नव प्रकाशित पुस्तके : पांच उपन्यास/तीनआलोचना/तीन व्यग्य संगह/चार एकाकी-नाटक /ग्यारह लघुकथाए/नो काव्य संगह/चार विविध विघाए



रिश्तों की आँच
प्रस्तुत उपन्यास के केन्द्र में एक सामान्य व्यक्ति है जो अपने कार्य-व्यवहार के आधारपर अपने जीवन की दशा-दिशा बदलने में सक्षम हो जाता है। लेखक इस बात पर बल देता है कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा तथा रचनात्मक सामर्थ्य अवश्य छिपी होती है। जिसको पहचान कर उचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिये। साथ ही इस कृति में व्यक्ति के मोहभंग, कथनी-करनी के अंतर तथा संस्कारों के पुनर्सिंचन तथा मानवीय रिश्तों के प्रति दृढ आग्रह को व्यक्त किया गया है। उपन्यास की भाषा सरल तथा रोचक होने के साथ-साथ संप्रेषणीय भी बन सकी है।
<br/>व्यर्थ का प्रलाप
<br/>उपन्यास रचना के क्षेत्र में तेजी से उभर रहे लेखक मुकेश सोहन ने अपनी इस कृति में हमारे समय के उन तमाम महत्त्वपूर्ण तथा ज्वलंत मुद्दों पर रोशनी डाली है, जिनसे आज का युवा वर्ग मुठभेड करने को विवश दिखाई दे रहा है। बेरोजगारी दिशाविहीनता, मांत्रिकता का जबरदस्त असर, प्रेम के स्तर पर होने वाले मोहभंग के विभिन्न स्वर तथा परम्परा के स्तर पर युवा वर्ग द्वारा होने वाले विचलन को लेखक ने काफी विस्तार पूर्वक चित्रित किया है। एक ही साथ अनेक अन्तर्विषयों से सुगुंफित उक्त रचना में यद्यपि शिल्प तथा भाषा के स्तर पर थोडी और मेहनत करने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसकी रोचकता काफी सीमा तक बनी रहती है। यही बात इसकी सार्थकता को पुष्ट करती है।
<br/>छोटा जागीरदार
<br/>इस ऐतिहासिक उपन्यास में प्रत्येक स्तर पर एकता की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है, जिसमें राजस्थान की वीर गुर्जर जाति के प्रामाणिक तथा ऐतिहासिक दस्तावेज होने का दावा किया गया है। भारतीय संस्कृति की चिरंतन परम्परा का निर्वहन करते हुए लेखक ने इस कृति में भाषा की जीवंतता
<br/>तथा कल्पना शीलता को बनाये रखने का भरसक प्रयास किया है। रोचकता, सरसता तथा गद्य की प्रवाह शीलता के कारण इसे पाठकों का स्नेह अवश्य मिलेगा। बेहतर होता यदि इसमें आदर्शवाद तथा यथार्थवाद के मध्य सम्यक संतुलन भी बनाये रखा जाता।
<br/>प्रियदर्शी सम्राट अशोक महान्
<br/>जैसा कि पुस्तक के शीर्षक से स्वतः स्पष्ट है, यह कृति सम्राट अशोक के व्यक्तित्व तथा राष्ट्रीय एकता में दिये गये उनके योगदान को रेखांकित करने का प्रयास करती है। अशोक के बहाने लेखक भारतीय जीवन मूल्यों की शाश्वत व्यापकता, उदारता तथा विविध रंगी संस्कृति को प्रकट करता है। भाषा में संस्कृत का प्राचुर्य होते हुऐ भी यह बोधगम्य बनी रहती है। इस पुस्तक में जगह-जगह पर पद्य का प्रयोग भी प्रभावी बन पडा है।
<br/>पीरों के भी पीर श्री रामदेव
<br/>प्रांत के वरिष्ठतम साहित्यकारों में शामिल तथा अनेक विधाओं में रचना करने वाले डॉ. दया कृष्ण ‘विजय’ भूमिका में लिखते हैं- ‘‘उपन्यास आकार में अवश्य ‘रमताराम’ और ‘पायसपायी’ से छोटा है, परंतु भावभूमि इसकी भी वही आध्यात्मिक है। इसके पीछे मेरी मानसिकता कारणी भूत है; जो इस पुण्य भूमि भारत के उस दैविक ज्ञान को समाज के सम्मुख रख, उसके ज्ञानात्मक चिंतन को भोगवाद तथा यथार्थवाद से हटा, इस मिट्टी की आध्यात्मिक सौंधी गंध से जोडने हेतु व्याकुल है।’’ इस कृति में लेखक के कल्पनापरक पक्ष तथा यथार्थपरक कल्पनाशीलता के समन्वित व्यंजनात्मक रूप को अवश्यक लक्षित किया जाना चाहिये, जो रोचक भी है तथा प्रेरणास्पद भी। आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक चेतना रचनाकार के मूल अभिप्रेत रहे हैं।
<br/>आज की कविता का मिजाज
<br/>डॉ. रमाकांत शर्मा समकालीन परिदृश्य में लम्बे समय से सक्रिय कवि-आलोचक-अनुवादक के तौर पर चिरपरिचित हैं। प्रगतिशील जीवन चेतना से सम्पन्न उनकी कविता सम्पदा काफी व्यापक है, तो वहीं दूसरी ओर आलोचक के तौर पर समकालीन कविता की पहचान-परख-पडताल करने वाले गंभीर अध्येता के रूप में भी वे चर्चित रहते आये हैं। प्रस्तुत कृति में उन्होंने पचास से भी अधिक नये पुराने कवियों की काव्य-प्रक्रिया, उनकी सामाजिक सम्बद्धता
<br/>तथा रचनात्मक खासियतों का विश्लेषण करते हुए अत्यंत संवेदनशील तथा संतुलित न*ारिये से अपना मत व्यक्त किया है और साथ ही राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता के मुहावरे, महत्त्व तथा मनोजगत को भलीभाँति रेखांकित करने का गंभीर-व्यापक श्रमसाध्य उपक्रम किया है। राजस्थान के बाहर के कवियों पर भी उनकी दृष्टि जाती है, जो उनके समग्र दृष्टिकोण की परिचायक है।
<br/>अपने समय से बेहद नाराज एक पेम कवि
<br/>प्रस्तुत गद्य संग्रह में डॉ. पद्मजा शर्मा ने डॉ. रामप्रसाद दाधीच के बहुआयामी रचनाकार व्यक्तित्व को समझने-परखने के क्रम में प्रदेश के वरिष्ठ तथा नये लेखकों, विद्वानों द्वारा समय-समय पर लिखे गये संस्मरणों, समीक्षाओं, साक्षात्कारों को सम्मिलित किया है। इनमें दाधीच साहब के नाटककार, कवि-अनुवादक, साहित्य चिंतक इत्यादि तमाम रूप उभरकर सामने आते हैं। विभिन्न लेखकों ने डॉ. दाधीच को अत्यंत सम्मान देते हुए, उनके मनोजगत में झाँकने का भी प्रभावशाली उपक्रम किया है। डॉ. दाधीच को जानने समझने लिये आवश्यक पुस्तक।
<br/>बुलाकी शर्मा के सृजन सरोकार
<br/>इस पुस्तक में राजस्थान के परिचित कथाकार व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को केन्द्र में रखकर नीरज दइया ने अपना समीक्षात्मक आकलन प्रस्तुत किया है। इस आकलन में उनके परस्पर सम्बन्धों तथा निजी जीवन के अनुभवों के साथ ही साथ संस्मरणपरक छवियाँ भी अंकित की गई है। व्यक्ति के समाज, समय, संस्कृति तथा परिवेश से जुडाव की बदौलत ही उसके सर्जनात्मक व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व की भूमिका निश्चित होती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति बतौर एक रचनाकार हमेशा अपने भीतर सतत् आत्म संघर्ष तथा आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। रचनाकार के तौर पर बुलाकी शर्मा को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व स्वयं स्पष्ट है। व्यंग्यकार तथा कथाकार के रूप में बुलाकी अपने विचार खुलकर प्रकट करते हैं और उनके रचनाकार का यह अकुंठित रूप से उन्हें सार्थक रचनाकार के तौर पर स्थापित करता है।
<br/> पागल
<br/>उक्त पुस्तक खलील जिब्रान के चिंतन, जीवनानुभवों तथा नैतिक धरातल की दृष्टि से संतुलित सारतत्त्व को प्रकट करने का प्रयास करती है। अपने समय में प्रखर लेखकों, विद्वानों, चिंतकों को समाज से मुठभेड करनी पडती है। तभी जाकर सोना असली कुन्दन बनता है, जिसकी चमक फिर कदापि फीकी नहीं पडती। यही इस पुस्तक के प्रकाशन का महत्त्व है जो स्वागत योग्य भी है और पठनीय भी।
<br/>दीवानों की फितरत
<br/>समकालीन परिवेश के उलझे, जटिल तथा विसंगतिपरक विषयों को उनकी समग्रता में रख कर व्यंग्यपरक दृष्टि से पाठक तक पहुँचाने का उपक्रम प्रस्तुत संग्रह के इक्यावन व्यंग्य लेख करते हैं। मौजूदा यथार्थ का शायद ही कोई ऐसा विषय रहा होगा जो यहाँ व्यक्त ना हुआ हो। अपने कथ्य शिल्प तथा तेवर के समन्वित रूप में ये रचनाएँ पाठक को गुदगुदाती हैं, बेचैन करती हैं तथा अंततःउसे सोचने पर विवश भी करती हैं। इनका अन्दाज भले ही हल्का-फुल्का हो सकता है लेकिन इनका मंतव्य सार्वजनिक हित के मुद्दों को स्पर्श करता है और इस दृष्टिसे इनकी प्रासंगिकता भी बढ जाती है। भाषा की रोचकता यहाँ उल्लेखनीय लगती है।
<br/>मार्चोत्सव एक ऑफिस का
<br/>राजस्थान के समकालीन साहित्य परिदृश्य में व्यंग्य लेखन की गति और प्रगति दोनों ही उल्लेखनीय रही हैं। इसी क्रम में ‘मार्चोत्सव एक ऑफिस का’ पुस्तक में संग्रहीत व्यंग्य रचनाएँ व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक तथा व्यावसायिक इत्यादि तमाम क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतिपरक मुद्दों को आधार बना कर पाठकों को मनोरंजन देने तथा व्यग्रता का अहसास कराने का सफल उपक्रम करती है। खास करके सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली तथा वहाँ मौजूद कर्मियों की रोजमर्रा की अनुभवपरक घटनाओं का इनमें समावेश होने से ये रोचकता, बौद्धिक सचेतना तथा मनोरंजन करने में सफल कही जानी चाहिये क्योंकि इनकी भाषा भी सहज-बोधगम्य बन पडी है।
<br/> क्या देखाः क्या जाना
<br/>रोचकता तथा ज्ञानवर्धक सामग्री से भरपूर इन यात्रा संस्मरणों में राजस्थान तथा भारतवर्ष के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा धार्मिक महत्त्व के स्थलों के भ्रमण तथा उन शहरों के अपने निराले अंदाज तथा विशेषताओं
<br/>का वर्णन किया गया है। समग्रतया कहें तो इन रचनाओं को पढकर घर बैठे ही यात्रा-प्रवास का अहसास किया जा सकता है।
<br/>सेल्फियाए हुए हैं सब
<br/>तकनीक ने जहाँ हमारे जीवन को काफी सुविधाजनक तथा लाभदायक बनाया है तो वहीं दूसरी ओर इसने हमारे संस्कारों तथा सांस्कृतिक नैतिक मूल्यों को नुकसान भी कम नहीं पहुँचाया है। प्रमोद कुमार चमोली ने अपने अठारह व्यंग्य निबंधों के माध्यम से मोबाइल फोन के कुप्रभावों तथा घातक परिणामों की ओर ध्यान आकृष्ट करने का सटीक प्रयास किया है। इन व्यंग्य रचनाओं की भाषा काफी संवेदनशील, वक्र तथा प्रभावी बन पडी है क्योंकि इनमें लेखक स्वयं को भी लपेटता हुआ चलता है। बाजारीकरण, उदारीकरण तथा मुनाफाखाखोरी के इस दौर में जिस तरह से मानवीय मूल्यों का क्षरण हुआ है, उस ओर ये व्यंग्य हमारे मन में बेचैनी जगाते हैं तो साथ ही साथ गुदगुदाते भी हैं। सोचने का विवश भी करते हैं। यही इनकी रचनात्मक सार्थकता को सिद्ध करने को पर्याप्त है।
<br/>अनुपम फेरे
<br/>प्रस्तुत पुस्तक में कुल अठारह पौराणिक कथाओं का संग्रह किया है, जिनके केन्द्र में नारियाँ ही प्रमुख हैं। भारतीय संस्कृति तथा सामाजिक ताने बाने को अपनी तरह से प्रभावित-संचालित अनुप्राणित करने की दृष्टि से इन चरित्रों का असंदिग्ध महत्त्व रहा है। यह और बात है कि समय-समय पर इन चरित्रों के साथ पुरुष प्रधान समाज ने अन्याय, अत्याचार तथा विषमता से भरा व्यवहार ही किया है। इन कथाओं की भाषा अत्यंत रोचक, मनोरंजक तथा व्यावहारिक बन सकी है।
<br/>तक्षक हँस रहा है
<br/>उक्त पुस्तक में एक वृहद् नाटक है, जिसका कथानक महाभारत कालीन आख्यान को वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सन्दर्भों के
<br/>साथ जोडने का उपक्रम करता है। बदलते परिवेश में नारी-विमर्श तथा स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दों को रखांकित करने का प्रयास इस कृति को समीचीनता प्रदान करता है। नाटक की भाषा अत्यंत सुग्राह्य तथा सुगम है जिससे सामान्य पाठक के लिए अर्थ बोध में सुगमता रहती है।
<br/>मेरे श्रेष्ठ नाटक
<br/>उक्त संग्रह में आठ एकांकी शामिल हैं। जिनमें से अधिकांश की रचना आकाशवाणी से प्रसारण हेतु की गई थी। अतएव इनकी अपनी ध्वन्यात्मक अर्थवत्ता स्वयं सिद्ध है। नारी-विमर्श के सवालों पर आधारित इन रचनाओं में अभिनेयता के तत्त्वों की जगह श्रवणीयता के गुण अधिक हैं। अतएव इनका रसास्वादन भी उसी न*ारिये से किया जाना चाहिये।
<br/>साहिल के उस पार
<br/>नौ लघु नाटकों के प्रस्तुत संग्रह में जो विषय लिये गये हैं, उनका सम्बन्ध मौजूदा यांत्रिक युग की त्रासदियों से जुडता है। इनका मूल तथा मुख्य स्वर नारी-जीवन की व्यथा को उजागर करने का ही रहा है। सामाजिक सरोकारों से तालमेल रखने वाले इन नाटकों की रोचकता तथा मनोरंजन परकता उल्लेखनीय है। रेडियो के लिये इनकी रचना हुई थी, सो इनकी भाषा भी सहज-सरल तथा सुगम है।
<br/>आह्वान
<br/>कुल मिलाकर चौदह नुक्कड नाटकों वाले इस संकलन में समाजोपयोगी तथा समस्यामूलक विषयों को आधार बनाया गया है। जल की समस्या, प्रकृति के प्रदूषण, अस्वच्छता, साम्प्रदायिकता, कन्या के निराकरण पर जोर देते हुए लेखिका नाट्य शिल्प तथा कथ्य दोनों ही दृष्टियों से यथा संभव न्याय करती है। रोचकता तथा सम्प्रेषणीयता के लिहाज से भी ये रचनाएँ हमें निराश नहीं करतीं। किशोर वय के पाठकों को ये अवश्य पसन्द आयेंगी।
<br/>प्रांजल सृजन
<br/>विविध विषयों को व्यक्त करने वाली इस संग्रह की कविताएँ कवि मन की अन्तर्वेदना, बेबसी, सामाजिक आस्था, प्रकृति से मनुष्य के सम्बन्धों इत्यादि का चित्रण करती है। अनेक कविताओं में बिम्बधर्मिता तथा साधारणीकरण
<br/>का प्रयास यहाँ उल्लेखनीय है। ‘वह पुरुष’, ‘संध्या सुंदरी’, ‘बदलते सिद्धांत’, तथा ‘प्रांजल सृजन’, इत्यादि कविताएँ नारी मन की कोमल भावनाओं को रेखांकित करने के साथ उसके अस्मिता-बोध को भी प्रकट करती हैं। जीवन के मूल्यबोध, नवीन भावधारा तथा सौंदर्यानुभूतिपरक चेतना के लिहाज से ये कविताएँ उल्लेखनीय हैं।
<br/>गीतों की बारात
<br/>प्रस्तुत संग्रह में वैयक्तिक, श्रृंगारिक, सांस्कृतिक तथा राष्ट्रवादी विषयों को आधार बनाकर गीतों की रचना की गई है। इनकी भाषा में प्रांजलता तथा कवि-कल्पना में मौलिकता का दावा किया गया है। इन गीतों की लय तथा प्रवाहमयता अवश्य आकर्षित करने में सक्षम है। गेयता से भरपूर इस संग्रह का स्वागत किया जाना चाहिये।
<br/>उदास समय में गुलमोहर
<br/>कुल मिला कर छोटी-बडी ९३ कविताओं वाले इस संग्रह की भूमिका में डॉ. आईदान सिंह भाटी लिखते हैं- ‘‘ये कविताएँ अपने समय को रचती कविताएँ हैं, जहाँ मानवीय अस्मिता के क्षरण के संकेत हैं, तो शब्दों द्वारा रचित आस्था और विश्वास के झरने भी हैं।’’ इनमें विषयों की विविधता अवश्य है लेकिन शिल्प में कसावट तथा काव्यभाषा के लाघव की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, समकालीन परिवेश की प्रामाणिक अभिव्यक्ति इनकी पठनीयता में वृद्धि करती है।
<br/>कुछ तो बोल
<br/>राजस्थानी के परिचित समकालीन कवि श्याम महर्षि की चयनित कविताओं के प्रस्तुत अनुवादों में राजस्थान के मौजूदा परिवेश से सम्बद्ध सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक मुद्दों को आधार बनाकर अभिव्यक्त किया गया है। समय की विषमताओं, विडम्बनाओं तथा पीडा को उजागर करके जन सामान्य की भावनाओं तथा अनुभवों को उजागर करते समय कवि उनकी पीडा से साझा करता दिखाई पडता है। इस अनुदित कृति की खासियत यही है कि इसके द्वारा हिन्दी कविता के पाठक श्याम महर्षि की साहित्य-सर्जना से प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करने में सफल होते हैं।
<br/> दीया बिन बाती
<br/>उक्त संग्रह में एक सौ पचास छन्द मुक्त कविताएँ सम्मिलित हैं, जिनमें सामाजिक रुढियों के कारण महिलाओं को अनुभव होने वाली पीडा को अभिव्यक्त किया गया है। नारी-सशक्तिकरण के पक्ष में अपना स्वर बुलंद करने वाली इन रचनाओं में नारी-अस्मिता तथा अस्तित्व से जुडी विडम्बनाओं, विषमताओं तथा जीवन से जुडी हलचलों का अंकन मौजूद है। कवयित्री के भाव पक्ष तथा संवेदन पक्ष के बेहतर समन्वय के कारण इनका शिल्प तथा भाषा भी प्रभावी बन पडी है।
<br/>गीत तुम्हारे अधरों पर
<br/>इस काव्य संकलन में एक साथ गीत, गजलें तथा नज्में सम्मिलित हैं और जहाँ तक इनकी काव्यवस्तु का सवाल है, इनमें समसामयिक विषयों का निर्वहन किया गया है। रचनाओं से गुजरने पर स्पष्ट होता है कि कवि को परिपक्वता, संतुलन तथा अभिव्यक्ति के स्तर पर अधिक गंभीर होने की अपेक्षा है। भूमिका में कवि ने अपनी काव्यपरक यात्रा का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है तथापि भाषा तथा शिल्प को लेकर उनसे आगे के लिये बेहतर रचनाओं के बारे में आशान्वित अवश्य हुआ जा सकता है।
<br/>सुमन सतसई
<br/>संग्रह में शामिल दोहों में आजादी के बाद आये जन-जीवन तथा सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन; बिखराव, विसंगतियों, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक मूल्यों के क्षरण इत्यादि विषयों का भी समावेश किया गया है। इन रचनाओं में भाव सौंदर्य तथा शिल्प सौष्ठव दोनों के सामंजस्य की कोशिश को भी देखा जा सकता है।
<br/>दोहा ससार
<br/>कवि जीवन के लगभग तमाम पक्षों तथा तत्त्वों, प्रवृत्तिय तथा सक्रियताओं को सम्मिलित करते हुए इन दोहो के माध्यम से अपनी बात कहता है। समय, समाज तथा सांस्कृतिक परिवेश में रहते हुए कवि जो कुछ देखता, अनुभव करता है, उन सभी को उसने यथा संभव प्रामाणिकता से व्यक्त करने का प्रयास किया है, जो सराहनीय भी है और पठनीय भी।
<br/> प्रकाश की ओर
<br/>इस काव्य संग्रह की भूमिका में कवि ने कहा है- ‘विगत दशकों में देश-समाज की व्यवस्थाओं से उपजी विकृतियों ने जनचेतना को बहुत आहत किया है। इस संदर्भ में वस्तुस्थिति की समझ को जाग्रत करने में यदि ये रचनाएँ सफल हुई तो मैं इनकी सार्थकता समझूँगा।’इस आलोक में प्रस्तुत कविताओं को पढें तो लगेगा कि कवि ने अपने विवेक के अनुसार ईमानदारी से अपनी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है। यहाँ काव्य भाषा की स्फीति से बचा जाना चाहिये था तथा शिल्प में कसावट तथा काव्य दृष्टि में सूक्ष्मता का समावेश हो पाता तो ये कविताएँ अपेक्षाकृत अधिक प्रभावकारी बन सकती थीं।
<br/>रोशनी के परिन्दे
<br/>इस गजल संग्रह में शायर के जज्बातों, भावों तथा अहसासों की अभिव्यक्ति मिलती है। इनमें जमाने भर की विसंगतियों तथा विडम्बनाओं के चित्र भी देखे जा सकते हैं। व्यक्ति, समाज, संस्कृति तथा राजनीति इत्यादि तमाम बडे विषय तथा समसामयिक मुद्दे यहाँ रेखांकित होते हैं। जीवन के तमाम उतार-चढावों, वेदना तथा चुनौतियों से उपजे दृश्य संवेदनाशील कवि की निगाह से गुजर कर अभिव्यक्ति होते हैं। इतना जरूर कहा जा सकता है कि गजल की भाषा की बारीकियाँ तथा शिल्पगत कौशल की आवश्यकता यहाँ लगातार महसूस की जा सकती है।
<br/>अन्दर एक समन्दर
<br/>उक्त संग्रह की लघुकथाओं में लेखक के सामाजिक दायित्वबोध का परिचय तो मिलता ही है, लेकिन साथ ही साथ हमारे पारिवारिक ताने बाने तथा समष्टिगत विषयों की अभिव्यक्ति भी इनमें मिलती है। किसी भी राष्ट्र तथा समाज की उन्नति के लिये सामाजिक समरसता, समन्वय भावना तथा संवेदनापरक महौल की आवश्यकता पर ये रचनाएँ जोर देती हैं। यही बात इन रचनाओं की सार्थकता की पुष्टि करती है।
<br/> मुँह दिखाई
<br/>युवा रचनाकार के इस पहले लघुकथा संग्रह में सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। सामाजिक रुढियों, कुरीतियों, विचारों में आते जा रहे विकारों तथा मनुष्य विरोधी तत्त्वों की पहचान और पडताल करने की कोशिश यहाँ प्रभावकारी लगती है। समसामयिकता, उद्देश्यपरकता तथा रोचकता के कारण इनको अवश्य पसन्द किया जायेगा, ऐसा मानना अकारण नहीं है।
<br/>हँसी की चीखें
<br/>प्रस्तुत लघुकथा संग्रह की रचनाओं में बाजारवाद,भूमंडलीकरण, रिश्तों की क्षरणशीलता, नारी-अस्मिता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण तथा अन्य समसामायिक विषयों को आधार बनाया गया है। आज के दुष्कर दौर में कदम-कदम पर असरकारक ढंग से चिन्तित करने का प्रयास लेखकीय प्रामाणिकता की ओर संकेत करता है।
<br/>लघुकथा : एक कोलाज
<br/>चुने हुए लेखकों की लघुकथाओं के संचयन के साथ-साथ प्रस्तुत पुस्तक में लघुकथा-सर्जना के आकलन-मूल्यांकन से संबंधित आलोचनात्मक आलेख भी इस पुस्तक में उपलब्ध हैं। सर्जना तथा आलोचना का उक्त प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है, जो कि अपने मंतव्य में लघुकथा के बढते दायरे तथा लोकप्रियता की ओर सार्थक संकेत करता है।
<br/>दायित्व - बोध
<br/>प्रस्तुत संग्रह में नैतिक धरातल तथा मानवीय अस्तित्व से जुडी समस्याओं को उद्घाटित करते हुए लेखक ने जीवन में मूल्य बोध तथा संवेदनशील परिप्रेक्ष्य पर बल दिया है। विषयवस्तु का आधार व्यापक, विविधवर्णी तथा जीवंत है और साथ ही साथ इन रचनाओं की भाषा भी सहज-सरल तथा बोधगम्य है, जो कुल मिला कर पाठक तक अपनी पहुँच बनाने में सफल दिखाई पडती है। रचनाओं में उपदेशात्मक शैली का उपयोग किया है, जिससे बचा जाना लेखक के लिये श्रेयस्कर रहता।
<br/> रिश्तों की भीड
<br/>कुल मिला कर ११६ लघुकथाओं वाले प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं की सहजता, सरलता तथा बोधगम्यता पाठक को आकृष्ट करने में सक्षम है। इन लघुकथाओं की आधार भूमि मानवीय स्वभाव की विचित्रताओं तथा विसंगतियों से निर्मित होती है। लगे हाथों ये कथाएँ हमारी दोहरी मानसिकता तथा स्वार्थपरक स्वभाव पर प्रहार करने में भी समर्थ है। गागर में सागर जैसी उक्ति को चरितार्थ करती ये रचनाएँ अपनी सार्थकता असरकारी ढंग से सिद्ध करती हैं।
<br/>विरासत
<br/>अपनी कदकाठी में खासी बडी इन कहानियों को पता नहीं क्यों लघुकथा के खाँचे में डाला गया है। इन रचनाओं में अतीत, वर्तमान तथा भविष्य से जुडे भावसंवेदनों तथा अनुभवों की अभिव्यक्ति मौजूद है। इन कथाओं के स्तर पर मौजूद सादगी, अपनत्व तथा स्मृतियों का मिला जुला स्वरूप पाठक को बाँधे रखने में सफल रहता है। कथ्य की व्यापकता तथा वैविध्य भी इनमें उल्लेखनीय लगता हैं।
<br/>मौत में जन्दगी
<br/>इस संग्रह में एक सौ दस लघुकथाएँ सम्मिलित हैं, जिनकी विषयवस्तु के अन्तर्गत मानवीय संवेदना, समाज में असमानता के यथार्थ, कथनी-करनी में मौजूद अन्तर तथा ऐसे ही अनेक आवश्यक मुद्दों की अभिव्यक्ति हुई है। एक तरह से कहं तो समकालीन जीवन परिवेश की लगभग तमाम जटिलताओं को इनमें पर्याप्त स्थान मिला है। लघुकथाओं की भाषा तथा शैली भी सरल तथा सुगम्य है, जिससे ये पठनीय बन गई हैं तथा बोधगम्य भी।
<br/>इत्रफरोश
<br/>उक्त संग्रह के बारे में रोचकता तथा पठनीयता का दावा किया गया है, जो काफि हद तक सही भी है। नारी सशक्तिकरण के विभिन्न आयाम शैक्षणिक क्षेत्र में फैले माहौल, पारिवारिक रिश्तों में आने वाली टूटन, साम्प्रदायिक मानसिकता पर चोट इत्यादि आवश्यक विषयों का निर्वहन इन लघुकथाओं में किया गया है। अपने व्यापक कलेवर तथा विषय-वैविध्य और साथ ही साथ लेखक के सामाजिक बोध के कारण भी ये लघुकथाएँ पाठकों के स्मृतिपटल
<br/>पर काफी देर तक अपना असर छोडने में सफल कही जायेंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
<br/>तुम कौन हो?
<br/>कुल मिला कर ५७ लघुकथाओं के इस संग्रह में लेखक मध्यमवर्ग की मानसिकता, उसके जीवनपरक यथार्थ, सामाजिक विद्रूपताओं, उदारीकरण वैश्विकरण एवं बाजारवाद इत्यादि ज्वलंत विषयों को यथा संभव व्यंग्य शैली के माध्यम से तथा जागरूकता के स्तर पर अभिव्यक्त करता है। जो बात यहां हमारा ध्यान आकृष्ट करती है, वह है लेखक की सजगता तथा सामायिक महत्त्व के मुद्दों को लेकर उसकी संवेदनापरक तथा यथार्थवादी सोच। सहज, सरल शिल्प तथा बोधगम्य भाषा के कारण ये रचनाएँ पठनीय हैं।
<br/>कहानियाँ और लघुकहानियाँ
<br/>दो खण्डों में विभाजित उक्त संग्रह में तैंतीस लघुकथाएँ एवं १३ कहानियाँ समाहित हैं। भाव-संवेदन, अनुभूति-अनुभव एवं पर्यवेक्षण इत्यादि के समन्वित प्रयास से सृजित ये रचनाएँ कथ्य के लिहाज से अपने समकालीन परिवेश पर आद्धृत हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक तथा अन्य मानवीय मुद्दों का इनमें अच्छे तरीके से निर्वहन किया गया है। इन रचनाओं की भाषा रोजमर्रा की भाषा से मेल खाती है। अतएव सहज सम्प्रेषणीय भी बन गयी है।