प्रौद्योगिकी एवं हिन्दी भाषाः साहित्य सम्बन्ध के अन्तःसूत्र

डॉ. अमृता जोशी


सूचना-प्रौद्योगिकी व हिन्दी भाषा-साहित्य के अन्तः सूत्रों पर विचार करने पर सर्वप्रथम यह तथ्य उभरकर आता है कि किसी भाषा का सामर्थ्य प्रौद्योगिकी को अपनी सामुदायिक स्मृति, लोकोन्मुखता, जनपक्षधरता, सांस्कृतिक व जातीय अस्मिता के रक्षण में एक ‘उपकरण’ की भाँति प्रयोग करने में है न कि प्रौद्योगिकी को अपनी सामुदायिक स्मृति करने में है न कि प्रौद्योगिकी के द्वारा अपने मूल इतिहास-परम्परा सम्बद्ध लोकतांत्रिक संवेदनात्मक व भावात्मक वैशिष्ट्य के स्थानापन्न में। यह सही है कि प्रौद्योगिकी ने मानवीय संवेदनाओं का स्थानापन्न किया है तथापि प्रौद्योगिकी मनुष्य की ही उपज है। यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर है कि वह किस तरह उसे अपने सौन्दर्यानुभव, कलात्मक-अनुभवों, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक विकास के सम्बन्ध में एक ‘उपक्रम’ के रूप में काम में ले। भूमण्डलीकरण व नवउदारवादी सांस्कृतिक समय में सूचना-प्रौद्योगिकी ने भाषा की अस्मिता को भी कई तरह से प्रभावित किया है। वेब ०.२ तकनीकी ने सोशल मीडिया की उपलब्धता करा कर एक नए तरह के भाषा-विमर्श को जन्म दिया है। रचनात्मक स्तर पर सामुदायिक-सहभागिता के व्यापक प्लेटफार्म को उपलब्ध कराकर एक ओर सकारात्मक प्रभाव छोडे हैं, तो वहीं दूसरी ओर मनुष्य की कल्पना शक्ति का ह्नास, साहित्य में भाषा सम्बन्धी खतरे, सामुदायिक अस्मिताओं के क्षरण सम्बन्धी नकारात्मक प्रभाव से भी नकारा नहीं जा सकता। प्रौद्योगिकी व हिन्दी भाषा के सम्बन्ध पर निम* विचार-बिन्दु उभर कर आते हैंः-
१. क्या प्रौद्यौगिकी द्वारा हिन्दी भाषा-साहित्य के मूल चरित्र का कोई विकास हुआ है?
२. सोशल मीडिया जो कि प्रौद्योगिकी का एक हिस्सा है, ने जातीय सांस्कृतिक-बोध को किस प्रकार प्रभावित किया है?
३. प्रौद्योगिकी ने भाषाई- अस्मिता की रक्षा के लिए जिन प्रविधियों को काम में लिया है वे कितनी जनपक्षीय हैं?
जहाँ तक प्रौद्योगिकी द्वारा हिन्दी भाषा- साहित्य के मूल चरित्र के विकास का प्रश्न है इंटरनेट, वेब, पोर्टल आदि के साहित्य में प्रयोग ने साहित्य की सर्वग्राह्यता को बढाया है। आज सोशल मीडिया पर कविताकोश, गद्यकोश,
हिन्दी समय डॉट कॉम जैसी कई वेबसाईटस साहित्य के ‘स्मृति’ के संरक्षण का दायित्व बहुत अच्छे से निभा रही हैं। फेसबुक, टिव्टर, ब्लॉग आदि व्यक्तिगत-अनुभूति को सार्वजनीन करने के सशक्त माध्यम के रूप में उभरकर आए हैं। इन्होंने पाठक व रचनाकार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित कर विमर्श की नयी सम्भावनाओं को उत्पन्न किया है। सम्पादक व प्रकाशक की भूमिका अब रचनाकार स्वयं ही निभाकर साहित्य के रूढिबद्धमूलक-व्यक्तित्व से अलग एक नया अलग तरह का साहित्यिक संस्कार रच रहा है, जो कि पूरा ही तकनीक आधारित या आभासी है। कविता, कहानी, विमर्श आदि के लिए सोशल मीडिया में पूरा स्पेस है। जानकी पुल, शब्दांकन, समालोचन, सौतुक, आदि ऑनलाईन माध्यम ने इस दिशा में काफी स्तरीय कार्य किया है। कुल के मॉडरेटर एक नहीं है कई है, जो इन्हें निरन्तर ‘अपडेट’ करते रहते हैं। मेल्स के माध्यम से बडे से बडा टेक्स्ट दुनिया के किसी भी कोने में भेजा जा सकता है। फिर ब्लॉगस आए, पत्रकारिता के सशक्त माध्यम के अलावा जिनमें प्रकाशित रचनाओं का बाकायदा कॉपीराईट होता है। टिव्टर पर अभिव्यक्ति की १४० शब्दों की सीमा को बढाए जाने की कवायद इसलिए है ताकि संप्रेषण को और अधिक उदार बनाया जा सके। फेसबुक आरम्भ में अपनी फोटोज शेयर करने की शौकिया सुविधा की बजाय वर्तमान में टैक्स्ट-शेयरिंग के सशक्त माध्यम के रूप में सामने आता है। अनगिनत कवि, लेखक, लेखिकाएँ आदि निरन्तर एक साथ रचनात्मक रूप से अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज ही नहीं कराते हैं, वरन् फेसबुक आदि पर टिप्पणी आदि में कई आलोचनात्मक सम्भावनाएँ भी उभर कर आती हैं। ‘व्हाट्स अप’ आदि पर रचनात्मक व विमर्शीय लेखन हिन्दी की सर्वग्राह्यता के फलक को विस्तार देता है।
सन् २००० में माईक्रोसॉफ्ट विण्डोज, एक्सपी और विण्डोज २००० के माध्यम से यूनीकोड हिन्दी का आगमन तथा साथ ही माईक्रोसॉफ्ट द्वारा मंगल फॉन्ट को
जारी करना हिन्दी की तकनीकी दुनिया में किसी क्रान्ति से कम नहीं था। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के आधार पर तकनीकी स्तर पर बल मिला। हिन्दी शब्द तन्त्र, डिक्श्नरी, ई-महाशब्दकोश, शब्दमाला आदि के अतिरिक्त पारिभाषिक शब्दावली सम्बन्धी; मौसम विज्ञान शब्दावाली, प्रशासनिक भाषा का सरलीकरण, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली सम्बन्धी मौसम विज्ञान शब्दावली, प्रशासनिक भाषा का सरलीकरण, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा जारी शब्दकोश, ऑनलाईन बैंकिग शब्दावली, हिन्दी यूनीकोड पाठ संग्रह, कथा समान्तर कोश, अरविन्द सहज समान्तर कोश, आदि शब्दकोश उपलब्ध है। इसके अलावा गूगल पर ‘हिन्दी-हिन्दी’ जैसे एप्प मौजूद हैं, जिनसे सहज ही शाब्दिक सहायता न केवल ऑनलाईन वरन् ऑफलाईन हिन्दी में कार्य करने वाले कार्यकर्ता भी सहायता ले सकते हैं। अभिव्यक्ति, रचनाकार, अनुभूति, साहित्य कुंज, लेखनी, प्रतिलिपि, समयान्तर आदि ई-पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य को रचनाधर्मिता व प्रयोगधर्मिता की दृष्टि से संवर्द्धित किया है। इस तमाम तकनीकी प्रयोगधर्मिता ने एक व्यापक परिपेक्ष्य में हिन्दी भाषा की लोकप्रियता, रचनात्मक सम्भावनाशीलता व प्रयोजनमूलकता को बढाते हुए एक बहुत बडे वर्ग को हिन्दी के प्रति विश्वस्त किया है। निश्चय ही, चीनी के बाद विश्व में सबसे अधिक बोले जाने वाली हिन्दी भाषा के लिए यह एक अधिकारिता जनोन्मुखता का प्रमाण है। प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप हिन्दी का जो चरित्र उभरकर आता है, वह एक तरह से उत्तर-आधुनिक अवधारणा ‘विखण्डनवाद’ के निकट है। विखण्डनवाद की मूल धारणा शक्ति का ‘विकेन्द्रीकरण’ है। प्रौद्योगिकी ने इस दिशा में हिन्दी समाज की केन्द्रीकृत-सत्ता को विकेन्द्रित कर सार्वजनीन हाथों में सौंप दिया है। वास्तव में ‘हाईपर टैक्स्ट’ अवधारणा, जो कि टेड नेल्सन द्वारा सर्व प्रथम साहित्य व प्रौद्योगिकी के संबंध में रखी गई के अनुसार पाठ को चारों ओर से खोला जाता है। तकनीकी आधारित आधुनिक भाषा-साहित्य स्वरूप को गैर-क्रमिक रीडिंग के
तहत एक नये सामुदायिक सन्दर्भ में ‘व्याख्यायित’ करने का अवसर पाते हैं।’’ ‘ली’ ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि मानवीय संरचनाओं और नेटवर्क सिस्टम की संरचनाओं में कुछ बुनियादी समानताएँ हैं। इनमें से एक है विकेन्द्रीकरण। इन्टरनेट ने अपना सारा विकास विकेन्द्रित व्यवस्था के रूप में किया। वह स्थान का भी विकेन्द्रीकरण करता है।.......... गौर से देखें तो इंटरनेट में नियंत्रण का कोई बिन्दु नहीं है। यहाँ तक कि इंटरनेट न्यूज गुप के पास भी नहीं हैं। यहाँ समुदाय की भावना का महत्त्व है।१ यह तथ्य सोशल मीडिया व हिन्दी साहित्य के समूचे चरित्र से सन्दर्भ में लिया जा सकता है। यूँ देखा जाए तो यह तकनीकी की सीमा भी है। दूसरे सन्दर्भ में यह हिन्दी की जनपक्षीयता के पक्ष में भी है। यह एक अलग विषय है कि इस जनपक्षीयता का मूल स्वरूप कितना वास्तविक है और कितना आभासी, पर यह निर्विवाद है कि हिन्दी की प्रयोगमूलकता को तकनीकी ने बढाया है। जहाँ आज से लगभग एक दशक पहले की-बोर्ड लेआउट और सॉफ्टवेयर की समस्या थी। कई बार विश्व हिन्दी सम्मेलन में पावर-पॉईन्ट प्रेजेन्टेशन की समस्या फॉन्ट को सी.डी. में डालकर ले जा सकने की भूल की वजह से आयी, उसे यूनकोर्ड हिन्दी के आने से निजात मिली। कृतिदेव के अलावा अब देवनागरी को मंगल, रघु, संस्कृत २००३, अक्षर एरियल, कोकिला, अपराजिता, गार्गी, कालीमती, सम्यक देवनागरी आदि किसी में भी टाईप किया जा सकता है। जिन्हें हिन्दी टाईपिंग में समस्या आती है वे इन्डिक इनपुट-१, इन्डिक इनपुट-२ जैसे लिप्यन्तरण के द्वारा रोमन तरीके से टाईप करके भी हिन्दी लिख सकते हैं। लिप्यन्तरण सॉफ्टवेयर सिर्फ अंगे*जी से हिन्दी में ही नहीं किसी भी भारतीय भाषा के कर सकने की सुविधा कम्प्यूटर पर उपलब्ध कराता है, यहाँ तक कि वर्तनी शुद्धिकरण हेतु महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा ‘सक्षम’ जैसा सॉफ्टवेयर अक्टूबर २०१३ में जारी किया गया है। जिसके द्वारा ६९००० हिन्दी शब्दों को
वर्तनी जाँचकर ठीक किया जा सकता है। जगदीप सिंह दांगी द्वारा निर्मित यूनीकोड आधारित मानक हिन्दी के लिए यह पहला स्पेलिंग चैक सॉफ्टवेयर है। यह माइक्रोसॉफ्ट वर्ड के साथ भी काम कर सकता है। इससे पहले माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस ने भी यह विकल्प दिया किन्तु वह मंहगा है, इस दृष्टि से ‘सक्षम’ कम्प्यूटर शुद्ध हिन्दी लेखन में काफी सहायक सिद्ध हो सकता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न भारतीय भाषाओं के वर्तनी शोधक शब्दकोश कम्प्यूटर पर उपलब्ध हैं।
डेस्कटॉप पब्लिशिंग सॉफ्टवेयर की दृष्टि से माईक्रोसॉफ्ट पब्लिशर ने हिन्दी की प्रयोगमूलकता को बढाया है। हिन्दी वेबसाईट्स साहित्य कला, समाचार राजनीति, मनोरंजन, शिक्षा, समाज, नीजि पृष्ठ, वेब पॉर्टल, ज्योतिष, धर्मसम्बन्धी, हिन्दी पत्रिका आदि कई वर्गों में देखी जा सकती है। निरन्तर हिन्दी भाषियों के ज्ञान वर्द्धन की दृष्टि से ही नहीं, वरन् सामुदायिक व सांस्कृतिक-स्मृति के रक्षण की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘भारतकोष’ जैसे ज्ञानवर्द्धक पोर्टल बनाने के उद्यम इस तरफ किए गए है। कहा जा सकता है प्रयोगूलकता की दृष्टि से तकनीकी ने हिन्दी भाषा को विस्तार दिया है। हिन्दी भाषा व साहित्य का चरित्र इससे संवर्द्धित हुआ है। यह अलग विषय है कि स्मृति का यह संरक्षण कितना रेखीय है,
कितना क्षैतिजीय?
जहाँ तक यह सवाल भाषा के प्रयोग का है, व्यवहार का है, प्रौद्योगिकी की भूमिका ने इसके दायरे को बढाने के साथ एक विपुल सांस्कृतिक व सामुदायिक संवेदन के संरक्षण का भी प्रत्यन किया है। यह चीनी के बाद बोली जाने वाली विश्व की सबसे बडी भाषा के हित में है कि हिन्दी अब जन व्यवहार की कम्प्यूटर कार्य शैली के माध्यम के रूप में विकसित हो रही है। किन्तु यदि हिन्दी साहित्य का प्रश्न है तो यह विचारणीय बिन्दु है कि हिन्दी की तकनीक प्रयोगमूलक सुविधा व सोशल मीडिया की सुलभता के माध्यम से जो साहित्यिक परिदृश्य उभरकर
आता है, उसकी मूल संरचना ने हिन्दी की परम्परागत व जातीय प्रवृति, अस्मिता को किस तरह प्रभावित किया है? सोशल मीडिया के माध्यम से आज किसी भी रचनाकार को व्यक्तिगत स्पेल हासिल है। वह रचनाकार, प्रकाशक व सम्पादक तीनों की भूमिकाओं में है। सत्ताधीशों को अपदस्थ करने की दृष्टि से यह जनतान्त्रिक भी है किन्तु साहित्य के मानकीकरण की दृष्टि से सोशल-मीडिया ने कहीं हिन्दी साहित्य को नुकसान पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर जो आलोचना का स्वरूप उभरकर सामने आता है, उसके अधिकतर अवास्तविक, चारण-ढाढी प्रथात्मक तथा रूढबद्धमूलक होने के खतरे होते हैं। आलोचना के लिए जिस निरपेक्षता, तटस्थता और नीर-क्षीर विवेकशीलता की आवश्यकता होती है, अक्सर वह सोशल-मीडिया पर नदारद मिलती है। साहित्य की मूल सत्ता के लिए स्वस्थ आलोचनात्मक दृष्टि की आवश्यकता है। आलोचना ही ग्राह्य-अग्राह्य का विभेद करती है। सोशल मीडिया पर इसका स्वरूप टिप्पणिय, विश्लेषण, प्रश्न-प्रतिप्रश्न, उत्तर-प्रतिउत्तर आदि के माध्यम से ‘पाठ’ के अन्य स्तर भी खुलते हैं। इस दृष्टिकोण से सोशल मीडिया आलोचनात्मक मापदण्डों के निर्माण में सशक्त भूमिका निभा सकता है, किन्तु ऐसा बहुत ही कम देखने में आता है। अधिकांशतः सोशल मीडिया की आलोचनात्मक-दृष्टि के ‘विरूदावलीपरक’ होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। यहाँ साहित्य व असाहित्य का कोई मानक नहीं है, फलतः साहित्य के नाम पर मनमर्जी पूर्ण अभिव्यक्तियों, आत्मालाप, मनेाकुंठओं, आत्ममुग्धताओं का राग भी देखने को मिलता है। पाठक के समक्ष चुनाव का प्रश्न है। जब पाठक कोई पुस्तक खरीदने जाता है तो अपने ‘चुनाव’ के अधिकार को काम में लेता है, किन्तु सोशल मीडिया पर पाठक के ‘चुनाव’ के अधिकार पर प्रशन चिन्ह लग जाता है। अक्सर उसके आगे ऐसा साहित्य भी आता है जिसे पढना वह पसंद नहीं करता है और जो ‘साहित्य’ के मानक मापदण्डों के अनुकुल भी न हों।
यह एक विरोधाभास है कि तकनीक स्वयं में लोक असम्पृक्त होती है। फलतः अनुभवों के तकनीक आधारित आदान प्रदान के फलस्वरूप निर्मित हिन्दी की सामुदायिक अनुभवशीलता को रच रही वह कितनी लोक व यथार्थ सम्पृक्त है? कागज, पुस्तक व कलम के दौर में यह अनुभव बहुत कुछ पाठक व लेखक की निजी व जीवन के प्रत्यक्ष दर्शन से निकल कर आता है, किन्तु सोशल मीडिया पर संपे*षित भावनाएँ विरोध, संवेदना, क्रोध, स्वीकार-अस्वीकार आदि का रूप बहुत कुछ आभासी व लोक-विच्छिन्न है। यह बात इस तरह समझी जा सकती है जैसे सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति, साहित्यकार, रचनाकार आदि की मृत्यु पर संवेदनाओं का तकनीक आधारित आदान-प्रदान होता है। किसी मित्र-शुभचिंतक आदि के सुख-दुःख पर प्रतिक्रियाओं का स्वरूप तकनीकी रहता है। क्या यह संवेदनात्मक परिदृश्य वास्तविक जीवन से असम्पृक्त नहीं? मनुष्य एक तरफ से संवेदनाओं के तकनीकी स्वरूप को ही जीने लगता है। निःसंदेह यह सिर्फ हिन्दी साहित्य की नहीं पूरे युग की विभीषिका है। तकनीक की अपनी सीमा है। मनुष्य ने तकनीक को जन्मा ह्रै, तकनीक यदि मनुष्य का स्थानापन्न करे तो इससे भयावह क्या? साहित्य में यह विडम्बना हमारे आनुभाविक संवेदन के निर्माण की दृष्टि से किस तरह कार्य करती है, यह प्रश्न उभरता है।
रचना-प्रकाशन की प्रमाणिकता का सवाल भी सोशल मीडिया की अपनी सीमा है। फेसबुक आधारित रचनाओं का कॉपीराईट नहीं होता। उदाहरणतः पिछले दिनों ‘हंस’ के नवम्बर अंक में प्रकाशित एक कहानी की प्रामाणिकता पर लगे प्रशन फेसबुक रचनाओं की चोरी आदि को उजागर करते हैं। यहाँ एक शुद्धतावादी वर्ग हिन्दी का ऐसा भी है जो सोशल मीडिया के फेसबुक, व्हाट्सअप ग्रुप, ब्लॉग आदि पर कार्यरत रचनाओं को उच्च कोटि का नहीं मानता। हालाँकि इस सन्दर्भ में २०१५ में बोधि-प्रकाशन ने फेसबुक रचनाओं की चुनी हुई रचनाओं
का सम्पादन ‘शतदल’ में किया, जो कि यह प्रमाणित करता है कि सोशल मीडिया पर इधर गम्भीर रचनात्मक सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु फिर भी बहुत-सा हिस्सा ऐसा है सोशल मीडिया का, जिसका ग्राह्यता-अग्राह्यता का कोई मापदण्ड तय किया जाना न केवल रचनात्मक दृष्टि से वरन् साहित्य की परम्परागत, जातीय-स्वभाव की रक्षा के लिए भी आवश्यक है। प्रियदर्शन ने इस वायवीय व साहित्यिक परिदृश्य की चिन्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है- ‘‘यानि हो सकता है, साहित्य के मूल रेशे वहीं रहे, लेकिन उसका आकार प्रकार रंग बदले, जो कि स्वाभाविक है, लेकिन इस स्वाभाविकता में इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि हमारे पारम्परिक सामाजिक जीवन अभ्यासों और मूल्यबोध तथा उदारीकरण, बाजार और तकनीक के साझा मोर्चा से बन रही मजबूरियों के बीच टकराव है, उसमें स्मार्टफोन के साये में उभरता साहित्य किस तरफ खडा होगा वंचितों की तरफ या विकासवादियों की तरफ? या वह दोनों तरफ की विडम्बनाओं को लक्ष्य कर सकने में कामयाब होगा?’’२
दूसरा सवाल जो उभर कर आता है, सोशल मीडिया, जो प्रौद्योगिकी का एक हिस्सा है, ने जातीय-संस्कृतीय बोध को किस तरह प्रभावित किया? सोशल मीडिया ने एक समानान्तर शब्द-कोश विकसित किया है जिसके प्रभाव को नाम चॉमस्की ने बहुत पहले स्वीकार कर लिया था। भाषा व विधा का क्षरण, कल्पना-शक्ति का ह्नास इस दृष्टि से प्रमुख विवेच्य बिन्दु है। यह सही है कि विश्व में निरंतर भाषाओं का बचे रहना भाषा की प्रयोजनमूलकता तय करेगी। एक ऐसे भाषात्मक संकट के समय सोशल मीडिया जिस बाजारीकृत, असाहित्यिक, अमानकीकृत, अनुवादपरक भाषा-स्वरूपों को सामुदायिक चेतनाओं पर थोप रहा है, वह चिन्तनीय है। सोशल मीडिया पर गैर-साहित्यिक वर्ग प्रायःभाषा के इसी स्वरूप को व्यवहार में लाता है। संवेदनाओं की सरलीकृत अभिव्यक्ति
के लिए वहाँ प्रतीक चिन्हों को काम में लिया गया है, क्या यह भाषा को पीछे ले जाना नहीं है?
ध्यान से देखा जाए तो हिन्दी का व्यवहृत रूप विकसित अवश्य हुआ है, किन्तु वह एक सांस्कृतिक जातीय-स्मृति आनुभविक संवेदना की विकासमान परम्परा के तहत् नहीं, वरन् बाजार एवं भूमण्डलीकरण के एक आवश्यक ‘माध्यम’ के रूप में। विश्व में चीनी के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा पर नियन्त्रण के अभाव में बाजार के आगे अवरोध थे, फलतः उसने हिन्दी के सरलकृत रूप गढ लिये। यह आश्चर्यजनक है कि जहाँ हिन्दी भाषा में अंगेजी आदि विदेशी भाषा-शब्दों के प्रयोग को ऐतिहासिक बदलाव के तहत देखा जा रहा है, वहीं संस्कृत आदि प्राच्य भाषा-स्वरूपों के प्रयोग को उस सहाजता से नहीं लिया जाता। हिंग्लिश, रोमन लिपि में हिन्दी लिखने के प्रयत्न हिन्दी के व्यवहृत रूप को प्रसार अवश्य देते हैं, किन्तु उसकी भाषिक चेतना पर कहीं आघात करके। इस तरह के प्रयोग करके किसी भी भाषा की प्रयोगमूलकता को बनाये रखा जा सकता है, किन्तु मूल संरचना को लेकर सन्देह है और किसी राष्ट्र की भाषिक चेतना पर प्रश्न सांस्कृतिक-जातीय बोध के रक्षण से जुड जाता है।
वास्तव में ऐसा इसलिए होता है कि हमने तकनीक को साध्य समझ लिया है, जबकि वह सिर्फ साधन है। ‘तकनीकी कौशल’ में हमारी उपलब्धियों व मानकों को हमें अन्तश्चेतना में सामुदायिक स्मृति में सामुदायिक अनुभवों से सम्बद्ध करके आकलित करना चाहिए। प्रौद्योगिकी तो साधन है, साध्य तो मानवीय अस्मिता का संरक्षण व विकास है। ‘नया ज्ञानोदय’ में बालेन्दु दाधीच ने बहुत विस्तार से हिन्दी के कम्प्यूटर प्रयोग में मानकीकरण के प्रश्न को उठाया है। उन्होंने अपने लेख में लिखा है कि जिस तरह अंगेजी में टाईप करने का सिर्फ एक की-बोर्ड है QWERTY अंगेजी का कोई भी फॉन्ट हो, कम्प्यूटर पर टाईप करने का उसका एक ही तरीका उपलब्ध है। आखिर हमारे तकनीकविदों को इतना कष्ट उठाने की क्या
जरूरत थी? किसी एक विज्ञान-सम्मत पद्धति को विकसित करके और उसी को प्रोत्साहित करके, लोकप्रिय बनाते तो काफी नहीं था? इतने तरीकों से तो दुनिया की दूसरी दर्जनों भाषाओं का भला हो जाता। लेकिन कारोबार का तकाजा था। हमने एक मानक मांगा तो उन्होंने ५० पेश कर दिए। बताइए अब आपको क्या शिकायत है?
मानकीकरण आ जाता तो सॉफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियों को नुकसान होता। उन्हें प्रतिद्वन्द्विता का सामना करना पडता। ग्राहक कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। वे एक ही तरीके से सीखते और काम करते। उत्पादकता बढती, लेकिन निर्भरता घट जाती। जिन्होंने तकनीकों और उत्पादों का विकास किया, वे भला क्यों चाहेंगे कि उन पर उपभोक्ता की निर्भरता घट जाए?३ अपने लेख में उन्होंने यूनीकोड हिन्दी का हिन्दी के मानकीकरण की दृष्टि से स्वागत किया है, किन्तु इन्स्क्रिप्ट के माध्यम से तकनीकी युक्तियों पर टैक्स्ट इनपुट करने को हिन्दी की भाषिक-संरचना के लिए अधिक उपयुक्त व वैज्ञानिक माना है, बजाय लिप्यन्तरण जैसे तात्कालिक सुविधापरक सॉफ्टवेयर के। उनका तर्क है कि टेक्स्ट इनपुट के लिए यदि की-बोर्ड के साथ माऊस व अतिरिक्त सॉफ्टवेयर काम में लेना पडे तो विज्ञान-सम्मत नहीं। किन्तु भूमण्डलीकृत, वर्चस्ववादी ताकतों ने जब पाया कि हम इस अपनी भाषा की विशिष्ट तकनीकों को सीखने के बजाय सरलीकृत मार्ग चाहते हैं तो लिप्यन्तरण की विभिन्न पद्धतियाँ सामने आयीं। क्या यह हिन्दी की मूल प्रकृति के पक्ष में हैं? तकनीक मनुष्य की सुविधा के लिए है, निर्भरता के लिए नहीं। दूसरे, इन विभिन्न पद्वतियों में मानकीकरण का अभाव है। ये भाषा- वैज्ञानिक दृष्टि से भी अताक्रिक बालेन्दुजी ने इस लेख में इनस्क्रिप्ट के अभ्यास के लिए स्वयं द्वारा विकसित किया गया एक निःशुल्क टाईपिंग ट्यूटर ‘स्पर्श’ का लिंक भी दिया है, http://www.balendu.com/labs/sparsh निश्चय ही कम्प्यूटर
पर हिन्दी की भाषिक व मानकीकृत आदर्शात्मक स्थिति के लिए यह एक सशक्त सकारात्मक प्रयास है।
हिन्दी की भाषिक- सामर्थ्य के विकास व उर्वरता के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान भी (सन् १९९० के बाद से ही) निरन्तर प्रयत्नरत रहा है’’। संस्थान ने सन् २००० में हिन्दी विश्वकोश की समस्त सामग्री को ६ खण्डों में तैयार करके उसे इन्टरनेट पर डालने की योजना बनाई तथा इसके जीरो वर्जन का विमोचन इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने किया। सन् १९९१ में भारत सरकार के तत्कालीन सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भारतीय भाषाओं में प्रौद्योगिकी विकास सम्बन्धी योजना के अन्तर्गत ‘हिन्दी कॉर्पोरा परियोजना’ का काम आरम्भ हुआ। इस परियोजना के अन्तर्गत विविध विषयों के तीन करोड से अधिक शब्दों का संग्रह कर लिया गया था। इसकी टैगिंग के नियमों का निर्धारण सन् २००० तक हो गया था। समस्त शब्दों की टैगिंग होने से कम्प्यूटर पर हिन्दी में और अधिक सुविधाएँ सुलभ हो जाएगीं।४ टैगिंग शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए महावीर सरन जैन लिखते है, ‘‘टैगिंग से मतलब शब्द के मात्र अधिकृत समझे जाने वाले वाग भाग (पार्ट ऑफ स्पीच) के निर्धारण से ही नहीं है अपितु भाषा में उनके समस्त प्रयोगों एवं सन्दर्भित अर्थों के आधार पर उसके समस्त वाग भागों (संज्ञा, क्रिया, विशेषण, पूर्वसर्ग, क्रियाविशेषण, अव्यय, संयोजन, विस्मयबोधक) तथा समस्त व्याकरणिक कोटियों, (वचन, लिंग, पुरुष, कारक आदि) को स्पष्ट करना है, उसके सहप्रयोगों को स्पष्ट करना है। यदि उसके प्रयोग में संदिग्धार्थकता की सम्भावनाएँ हैं तो उन्हें भी बताना है।.... टैगिंग में विवेच्य भाषा शब्द के सन्दर्भित अर्थ प्रयोगों का आवृतिपरक अथवा सांख्यिकीय तकनीक से अध्ययन किया जाता है।’’५ टैगिंग कम्प्यूटरीकृत भाषा-विशलेषण के लिए सटीक तकनीक है, जो शब्द के वागभाग ही नहीं वरन् अर्थकोष के तहत् वाक्य विन्यास व अन्य सैद्धान्तिक प्रयोगों को स्पष्ट करती है।
राजभाषा विभाग द्वारा जारी ‘मंत्र’ साफ्टवेयर ने पाठ से वाक (टेक्स्ट टू स्पीच) तथा वाक से पाठ (स्पीच टू पाठ) के माध्यम से अनुवाद की सुविधा सर्वजन को उपलब्ध कराने का प्रयत्न किया है, यह साफ्टवेयर अंग्रेजी से हिन्दी में भी अनुवाद करता है, ऐसे में ‘टैगिंग’ जैसी तकनीक से अनुवाद को और ज्यादा सटीक, प्रभावी बनाने में सहायता भी ली जा सकती है। यहाँ तक की राजभाषा विभाग के लिए प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ स्तर की परीक्षाओं की प्रशिक्षण-सामग्री भी इन्टरनेट पर सी-डैक द्वारा उपलब्ध करायी गयी है। वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग भी निरन्तर हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली के मानकीकरण, निर्माण आदि के लिए क्रियाशील रहता है।
हिन्दी भाषा की प्रयोजनमूलकता को लेकर यह कहा जा सकता है कि तकनीकी दृष्टि से यह निरन्तर विकासशील तथा प्रयोगधर्मी है। आवश्यकता सरलीकृत मानदण्डों की बजाय भाषा को मूल परम्परागम नैरन्तर्य के भीतर तकनीक-सम्मत ढंग से पकडने की है ताकि सामुदायिक व जातीय सन्दर्भों के रक्षण दायित्व के साथ हिन्दी नवउदारवादी चुनौतियों का सामना कर सके। अपनी तमाम वैकल्पिक सुविधाओं के बावजूद भी ‘तकनीक’ मनुष्य-चिंतन की विकासधारा में एक ‘उपादान’ ही है, मूल्य लक्ष्य नहीं। यह तथ्य भली भाँति समझकर ही हमें हिन्दी के भाषिक तकनीकी प्रयोगों के प्रति अपनी व्यवहार-शैली तय करनी होगी। ताकि साहित्य व साहित्यकार दोनों ही धरातलों पर हिन्दी की जनपक्षीय, लोकतान्त्रिक छवि के मूल सौन्दर्य को प्रौद्योगिकी-सम्मत बनाए रखा
जा सके।
संदर्भ
१ वागर्थ, जून २००५, पृ. ५०, हाइपर टेक्स्ट यानी कम्प्यूटर भाषा की परम्परा, जगदीश्वर चतुर्वेदी।
२. नया ज्ञानोदय, फरवरी २०१६, पृ. १००, स्मार्टफोन पर साहित्य का पाठ, प्रियदर्शन।
३. नया ज्ञानोदय, सितम्बर २०१५, पृ.५३, सुविधा के फेर में मानकीकरण की बली, बालेन्दु दाधीच।
४. साहित्य अमृत, सितम्बर २०१५, पृ.३७, भाषिक प्रौद्योगिकी एवं हिन्दीः दशा और दिशा,महावीर सरन जैन।
५. वही।
व्याख्याता : हिन्दी
राज. आदर्श उच्च मा. विद्यालय, हर्ष, सीकर (राज.)
पाँच मुखी मन्दिर के पास, रेल्वे स्टेशन, सुजानगढ, जि. चूरू-३३१५०७