दो उडिया कविताएं

यज्ञदत्त सामन्तराय


दफ्तर की नौकरी
गुलाम शहर में
बहुत सारे दफ्तर
फाईल की खेती में
सब हैं तत्पर
खेती देर होते ही
बढ जाता है रोजगार।
दफ्तर के अंदर
बाजारी कारोबार
मोल तोल होता है
लेन देने के बाद
सभी सेवा मिल जाती है
तेजी से।
वे गुस्सा करेंगे तो
खत की देरी होती है
फाईल गुम हो जाती है
धन की हानि होती है
लालफीता के अंदर
सब काम अटक जाता है।
वे चलाते हैं
राज्य प्रशासन
तनखाह लेते हैं
रिश्वत भी मिलती है
किसी को नहीं है
उनकी परवाह।
सबसे अच्छी है
दफ्तर की नौकरी
रिस्क नहीं है
रिश्वत ज्यादा
किस्मत में अगर हो
गुलाम के शहर में
मिलती है ऐसी नौकरी। ?
तुम्हारे लिए
ऐसा बहुत कुछ है
कितना भी ऐसा है
लिखा जाता है, फाड दिया जाता है
फाडा जाता है और लिखा भी
कागज के वदन पे
कलम की नोक से
कोरा कागज की
उस दर्द और सुरीले सपने में।
लेकिन,
ऐसा वैसा लिखना
वैसा ऐसा लिखना
अब था, अब नहीं लिखना
लिखते लिखते
सब कुछ लिख देना
नई बात नहीं है।
मैं किसी का नहीं,
लिखता नहीं किसी और के लिए
लिखने के लिए कोशिश करता हूँ
तुम्हारे लिए,
सिर्फ तुम्हारे लिए
मेरे दिल की किताब और
मेरी आँसुओं की स्याही से
तुम्हारे दीदार के लिए
तुम्हारे दीदार के लिए। ?
सामन्तराय भवन, कवि सूर्यनगर
गंजाम, ओडिशा-७६११०४
मो. ०९०४०३११३३७