधी जी शरीर-श्रम के सिद्धान्त को व्यक्ति के जीवन के अधिकार (राइट टू लाइफ) से जोडते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति दूसरों की सेवा करके ही अपने जीवन का अधिकार पा सकता है। केवल शारीरिक श्रम काफी नहीं है जब तक कि उसके साथ सेवा का निःस्वार्थ प्रयोजन नहीं जुड पाता है -
’’सेवा करना तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि उसके मूल में प्रेम अथवा अहिंसा न हो... एक बात यह भी है कि यह सेवा रोटी के लिए श्रम के बगैर सम्भव नहीं है, जिसे गीता में यज्ञ कहा गया है। सेवा के प्रयोजन से शारीरिक श्रम करने पर ही स्त्री अथवा पुरुष को जीने का अधिकार प्राप्त होता है।‘‘२१
मार्गरेट चटर्जी ने भी शरीर-श्रम सिद्धान्त के सम्बन्ध में दर्शाया कि गाँधी जी ने इसे अपनाकर भोजन एवं जीवन के अधिकार (राइट टू फूड और राइट टू लाईफ) के साथ संलग्न किया।२२ उनके अनुसार स्वेच्छा से किया गया पालन न केवल व्यक्तिगत अपितु सार्वजनिक रूप से कल्याणकारी साबित होगा। उनके सामने वर्तमान परिस्थिति में मजदूरों की जन्दगी थी, जहाँ काम उनके लिए शारीरिक श्रम होने के बावजूद भी आनन्ददायी नहीं था। वह कहते हैं कि मजदूरों को अपने द्वारा किए गए शारीरिक श्रम में कोई सुख नहीं मिलता। वे (मजदूर) अपने श्रम को कष्टप्रद और सुखहीन समझते हैं, जबकि गाँधी जी के लिए शरीर-श्रम का अर्थ सृजनात्मक आनन्द और स्वेच्छापूर्वक समाज सेवा से था।
इन बिन्दुओं पर चर्चा करने के बाद भी एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत होता है कि शरीर-श्रम कितना किया जाए? एक व्यक्ति के लिए कितना शरीर-श्रम पर्याप्त है? गाँधी जी के सम्पूर्ण खण्डों में हमें इस प्रश्न के अलग-अलग उत्तर प्राप्त होते हैं। एक ओर यह उत्तर भी प्राप्त होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक श्रम के जरीए अपनी आजीविका कमानी चाहिए, ऐसा करते हुए उसे समाज सेवा भी करनी चाहिए। वहीं, दूसरी ओर हमें ऐसे उत्तर भी प्राप्त होते हैं जहाँ व्यक्ति को कुछ सामाजिक उपयोगी शारीरिक श्रम करना चाहिए।
शरीर-श्रम की अवधि पूछे जाने पर गाँधी जी ने कई बार आठ घंटे शरीर-श्रम करने की बात कही है। एक साक्षात्कार में वह स्पष्ट करते हैं कि एक व्यक्ति को एक दिन में आठ घंटे का शारीरिक श्रम करना चाहिए।२३ कई स्थानों पर भी वह आठ घंटे का समर्थन करते हैं। कई स्थानों पर इससे कम अवधि का भी जिक्र करते हैं।
यह आवश्यक है कि एक ओर आठ घंटे शरीर-श्रम करने की बात कहते हुए भी कई बार शरीर-श्रम की लचीली व्याख्या करते हुए हर व्यक्ति को कुछ शरीर-श्रम करने की बात कहते हैं।
एक अन्य स्थान पर प्रश्नकर्त्ता द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं रमन को शरीर-श्रम करने की गाँधी जी की इच्छा के सवाल का जवाब देते हुए वह इस बात को स्पष्ट करते हैं कि वह शरीर-श्रम की जरूरत पर जोर देते हैं और इस फर्ज से किसी भी मनुष्य को छुटकारा नहीं मिलना चाहिए।२४ गाँधी के अनुसार शरीर-श्रम के इस फर्ज से व्यक्ति को छुटकारा दिए जाने का परिणाम प्राचीन संस्कृतियों के उदाहरण से जाना जा सकता है। उन्होंने प्राचीन रोमन सभ्यता का हवाला देते हुए कहा कि ’बिना श्रम की संस्कृति या वह संस्कृति, जो श्रम का फल नहीं है, एक रोमन कैथलिक लेखक के अनुसार नाशकारक है।‘२५ इस तरह गाँधी जी श्रम और संस्कृति को अलग न रखकर एक श्रममूलक संस्कृति की ओर ले जाते हैं।
डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा प्रेषित पत्र के जवाब में वह पारस्परिकता और शरीर-श्रम को सम्बन्धित करते हुए बताते हैं कि शरीर-श्रम का अर्थ है एक-दूसरे के साथ सहयोग करना -
’’अहिंसा के विषय में अपने प्रयोगों से मुझे पता है कि व्यावहारिक अहिंसा का मतलब है सबके साथ मिलकर शारीरिक श्रम करना। रूसी दार्शनिक बोन्डरेफ ने इसे जीविका श्रम का नाम दिया है। इसका मतलब है आत्यन्तिक सहयोग। ...सत्य और अहिंसा के विषय में चौंतीस साल के सतत अनुभव और प्रयोग ने मुझे कायल कर दिया है कि अहिंसा तभी तक निभ सकती है जब तक कि वह सजग शारीरिक श्रम से सम्बद्ध हो और अपने पडोसियों के साथ हमारे रोजाना व्यवहार में व्यस्त हो।‘‘२६
यहाँ यह स्पष्ट है कि शरीर-श्रम की अवधारणा किसी भी तरह से स्वच्छन्दता या व्यक्तिगत स्वार्थ या सामाजिक कटाव का समर्थन नहीं करती है बल्कि वह लहरों की तरह एक केन्द्र से प्रारम्भ होकर अन्य लहरों के साथ सहयोग करते हुए वृत्त का निर्माण करती। शरीर-श्रम समाज परिवर्तन के लिए व्यक्ति की प्रकृति और विचारों में परिवर्तन का अवसर देता है। व्यक्ति श्रम करते हुए शरीर को स्वस्थ रखता है, बुनियादी जरूरतें पूरी करता है और एक ज्यादा प्राकृतिक जिंदगी जीता है। प्राकृतिक जिंदगी व्यतीत करते हुए वह अपनी कृत्रिम जरूरतें कम करता जाता है यानी उसकी जरूरतें कम होती जाती हैं। हर व्यक्ति श्रम करते हुए श्रम की महत्ता जानते हुए हर दूसरे श्रम करने वाले व्यक्ति का सम्मान करता है और एक पारस्परिक सहयोग, सम्मान वाला समाज बनता है। शरीर-श्रम अवधारणा में व्यक्ति सामाजिक कर्त्तव्य का निर्वाह करता है,२७ वह भी अन्य के प्रति सहयोग करके, अतएव वह सामाजिकता का ही पोषक है।
गाँधी जी शरीर-श्रम की अवधारणा में अपनी मौलिकता का समावेश करते हुए उसका भारतीयकरण करते हैं। कृषि के साथ-साथ अन्य व्यवसायों को भी वह शामिल करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि वह सफाई के काम को भी शरीर-श्रम की गतिविधि में शामिल करते हुए इसे एक अत्यन्त क्रांतिकारी तत्त्व बना देते हैं। वह बताते हैं कि सभी को सफाई का काम करना चाहिए और सफाई का काम करने वाले व्यक्तियों और वर्गों के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए -
’’...सबसे आसान उपाय यह है कि हम सब रोटी कमाने के लिए सफाई का काम हाथ में लें। इस प्रकार अगर सफाई का काम बुद्धिमानी से हाथ में लिया जाए तो इंसान-इंसान की बराबरी को सच्चे रूप में समझने में बडी मदद मिलेगी।‘‘२८
इस तरह यह स्पष्ट है कि शरीर-श्रम की अवधारणा को व्यापक करना गाँधी जी का मौलिक अवदान है।
इस तारतम्य में हमें यह भी देखना होगा कि गाँधी जी ने एक आदर्श रूप में शरीर-श्रम को प्रस्तुत किया परन्तु जिस समय और समाज में वह रह रहे थे, उसका प्रभाव भी इस विचार पर अवश्य पडा। वह एक सोपानीकृत सामाजिक व्यवस्था, शोषणकारी केन्द्रीकृत आर्थिक व्यवस्था, अपनी जमीन-जीवन से कटी शिक्षा व्यवस्था, मानसिक गुलामी, सांस्कृतिक हीनभाव इत्यादि से ग्रस्त समाज में रह रहे थे। अतएव शरीर-श्रम की उनकी अवधारणा भी एक विकासशील अवधारणा रही। उन्होंने इसे व्यावहारिक बनाने का भरपूर प्रयास किया। उन्होंने एक ओर आदर्श के रूप में इसे दैनंदिनी जीवन का अंग बनाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर व्यावहारिक स्तर पर यह प्रयास किया कि हर व्यक्ति जहाँ भी जिस भी तरह से सम्भव हो सके कुछ-न-कुछ शरीर-श्रम अवश्य करे। उन्होंने शरीर-श्रम को स्थैतिक/जड अवधारणा की तरह नहीं माना बल्कि उसमें अपवादों के लिए भी स्थान छोडा। गाँधी सेवा संघ की बैठक में एक प्रश्नकर्त्ता द्वारा शरीर-श्रम की न्यूनतम मर्यादा क्या हो? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि वह किसी निश्चित प्रकार की गतिविधियों को इसमें बाँधकर सीमित नहीं करना चाहते हैं। यह बात स्पष्टतः प्रकट करती है कि वह इसमें संशोधन की सम्भावना या समयोचित बदलाव से इन्कार नहीं करते हैं।२९ एक अन्य स्थान पर वह शरीर-श्रम की अनिवार्यता को मानते हुए भी इसमें अपवाद की सम्भावना को स्वीकार करते हैं।३०
शरीर-श्रम एक आदर्श के रूप में महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक शोषणमुक्त समाज की नींव रखता है। भले ही व्यक्ति शरीर-श्रम का पालन पूर्ण रूप में न कर सकता हो परन्तु उसे किसी-न-किसी रूप में उसका पालन करना चाहिए। फिर वह रूप शारीरिक श्रम करते हुए उपयोगी समाज सेवा हो या शोषणमुक्त कार्य।
हम स्पष्टतः यह देख सकते हैं कि गाँधी जी ने शरीर-श्रम में कुछ अपवाद भी किए हैं। ये अपवाद समयानुकूल एवं प्रासंगिक हैं। उनका उद्देश्य था कि समाज श्रम को प्रतिष्ठा प्रदान करे और उसे उचित सम्मान व स्थान दे।
गाँधी जी श्रम के दोनों रूपों - शारीरिक व बौद्धिक श्रम - को महत्ता प्रदान करते हैं। प्रो. अजित दासगुप्ता ने लिखा कि गाँधी जी टॉलस्टॉय की तुलना में मानसिक व शारीरिक श्रम के बीच विचार करते समय कम कठोर हैं।३१ गाँधी जी शरीर-श्रम और बौद्धिक श्रम के बीच अलगाव कम करके दोनों वर्गों को साथ लाकर समाज की बेहतरी में प्रयुक्त करना चाहते हैं। वह इन दोनों श्रम के बीच किसी तरह के सोपानीक्रम (हाइरारकी), उच्चता-निम्नता को अस्वीकार करते हैं।
बौद्धिक श्रम करने वालों को शरीर-श्रम की अनिवार्यता कर मेहनतकश जीवन की समस्याओं से रू-ब-रू करना चाहते हैं, जिससे समाज के दो छोरों पर रह रहे वर्ग की खाई को पाटा जा सके। इसी बौद्धिक एवं शारीरिक श्रम के बीच सामंजस्य का विचार नई तालीम का प्रादुर्भाव करता है। यह शिक्षा श्रम आधारित थी। इसमें साक्षरता और उद्योग धंधे एवं हस्तशिल्प की शिक्षा एक साथ होती है। साक्षरता (अक्षर ज्ञान) एक ओर औपचारिक बौद्धिक विकास का परिचायक है तो उद्योग-धंधे एवं हस्तशिल्प की शिक्षा समाजोपयोगी शरीर-श्रम का। वह इन दोनों के पार्थक्य को गलत मानते हैं और कहते हैं कि अक्षर ज्ञान और उद्योग को अलग कर देने पर ज्ञान का व्यभिचार होने लगता है। वह अपनी शिक्षा व्यवस्था में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख करते हैं कि इसकी प्राप्ति के बाद विद्यार्थी शरीर-श्रम को हेय न समझें।३२ दोनों ही प्रकार के श्रम हेतु गाँधी जी समान पारिश्रमिक की बात कर समानता स्थापित करने की बात कहते हैं, जिसे वह ’सर्वोदय‘ में स्पष्ट करते हैं। यहाँ श्रम के पारिश्रमिक पर गाँधी दृष्टि से विचार करना प्रासंगिक होगा।
शरीर-श्रम से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन करने के बाद हम यह अनुभव कर सकते हैं कि साधारण तौर पर शारीरिक श्रम का प्रस्ताव करने वाली यह अवधारणा कितनी व्यापक एवं अहिंसक समाज की महत्त्वपूर्ण बुनियाद है। स्वयं गाँधी जी ने भी जब इसे आश्रम जीवन का अंग बनाया तब वह इसके विभिन्न आयामों से परिचित हुए होंगे इसलिए उन्होंने शरीर-श्रम को महत्त्वपूर्ण बताया।
इसके अतिरिक्त शरीर-श्रम की संकल्पना को गाँधी जी ग्रामीण पुनर्रचना में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं। वह अपने समय में यह देख रहे थे कि सम्पूर्ण भारत का आधार गाँव था परन्तु श्रम करने के नियम से हटने, शहरों के गाँवों के शोषण करने, गाँवों द्वारा शहरों का अनुकरण करने इत्यादि कारणों से गाँवों की दशा दयनीय हो गई है।
वह शरीर-श्रम की प्रस्तावना से इन गाँवों की पुनर्रचना का सपना देखते हैं। उनके आमूलचूल परिवर्तन की आकांक्षा करते हैं।३३-३४
सम्भवतः श्रम की अपनी इसी व्यापक समझ के चलते एक विद्वान ने गाँधी जी को ’श्रम का राजनीतिक अर्थशास्त्री कहा है।३५ गाँधीवादी अध्येता त्रिदीप सुहृद३६ ने शरीर-श्रम पर विचार करते हुए बताया कि गाँधी जी ने एकादश व्रतों में से तीन (अस्पृश्यता उन्मूलन, सर्वधर्मसमभाव और स्वदेशी) उनके अपने समय और संदर्भ के प्रति उनकी प्रतिक्रिया थी। शरीर-श्रम की अवधारणा का समावेश भारतीय संदर्भ में उनका नवाचार था, जहाँ समाज में सामाजिक और कर्मकांडीय शुद्धता-अशुद्धता का भाव किसी व्यक्ति के द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले कर्म से जुडा था। अन्य सात व्रत अन्य भारतीय परम्पराओं के भाग हैं। गाँधी जी की मौलिकता इस बात में है कि उन्होंने इन सभी को राजनीतिक क्षेत्र की मुख्यधारा में ला दिया। डॉ. रायुलू ने शरीर-श्रम के अपने विवेचन में इसके तीन आयाम बताए हैं*-
१. श्रम की गरिमा (डिग्नीटी ऑफ लेबर)
२. श्रम की समानता (इक्वलिटी ऑफ लेबर)
३. श्रम के प्रति समर्पण एवं कुशलता (एक्सीलेंस इन एण्ड डिवोशन टू लेबर)३७
डॉ. डी.एन. चतुर्वेदी३८ के अनुसार गाँधी जी के श्रम विचार भी मानवतावादी विचारों एवं समग्र दृष्टिकोण से प्रेरित हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित गाँधी जी के श्रम सिद्धान्त को निम्नानुसार बताया जा सकता है -
१. गाँधी जी ने शरीर रक्षण के लिए शरीर-श्रम को एक धर्म माना। जैव वैज्ञानिक तथा धर्मनिष्ठ विचारकों को साथ रखने का प्रयास किया।
२. शरीर-श्रम के माध्यम से अर्थशास्त्र द्वारा विकृत सामाजिक सम्बन्धों की बुनियाद को नष्ट किया।
३. श्रम को मानव जीवन की कसौटी माना। अर्थव्यवस्था में आवश्यक है कि उपभोग के लिए शारीरिक श्रम किया जाए। उत्पादक व उपभोक्ता की खाई खत्म होने से समरसता होगी।
४. प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक श्रम द्वारा मानवीय समता को प्राप्त कर सकेगा।
५. शरीर-श्रम श्रममूलक संस्कृति का स्थापक है।
डॉ. बी.एन. गांगुली३९ ने शरीर-श्रम सम्बन्धी अवधारणा और उसकी आलोचना पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने शरीर-श्रम की आलोचना करते हुए स्पष्ट किया कि यह अवधारणा फिनिक्स आश्रम या टॉलस्टॉय फॉर्म जैसे घनिष्ठ सामुदायिक संगठनों में तो प्रचलित हो सकती है परन्तु जटिल श्रम विभाजन पर आधारित समाजों में व्यापक स्तर पर लागू होना सम्भव नहीं है। इस आलोचना का उत्तर यह दिया जा सकता है कि गाँधी जी से पूर्व यह माना जाता था कि अहिंसा एक व्यक्तिगत गुण है इसे सामाजिक स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता, परन्तु हमने देखा कि यह सार्वजनिक क्षेत्र में आजादी के आंदोलन का आधार बनी। उसी प्रकार जब तक उसे लागू नहीं किया जाता है तब तक उसकी सफलता असफलता पर विचार बेमानी हो जाता है। फिर भी वह अवधारणा की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि यह अवधारणा बेहतर मनोवैज्ञानिक और शारीरिक स्वास्थ्य हेतु सहायता; सामाजिक जागरूकता हेतु उत्प्रेरक; मानसिक एवं शारीरिक श्रम के संयोजन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति; उत्पादन मंक सभी की भागीदारी करने के रूप में अपनी सामाजिक महत्ता रखती है। समाज में श्रम और आराम के समान वितरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। साथ ही यह एक सच्चे समतामूलक समाज के लिए संगत मनोवैज्ञानिक वातावरण के निर्माण के लिए जरूरी है।
डॉ. शम्भू जोशी इन दिनों अपनी शोधकृति अहिंसक श्रमदर्शन के कारण चर्चा में हैं। वे महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में सहायक आचार्य के पद पर कार्यरत हैं।