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आदिवासी सौन्दर्यबोध

हरिराम मीणा
सौन्दर्य शास्त्र की भद्र मान्यता भाववादी, वायवीय एवं सापेक्षिक रही है, जिसका बहुप्रचारित दृष्टान्त ’सत्यम् शिवम् सुन्दरम्‘ का दिया जाता रहा है। यह शब्द-समूह प्राचीन भारतीय वाङ्मय में कहीं नहीं मिलता, हालाँकि तीनों ही शब्दों की वृहत् व्याख्या विभिन्न ग्रंथों में मिलती है। इस शब्द समूह का प्रयोग पहली दफा गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर ने किया था और इसका बहुत ही गहन एवं आधिकारिक विश्लेषण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ’हिन्दी साहित्य के इतिहास‘ के छायावाद वाले अध्याय में किया है। जहाँ तक ’सत्यम्, शिवम् व सुन्दरम्‘ की बात है तो इसका अर्थ ’यत् सत्यं तत् शिवं, यत् शिवं तत् सुंदरं।‘ सौंदर्य की इस अवधारणा में सत्य एवं मंगल के तत्त्व अनिवार्य रूप से सम्मिलित हैं। यहाँ अंतिम सत्य परम ब्रह्म को माना गया है जो अविनाशी, चिरंतन और शाश्वत है। सौन्दर्य- बोध का यह परम्परागत भद्र दृष्टिकोण नितांत काल्पनिक है, जो लौकिक संसार से कोई सम्बन्ध नहीं रखता।
जब हम सौन्दर्य की समान्तर और एक अन्य परम्परा की बात करेंगे तो चार्वाक-लोकायत की यह मान्यता सामने आएगी, जिसमें कहा गया है कि ’मयूर पंखों की सुन्दरता उनके रंगों के समन्वय में होती है, जो प्रकृति-प्रदत्त हैं। उन्हें किसी अमूर्त सत्ता ने निर्मित नहीं किया।‘ मूलभूत भौतिक तत्त्वों के सम्मिश्रण से सृष्टि का उद्भव एवं विकास हुआ है, किसी अलौकिक शक्ति की मनसा से नहीं। यही वजह है कि सौन्दर्य का बोध इन्द्रियजन्य होता है और एक सीमा तक यह प्रत्यक्ष व्यक्तिपरक, सापेक्ष व अस्थायी भाव रखे हुए हो सकता है। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं अन्य पिछडा वर्ग अर्थात् कुल मिलाकर भारत की शोषित-वंचित मानवता के लिए सौन्दर्य की अवधारणा वह है, जो उसे इस त्रासदी से मुक्ति दिला सके। इसीलिए राष्ट्र की इस बहुसंख्यक मानवता के लिए आनन्द एवं सौन्दर्य जैसे शब्दों की परिभाषाएँ परिवर्तित हो जाती हैं। यहाँ पीडा की अभिव्यक्ति को सौन्दर्य शास्त्र के सरोकारों में प्राथमिक स्थान पर रखा जाएगा न कि नायिका भेद को।
संस्कृत साहित्य से लेकर विभिन्न भाषाओं में रचित परवर्ती भारतीय साहित्य का जब विश्लेषण किया जाता है तो सबसे पहले बाबा नागार्जुन ने चाँद में नायिका का मुखडा देखने के स्थान पर ’रोटी‘ देखी। रोटी एक प्रतीक है, दरिद्र के सौन्दर्यबोध का। चन्द्रमा की छवि में नायिका का चेहरा देखना धापे-अघाये भद्र मानसिकता के कवि की कल्पना हो सकती है। भूखी मानवता को तो सपने में भी चाँद रोटी जैसा ही प्रतीत होगा, चूँकि चाँद और रोटी का आकार गोल होता है।
किसी अकादमिक विमर्श के दौरान मैंने एक सवाल किया कि ’पसीने में आप लोगों को बदबू आती है अथवा खुशबू?‘ उपस्थित जनसमूह ने मेरे प्रश्न को बहुत ही अटपटा महसूस किया। अधिकांश लोग चुप रहे और जिन्होंने प्रतिक्रिया की उन्होंने कहा, ’आप भी क्या बात करते हो? पसीने में बदबू ही आयेगी, खुशबू कहाँ?‘ मैंने पलट कर पूछा, ’बदबू एक नकारात्मक संज्ञा है। पसीने का सम्बन्ध मानव-श्रम से होता है। श्रम से दुनिया का सारा निर्माण हुआ है और आगे भी होता रहेगा। क्या ’श्रम-निसृत-स्वेद‘ का बदबूदार प्रदूषण से कोई वास्ता रखता है?‘
फिर मैंने इसी क्रम में आगे पूछा, ’आपको क्लियोपेट्रा अथवा कोई सिने-तारिका सुन्दर लगती है अथवा महाकवि निराला की ’वह तोडती पत्थर‘?‘
शरण कुमार लिम्बाले सत्यम्, शिवम् व सुन्दरम् की नयी परिभाषा देते हैं। ’मनुष्य प्रथमतः मनुष्य है, यही सत्य है। मनुष्य की स्वतंत्रता ही शिव है। मनुष्य की मनुष्यता ही सुन्दर है।‘
सौन्दर्य-बोध के क्रम में जब हम मानव समाज की आदिम समझ पर विचार करें तो हमें जंगल-पहाडों में जीवन बसर करने वाले आदिम समुदायों को तनिक समझना होगा, जो अभी भी आदिम युग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनके यहाँ सौन्दर्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। भौतिक सुविधाएँ चाहे अत्यल्प हों, उनके यहाँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सौन्दर्य का भाव दिखाई देगा। उनके नृत्य-गीत प्रकृति की भाव-भंगिमाओं यथा ऋतुओं, फसलों एवं श्रम से जुडे हुए होते हैं। उनके लिए ’फुर्सत का रियाज‘ नहीं होती, प्रत्युत जीवन में रची-रमी-बसी होती हैं।
दुनिया में अब तक जितने भी दर्शन विकसित हुए हैं, उन सभी ने यह निष्कर्ष निकाला है कि हमारा अस्तित्व अच्छाई एवं बुराई की अवधारणाओं के मध्य उपस्थित है। बुराई का विस्तार भद्देपन की अतियों तक और अच्छाई की सीमा सुन्दरतम तक संभव हो सकती है। सत्यम, शिवम् व सुन्दरम् के प्रत्यय के आधार पर सौन्दर्य की व्यापक व्याख्या की जाए तो सत्य व शिव के आदर्श भी इसी में समाहित हो जायेंगे। चूँकि सुन्दरता में मिथ्या एवं अकल्याणकारी नहीं हो सकता। इसके बावजूद भी सौन्दर्य की अवधारणा को निर्पेक्ष नहीं कहा जा सकता। सौन्दर्य वस्तुगत नहीं होकर व्यक्तिगत दृष्टि है, इसलिए इसे देखने व परखने के एकाधिक मानदण्ड सम्भव हैं। भारतीय काव्य परम्परा में सौन्दर्य की बात छिडते ही नायिका चित्रण सामने आता रहा है। शुक-नासिका, मृगनयनी, गजगामिनी व स्वर्ण-वर्णा, चन्द्र-कांता सहित त्रि-अभिसारिकाओं की सैकडों छवि के नायिका-भेद मिलते हैं। इन सब में पैनापन, चमक व मंदगति का आभास होता है। हमने सुना है कि लैला की काया काले रंग की थी, फिर भी वह मजनूं के लिए सुन्दर थी। इसीलिए मोहब्बत को दिल का मामला कहा गया है, दिमाग का नहीं। स्त्री-रसरंजकों के लिए नायिका-भेद गणितशास्त्र का विषय होता है। उनकी कसौटी भद्र-शास्त्र के मानदंड हैं। नेत्र लुभावक सुदर्शन वस्तु उनके लिए सुन्दर होती है। इस निकष पर सुन्दर होने और दुनिया को सुन्दर बनाने में भूमिका निभाने वाले में अंतर हो जाता है। चक्षुप्रिय आकर्षण की एषणा कुलीन समाज की मानसिकता का द्योतक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव सभ्यता के विकास में जो महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, वह है भौतिक प्रगति। इस भौतिक विकास का सदैव ही सकारात्मक अर्थ हो, यह आवश्यक नहीं। इसी तरह शिक्षा की भूमिका मनुष्य की सभ्यता से जुडी हुई होती है, लेकिन हर शिक्षित व्यक्ति समझदार हो, यह जरूरी नहीं। यदि शिक्षित आदमी आधारभूत मानवीय सरोकारों व मूल्यों का हनन करता है तो वह मनुष्य विरोधी कहा जायेगा चाहे वह शिक्षित है और भौतिक दृष्टि से समृद्ध भी। इस संक्षिप्त पृष्ठभूमि के पश्चात् जब हम आदिवासी समाज के सौन्दर्यबोध की पडताल करते हैं, तो बहुत कुछ भिन्न दृष्टिगत होता है।
मैं यहाँ एक दृष्टान्त दे रहा हूँ जो नाईजीरिया के एक आदिम समुदाय से बेशक ताल्लुक रखता हो किन्तु वह संसार के सभी आदिवासियों की सोच का प्रतिनिधित्व करता है। मेरे एक मित्र लम्बे अर्से तक वहाँ रहे। वे दुग्ध उत्पादन के व्यवसाय से जुडे हुए थे। घूमते-घामते उस आदिम कबीले के आसपास पहुँच गए, जो घने जंगल में जीवन बसर कर रहा था। वहाँ जंगली गायों की संख्या काफी थी। उनके असंख्य झुण्ड यहाँ-वहाँ वन में विचरण कर रहे थे। वे सारे वन्यजीव हृष्ट- पुष्ट दिखाई दे रहे थे। उनके बछडे-बछडी गौ-वंश के समूहों के भीतर उछल-कूद मचा रहे थे। उन्हें देखकर मेरे मित्र ने उस आदिम समुदाय के मुखिया के समक्ष प्रश्ननुमा प्रस्ताव रखते हुए कहा कि ’तुम्हारे इस जंगल में अनगिनत गायें हैं। ये सब दुधारू हैं। तुम इनके दूध का धंधा क्यों नहीं करते?‘ उसकी बात का अर्थ मुखिया नहीं समझा। जब उसे पुनः तसल्ली के साथ समझाया तो वह अवाक रह गया। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए जवाब दिया कि ’आप यह क्या बेतुकी सलाह दे रहे हो, इन गायों के दूध पर उनके शिशुओं का अधिकार है। उस नैसर्गिक अधिकार को हम कैसे छीन सकते हैं?‘ उसकी तल्ख प्रतिक्रिया का स्पष्ट अर्थ था कि जंगल सिर्फ वृक्षों व अन्य वनस्पतियों से ही नहीं बनता, इनके साथ यहाँ के वन्यजीव भी उसकी शोभा बढाते हैं। हमें इनका ध्यान रखना चाहिए। मानवेतर जीवजगत् के प्रति आदिवासियों का यह एक भिन्न तरह के सौंदर्यबोध का आभास कराता है, जिसे समझने के लिए आदिवासी समाज के दर्शन की गहराई में उतरना अनिवार्य है। हम बाहर से और अपने सीमित दृष्टिकोण से यह सब नहीं समझ सकेंगे। आदिवासी समाज की मान्यता है कि मानव समाज के साथ हमें प्रकृति के सभी तत्त्वों के साथ सामंजस्य एवं मनुष्य से इतर प्राणियों के प्रति भी सह-अस्तित्व की भावना के साथ व्यवहार करना चाहिए। आदिवासी लोगों का यह नजरिया पारिस्थितिकीय संतुलन के प्रति सोच का व्यापक दायरा रखता है। व्यक्तिगत लाभ की बात तो दूर, सम्पूर्ण मानव समाज का कल्याण भी यह समाज किसी अन्य की कीमत पर नहीं करना चाहता। आदिवासी दर्शन में इस भावना का समावेश होता है कि यह पृथ्वी केवल मनुष्यों की धरोहर नहीं है, प्रत्युत इसका गहरा सम्बन्ध मानवेतर सृष्टि जगत् से भी है। यह धरती केवल मनुष्यों की एवं मनुष्यों के लिए ही नहीं है। इसी साल माह अक्टूबर में केन्द्रीय वि.वि. हैदराबाद में आयोजित एक राष्ट्रीय सेमिनार में गुजरात के लेखक भगवानदास पटेल ने आदिवासी समाज के अपने अनुभव के आधार पर यह बात कही कि आदिवासी रात में सोने के बाद सुबह जब जागता है तो धरती पर पाँव रखने से पहले उससे यह कहते हुए क्षमायाचना करता है कि ’हे माँ मैं दिनभर तुम्हारे बदन पर पैर रखकर अपना काम करूँगा। मेरे इस भार से तुम्हें दुःख पहुँचेगा, मगर यह मेरे जीवन के लिए अनिवार्य है, इसलिए तू मुझे माफ करना।‘ आदिवासी अपने दाँत साफ करने के उद्देश्य से किसी पेड की टहनी को तोडकर दातून के रूप में इस्तेमाल भी करता है तो उस पेड से माफी माँगता है।
आदिवासी दर्शन में मनुष्य की श्रेष्ठता का नकार है। गैर-आदिवासी समाज के दर्शन में मनुष्य की श्रेष्ठता पर जोर दिया गया है। हिन्दू मिथकीय मान्यता के अनुसार सृष्टि की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है। कहते हैं कि पूर्व जन्मों के सत्कर्मों के पश्चात् आत्मा मनुष्य रूप में जन्म लेता है। उस जन्म के बाद फिर से चौरासी लाख योनियों के जन्मों को भोगना होता है। आदिवासी समाज के दर्शन के अनुसार ऐसी मान्यता गलत है। यह मनुष्य द्वारा स्वयं के पक्ष में स्थापित की गई धारणा है, जिसके पीछे कोई शक्तिशाली सर्वमान्य तर्क नहीं है। यह स्थापना मनुष्य के दंभ का संकेत देती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह कहता है कि सृष्टि के सभी प्राणियों का अपना-अपना महत्त्व है। अकारण किसी भी प्राणी की उत्पत्ति नहीं होती। यह बात प्राणिजगत् ही नहीं प्रत्युत सृष्टि के समस्त तत्त्वों पर लागू होती है। क्या आप और हम किसी ऐसे प्राणी की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी कोई उपयोगिता इस पृथ्वी पर नहीं होती हो? इस प्रश्न का उत्तर ’हाँ‘ में देना ताfdZd विसंगति होगा। आदिवासी के लिए संसार में सब कुछ सुन्दर है और कुछ भी असुन्दर नहीं है। इसी कारण इसके यहाँ किसी भी अस्तित्व को अश्रेष्ठ नहीं माना जाता है, सब कुछ अच्छा है।
इस संदर्भ में हम सत्यम्, शिवम् व सुन्दरम् की अवधारणा से आदिवासी सौन्दर्यबोध को समझ सकते हैं। आदिवासी मनुष्य भोला, सहज व सरल होता है। वह कुछ भी छिपाने में विश्वास नहीं करता। सब कुछ खुला हुआ होता है। वहाँ मिथ्या अथवा झूठ को कोई स्थान नहीं है। वे सच्चे लोग होते हैं। कहा जा सकता है कि उनके यहाँ सत्य की महिमा है। सत्य का पाठ पृथक से उन्हें पढाने की आवश्यकता नहीं है। इसीलिए बाहरी व्यक्ति को वे ’दिकू‘ यानी की लुच्चा, लफंगा, लुटेरा, शोषक के रूप में देखते हैं। उनसे मिलने में आदिवासी को झिझक होती है। भारत सरकार ने इसी कारण आदिवासियों की पहचान की पाँच विशेषताओं में से प्रमुख विशेषता ’बाहरी लोगों के प्रति झिझक, को माना है। शेष विशेषताएँ हैं आदिमता के लक्षण, आर्थिक पिछडापन, भौगोलिक पृथकत्व, अनूठी संस्कृति। इसीलिए आदिम समुदायों में सत्य के प्रत्यय को सुन्दर माना गया है। यह मनुष्य का आदिम गुण है। निजी सम्पत्ति की अवधारणा के प्रादुर्भाव के साथ स्वार्थ एवं असत्य जैसी बुराइयों का जन्म हुआ है। जहाँ तक शिवम् अर्थात् कल्याण का प्रश्न है तो आदिवासी समाज के अन्य महत्त्वपूर्ण आदर्शों में समानता एवं सामूहिकता की भावना है जो सबके कल्याण की कामना को मूर्त रूप देने में प्रभावकारी भूमिका निभाती हैं। हमारे यहाँ भद्र वर्ग के शास्त्रों एवं आप्त वचनों में ’वसुधैव कुटुम्बकम्‘, ’सर्वजनहिताय‘, ’सर्वे भवन्तु... निरामया‘ आदि मुहावरे महज नारेबाजी अथवा जुमले बनकर रह जाते हैं जबकि आदिवासी समाज इन आदर्शों को जीता है। ऐसे दर्शन द्वारा स्थापित कल्याण की भावना को आदिवासी सौंदर्यबोध का अनिवार्य तत्त्व कहा जा सकता है। कुल मिलाकर आदिम सौन्दर्यबोध सत्य व शिव के शीलों को महत्त्व देता रहा है।
प्रकृति-तत्त्वों एवं मानवेतर प्राणीजगत् के प्रति आदिवासी सौन्दर्यबोध की चर्चा को थोडा विस्तार देने के लिए आदिवासी गण-चिह्वों पर ध्यान दिया जाना समीचीन होगा। जहाँ गैर-आदिवासी समाज के मनुष्य अपनी पहचान वंश, गोत्र के आधार पर करते हैं, अपने कुल-कुटुम्ब अथवा घटक की उत्पत्ति को किसी महान विभूति से जोडकर देखने का आग्रह करते हैं तथा अलौकिक, अमूर्त, वायवीय व मिथकीय अवधारणाओं की स्थापना से अपने दावे को सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। ईश्वरों, देव-देवियों, ऋषि-मुनियों आदि में से अपने उद्भव की खोज भद्रजन करते रहे हैं। इसके विपरीत या कहें पृथक दृष्टिकोण अपनाकर आदिवासी समुदाय अपने उद्भव को किसी गणचिह्व से जोडकर देखते हैं। प्रत्येक आदिम समुदाय का एक गणचिह्व होता है, जो प्रकृति-तत्त्वों अथवा मानवेतर प्राणियों में से कोई एक होता है। अपने गणचिह्व के प्रति सम्बन्धित कबीला पूज्य भाव रखता है। मान्यतानुसार वह गणचिह्व उस समुदाय के लिए रक्षक एवं अन्यथा जीवनोपयोगी की भूमिका निभाता है। उसे वह समुदाय एक तरफ पूजता है और दूसरी ओर उसका उपभोग भी करता है। उदाहरणार्थ भील समुदाय का गणचिह्व महुआ का वृक्ष है, जो उसके लिए कल्पवृक्ष की भूमिका निभाता है। पर्वत, नदी, नाला, झील, समुद्र, सरोवर, कोई वृक्ष, दीगर वनस्पति, चाँद, सूरज जैसे कोई प्रकृति-तत्त्व अथवा हाथी, बाघ, चीता, हरिण, साँप जैसा कोई भी जीवन गणचिह्व हो सकता है। इतिहास में पढाये जाने वाले प्रमुख क्षत्रिय वंशों में सूर्यवंश व चन्द्रवंश को प्रतापी सम्राटों के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। यहाँ सूर्य व चन्द्रमा शक्ति के स्रोत हैं, जिसके आधार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की अभिलाषा महत्त्वपूर्ण है। इसके विपरीत आदिवासी समाज में इन्हीं प्रकृति-तत्त्वों को जब गणचिह्व के रूप में मान्यता दी जाती है तो वे सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति एवं उसे सुन्दर बनाने वाले तत्त्वों के रूप में दीख जाते हैं। यहाँ प्रकृति-तत्वों को देखने का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल जाता है। आदिवासी समाज में कोई भी गणचिह्व किसी समुदाय के होने के प्रति एक भिन्न प्रकार के सौंदर्यबोध की ओर संकेत देता है। इस सृष्टि में किसी भी इकाई के अस्तित्व की महिमा सर्वोच्च है। आदिवासी मनुष्य अपने अस्तित्व की पहचान के लिए अपने से भिन्न किसी प्रकृति अथवा प्राणी से सम्बन्ध जोडता है और उसे अपने अस्तित्व से भी अधिक महत्त्व देता है, यह हमारे लिए अनूठी एवं सुखद प्रेरणादायक शिक्षा है, जो ’वसुधैव कुटुम्बकम्‘ के आदर्श को जीवन में उतार सकने में सक्षम हो सकती है।
समुद्री टापुओं में रहने वाले आदिवासियों के सौन्दर्यबोध की जब हम बात करेंगे तो अंडमानी द्वीप याद आते हैं। मैं वहाँ के आदिम समूहों का अध्ययन करने के उद्देश्य से दो दफा गया। मुझे यह पता चला कि समुद्री जीवों में सबसे सुन्दर नीलवर्णी स्टार फिश होती है, जो वहाँ के टापुई तटों के इर्द-गिर्द बहुत कम संख्या में पाई जाती हैं। नीले रंग की ये स्टार फिश सागर के प्राकृतिक सौन्दर्य क समृद्ध करती हैं। इसका भान उन आदिम कबीले के लोगों को है। इसीलिए वे इस किस्म की स्टार फिश की प्रजाति को अखाद्य मानते हैं। उनकी मान्यता है कि इन समुद्री जीवों में उन कबीलों की ’आदि-परी माँ‘ की आत्मा का वास होता है। अन्य जो भी समुद्री प्राणी हैं उनकी तादाद काफी है, ’सी-फूड‘ के उस भण्डारण का उपभोग वे लोग करते हैं। जंगली सुअर असंख्य हैं, भोजन हेतु उनका आखेट वहाँ के आदिवासी करते हैं। हरिण की संख्या कम है, उनमें वे आदिवासी अपने मृत बुजुर्गों की आत्माओं का वास मानते हैं। उन्हें पूज्य मानकर उनका संरक्षण करते हैं। हरे कबूतर जिन्हें हम ’हरियल‘ के नाम से जानते हैं, वे अत्यल्प हैं। उन्हें प्रकृति का वरदान मानकर संरक्षित करने की भावना उन आदिवासियों के मन में अंकित है। तीतर व बटेर जैसे प्राणी काफी हैं, उनके माँस का सेवन वे लोग करते हैं। देखने वाली बात यह है कि जो कुछ कमतर है, उसे संरक्षित किया जाना चाहिए, यह बोध उन आदिम समूहों को है। शायद उनके दिलो-दिमाग में यह समझ हो कि प्राणियों की विविधता की उपस्थिति सृष्टि को सुन्दर बनाती है। अगर किसी इकाई के अस्तित्व को नष्ट करने से कुछ कम हुआ तो प्राकृतिक सौन्दर्य प्रभावित होगा। ’जीवो जीवस्य भोजनम्‘ के यथार्थ को स्वीकार करते हुए भी विरल जीवों के अस्तित्व के संरक्षण की ऐसी भावना अद्भुत है, जिसके लिए यदि वे आदिवासी लोग किन्हीं भी मिथकों, धार्मिक आस्थाओं, अंधविश्वासों, रूढयों, मान्यताओं अथवा परम्पराओं का सहारा लें, उनका हमें सम्मान करना चाहिए।
मानव समाज के सौन्दर्य को स्त्री व पुरुष के सम्बन्धों की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। यहाँ हम पुरुष वर्चस्व की बात कर सकते हैं। आदिवासी समाज में स्त्री को पुरुष के समान स्थान दिया जाता है। वहाँ लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं देखा जाता। गैर-आदिवासी समाज में पुरुष का दर्जा स्त्री से ऊपर रखने का घोर षड्यंत्र रचा जाता रहा है। यहाँ तक कि इस व्यवस्था को पवित्र बनाने के लिए तथाकथित धर्मग्रंथों तक का सहारा लिया गया है। मनुस्मृति से लेकर महाकवि तुलसीदास तक में यह पूर्वग्रह देखा जा सकता है। गैर-आदिवासी समाज के समृद्ध व शिक्षित कहे जाने वाले क्षेत्रों में लिंगानुपात के असंतुलन की समस्या को ज्वलंत उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है, जो उपस्थित है दिल्ली, पंजाब व हरियाणा जैसे प्रांतों में। इसके ठीक उलट संतोषजनक लिंगानुपात हमें आदिवासी अंचलों में मिलता है। इसी तरह घरेलू हिंसा के आंकडों का विश्लेषण किया जा सकता है। शहरों अथवा देहातों के कुलीन तथा मध्य वर्गों के परिवारों में इस तरह की हिंसा अधिक मात्रा में मिलती है। यही स्थिति दुष्कर्म की घटनाओं की है। स्त्री के प्रति पुरुषवादी मानसिकता को दहेज हत्याओं, लडका व लडकी के प्रति असमान व्यवहार, महिला उत्पीडन, वेश्यावृत्ति, देह व्यापार, विज्ञापन आदि के लिहाज से भी देखा जा सकता है। कन्या भ्रूण हत्या व सती जैसी बर्बर प्रथाएँ उच्च वर्णों में प्रचलित रही हैं, न कि आदिम समुदायों में। स्त्री व पुरुष के मध्य गैर-बराबरी की मानसिकता एक अस्वस्थ एवं भद्दे समाज का लक्षण है, यह दशा समाज की सुन्दरता को नष्ट कराती है। समाज के विशेष सन्दर्भ में यह भी एक प्रकार का सौन्दर्यबोध है, जो हमें आदिवासी समाज में मिलता है।
ईश्वर की सत्ता के प्रति आस्तिकता के पक्षधर यह मानते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति ईश्वर ने की। अनास्तिक लोगों का कहना है कि यह समस्त सर्जना प्रकृति प्रदत्त है, जिसके निर्माण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया रही है, जिसकी यात्रा सरल से जटिल की तरफ अग्रसर है। इन प्राकृतिक संरचनाओं के समानान्तर संसार में सभ्यता व संस्कृति के निर्माण व विकास में मनुष्य की अहम भूमिका रही है, जिसे प्रकृति ने विवेक दिया है। इसी के सहारे वह ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में शोध, खोज व आविष्कार करता रहा है। दीगर जीवजगत् का
व्यवहार वृत्तिमूलक (instinctual) रहा है। उसके पास विवेक नहीं है, जिसके द्वारा वह अपना व्यवहार परिवर्तन कर सके। यह दीगर मसला है कि विभिन्न प्राणियों को मनुष्य द्वारा पालतू बनाकर प्रशिक्षण के बल पर उनके व्यवहार में तब्दीलियाँ की जाती रही हों। सभ्यता एवं संस्कृतियों के निर्माण के विशेष सन्दर्भ में जब हम सौन्दर्य बोध की चर्चा करते हैं तो यह प्रश्न स्वतः ही सामने आता है कि इस निर्माण व विकास में किन लोगों का योगदान रहा है? सभ्यता एवं संस्कृतियों ने जीवन को सुन्दर बनाने का काम किया है। सभ्यताओं का निर्माण श्रम से होता रहा है और संस्कृतियों का विकास विशिष्ट प्रकार के सौन्दर्य- बोध से होता है। मानव समाज का जो आदिम दर्शन है, उसके अनुसार मेहनत करने वाला आदमी सभ्यताओं का निर्माण करता है और इसीलिए वह सुन्दर है। संस्कृतियों के विकास के पीछे एक किस्म का सौन्दर्यबोध होता है, जिसके कारण प्रत्येक सांस्कृतिक उपक्रम जीवन से जुडी गतिविधि बन जाती है। आदिवासी समाज में कोई भी सांस्कृतिक क्रिया श्रम एवं दिनचर्या से पृथक नहीं होती। किसी कलाकृति अथवा अन्य सांस्कृतिक आयोजन के लिए अलग से फुर्सत निकालने या अभ्यास करने की जरूरत नहीं होती। यह सब कुछ जीवन की सहज व नैसर्गिक प्रक्रिया है। यह कहा जाता है कि आदिवासी की गति में नृत्य एवं वाणी में गीत होता है। सभ्यता एवं संस्कृति के निर्माण व विस्तार का यह कार्य भी सामूहिक होता है। श्रम की महत्ता यहाँ अपने आप में एक गुण है। किसी व्यक्ति विशेष के अवदान को रेखांकित किये जाने की मंशा व भावना इस समाज में नहीं होती। यहाँ व्यक्तिवाद का नकार है। यहाँ व्यावसायिकता को भी कोई स्थान नहीं। यहीं से जन्म लेती है निजी सम्पत्ति के प्रति नकार की अवधारणा, जो अपने आप में अद्भुत शील है। किसी भी तरह का व्यक्तिवाद स्वार्थ व वर्चस्व को पनपाता है, जो मनुष्य की सामाजिकता के लिए नकारात्मक कारक है। ऐसी मानसिकता समाज की सुन्दरता को नष्ट करती है। सभ्यता और संस्कृति को लेकर सौन्दर्य- बोध की चर्चा के पश्चात् हम ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र की बात कर सकते हैं। सिद्धार्थ युवराज के रूप में सुदर्शन हो सकते हैं, किन्तु सुन्दर तब होते हैं, जब वे बोधिसत्त्व की प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध बनते हैं। श्रम के सन्दर्भ में जब सौन्दर्य की अवधारणा पर बात की जाएगी तो यह प्रश्न उठेगा कि ’चाँदी की चम्मच के साथ जन्म लेने वाली कोई सोलह-श्ाृंगारित राजकुमारी या सुविधाभोगी चाक्षु-मोहिनी सिने-अभिनेत्री सुन्दर कही जाएगी अथवा जंगल या खेत-खलिहान में दिन-रात खटती पसीने में तर काली-साँवली कामगार महिला? मनुष्य की सुन्दरता उसके कर्म में है न कि उसकी ज्यामिति अथवा वर्ण में। ऋषि अष्टावक्र की काया आठ स्थानों से टेढी-मेढी थी, किन्तु उनके भीतर ज्ञान का सागर भरा हुआ था, इसलिए वे सुन्दर थे और कारणवश ज्ञानपिपासु राजा जनक उनके सम्मोह में डूब गया था।
हमारे राष्ट्र भारत का सौन्दर्य इसकी प्राकृतिक छटा से है, जिसमें तीन तरफ समुद्र हैं। उनके मध्य अवस्थित है अनेक टापू। देश के प्रत्येक अंचल में घने जंगल हैं, जंगलों में नाना प्रकार के पशु-पक्षी, सरीसृप, कीट-पतंगे हैं। झील, झरने, नदी-नाले, सरोवर हैं। उपवन व वाटिकाएँ हैं। उत्तर में हिमालय के रूप में इस देश का उन्नत भाल है, जिसके गर्भ में ज्ञात-अज्ञात असंख्य रस, रत्न व औषधियाँ हैं। यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस राष्ट्र की जितनी भी प्राकृतिक सम्पदा है, उसका संरक्षण यहाँ के आदिम कबीलों ने शताब्दियों ट्रस्टी या कस्टोडियन की हैसियत से किया है। यही कारण है कि हमारा देश इस दृष्टि से धनी है। यह बहुत ही समृद्ध प्राकृतिक सौंदर्य है, जिसे आदिवासी समाज ने सुरक्षित रखा है। प्रकृति के सौन्दर्य के प्रति ऐसी दृष्टि केवल आदिवासी समाज के हृदय में बसी हुई है। गैर-आदिवासी समाज जो स्वयं को शिक्षित एवं विकसित होने का दम्भ पाले हुए हैं, उसने तो इस प्राकृतिक धरोहर का अँधाधुंध दोहन किया है, चाहे वे विदेशी आक्रान्ता व उपनिवेशवादी हों अथवा इस आधुनिक काल के देशी-विदेशी बहुराष्ट्रिक निगमों के अधिपति हों। विकास के नाम पर लूट की इस मुहिम में हमारी जनतांत्रिक सरकारों ने भी प्रकृति एवं मनुष्य विरोधी भूमिका निभाई है। प्राकृतिक संसाधनों की चौतरफा लूट- खसोट के इस माहौल ने इस राष्ट्र के सौंदर्य को नष्ट करने का काम किया है। राष्ट्रनायकों व तथाकथित प्रत्येक ब्रांड के राष्ट्रवादियों के संस्कारों में कैसा सौन्दर्यबोध है, इसकी पडताल हम सब को करनी चाहिए। राज, अर्थ व धर्म की सत्ताओं पर जिस वर्ग का अधिकार रहा है, उसी ने समाज पर अपना वर्चस्व स्थापित किया है। यही वर्ग है, जिसने भौतिक विकास की यात्रा में बहुआयामी प्रदूषण फैलाया है, जिसकी वजह से पृथ्वी का बहुवर्णी यह प्राकृतिक परिधान मैला हो रहा है और स्वयं पृथ्वी भीतर से खोखली की जा रही है। पृथ्वी के रस, रंग, रूप, गंध व स्पर्श जैसे महान तत्त्वों के अस्तित्व पर मंडराते इन मानव निर्मित खतरों एवं बिगडते सौन्दर्य के साथ उसकी सुगढता का संतुलन भी अस्त-व्यस्त हो रहा है, यह कैसा विकास है और कैसा सौन्दर्यबोध!
किसी भी प्रकार का कायिक अथवा मानसिक रोग मनुष्य को अस्वस्थ कर देता है और अस्वस्थता जीवन के सौन्दर्य को नष्ट कर देती है। आज के इस आधुनिक मानव को कितनी किस्म के रोगों ने ग्रसित कर रखा है इसका अंदाज इस मनुष्य को भी नहीं। हमने सुना है कि आदिमानव की अकाल मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्राकृतिक प्रकोप, दुर्घटना एवं जंगली जानवरों के आक्रमण हुआ करते थे। दिनचर्या, खानपान, पर्यावरण वगैरह सब कुछ ठीक था। उनकी सभ्यता का बिछौना धरती थी और ओढना आकाश हुआ करता था। इसलिए उनकी धरोहर के वाहक आज भी पृथ्वी को माँ और आसमान को पिता मानते हैं। हवा व पानी को भाई-बहन का दर्जा देते हैं। उनकी संस्कृति में अपनापा था। उनके छोटे-छोटे सुख उन्हें आनन्द दिया करते थे। ऐसा नहीं कि उनके जीवन में दुःख नहीं हुआ करते थे। दुःख थे, किन्तु सरल और आसानी से समझ में आ सकने वाले। वे ऐसे नहीं थे जिनमें चालाकियाँ, षड्यंत्र, रहस्य, जटिलता, गुत्थियाँ आदि हों। ’घट में राम, बगल में छुरी‘ वाली कहावतें उन पर लागू नहीं होतीं। आज का हाईटैक मनुष्य अनेक बीमारियों के चंगुल में है। उसे सैकडों प्रकार की शारीरिक एवं हजारों किस्म के मानसिक रोगों ने जकड रखा है। अधिकांश का उसे खुद पता नहीं चल रहा। जो रोग आम हैं उनकी बात मैं नहीं कर रहा लेकिन जो स्पेशियल हैं उन्हें चिह्वित किया जाना आवश्यक है। इस आदमी को भौतिक समृद्धि का रोग है, इसे विकास की बीमारी है, इसे पूँजी की महामारी है, इसे तकनीकी का क्लेश है। इसको उत्पाद, बाजार, विज्ञापन, मुनाफा, स्वार्थ, आय, फैशन, दिखावा, मुखौटा, गोपनीयता, साजिशों की व्याधियाँ हैं। यह इंसान सूचना के विस्फोट से घायल हो रहा है। यह मनुष्य विवश होकर यंत्रों पर आश्रित हो रहा है। कृत्रिम ऊर्जा के बिना यह आदमी एक पल भी नहीं गुजार सकता। दिन-रात बेचैन रहने वाला यह मनुष्य स्वयं से बाहर अपनी ढेर सारी चिंता, अपेक्षा, आकांक्षा, असमंजस, आशंका, दुर्सम्भावना, भय, अनिद्रा, अपच आदि रोगों का उपचार तलाश रहा है, यह भूलकर कि ये समस्त रोग उसने स्वयं ने पैदा किये हैं।
एक अन्य सवाल यहाँ उठ सकता है, वह यह कि मेहनत के जिस पसीने से सभ्यताओं का निर्माण होता है उसमें हमें ’बदबू‘ आनी चाहिए या ’खुशबू‘? महाप्राण निराला जब कुकुरमुत्ता के पक्ष में कविता लिखते हुए ’अबे ओ गुलाब‘ कहते हैं तो हमें गौर से सोचना होगा कि वे किस सौन्दर्यबोध की तरफ इशारा करते हैं? मनुष्यों के समाज के लिए कौनसा वर्ग परिश्रमी है और कौनसा तबका पराश्रयी, इस मुद्दे पर हमें विचार करते हुए सौंदर्य को पुनर्परिभाषित करना होगा। क्या पराश्रयी मनुष्य को हम सुन्दर कहेंगे? स्वयं निराला ही सौन्दर्य के प्रतिमान गढते हैं जब वे ’अट्टालिका‘ की सुन्दरता को ध्वस्त करते हुए ’पत्थर तोडने वाली‘ स्त्री के पक्ष में खडे होते हैं।
संस्कृति के विविध क्षेत्रों में जितनी भी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, वे सब मनुष्य का जीवन के प्रति सौन्दर्य- बोध का प्रदर्शन है। इस दृष्टि से जीवन शैली के अन्यान्य पक्षों से परे जब हम आदिवासी कलाओं की बात करते हैं तो यह पता चलता है कि यहाँ कला का सृजन पृथक से नहीं किया जाता, प्रत्युत यह समस्त सृजन जीवन का हिस्सा बनकर रहता है। जीवन के सौन्दर्य से कला का सौन्दर्य भिन्न नहीं, जबकि भद्र समाज में कला फुर्सत के क्षणों में मन-बहलाव अथवा व्यावसायिकता से गहरा सम्बन्ध रखती है। आदिवासी कला की सर्जना चाहे चित्रकला, मूर्तिकला व वास्तुकला के रूप में हो अथवा नृत्य, संगीत एवं नाट्य विधा की प्रस्तुति हो, उसमें व्यावसायिकता, व्यक्तिवाद एवं दिखावेपन जैसे तत्त्वों की उपस्थिति नह मिलेगी। यहाँ सामूहिकता, सहज गत्यात्मकता, जीवन की अनिवार्य गतिविधि जैसे आदिम लक्षणों की प्रमुखता दिखाई देगी। आदिम समुदायों में कला के प्रति रुझान जन्मजात होता है। कमोबेश हर व्यक्ति कलाकार होता है। यही तत्त्व जिससे उनकी कलाभिव्यक्ति सामूहिक रूप ग्रहण किये रहती है। यहाँ भद्र समाज की तरह कला जीवन के सौन्दर्य को निखारने अथवा समृद्ध करने के लिए बाहर से समाहित होने वाला कोई उपक्रम नहीं है, बल्कि जीवन की सुन्दरता की सहज गतिविधि है। इसीलिए समूह के स्तर पर सहज स्फूर्ति आसानी से देखी जा सकती है। जीवनोपयोगी प्रत्येक वस्तु में कलात्मकता का पुट होगा, चाहे वह घर की दीवारें हो, आँगन हो, चूल्हा हो, चाकी हो, अन्य कोई उपकरण हो।
विश्व के करीब-करीब सभी दर्शनों का विकास इस दुनिया को समझने के लिए हआ है और उन दर्शनों में सौन्दर्य की विशद व्याख्याएँ की गई हैं, जिनमें भौतिकवादी तथा भाववादी दोनों ही प्रकार की चिंतनधाराएँ सम्मिलित रही हैं। इस समस्त बौद्धिक परम्परा के साथ आग्रह यह है कि इस दुनिया को बनाने वाले, इसे सजाने वाले, इसे संरक्षित रखने वाले लोग और उनके कर्मों को जब तक सौन्दर्य का निकष नहीं बनाया जायेगा तब तक हम सौन्दर्य के काल्पनिक लोक में भटकते रहेंगे। इसीलिए सौन्दर्य के तथाकथित प्रतिमानों को ध्वस्त करना होगा ताकि अमूर्त, वायवीय, काल्पनिक सिद्धान्तों पर आधारित दर्शन के सातवें आसमानों से उतर कर हम धरती के यथार्थ को समझ सकें। यहाँ मुझे गालिब का एक शेर याद आ रहा है -
’गालिब जन्दगी भर एक ही भूल करता रहा
धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा।‘
मनुष्यों की सामाजिकता, प्रकृति-तत्त्वों व मानवेतर प्राणियों के पक्ष में जो कोई भी खडा होता है, वह सुन्दर है। जो इंसान शोषण व वर्चस्व के विरुद्ध मोर्चाबद्ध होता है, वह सुन्दर है। जो मनुष्य सकारात्मक मूल्यों के लिए संघर्षरत होता है, वह सुन्दर है। जो बंदा सबके लिए बेहतर भविष्य की कामना करता है, वह सुन्दर है। जो आदमी सहज, सरल व सच्चा होता है, वही सुन्दर हो सकता है। ये सारे गुण आदिवासी समाज के लोगों में हैं, इसलिए उनके सौन्दर्यबोध को समाज के लिए आदर्श व अनुकरणीय मानना निस्संदेह श्रेयस्कर हो सकता है।
हिन्दी के प्रमुख आदिवासी विमर्शकारों में अग्रणी हरिराम मीणा अपने जमीनी लेखन एवं सम्पादन के लिए जाने जाते हैं।