तीन बाल कविताएँ

शिवराज भारतीय


देश हमारा
देश हमारा सबसे न्यारा,
बहती स्नेह पेम की धारा,
दुनिया भर में जाना जाता,
गाँव-गली का भाईचारा।
दीप मालिका जब-जब आती,
एक नया उल्लास जगाती,
अँधियारे पर उजियारे की
जीत सदा होती सिखलाती।
जगमग हो उठता हर द्वारा,
देश हमारा सबसे प्यारा,
होली का त्यौहार रंगीला,
बह उठती गीतों की धारा,
ऊँच-नीच का भेद मिटाने,
का संदेश सुनाता प्यारा।
ईद सिखाती भाईचारा,
देश हमारा सबसे न्यारा।
पन्द्रह अगस्त छब्बीस जनवरी,
घर-घर में झंडा लहराता,
देश पे मर मिटने वाले उन
वीरों की है याद दिलाता।
वंदे मातरम् गूँजे नारा,
देश हमारा सबसे न्यारा।
भूख लगी है मुझको पापा
भूख लगी है मुझको पापा,
कुछ खाने को लाओ जी।
खीर-जलेबी, डोसा-पूरी,
कुछ भी तो मँगवाओ जी।
दिन भर में मैं थक जाती हूँ,
काम से मैं उकता जाती हूँ।
उल्टा-पुल्टा ना हो जाए,
कभी-कभी घबरा जाती हूँ।
झाडू-पोंछा साफ-सफाई
आज तो ना करवाओ जी
भूख लगी है मुझको पापा
कुछ खाने को लाओ जी।
मुझको शाला भी जाना है
होमवर्क भी करवाना है
छोटू को भी नहलाना है
आँगनवाडी भिजवाना है
काम समय पर सब हो जाए
थोडा हाथ बँटाओ जी
भूख लगी है मुझको पापा
कुछ खाने को लाओ जी।
माँ
लोरी गाकर हमें सुलाती,
जग में सबसे प्यारी माँ,
मीठा सा अहसास जगाती
बच्चों की ये दुलारी माँ।
सदा मुळकती नहीं रूठती
ममता खूब लुटाती माँ,
खुद अभाव सहकर के सारे
बच्चों को हरषाती माँ।
जीवन जेठ की दोपहरी में
सुख बरसाती बदली माँ,
होगी क्या जन्नत भी ऐसी
जैसी तेरी गोद माँ।
प्रधानाचार्य, रा.उ.मा.वि. सोनडी (हनुमानगढ)