दो बाल गीत

सुरेन्द्र अंचल


हर्ष-हर्ष, नया वर्ष
भूलो बीती बातें भाई
राग द्वेष औ फूट लडाई
आगत का स्वागत सहर्ष।
नया कुछ करने की सोचो
कुछ आगे बढने की सोचो
भूलों में ढूँढो निष्कर्ष।
साम्प्रदायिकता बडी बीमारी
इससे सबको खतरा भारी
भारत तो सबका आदर्श।
जन-गण-मन क्यों दुःखी है भाई
किसने घर-घर आग लगाई
आतंकवाद का मिटे मजर्
हर्ष-हर्ष, नया वर्ष
जागा मेरा गाँव रे !
श्रम की सौंधी गंध जग उठी, महुवा-अमुवा छाँव रै।
जागा मेरा गाँव रे।
हल है कलम, पसीना स्याही
हम, लिखें नया इतिहास रे।
खेतों के कागज पर उतरें
नव फसलों का उल्लास रे।
जिसकी बाँहों में श्रम का बल, कैसा उसे अभाव रे।
जागा मेरा गाँव रे।
मानसून कितना तरसाएँ
बादल चाहे आँख चुराएँ
हम, पर्वत के वज्र वक्ष से
नहरें उतार पानी लें आएँ
उमडा मेहनतकश के मन में, स्वाभिमान का भार रे
जागा मेरा गाँव रे।
सिंदरी के पारस को छूकर
माटी सोना बन इतराएँ।
नई नसल की नई फसल ले
खेतों की दुल्हन शरमाएँ
अब न कर्ज की ‘अमरबेल’ का रहे कहीं उलझाव रे
जागा मेरा गाँव रे।
२/१५२, साकेत नगर, ब्यावर, अजमेर (राज.) मो. ९४६०१७८५११