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मौलिकता जीवन का आश्वासन है।

ब्रजरतन जोशी
मौलिकता मानवीय चिन्तन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और प्रभावी गुण है। अक्सर हम मौलिकता के प्रति आकर्षित भी होते हैं तो बहुधा उससे आहत भी। हर व्यक्ति का व्यक्तित्व एक अनूठेपन से विन्यस्त होता है। यह जो प्रत्येक का अनूठापन है, वही मौलिकता की चमक, ताप और प्रभाव की अभिव्यक्ति है। इसी के चलते प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव का भव नवीनता से ओतप्रोत रहता है। प्रत्येक संवेदनशील रचनाकार अपनी तरह से संसार को देखता, भोगता और उसकी पुनर्रचना करता है। वह संसार का गुणगान भी करता है, तो उसकी आलोचना भी करता है। इसलिए हर रचनाकार की यात्रा विशिष्ट यात्रा होती है।
जब जीवन के साथ मौलिकता का रिश्ता इस तरह से जुडा है, तो फिर क्या कारण है कि हम मौलिकता के प्रति गहरा आकर्षण रखते हुए भी उससे आहत महसूस करते हैं? ऐसा क्यों होता है कि प्रायः प्रत्येक मौलिक रचनाकार व्यक्तित्व को अपने समय, संस्कृति और समाज के साथ संघर्षरत होना पडता है? क्यों व्यवस्था के निष्ठुर व्यवहार या कोपभाजन का शिकार प्रायः मौलिक रचनाकार को ही होना पडता है?
इन प्रश्नों के मूल में जाने से पहले हमें मौलिक शब्द के मूल या मर्म को भी जानना होगा। मौलिक शब्द की व्युत्पति मूल शब्द से हुई है। मूल के मानी हैं अस्तित्व के साथ जुडाव और उससे एकत्व का बोध। अब तक का इतिहास साक्षी है कि हम अपने सम्पूर्ण जीवन में संभावनाओं के क्षितिज का अंश भर भी ठीक से उपयोग नहीं कर पाते। अतः अस्तित्व की बहुआयामिता के आगे हमारा जीवन एकायामी रह जाता है। यहाँ फिर प्रश्न उठता है कि अस्तित्व के साथ एकत्व का बोध कैसे अर्जित करें ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि स्वतंत्र चिन्तन और नवीन विचार को अपने आत्म में शामिल करने से यह संभव हो सकता है। साथ ही पठन, श्रवण और मनन के साथ-साथ संवेदनशील संबंध स्थापित किया जाए। यहाँ ऊपर उठे उन प्रश्नों का उत्तर भी स्वयं ही आ जाता है कि जैसे ही रचनाकार स्वतंत्र चिन्तन और नवीन विचार को अपने आत्म में प्रतिष्ठित करेगा वैसे ही उसकी रचना में व्यक्त हुआ अनुभव पाठक के आत्म में कुछ नया जोडेगा। इस जुडाव से स्थापित मानदण्ड, विचार व्यवस्था, भाषा, कहन की आकृति की दिशा, दशा और गति में परिवर्तन आएगा और प्रायः इस तरह के परिवर्तन संस्कृति को यथास्थिति से अवस्थिति बोध की तरफ लाते हैं। मौलिकता और रचनात्मकता का आधार एक ही है- नवोन्मेष। इसी नवोन्मेष से उपजे अनुभव की अद्वितीयता इन्हें परस्पर जोडे रहती है। हम भली-भाँति जानते हैं कि अक्सर हमारा जीवन किसी विचार, शास्त्र अथवा सम्प्रदाय की मान्यताओं से बँधा जीवन होता है। ऐसा जीवन कैसे पूर्ण विकसित जीवन हो सकता है? क्योंकि हमारी चेतना की कंडिशनिंग इतने गहरी हो चुकी होती है कि अब एकदम उससे च्युत होना हमारे लिए कठिन हो जाता है। इसी असुरक्षा की भावना और भविष्य के भय से मौलिकता के प्रति समाज और संस्कृति आहत महसूस करते हैं। क्योंकि वह नवीनता का ताप, तेज और ताकत सहन नहीं कर पाते, जबकि हमारी असली ताकत तो यह है कि जो हमें उपलब्ध है उसमें से हम कितने को स्वीकार और सहन कर पाते हैं और कितने को अस्वीकार। यही मौलिकता के द्वारा जीवन को दिया एक आश्वासन है।
सामान्यतः हम यह समझते हैं कि मौलिकता का संबंध मन से है। जबकि वास्तविकता यह है कि मौलिकता का संबंध मन के बजाय हमारी चित्तभूमि से है। हमारा चित्त हमारे अर्जित अनुभव कणों का पुंज होता है जबकि हमारा मन विचार का अनन्त प्रवाह। चित्त की निर्मिति अनुभव से होती है। हमारी अपनी परम्परा में बाकायदा चित्त भूमि के पाँच प्रकारों का उल्लेख है जो क्रमशः क्षिप्त, गूढ, विक्षिप्ति, एकाग्र और निरूद्ध है। और हम देख रहे हैं कि सांस्कृतिक प्रकोप और औपनिवेशिक मानस ने वैद्युतिक मीडिया के साथ मिलकर हमारी चित्त भूमि पर एक जोरदार हमला कर रखा है। परिणाम स्वरूप हमारे स्वायत मानस निर्माण की प्रक्रिया की कोशिशें कारगर साबित नहीं हो पा रही है और चित्तभूमि दिन-ब-दिन होती जा रही है।
दूसरी ओर विचार विश्व में अनन्त विचार प्रवाहमान है। यह हमारे स्वविवेक और चयन पर निर्भर करता है कि उसमें से हम किसका चयन करें और किसको छोडे। हमें महर्षि अरविन्द की इस बात को सदैव याद रखना है कि बौद्धिकता में कुछ भी देशज नहीं होता, सब कुछ उस अखण्ड अस्तित्व का हिस्सा है। इसलिए हमें जरूरत है ऐसे साहित्य, कला और संवेदनशील आत्मसजग सृजनधर्मियों की जो हमारी चित्तभूमि को निर्मल और पारदर्शी बनाए। शायद यही कारण रहा हो कि हमारी अपनी साहित्य की परम्परा में क्लैसिक कही जाने वाली कृतियों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
ज्ञान के वर्तमान मानचित्र पर उभरी रेखाएँ बताती है कि मौलिकता कहीं खोयी हुई है। यानी यह माना जा सकता है कि मौलिकता तो है, पर उसकी सजग और सक्रिय उपस्थिति नहीं है। यहाँ फिर एक सहज जिज्ञासा का उदय होता है कि क्या हमारा रचनाकार ज्ञान के नए विमर्श घडने के कौशल से सम्पन्न है? या कहीं उसमें इस कौशल की कमी है। यह गहरी पडताल का विषय है। जल्दबाजी में इस पर कुछ कहना विषय के बोध को सीमित करना होगा।
महर्षि अरविन्द की मान्यता है कि जो भारतीय बौद्धिकता किसी समय में दुनिया में अपनी तरह की मौलिकता से सम्पन्न थीं, वह दासता के कारण कुंद और मन्द पड गई। यहाँ प्रश्न उठता है कि मौलिकता के संशयग्रस्त होने के कारण हमारी दासता में थे या हमारी दास्ता के कारण हमारी मौलिकता नष्ट हुई और हम सदियों तक गुलामी की बेडयों में जकडे रहे। इस पर गहराई से विचार और चिंतन करने की आवश्यकता है।
हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि मौलिकता का कोई मॉडल नहीं होता। अगर किसी समाज के साहित्य, दर्शन और कला की भावदृष्टि में यह दिखाई देता है कि वह समाज चिन्तन के स्वराज को अपनी सोच और व्यवहार से दरकिनार कर कम महत्त्व दे रहा है, तो जाहिर है कि वहाँ मौलिकता का उन्नयन नहीं अवमूल्यन ही होगा। भला उस समाज में मौलिकता का उत्स और विकास कैसे संभव है।
मौलिकता की राह में आगे बढने के लिए हमें अपने जीवन को देशज संस्कृति की ओर ले जाना होगा। यानी हमारी सम्पूर्ण जीवन पद्धति, जीवनचर्या, जीवन दर्शन आडंबरविहीन सभ्यता के विकास को गति देने वाले बने। शिक्षण का माध्यम मातृभाषा बने और अपनी जडों से जुडकर ही हम आगे का सफर तय करें। यह भी देखा गया है कि जब-जब भी सृजनात्मक व्यक्तित्वों द्वारा प्रचलित मान्यताओं, संस्कारों और जीवन पद्वति को बिना तोड-फोड के बदलने की कोशिशें की गईं, तो जो चुनौतियाँ सामने आईं वे भिन्न प्रकार की थीं। ऐसे में रचनात्मक लेखन और बौद्धिक वर्ग को अपने समाज की सामर्थ्य बढाने के संस्कार विकसित करने होंगे। हमें ऐसे विचारवान, बौद्धिक एवं सृजनात्मक व्यक्तित्वों की परम्परा विकसित करनी होगी जो निरन्तर अपने आत्मभ्रमों से मुक्त होकर आत्मानुशासन के माध्यम से अपनी भूमि पर चिन्तन के बीज वपन करे। यह अपनी भूमि या जडे ही हमारे आत्म का आधार है। यही हमारे चिन्तन का स्वराज है।
इतिहास साक्षी है कि पहले हम मध्ययुगीन धुंधलके की गिरफ्त में थे और आज आधुनिकता की गिरफ्त में है। एक बात का सदैव स्मरण रखना है कि जीवन किसी फार्मूले से हल होने वाली पहेली नहीं है। इसलिए हमें अपने बने-बनाए साँचों से निकलकर मौलिकता के राजमार्ग से जीवन विकास की प्रक्रिया को गति देनी है। हालांकि यह यात्रा बेहद कठिन मालूम होती है, पर हमारे ही समय के महापुरुषों ने इस पर चलकर बडा जीवन जीया है। अगर हमें बडा जीवन जीना है, तो उद्यम भी बडे ही करने होंगे।
इस अंक में संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ, नाट्यशास्त्र के अध्येता प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी का संस्मरण और पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह का महाकवि येट्स पर लिखा एक बहुत ही मूल्यवान आलेख हमारे पाठकों को सम्पन्न करेगा। हम आभारी हैं कवि, आलोचक और संपादक ओम निश्चल के जिन्होंने अत्यन्त अल्प समय में कृष्णा सोबती के समग्र रचनात्मक अवदान को रेखांकित करता एक विस्तृत आलेख हमें दिया। इसी क्रम में युवा गाँधी अध्येता शंभू जोशी का गाँधी के शरीर श्रम संबंधी विचारों पर एकाग्र एक बहुत ही सुचिन्तित और तार्किक लेख भी हमारे पाठकों के लिए गांधी के किचिंत अस्पर्शी, अलक्षित विषय पर कुछ नयी रोशनी डालेगा। इसी कडी में प्रसिद्ध आदिवासी विमर्शकार हरिराम मीणा का आदिवासी सौन्दर्यबोध एक विचारोत्तेजक लेख है।
इसके अतिरिक्त इसी अंक में हिन्दी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूडी के साथ चर्चित कवि लाल्टू की कविताएँ भी इसे सार्थक बनाती हैं। अनुवाद के लिए हम श्री यादवेन्द्र के आभारी हैं। अंक पर आफ विश्लेषणात्मक विचार जानने का इंतिजार रहेगा।