पत्र सेतु



मधुमती का अक्टूबर २०१७ का अंक पढा। सम्पादकीय में राम चरित की चर्चा खूब प्रिय लगी। लेख पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी, सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा का वर्चस्व, काफी पसंद आई। कहानी नैहर भी पसंद आई।
कविताएँ भी खूब पसंद आई। मधुमती में आप लेखकों के
फोटो भी छापें
बद्रीप्रसाद वर्मा अनजान, गोरखपुर (उ.प्र.)
मधुमती का नवम्बर, २०१७ का अंक, साहित्य की अधिकांश विधाओं से लबरेज है। अंतपार्ठ के तहत श्री गोपेश का आलेख ज्ञानवर्धक है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय से डॉ. अशोक बैरागी द्वारा लिया गया साक्षात्कार एक उपलब्धि है। डॉ. हिन्दी के समर्थ, संपादक और आलोचक के रूप में सदैव याद किए जायेंगे। इस अंक की कविताएँ, गीत, गजल मन को छूती है। मूर्धन्य कवि मुक्तिबोध पर आपने जो लिखा है, वह सार्थक है।
अब्दुल सत्तार अन्जान, तराना, म.प्र.
मधुमती का नवम्बर २०१७ का अंक प्राप्त हुआ। नई जानकारियों के साथ साहित्य की विविध विधाओं में उत्कृष्ट रचनायें पढने को मिलीं। श्रेष्ठ सामग्री चयनकर्ताओं को हृदय से साधुवाद। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का साक्षात्कार पढकर हिन्दी के प्रति हो रहे उच्च स्तरीय अन्याय पढकर मन आहत हुआ। राष्ट्रभाषा हिन्दी के मार्ग की सभी बाधाएँ शीघ्र दूर करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है।
राजा भइया गुप्ता, लखनऊ
मधुमती का प्रस्तुतीकरण बदल रहा है। कुछ बदलाव अच्छे हैं जैसे ‘पाठकीय प्रतिभाव’, ‘रपट प्रस्तुति’ आदि में लेखकों के नाम पृष्ठ के दायीं ओर बनी पेटिका में दिखाना। यह दिलचस्प है। समीक्षा के लिए भी ज्यादा जगह हो गई है। ‘पुस्तक परिक्रमा’ में चौदह नए काव्य संग्रहों की समीक्षा अच्छी शुरुआत है। साहित्यकारों में यह विषय अक्सर चर्चा में रहता है कि साहित्य की भाषा, कविता की भाषा सरल होनी चाहिए। दुरूह होगी तो पाठकों तक कविता पहुँच नहीं पाएगी। इस संदर्भ में ‘मधुमती’ के अंतिम पृष्ठ पर रघुवीर
सहाय रचनावली से ‘मेरी प्रिय कठिन भाषा’ में व्यक्त विचार सोचने को मजबूर करते हैं कि ‘साधारण भाषा से खबरदार रहिए और कठिन भाषा से डरिए मत।’ कठिन और निरीह भाषा के अर्थ को, भेद को समझना भी जरूरी है। ‘सांस्कृतिक ध्वंस की मानसिकता पर विचार करते हुए’ डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ का संपादकीय
विचारणीय है।
डॉ. पद्मजा शर्मा, जोधपुर
मधुमती के दिसम्बर-२०१७ अंक में सम्पादकीय में हिन्दी को लेकर इन्दुशेखर जी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि नवीन शब्दों को अपनाना भाषिकता छिटका देना सांस्कृतिक विपन्नता का भी सूचक है। इसी अंक में निराला जी का हिन्दी भाषा पर उनके उद्गार ‘साहित्य और भाषा’ के अंतर्गत पठनीय है। प्रचलन में आने के बाद कोई भी शब्द क्लिष्ट नहीं रह जाता। बहरहाल इसी अंक में डॉ. सीमा शर्मा का लेख भी पठनीय है।
रतन चंद ‘रत्नेश’, चंडीगढ
मधुमती दिसम्बर २०१७ मिली। आफ सम्पादन कार्य को संभालने के पश्चात मधुमती के अभिवर्धित अलंकरण में आफ सम्पादन कौशल ने चमत्कृत किया है। प्रभावित हूँ।
मधुमती के आफ सम्पादित अंकों ने देश की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं को बहुत पीछे छोड दिया है। आफ इस वैदुष्य की बहुतों को कल्पना तक नहीं थी। आपने सभी शंकालुओं की शंका का, अपनी सम्पादन कुशलता से समाधान कर अपनी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने हेतु उन्हें विवश कर दिया है।
डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय ‘विजय’
मधुमती नवम्बर २०१७ अंक में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का साक्षात्कार (संवाद) में सही कहा है कि हिन्दी स्वतंत्रता के ७० वर्षों के पश्चात भी आम लोगों को राष्ट्रीय भाषा आम भाषा नहीं हुई, अफसरों की भाषा अभी भी
अंगेजी ही है। कुशल करण सांचीहर, जोधपुर
मधुमती का माह अक्टूबर २०१७ का अंक पढा। इसमें एस. भाग्यम शर्मा की अनुवादित कहानी ‘रंग बदलता मन’, सत्यदेव संवितेन्द्र जी के गीत, ओम नागर की कविताएँ एवं आशा शर्मा जी व डॉ. गार्गी जी की बाल कविताएँ अपनी उत्कृष्टता तो सिद्ध करती ही है, कृति में एकत्र समस्त सामग्री पठनीय है। आवरण व रेखांकन सज्जा भी अच्छे बन पडे हैं।
आनन्द हजारी, कोटा (राज.)
मधुमती नवम्बर २०१७ का नये कलेवर अत्यन्त भावपूर्ण कलेवर आवरण पृष्ठ का मुखावरण बहुरंगी भावों से भावपूर्ण तो अंतिमावरण पर हिन्दी साहित्य के विश्वविख्यात लेखक गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ एवं हरिवंश राय ‘बच्चन’ बच्चन जी का ताजा याद ‘मधुशाला’ को बरबस ताजा कर गई। साक्षात्कार शिक्षाप्रद एवं सराहनीय है। गद्य-भूमि प्रेम चन्द के उपन्यासों में स्त्री सशक्तिकरण की वास्तविकता
को बखूबी उजागर किया है। शेष कविताएँ सुंदर,
सराहनीय हैं।
सांवलाराम नामा, जालौर
मधुमती का नवम्बर अंक पढा। संपादकीय बहुत सारगर्भित है। लेखों का संचयन बहुत अच्छा है। कविताएँ, गीत-गजल स्मृतियाँ जगाती हैं। ‘रम्य रचनाएँ’ कुरेदती हैं और सोचने को मजबूर कर देती हैं। अंक अन्य अंकों के साथ संग्रहणीय है। ‘बाल जगत’ द्वारा बच्चों और किशोर को ज्ञानवर्धक सामग्री मिलती है।
महावीर सिंहल, जयपुर
मधुमती का नवम्बर अंक मिला। इन दिनों मधुमती का संपादकीय बदले हुए कलेवर के साथ आ रहा है जो कि नियमित पाठक हो शुरुआती पन्नों में बाँध लेता है।
संपादक को साधुवाद कि मुक्तिबोध जन्मशती पर उनकी काव्य रचना प्रक्रिया और उसके विभिन्न बिम्बो कों सरल कर मुक्तिबोध की प्रशाढ भावात्मक संवेदना से पाठाकों को रू-ब-रू करवाया।
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय से डॉ. अशोक कुमार बैरागी का साक्षात्कार बेबाक बयानी लगा जिसमें उन्होंने खुलकर विचारधाराओं, हिन्दी की स्थिति और भाषाओं के सन्दर्भ में बात कही है।
बालमुकुन्द नन्दवाना का आलेख, स्वयं प्रकाश और उनका लेखनीय रचना संसार बहुत ही अच्छा लगा, क्योंकि हमारे जैसे नवोदित कहानीकारों को समकालीन कहानी की रचना प्रक्रिया के समझने की दृष्टि देता है।
मुक्तिबोध की डायरी और उनका निबन्ध कला के तीन क्षण हर लेखक के सृजन का अनिवार्य हिस्सा लगता है। युवा कवि बंशी दर्जी की कविताएँ और कुबेरनाथ राय का प्रसंग पठनीय था।
माधव राठौड, जोधपुर
मधुमती का नवम्बर का अंक प्राप्त हुआ। इस अंक में ‘रामचरित मानस के प्रथम द्वंद्व में काव्य’ शीर्षक से रचित आलेख में श्री गोपीनाथ ‘गोपेश’ ने काव्य सिद्धांतों का विषद उल्लेख करते हुए शब्द और अर्थ की अन्योन्याश्रिता के विविध काव्य ग्रंथों से उल्लेखित परिभाषा, अर्थ तथा अभिप्राय को जिस ढंग से विवेचित किया है वह अनूठा है, पठनीय है-
डॉ. प्रभाकर क्षोत्रीय से डॉ. अशोक कुमार वैरागी का संवाद बडा अर्थपूर्ण, सारगर्भित तथा हिन्दी भाषा में अंगेजी भाषा के घुल मिल जाने पर भाषाई व्यवहार में जो परिवर्तन हुआ है, उसका भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
महिला सशक्तीकरण की दिशा में मु. पे*मचंद के उपन्यासों में भी पेरणादायी प्रयास दृष्टिगत होते हैं, जिसे डॉ.उमा कुमारी जी ने अपने आलेख ‘प्रेमचंद के उपन्यासों में स्त्री सशक्तीकरण’ द्वारा प्रस्तुत किया है। वे आज के संदर्भ में प्रेरणादायी है। श्री रघुवीर सहाय की चिन्ता है कि हम सामाजिक यथार्थ के प्रति अधिक जागरूक नहीं हैं। वैज्ञानिक तरीके की समझ और भाषा को साधारण बोलचाल की भाषा के धरातल पर लाने का आग्रह है, जो इनके आलेख ‘‘कविता में समाज और समाज में कविता की चिंता’’ में प्रकट हुआ है।
मुक्तिबोध की रचना शैली का विश्लेषण करते हुये ‘‘एक साहित्यिक की डायरी’’ लेख में रेखा कुमारी खराडी ने उनकी काव्यकला में संवाद शैली का प्रयोग प्रदर्शित करते हुये पाठकों को जो दिशाबोध देने का प्रयास किया है, सराहनीय है।
साहित्य की विविध विधाओं के समावेश, बाल जगत का परिशिष्ट, रम्य रचनाएँ तथा ‘पत्नी का मायका’ व्यंग्य आलेख हृदय तंत्रियों को झंकृत्त करने वाले हैं। काव्य खंड में प्रयुक्त सामग्री सामयिक एवं उत्पेरक है। पत्रिका के सफल संपादन के लिये संपादक समूह को ढेर सारी बधाइयाँ व साधुवाद।
शकुन्तला पालीवाल, उदयपुर (राज.)
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष में ‘मधुमती’ द्वारा ‘‘एकात्म मानववाद’’ के प्रणेता पर एक वृहद ग्रन्थ के रूप में विशेषांक का प्रकाशन सचमुच आज की नितान्त आवश्यकता है।
राष्ट्रीय एवं मानवीय विचारधाराओं के महत्त्वपूर्ण आलेखों के साथ पं. दीनदयाल जी पर विशिष्ट सामग्री व उनके जीवन के प्रेरक संस्मरण आज की युवा पीढी एवं भटके लोगों का मार्गदर्शन करने में निश्चित ही सहायक होगें। आफ कुशल संपादन में इस अद्भुत व अद्वितीय विशेषांक ग्रंथ के लिये हृदय से साधुवाद स्वीकारें। इस अंक के समस्त विचारक-लेखकों सहित संपदाकीय सहयोगियों को भी हार्दिक बधाई।
सुरेश कुशवाहा, जबलपुर
‘दीनदयाल विशेषांक’ में पं. दीनदयाल उपाध्याय के बारे में उनका पूरा व्यक्तित्व व कृतित्त्व पढने को मिला। ‘मधुमती’ नवम्बर अंक में प्रकाशित रचनाएँ भी स्तरीय, ज्ञानवर्धक एवं पठनीय लगी। पत्र सेतु में पत्र लेखकों को भी आपने सम्मान पूर्वक स्थान दिया है, उसके लिए बधाई। श्रेष्ठ रचनाओं के संपादन के लिए पुनः बधाई स्वीकार करें।
डॉ. श्याम मनोहर व्यास, उदयपुर