ई-लोक का हिंदी साहित्य पर प्रभाव

डॉ. आशीष पुरोहित


साहित्य का सीधा सा वास्ता शब्द से है और शब्द को बरतने की कलात्मक अभिव्यक्ति भाषा के बगैर संभव नहीं। भाषा की अपनी एक तकनीक है और साहित्य की भाषा की अपनी एक दुनिया। मैं तो इस विषय प्रवेश में ही इस दावे के साथ प्रवेश करना चाहता हूँ कि इस प्रचलित आभासी दुनिया से पहले अगर किसी ने अपना संसार बसाया था तो वह साहित्यकार ही था। कल्पना और ज्ञान के बूते उसने ऐसे-ऐसे कथानक रचे, जो थे तो इसी संसार से ही, लेकिन कुछ जाने-पहचाने और कुछ अपरिचित से। ई-लोक में भी ऐसा ही हुआ। एक आभासी संसार रचा गया, लेकिन यहाँ आभासी संसार का साधारणीकरण था। हर खासो-आम को यह संसार उपलब्ध था और इस संसार की तमाम तरह की नेमतें भी सहज थीं। होगीं सहज। मिले होगें अच्छे-बुरे परिणाम। लेकिन अगर इस समूचे परिदृश्य को साहित्य से जोडकर देखा जाए तो यह दो घरानों का मिलन महसूस होता है। साहित्य जगत का ई-लोक से मिलन किन्हीं दो बडे घरानेदारों के बीच के रिश्ते से परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी चर्चा अधिक और प्रतिफल भी उसी रूप में गुणात्मक मिलना तय है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास में पांडुलिपियों के प्रचलन से बाहर होने का कारण भी तकनीकी थी। जैस-जैसे छापाखाने अस्तित्व में आए न सिर्फ पांडुलिपियों का प्रचलन खत्म हुआ बल्कि गं*थों का प्रसार भी हुआ। फर्मे बनाने, ब्लॉक लगाने, अक्षर को मिलाकर कंपोज करने और छापने का पहला-पहला कार्य बडा ही श्रमसाध्य रहा होगा, इन तमाम तरह के कामों का इल्म भी ९० के बाद पैदा हुई पीढी को नहीं होगा लेकिन यही वह तकनीक थी, जिसकी नींव पर आज समूचा हिंदी-जगत खडा है।
हमने कभी जिस टाइप-राइटर को देखा है, उसी का विस्तार की-बोर्ड में है और प्रिंटिग-पे*स में जो लोहे के अक्षरों की कीलें यानी लेटर्स रखने के जो खाने हुआ करते थे उसमें और हमारे की-बोर्ड पर पडे अक्षरों में कोई बडा फर्क नहीं है। अर्थात् बेसिक्स नहीं बदले हैं।
यह तो हुई ई-लोक और हिंदी जगत की बात। लेकिन प्रारंभ इतना सहज नहीं था। रोमन के मुकाबले देवनागरी को स्थापित होने में बडी कठिनाइयों का सामना करना पडा। आज हालाँकि यूनिकोड के कारण देवनागरी लिपि में लिखी इबारत कम्प्यूटर में अब कहीं भी खोला जा सकता है, लेकिन २०१० तक यह इतना आसान भी नहीं था और इस वजह से हिंदी साहित्य ई-लोक से लगभग अप्रभावित ही रहा। उस समय कुछ कनवर्टर प्रकाश में आए लेकिन प्रक्रिया बडी ही कठिनाई पूर्ण थी और तकनीक से हमेशा ही दूर रहने वाले साहित्यकारों के लिए यह सब ‘दूर की कौडी’ ही रहा।
ऐसे दौर में कम्प्यूटर तकनीक को हिन्दी भाषियों और हिन्दी के साहित्यकारों के लिए अधिक सहज बनाने में कई नाम तेजी से उभरे जिनमें ‘वेबदुनिया’ के विनय छजलानी, ‘बारहा’ के वासुश्री निवास, बालेन्दु शर्मा दाधीच थे। ये सब ‘मल्टी-टास्किंग’ पेशेवर हैं। जिन्होंने हिन्दी कम्प्यूटर तकनीक को आसान करने की दिशा में तो काम किया ही साथ ही इस तकनीक के बारे में समय-समय पर अपने ब्लॉगस और अखबारों के माध्यम से उपयोगकर्त्ताओं को अपडेट रखने का भी महत्त्वपूर्ण काम किया। यही वो दौर था जब यूनिकोड हिन्दी के जरिये ई-लोक में हिन्दी साहित्य की अलग-अलग प्लेटफार्म पर भरमार हुई।
इसी दौरान कविता-कोश के माध्यम से ललित कुमार जी ने एक बहुत ही निर्णायक और युगीन कदम उठाया। हिन्दी ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य को इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने के लिए कविता-कोश और गद्य-कोश ने काम शुरू किया और पांडुलिपियों को री-टाईप करवाकर देश के आधे से अधिक साहित्य को सुरक्षित करने का महत्त्वपूर्ण काम कविता कोश आज भी कर
रहा है।
मेरी नजर में अकेला कविता कोश ही ऐसा मंच है, जिसने हिंदी साहित्य को ई-लोक में सर्वाधिक लोकप्रिय
बनाया। इसके अलावा भी विकीपीडिया हो, चाहे.... और ऐसी ही बहुत सारी साइट और पोर्टल। आज ई-लोक में अगर साहित्य है तो इसकी वजह ऐसे लोग हैं जो साहित्यानुरागी होने से साथ-साथ टैक्नो भी थे। संचार तकनीक को जानने वाले लोगों की वजह से ही हिंदी साहित्य का वैभव ई-लोक में बिखरा पडा है।
वरन, सच तो यह है कि आज भी साहित्यकार ‘हाई टैक’ नहीं है। आधे भी टैक्नों नहीं है। यह तो भला हो इस मोबाइल फोन की एंड्रायड तकनीक का कि हम हिंदी में टाइप कर पा रहे हैं लेकिन सच तो यह है कि हम यह टाइप किस फारमेट में कर रहे हैं, अधिकांश लोगों को यह पता नहीं है, भले ही इसका उपयोग धडल्ले से कर रहे हैं।
खैर, यह तो एक बात हुई। यह किसी तरह का अपराध नहीं है। हाँ, इतना जरूर है कि अगर किसी के पास इस तरह का तकनीकी ज्ञान है तो वह उस साहित्यकार से बहुत आगे निकल सकता है, जिसे अभी तक अपना ब्लॉग लिखना नहीं आता। सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं आता और यू-टयूब पर चैनल बनाना नहीं आता। पश्चिम में ऐसा लगभग हर साहित्यकार को आता है, वहाँ का साहित्यकार तकनीकी रूप से समृद्ध है। सभी के पास अपना हैंडकैम है, अपना लैपटॉप है और इस तरह वे न सिर्फ ‘गो-ग्रीन’ के हिमायती बन चुके हैं बल्कि सही अर्थों में ‘हाई टैक’ भी हैं। यहाँ यह देखना भी जरूरी है कि हमारे ही देश के अंगेजी साहित्यकार भी इस मामले में पीछे नहीं है, लेकिन हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं के हैं, क्योंकि उनके पास अव्वल तो तकनीकी ज्ञान है नहीं, दूसरा यह और कि कम्प्यूटर की दुनिया में जो निर्देश आते है, वे अंगे*जी में होते हैं और उनका अनुवाद इतनी औपचारिक हिंदी में होता है कि अच्छे-अच्छे हिंदी भाषी नहीं समझ पाएँ।
यह एक समस्या है लेकिन इससे भी बडी समस्या जो इन दिनों सोशल मीडिया के दौर में साहित्यकारों के
सामने आ रही है, वह हिंदी की शुद्धता की है। मैं देखता हूँ कि बहुत सारी फेसबुक पोस्ट में इतनी हिंदी संबंधी त्रुटियाँ होती हैं कि अखबारों की त्रुटियों को माफ करने का जी चाहता है। शब्द से संस्कारित साहित्यकार अगर वर्तनीगत अशुद्धियाँ करेंगे तो फिर किसे दोष दिया जाए। लेकिन ई-लोक ने इस मिथ को तोड दिया है कि सभी साहित्यकारों को शुद्ध हिंदी लिखनी आती है।
प्रकारांतर से कहूँ तो यह है ई-लोक का हिंदी साहित्य पर प्रभाव कि साहित्य में भाषागत अशुद्धियों का तलछट बाहर आ रहा है और जिन्हें भाषाई शुद्धता का पैरोकार माना जाता रहा है, उनकी त्रुटियाँ न सिर्फ हास्यास्पद बनती जा रही हैं, बल्कि मिथ भी टूट रहे हैं। यह चुनौती हिंदी साहित्य को ई-लोक की है क्योंकि कम्प्यूटर का एक ही सूत्र है कि कम्प्यूटर कभी गलत नहीं हो सकता। आप जो भी कमांड देगें, आपको परिणाम मिलेगा।
यह ई-लोक का हिन्दी साहित्य पर सबसे बडा प्रभाव है, जिसे दुष्प्रभाव के रूप में चिह्नित करना चाहिए। लेकिन जैसा कि पहले भी मैंने उल्लेख किया है हिंदी साहित्य को ई-लोक से गठबंधन की वजह से विस्तार मिला है। आमजन तक साहित्य पहुँचने लगा है। हम देखते हैं कि किंडल जैसे डिवाइसेज महज दस-दस रुपये में भी किताबें उपलब्ध करवा रहे हैं। ई-बुक, ई-लाइब्रेरी, प्रिंट ऑन डिमान्ड आदि कांसेप्ट चर्चा में आने लगे हैं। किताबों के मूल्य बहुत ज्यादा होने से बहुत सारे लोग किताबें खरीदने से कतराते थे। अब ऐसा नहीं है। जिन्हें किताब पढनी है, उनके दैनिक खर्च में ही किताब पढना शामिल हो चुका है। इसका हिंदी साहित्य पर गहरा प्रभाव पडा है। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसी सोशल साइट्स पर साहित्यकारों का सृजन सामने आ रहा है। वाट्स अप जैसे मंच भी मिले हैं, जहाँ हम एक ही समय में बहुत सारे लोगों को अपने रचनाकर्म से अवगत करा सकते हैं। इस पूरे परिदृश्य में रिस्क सिर्फ इतना ही है कि कॉपीराइट
जैसा अधिनियम भी आपकी मदद नहीं कर सकता और खुद आपको भी पता नहीं होता कि आपका लिखा, कितनी-कितनी बार, कहाँ-कहाँ और किस-किस के नाम से प्रकाशित हुआ है।
अभी प्रदेश के दो बडे अखबारों के एक ही दिन के संस्करण में एक कहानी सिर्फ शीर्ष बदलकर छाप दी गई। एक कहानी पर तो बाकायदा कहानी देने वाले का नाम भी था। एक ही दिन, दो अलग-अलग अखबारों में एक ही कहानी प्रकाशित होना और वह भी अलग-अलग ट्रीटमेंट के साथ, यह बताने के लिए काफी है कि ई-लोक का दखल हिंदी साहित्य में किस हद तक हो चुका है। सिर्फ यही नहीं, हिंदी में हरिवंशराय बच्चन और उर्दू में गालिब के नाम से ऐसी-ऐसी कविताएँ और शायरियाँ सामने आ रही हैं जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में लिखा ही नहीं। कबीर और मीराँ के लिए यह कहा जाता है कि बहुत सारे पद तो उनके नाम से कालांतर में आने वाले कवियों ने लिखे हैं। हालाँकि इस मसले पर अभी विशेषज्ञों का मूल्यांकन बाकी है लेकिन ई-लोक में ऐसा बहुतायत से हो रहा है।
खबरों की चोरी हो रही है। चोरी की कहानियों से लिखी स्क्रिप्ट पर फिल्में बन रही हैं। कांसेप्ट उडाए जाने लगे हैं और कई बार तो सिर्फ नाम ही हटाए और लगाए जा रहे हैं। इन दिनों एक महिला साहित्यकार इसी वजह से निशाने पर हैं कि उन पर साहित्यक-चोरी का
आरोप है।
बावजूद इन सभी के, ई-लोक के साथ गठबंधन ने साहित्यकारों को सही अर्थों में लोकतंत्र दिया है। पहले पत्र-पत्रिकाओं में लॉबिया तय करती थी, कौन छपे और कौन नहीं छपे। कुछ मठाधीशों के हाथ में साहित्यकारों की स्थापना करने का अधिकार था। लिखे हुए को समीक्षा या आलोचना की दृष्टि से देखने और छपने के लिए कुछ लोग मुकर्रर थे।
अब ऐसा नहीं है। ई-लोक ने सभी को अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए मंच दे दिया है। बहुत सारे लोग तो सिर्फ इसी वजह से लिखने लगे हैं कि किसी का लिखा देखकर उन्हें लगा कि अरे! ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ। हाँलांकि यहाँ यह सवाल भी है कि देखादेखी लिखने की होड के चलते कितना कालजयी रचा जाएगा? लेकिन यह भी तो है कि अब तक जो रचा जा रहा है उसमें से कालजयी कितना है। ऐसे में इस लोकतंत्र की स्थापना के परिणामस्वरूप कुछ निकल जाता है तो क्या हर्ज है।
ऐसे मेरा मानना है कि ई-लोक से साहित्य जगत का संबधं अभी तक भले ही प्रगाढ नहीं हो पाया हो लेकिन अन्योन्याश्रित हो चुका है। ई-लोक का मूल्य भी साहित्यिक-कृतियों की वजह से आमजन में बढा है। वरना यह भी डाकिया ही बना रहता। दूसरी ओर साहित्य भी कुछ लोगों के हाथ से निकलकर आम लोगों के बीच आ गया है। सही अर्थों में जन-संवाद, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के अधिकार का अगर यह दौर है, तो इसकी एक बडी वजह ई-लोक है। जहाँ कहने और लिखने की आजादी पिछले सत्तर साल की तुलना में, बीते दशक अधिक मिली है। हमें यह कामना करनी चाहिए कि हिंदी जगत के लिए यह गठबंधन शुभ रहे।
राजकीय माध्यमिक विद्यालय संख्या-२ के पास, कोर्ट रोड, नोहर, जिला हनुमानगढ-३३५५२३ (राज.)