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मारवाड में साहित्य संरक्षण एवं संवर्द्धन की परम्परा

डॉ. मोहनलाल गुप्ता
जैन मुनि उद्योतन सूरि द्वारा ई. ७७९ में जालोरा दुर्ग में लिखित ’कुवलयमाला‘ में जिन अठारह देशी भाषाओं का उल्लेख हुआ है, उनमें मरु भाषा भी एक है।१ मट्टयकाल में मरुभाषा राजस्थान के विविट्टा राज्यों में व्यवक्तत होने वाली प्रमुख साहित्यिक भाषा थी, जिसमें डिंगल नामक काव्य शैली प्रकट हुई। मारवाड में चारण कवियों ने डिंगल में, भड्ड, राव एवं संत कवियों ने पिंगल में, जैन कवियों ने प्राकृत में तथा ब्रा॰ण कवियों ने संस्कृत में विपुल साहित्य की रचना की। ई. ८०० से १००० की अवट्टिा में उार भारत में विकसित हुई हिन्दी भाषा पर इन पूर्ववर्ती भाषाओं का अच्छा-खासा प्रभाव है। हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का आरम्भ ई. ११५० के आसपास माना जाता है। १३वीं शताब्दी ईस्वी में कन्नौज अथवा बदाय से आए राठौडों ने मरुक्षेत्र में राज्य स्थापित करना प्रारम्भ किया, जो १५वीं शताब्दी के आते-आते विशाल आकार लेने लगा और मारवाड कहलाया। मारवाड के राजाओं ने अपने दरबार में कवियों, लेखकों और इतिहासकारों को आश्रय दिया। मारवाड के अनेक राजा, रानी एवं राजकुमारियों में भी अनेक कवि, संत एवं साहित्यकार हुए, जिन्होंने डिंगल, ब्रज, संस्कृत एवं हिन्दी भाषा के खजाने को समृ= किया।
चौदहवीं से सोलहवीं सदी में मारवाड नरेशों द्वारा साहित्यकारों को संरक्षण
मारवाड राज्य की स्थापना का श्रेय राव चूण्डा ;ई. १३९४-१४२३द्ध को है। उसका पिता वीरमदेव सलखावत चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में मारवाड के वीर पुरुषों में गिना जाता था। वह खेड में गुढा बोट्टाकर रहता था। वीरमदेव के आश्रित कवि बादर अथवा बहादर ढाडी ने ’वीरमायण‘ नामक काव्यगथ रचा, जिसमें वीरमदेव सलखावत के वीरतापूर्ण कायोङ पर प्रकाश डाला गया है। जांखो मणिहार नामक कवि ने ई. १३९७ में ’हरिश्चन्द पुराण‘ नामक काव्य की रचना की। इस ग्रंथ की एक प्रति अभय जैन ग्रंथालय बीकानेर में है।२ जांखो मणिहार की चार रचनाऐ अट्टिाक प्रसि= हैं - ’वेलि किसन रूक्मणी‘, ’ठाकुरजी रा दूहा‘, ’गंगाजी रा दूहा‘, ’फुटकर दोहे व गीत‘।३
मण्डोर के राव रणमल ;ई. १४२३-३८द्ध एवं राव जोट्टाा ;ई.१४३८-८८द्ध के आश्रित कवि गाडण पसाइत ने रणमल एवं जोट्टाा के वीर कृत्यों का प्रशस्तिगान करते हुए र्मणशः ’राव रिडमल रौ रूपक‘ तथा ’गुण जोट्टाायण‘ नामक काव्यों की रचना की। साहित्य एवं इतिहास दोनों ही दृष्टियों से ये दोनों ग्रंथ अत्यन्त महवपूर्ण हैं। गाडण पसाइत द्वारा लिखित ’कविा राव रिणमल नागौर रे ट्टाणी पेरोज ने मारीया ते समैरा‘ तथा ’कविा राणै मोकल रे मुआं री खबर अया रा‘४ शीर्षक से फुटकर रचनाओं का भी पता लगा है। मारवाड का राव मालदेव ;ई. १५३१-१५६२द्ध वीर राजा हुआ। वह साहित्यसेवी एवं विद्यानुरागी था। उसके द्वारा रचित ’त्रिपुरा भारती लघुस्तव‘ नामक ग्रंथ प्रकाशित रूप में उपलब्ट्टा है।५ मालदेव के आश्रित कवि बारहठ आसा की कई रचनाऐ प्राप्त हुई हैं। वह बाडमेर जिले के भाध्ेस गोव का निवासी था। उसने राव मालदेव से दान स्वरूप भूमि प्राप्त करने के उड्ढेश्य से जोट्टापुर आकर मालदेव के समक्ष राजकुमार चन्ध्सेन की प्रशंसा में ’गुण चौरासी रूपक बंट्टा‘ नामक रचना प्रस्तुत की। डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने बारहठ आसा की पोच रचनाओं - ’लक्ष्मणायण‘, ’गोगाजी री पेडी‘, ’गुण निरंजन प्राण‘, ’मिादे भटियाणी रा कविा‘ तथा ’बाघजी रा दूहा‘ का उल्लेख किया है।६ इनकी और रचनाऐ भी प्राप्त हुई हैं, जिनमें ’राव चन्ध्सेन रा रूपक‘, ’राव माला सलखावत रा छंद‘ तथा ’बात राव मालदे री‘ प्रमुख हैं। ’बात राव मालदे री‘ में कवि आसा द्वारा मालदेव की प्रश्ंासा में दो कवित् एवं मालदेव द्वारा विजित तैंतीस परगनों के उल्लेख वाले पोच कविा उपलब्ट्टा हैं। बीठू मेहा द्वारा रचित ’पाबू जी रा छंद‘ एवं ’गोगाजी रा रसवाला‘ नामक रचनाऐ भी इसी काल की हैं।
इस काल में मारवाड राज्य में ग्रंथ-लेखन का स्वतंत्र वातावरण था, फलस्वरूप सिंढायच चौभुजा, खिडया, चानण, हरिसूर, बारहठ लक्खा, बारहठ अक्खा, ईसरदास, अल्लूजी कविया आदि अनेक कवियों ने डिंगल साहित्य की श्री वृ= की। सांखला करमसी नामक कवि ने ’किसनजी री वेलि‘ नामक काव्य का सृजन किया। महाराजा सूरसिंह ;ई. १५९५-१६१९द्ध के कृपापात्र कवि माट्टाोदास दट्टावाडया ने ’राम रासौ‘, ’भाषा दसमस्कंट्टा‘ एवं ’गुण गजमोख‘ नामक काव्य लिखे। पृथ्वीराज राठौड ने माट्टाोदास के बारे में लिखा है*-
चूंडे चत्रभुज सेवियौ, ततफल लागो तास।
चारण जीवो चार जुग, मरो न माट्टाौदास।।
महाराजा सूरसिंह की आज्ञा से जोट्टापुर नगर वास्तव्य श्रीमाली माट्टावभड्ड ने ’सूरसिंह वंश प्रशस्ति‘ नामक पुस्तक की रचना की। ई. १५०९ में जन्मे भक्त कवि ईसरदास बारहठ को ’ईसरो परेमसरो‘ का विरुद प्राप्त था। उन्होंने ’हाला-झाला री कुण्डलियो‘ की रचना की, जो वीर रस की प्रमुख ऐतिहासिक कृति मानी जाती है। इनके रचे ’हरिरस‘, ’देवियाण‘, ’गुण आगम‘, ’गुण रासलीला‘, ’गुण वैराट‘, ’गुणनिंदा स्तुति‘ ’गुण भागवत हंस‘, ’गरुड पुराण‘, ’गुण प्रभा छब‘, ’गुणनिंट्टााततः‘, आदि ग्रंथ अट्टयात्म एवं शांत रस से ओतप्रोत हैं। जसवन्त नामक कवि ने ’त्रिपुर सुन्दरी री वेलि‘, ’सांयाजी झूला ने नाग दमण‘ तथा ’रुकमणी हरण‘ की रचना की।
भक्तिकाल की कवयित्री मीरो बाई
१६वीं शताब्दी ईस्वी में मारवाड राजवंश की मेडतिया शाखा में उत्पन्न भक्तकुल शिरोमणि मीरोबाई जोट्टापुर नरेश राव जोट्टाा की प्रपौत्री थीं। उनके लिखे पद सम्पूर्ण भारत में बडे चाव से गाए जाते हैं तथा हिन्दी भाषा की अमूल्य थाती हैं -
मेरे तो गिरट्टार गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई। छांडि दई कुल की कानि, कहा करिहैं कोई। संतन ढिग बैठ-बैठ, लोक-लाज खोई।
सत्रहवीं सदी में मारवाड राज्य में साहित्य संरक्षण
मारवाड नरेश गजसिंह ;ई. १६१९-३८द्ध ने १४ कवियों को लाख पसाव देकर सम्मानित किया। गजसिंह के समकालीन कवि हेम सामोर ;रचनाकाल ई. १६२९ के लगभगद्ध ने ’गुणभाखा चरित्र‘ तथा गाडण शाखा के चारण कवि केशवदास ;रचनाकाल ई. १५९४-१६३४द्ध ने ’गजगुण रूपक बंट्टा‘ काव्य की रचना की। ये दोनों काव्य डिंगल भाषा के हैं और इनमें महाराजा गजसिंह के वीर चरित्र का वर्णन किया गया है। केशवदास को ’उारकाव्य‘ लिखने पर महाराजा गजसिंह द्वारा १५०० रुपये वार्षिक आय की जागीर दी गई।७ इस काव्य की कुछ पंक्तियो इस प्रकार से हैं -
दोल दल दकरवणी अणी चह पासो आवे। गणण गमण ग्रीट्टाणी पंख भुव मण्डल छावे।। घणण घंट कजरी झणण प्रखरां झणंके। सूर सीए चाहत ताण नैण ताल तणके।।
केशवदास गाडण के अन्य ग्रंथों में निसांणी विवेक वीरता, राव अमरसिंह रा दूहा, गजगुण चरित्र, महादेवजी रा छंद, छन्द श्री गोरखनाथ, फुटकर गीत, दोहे एवं कविा आदि का भी पता चला है। महाराजा गजसिंह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह राठौड को देश-निकाला दिया था। स्वाभिमान का ट्टानी अमरसिंह अपने शौर्य एवं परार्मक के लिए लोकगीतों में अमर हो गया। उसे केन्ध्ति करते हुए अनेक कवियों ने गीत, झमाल, वार्ता, झूलणा, सिलोके ;श्लोकद्ध, छंद, विाको एवं ख्याल लिखे, जो डिंगल साहित्य की अमूल्य थाती हैं।
अलंकार शास्त्र एवं वेदांत के ज्ञाता महाराजा जसवंतसिंह
डॉ. हरिसिंह राठौड ने मारवाड नरेश जसवंतसिंह ;ई. १६३८-७८द्ध की गिनती रीतिकालीन आचार्य-कवियों में करते हुए लिखा है - ’हिन्दी के जिन रीतिकालीन कवियों में इने-गिने कवियों को ही आचार्य-पद का गौरव प्राप्त हैं, उन आचायोङ में महाराजा जसवंतसिंह हिन्दी के प्रथम आचार्य हें, जिन्होंने अलंकार शास्त्र को एक नवीन दिशा में ढालकर हिन्दी के आचायोङ को प्रेरित किया।८ महाराजा द्वारा रचित ग्रंथ ’भाषाभूषण‘ अलंकार शास्त्र का अनुपम ग्रंथ है, जिसे आगे चलकर काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया। इस ग्रंथ में २१२ दोहे हैं, जिनमें से १६६ अलंकार विषयक हैं। इसके मंगलाचरण में गणेशजी की स्तुति करते हुए उन्होंने लिखा है -
विघन हरन तुम हौ सदा गणपति होहु सहाई। विनती कर जोरे कहों दीजै ग्रन्थ बनाई।
करुणा करि पोषत सदा सकल सृष्टि के प्राण। ऐसे ईश्वर को हिये, रहो रेनि दिन ट्टयान।
इसी ग्रंथ में कवि ने बहुत-सी नारियों से प्रेम करने वाले पुरुषों को चेतावनी देते हुए लिखा है -
एक नारि सो हित करै, सो अनुकूल बखानि। बहु नारि सो प्रीति सम, ता को दक्षिण जानि।।
महाराजा जसवंतसिंह ने पांच लघु ग्रंथ ’सि=ान्तबोट्टा‘, ’सि=ान्तसार‘, ’अनुभवप्रकाश‘, ’अपरोक्षसि=ान्त‘ तथा ’आनन्दविलास‘ शीर्षक से लिखे।९ उन्होंने नायिका भेद पर भी एक पुस्तक लिखी थी, जो अब अप्राप्य है। महाराजा ने ’फूली जसवन्त संवाद‘ नामक एक ग्रंथ भी लिखा। उन्होंने श्रीमद्भागवत पर भाषा में एक टीका लिखी तथा ’प्रबोट्टा चन्धेदय‘ नामक संस्कृत नाटक का ’चन्ध्प्रबोट्टा‘ शीर्षक से भाषानुवाद किया। अब इस अनुवाद के केवल चार पृष्ठ मानसिंह पुस्तक प्रकाश में उपलब्ट्टा हैं। इन पृष्ठों में इस ग्रंथ का उल्लेख इस प्रकार किया गया है -
मोह अंट्टोरो दूर करि, प्रकट्यो चन्ध् प्रबोट्टा। ताते सबहिन के हिये, भयो जुं अबही बोट्टा।।
जसवंतसिंह विद्वानों और कवियों के आश्रयदाता थे। उन्होंने लाहौर में एक ही दिन में अपने सरदारों और कवियों को २२ घोडे और ३ हाथी पुरस्कार में दिए। साथ ही १४ कवियों को डेढ-डेढ हजार रुपए भी दान किए। महाराजा जसवंतसिंह के समय मारवाड राज्य में वल्लभ सम्प्रदाय के संतों एवं पुजारियों का आगमन हुआ, जिससे राज्य में कृष्ण भक्ति का प्रचार हुआ। हरिराय नामक संत की अनेक कृतियो मिली हैं, जिनमें ’आचार्य स्वरूप चिन्तन‘, ’कृष्णावतार स्वरूप निर्णय‘, ’गुंसाईजी का स्वरूप चिन्तन‘, ’जप प्रकार‘, ’द्वैतात्मक स्वरूप विचार‘, ’पुष्टि दृढता‘ एवं ’शिक्षा पत्र‘ आदि मुख्य हैं।१० वल्लभ मत के ही ट्टाु्रवदास रचित कृतियों में ’आनन्द दशा विनोद‘, ’आनन्दलता‘, ’ख्याल हुलास‘, ’जीव दशा‘, ’जुगल दशा ट्टयान‘ महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश जोट्टापुर में संग्रहित हैं। महाराजा जसवंतसिंह के दीवान मुंहणोत नैणसी ने ’नैणसी री ख्यात‘ नामक इतिहास ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ उस काल के विश्वसनीय इतिहास को जानने का मुख्य स्रोत है।
अठारहवीं सदी के साहित्यकार महाराजा अजीतसिंह एवं उनके दरबारी लेख
महाराजा अजीतसिंह द्वारा रचित ग्रंथों में ’गुणसागर‘११, ’भाव विरही‘, ’अजीतसिंह जी कह्या दुहा‘, ’महाराजा अजीतसिंह जी कृत दुहा श्री ठाकुरां रा‘, ’महाराजा अजीतसिंह जी री कविता‘ एवं ’महाराजा अजीतसिंहजी रा गीत‘ नामक ग्रंथ मिलते हैं।१२ मिश्रबंट्टाु विनोद में महाराजा अजीतसिंह के ग्रंथों के नाम इस प्रकार दिए गए हैं - ’दुर्गापाठ भाषा‘, ’राजरूप का ख्याल‘, ’निर्वाणी दोहा‘, ’ठाकुरों ;आदिद्ध के दोहे‘, ’भवानी सहस्रनाम‘ और ’फुटकर दोहे‘। ’अजीतविलास‘ में महाराजा ने ११७ दोहों में अपनी द्वारिका यात्रा का सुन्दर वर्णन किया है, साथ ही २१२ दोहों में अपने स्वामिभक्त सरदारों के सम्बन्ट्टा में लिखा है -१३
और सबै आणंद हुओ, एक पात नह चाह। कील्याणो राजण तणो, मुवो द्वारिका मांह।। सिरदारै साथ हुंती नारी परतग दोय।
ठाली भूली रह गई साथ गई नह कोय।।
ईते मरगे राह में मांणस तीन हजार।
ंट, तुरंगम बैल री, कर कुण सकै सुमार।।
महाराजा अजीतसिंह ;ई. १७०७-२४द्ध के समय के संस्कृत भाषा के तीन महवपूर्ण काव्य मिले हैं। संस्कृत ग्रंथ ’अजीत चरित्र‘ की रचना औदिच्य जाति के दीक्षित ब्रा॰ण पं. बालकृष्ण शर्मा ने स्वयं महाराजा के अनुरोट्टा पर की। इसमें १० सर्ग हैं।१४ ऐतिहासिक महाकाव्य ’अजीतोदय‘ संस्कृत में लिखा गया है, जिसकी रचना भड्ड जगजीवन ने की।१५ इस महाकाव्य में ३२ सर्ग हैं। जगजीवन ने मरुभाषा में ’अजीतचरित‘ की भी रचना की। इसी अवट्टिा में पण्डित श्यामराम ने ’ब्र॰ाण्डवर्णन‘ नामक काव्य लिखा। महाराजा अजीतसिंह ने अपने जीवनकाल में ब्रा॰णों और कवियों को ४३ गोव दान में दिए।
महाराजा अभयसिंह की हिन्दी साहित्य को देन
महाराजा अभयसिंह ;ई. १७२४-४९द्ध के समय में रचित साहित्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। इनके राज्यकाल में चारण कवि पृथ्वीराज ने ’अभयविलास‘ नामक भाषा-काव्य लिखा। जगजीवन भड्ड ने संस्कृत काव्य ’अभयोदय‘ की रचना की।१६ कविया शाखा के चारण कवि करणीदान ने ’सूरज प्रकाश‘ शीर्षक से भाषाकाव्य लिखा तथा महाराजा को सुनाने के लिए १२९ प=री छन्दों का ’विडदसिणगार‘ नामक एक अलग काव्य बनाया, जिसमें सूरज प्रकाश का सार-संक्षेप दिया गया है। दोनों काव्यों के उपहार में महाराजा ने करणीदान को २००० रुपए वार्षिक आय की जागीर प्रदान की। रतन शाखा के चारण कवि वीरभाण ने ’राजरूपक‘ की रचना की परन्तु किसी कारणवश वीरभाण के मारवाड से चले जाने से उसका लिखा ग्रंथ महाराजा अभयसिंह के सामने प्रस्तुत नहीं हो सका। इस घटना के लगभग एक शताब्दी पश्चात् मारवाड नरेश मानसिंह ने इस काव्य को देखा और इसके रचयिता की असफलता के बारे में सुनकर बडा दुःख हुआ।१७ उन्होंने कहा कि इस कवि का राजवंश पर बहुत कर्ज रह गया है, इसलिए हमारा र्काव्य है कि हम उससे उ(ण होने की चेष्टा करें। इसके बाद महाराजा मानसिंह ने वीरभाण के वंशजों का पता लगाकर अपने पास बुलाया। यद्यपि वह वंश इस समय नितांत अशिक्षित था तथापि महाराज ने उस परिवार को ५०० रुपये वार्षिक आय की जागीर प्रदान की। इस काव्य में उद्ट्टाृत पंक्तियों से प्रकट होता है कि महाराज अभयसिंह ने १४ कवियों को लाख पसाव दिये थे।
महाराजा बखतसिंह एवं भीमसिंह के शासनकाल में साहित्य संरक्षण
महाराजा बखतसिंह ;ई. १७५१-५२द्ध एवं भीमसिंह ;ई. १७९३-१८०३द्ध को अपनी साा बचाए रखने के लिए निरन्तर यु= करने पडे तथा अपने ही सामंतों से लडना पडा। इस पर भी बखतसिंह ने डिंगल भाषा में देवी स्तुति एवं भजन लिखे। महाराजा भीमसिंह के कठोर स्वभाव के कारण बहुत से चारण, मारवाड राज्य छोडकर चले गए। भीमसिंह के समय में रामकर्ण कवि का लिखा ’अलंकार- समुच्चय‘ नामक भाषा ग्रंथ मिलता है।
उन्नीसवीं सदी के उद्भट लेखक महाराजा मानसिंह
जोट्टापुर नरेश मानसिंह ;ई. १८०३-४३द्ध अपने समय के उद्भट विद्वान् थे। उन्होंने भक्ति एवं “ाृंगार रस से परिपूर्ण छोटे-बडे साठ ग्रंथों के साथ-साथ विपुल राशि में स्फुट साहित्य लिखकर राजस्थानी और ब्रज साहित्य के भण्डार को समृ= किया। मानसिंह के लिखे ग्रंथों में ’नाथ चरित‘, ’श्री जालन्ट्टारनाथ रो चरित ग्रंथ‘, ’जलंट्टार चंधेदय‘, ’नाथ वर्णन ग्रंथ‘, ’अनुभव मंजरी‘, ’नाथ स्तुति‘, ’कृष्ण विलास‘, ’रास चन्ध्किा‘, ’राम विलास‘, ’दूहा संजोग “ाृंगार‘, ’राम रत्नाकर‘, ’मानसिंह साहबांरी बणवट रा ख्याल-टप्पा‘, ’“ाृंगार पद‘, ’षड्(तु वर्णन‘, ’चौरासी पदार्थ नामावली कोष ग्रंथ‘, ’रतना हमीर री वारता‘,१८ ’नाथस्तोत्र‘, ’प्रश्नोार‘, ’नाथाष्टक‘, ’जलन्ट्टार ज्ञानसागर‘, ’पंचावली‘, ’स्वरूपों के दोहे‘, ’मानविचार‘, ’उद्यान वर्णन‘ आदि प्रमुख हैं।१९ ’कृष्ण विलास‘ भागवत के दशम् स्कंट्टा का भाषा पदों में अनुवाद है। मानसिंह ने ’भागवत पर राजस्थानी भाषा में टीका लिखी‘, जिसके अब तृतीय और पंचम स्कंट्टा ही उपलब्ट्टा हैं। महाराजा द्वारा लिखित ’चौरासी पदार्थ नामावली‘ में न्याय, साहित्य, संगीत, वैद्यक आदि अनेक विषयों के सम्बन्ट्टा में कविता लिखी गई है। महाराजा मानसिंह डिंगल तथा पिंगल दोनों ही भाषाओं में रचना करते थे।२० नाथ सम्प्रदाय के प्रति अट्टिाक श्र=ा होने के कारण इनकी रचनाओं में नाथ साट्टाुओं की महिमा को अट्टिाक स्थान दिया गया।
महाराजा मानसिंह के दरबार में अनेक कवि एवं विद्वान् आश्रय पाते थे। उन्होंने २७ कवियों को लाख पसाव तथा ६१ कवियों को जागीरें दीं। सुप्रसि= कवि आसिया बांकीदास उनका काव्य-गुरु था, जिसे महाराजा अत्यन्त श्र=ा से देखता था, किन्तु बाद में महाराजा ने बांकीदास को देश- निकाला दे दिया, क्योंकि उसने एक पद में नाथों के लिए अपशब्द का प्रयोग किया। महाराजा ने एक बार एक गट्टो पर भगवा कपडा पडा हुआ देखा तो उसे श्र=ापूर्वक नमस्कार किया। दरबारियों के पूछने पर राजा ने बताया कि जिसने भगवा ट्टाारण कर रखा हो, वह मेरे लिए पूज्य हैं। ई. १८०५ में महाराजा मानसिंह ने संगीत, चित्रकला, इतिहास, साहित्य एवं काव्य के हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रहण के लिए जोट्टापुर दुर्ग में ’पुस्तक प्रकाश‘ नाम से एक पुस्तकालय स्थापित किया। इस पुस्तकालय में महाराजा मानसिंह की हस्तलिपि में लिखी हुई कुछ रचनाऐ संग्रहीत हैं।
महाराजा मानसिंह ने नाथ पंथ के साट्टाुओं को संरक्षण दिया, जिन्होंने विपुल नाथ साहित्य की रचना की। ’सबदी‘ नामक रचनाओं में नाथ साट्टाुओं की वाणियो संग्रहीत हैं। इनमें ’कम्भारी पाव सबदी‘, ’चौरंगीनाथ सबदी‘, ’गरीबनाथ सबदी‘, ’पार्वती सबदी‘, ’नागार्जुन सबदी‘, ’देवलनाथ सबदी‘, ’पृथ्वीनाथ सबदी‘, ’भरथरी सबदी‘, ’हारताली पाव की सबदी‘, ’मुकुन्द भारती सबदी‘, ’मालीपाव सबदी‘, ’मींडकी पाव सबदी‘, ’मेणावती सबदी‘ प्रमुख हैं। नाथों ने ’महादेव गोरख संवाद‘, ’कबीर गोरख गोष्ठी‘, ’गोरख-मछन्दर नाथ संवाद‘, ’मच्छेन्ध्नाथ पद‘, ’मछेन्ध् पुराण‘, ’भरथरी पद‘ आदि की भी रचना की।
मानसिंह के समय बांकीदास नामक विख्यात कवि हुआ, जिसने ’मान जसो मंडन तथा बांकीदास री ख्यात‘ नामक ग्रंथ लिखे। मानसिंह ने उसे अपना भाषा-गुरु बनाया तथा उसे अनेक पुरस्कार दिए। बांकीदास ने गंगाजी की स्तृति करते हुए लिखा है -
पाप जिता तूं पलक में, सुरसरि हरण समत्थ। इाा पाप मिर-मही, सो कुण करण समत्थ। छला अलौकिक छाय, ेची लहरां पिडै। मुगत निसेणी माय, सुख देणी असुरा सुरां।।
महाराजा मानसिंह का शासनकाल, राज्य में संघर्ष, षड्यंत्र और जागीरदारों के विधेह का काल रहा, फिर भी महाराजा मानसिंह ने संगीत, कला और साहित्य को आश्रय देकर मारवाड में संगीत, कला और साहित्य के त्रिवेणी बहा दी।२१ मानसिंह ने लखन, काशी, दिल्ली और नेपाल से बडे-बडे गवैये, पंडित, कवि और योगियों को मारवाड में आमंत्रित किया। इस सम्बन्ट्टा में एक दोहा कहा जाता है*-
जोट्टा बसायो जोट्टापुर, ब्रज कीनी ब्रिजपाल। लखन, काशी, दिल्ली, मान कियो नेपाल।।
महाराजा तख्तसिंह एवं जसवंतसिंह ;द्वितीयद्ध के समय साहित्य संरक्षण
महाराजा तख्तसिंह ;ई. १८४३-७३द्ध स्वयं संस्कृत भाषा के विद्वान् एवं विद्याप्रेमी थे। उनके आश्रित कवि शेष ने ’तख्तविलास चम्पू‘ लिखा। यह ग्रंथ १९वीं शताब्दी की संस्कृत साहित्य परम्परा का अद्वितीय उदाहरण है।२२ महाराजा जसवंत ;द्वितीयद्ध ;ई. १८७३-९५द्ध के समय महामहोपाट्टयाय कविराजा मुरारिदान ने यशवंत यशोभूषण नामक अलंकार का ग्रंथ लिखा था।२३ उन्होंने इसके संस्कृत और भाषा के दो अलग-अलग संस्करण तैयार किये। जसवंतसिंह ने उन्हें लाख पसाव के साथ पोच हजार वार्षिक आय की जागीर देकर सम्मानित किया।
जोट्टापुर राजवंश की रानियों द्वारा साहित्य सृजन
रानी तीजा भटियाणी प्रताप कुंवरी का जन्म ओसियां तहसील के गोव जाखण में ठाकुर गोविन्दसिंह भाटी के यहो हुआ। इनका विवाह जोट्टापुर नरेश मानसिंह से हुआ।२४ प्रताप कुंवरी ने पिंगल भाषा में १५ ग्रंथ लिखें। इनमें - ’ज्ञानसागर‘, ’ज्ञानप्रकाश‘, ’प्रताप पच्चीसी‘, ’प्रेम सागर‘, ’रामचन्ध् महिमा‘, ’रामगुणसागर‘, ’रघुनाथजी के कवित भजन पद‘, ’हरजस‘, ’प्रताप विनय‘, ’श्रीरामचन्धिवनय‘, ’रघुवर स्नेह लीला‘, ’राम-प्रेम-सुख-सागर‘, ’रामसुजस पच्चीसी‘ आदि सम्मिलित हैं। महाराजा मानसिंह के स्वर्गवास के पश्चात् लिखी गई उनकी एक रचना इस प्रकार है -
पतियोग दुख भयो अपारा, सूनो लागत सकल संसारा। कहुन सुहाय नयन बहै नीरां, पति बिन कौन बंट्टाावै ट्टाीरा। सुनि-सुनि कथा पुराण अपारा, सब झूठौ जायो संसारा।।
महाराजा मानसिंह की चावडी रानी के लिखे हुए कुछ विरह गीत मिलते हैं -
बेगा नी पट्टाारो म्हारा आलीजा जी हो।
छाती सी नाजक ट्टान रा पीन।।
ओ सावणियो उमंग्यो छै।
हरिजी ने ओडण दिखणी चीर।।
इण औसर मिलणों कद होसी।
लाडी जी रो थांपर जीव।।
छोटी सी छण रा नाजक पीजी।
महाराजा मानसिंह की उपपत्नी तुलछाराय ने राम भक्ति को समर्पित फुटकर रचनाऐ लिखीं -
मेरी सुट्टा लीजो जी रघुनाथ।
लाग रही जिय केते दिन की, सुनो मेरे दिल की बात। मोको दासी जान सियाबर, राखो चरण के साथ। तुलछराय कर जोड कहे, मेरो निज कर पकडो हाथ।२५
जामनगर के जाम साहब बीमाजी की पुत्री और महाराजा तखतसिंह की रानी प्रताप कुंवरी ;प्रतापबालाद्ध का नाम भक्ति-प्रट्टाान कवयित्रियों की श्रेणी में विशेष उल्लेखनीय है। इन्होंने रामपदावली, हरिपदावली एवं अनेक पदों और हरजसों की रचना की। ’प्रताप कुंवरी पद रत्नावली‘ नामक संग्रह में उन्होंने भगवान कृष्ण को प्रीतम कहकर सम्बोट्टिात किया है -
प्रीतम प्यारो चतुरभुज बारो री।
हिय ते होत न न्यारो मोरे, जीवन नंददुलारो री। जामसुता को है सुखकारी, सांचो श्याम हमारो जी।।
रींवा नरेश विश्वनाथ सिंह के भाई बलभधिसंह की पुत्री और महाराजा तखतसिंह की रानी रणछोड कुंवरी की कविता का विषय कृष्ण प्रेम और भक्ति था-२६
गोविन्द लाल तुम हमारे, मोहे दुख से उबारे। मैं सरन ह कि तिहारे, तुम काल कष्ट हारे।। हो बाघेली के प्यारे, सिरर्‍ीट मुकुट वारे। छोनी छटा को पसारे, मोहिनी सूरत न निसारे।।
रींवा नरेश रघुवीरसिंह की पुत्री वाघेली रानी विष्णु प्रसाद कुंवरी का विवाह महाराजा तखतसिंह के पुत्र राजकुमार किशोरीसिंह से हुआ था। उनकी रचनाओं का विषय भी कृष्णभक्ति था।२७ उनके रचित तीन ग्रंथ उपलब्ट्टा हुए हैं - ’अवट्टा विलास‘, ’कृष्ण विलास‘ और ’राट्टााराम विलास‘। महाराजा तखतसिंह के पुत्र प्रतापसिंह की रानी रत्नकुमारी ने भक्ति और प्रेम की कविताऐ लिखीं तथा अनेक पदों व हरजसों का सृजन किया, वे रामभक्त थीं।२८
उपरोक्त साक्ष्यों के आलोक में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मारवाड राज्य की स्थापना के साथ ही साहित्य संरक्षण एवं संव=र्न की जो परम्परा आरम्भ हुई, वह मारवाड रियासत के राजस्थान में विलय होने तक चलती रही।