तीन असमिया कविताएँ

मीरा ठाकुर


बैशाखी
मैं तुम लोगों को देने के लिए आया हूँ
मुझे गढ लो
कल्पवृक्ष
मैं
धूप में बरसात में उगता हूँ
अनन्त गति के वेग वाली एक सागर मुखी नदी बन जाता हूँ
कच्ची-पक्की नालियों से बह कर आती हुई गंदगी को
धारण कर नीलकण्ठ बन जाता हूँ।
जाजरी नदी की टूटी-फू टी छातियाँ हौले से
उठा लेता हूँ अपनी गोद में
मैं
मरुभूमि की हड्डियों में भी चारों तरफ फै ल जात हूँ
नदी के किनारे रहने वाली देहों में भी जंग लगा देता हूँ
हरे-हरे
आत्महत्या के लिए तैयार एक नदी को
जीवन माधुर्य से
पुष्पित कर देता हूँ अनेक बार
गुम नहीं होने के लिए ही मैं
बार-बार जन्म लेता हूँ
दधीचि होकर
धूप की गर्मी से हड्डियों से विकसित होती है कृपाण
वज्र के साथ युद्ध करने हेतु
तूफान को रोकने की कोशिश करते हैं वे लोग
वे लोग तो खुद ही तूफान हैं।
देह के बीच से बह कर
जीवन होते हैं
शिला होते हैं
लिपि होते हैं
बैशाख की।
बैसाख की अग्रिम खबर
हमेशा की तरह ही वे आये थे
कविता की पंक्तियां पर्दे पर चिपकी हुई थी।
बैठक घर की गोल मेज पर गुलाब की टहनियाँ
साँझ से लिपटी हुई थी।
एक-एक कर कलियाँ बिखर रही थीं।
चारों ओर का कोलाहल सुनकर
आह! वेदना का यह कैसा मोहनीय रूप है
उनकी आँखों में तैरते हुये नौका के पाल में
अंधेरा फैल रहा था जोर से।
हिये में एकत्रित भूख की ज्वालाओं ने
देह में जैसे तूफान मचा दिया था
आँखों के सागर में पानी की धारा बह रही थी
अनागत दिनों की आशा में लिपि ने
दाग बैठा दिये थे
मन के किसी अज्ञात कोने में फिर भी
संत्रास को ममता का मंत्र पाठ कराने वाले
शपथ नामा को उन्होंने दोनों हाथों से
मुझे सौंप दिया था आशा भरी नजरों से।
मेज के एक कोने में सभी कहने लायक बातों को
एकत्रित कर वे खडे हो गये थे, और
कहने लायक सभी शब्द उनके बीच में खडे
हो गये थे।
शब्दों ने सहस्र बाहुओं से अपने को ऊपर उठा लिया था।
धुएँ की एक कुण्डली ने आकाश छूने की वृथा
कोशिश करते हुए
तीन-तीन अगरबत्तियाँ जल रही थी
प्रार्थना गृह की फर्श पर जली हुई बत्ती की गंध ने
निःसंग समय को जकड रखा था
क्षोभ के कच्चे दाग आकाश को प्रहार कर रहे थे और
एक संकल्प के रंगीन तोरण में एकत्रित हो गये थे सभी।
मुष्टिबद्ध हाथ की अँगुलियों के बीच से
रोशनी छन-छन कर निकल रही थी पंख लगे
हुए बाण की तरह।
मुठ्ठी के निश्छिद्र सुरंग में नष्ट हो गया था
एक अंधकाराछन्न पक्षी
सभी लोगों ने सिर उठा कर देखा। दृष्टि के
अंतिम प्रांत में आकाश चूम रहा था हरे रंग के मैदान को।
नदी ने अपने गालों पर रंग लगाया था लाल-लाल
रूपाली चादर ओढ कर चंचल लहरे डूब गई थी
तीव्र बहाव के कोने में।
एक हरियाले गीत की पंक्ति मेरे हृदय के
भीतर-बाहर गुनगुना रही थी, बैसाख की अग्रिम खबर होकर।
कठोर उत्सव का गीत
किसने
कब
कहाँ पर
उकेरा है मुझे
किसने सजायी है पत्थर की प्रतिमा
समय, मुझे तुम मत पूछना
यम पिशाच की कोलाहलमय ध्वनि के स्पर्श से
रक्तिम शरीर गल-गल कर मकडे की तरह
हो गया है।
एक धुँधले से चक्रव्यूह में मैं आजीवन बन्दी हूँ
दुःखों का सरोवर आँखों के आँसुओं से
उफन रहा है जैसे तारों भरी रात्रि का आकाश।
खिले हुये होठों पर भी नहीं खिली रोशनी की कली
मिट्टी का एक टुकडा पकडे हुए
खून की कुछ बूँदें पकडे हुए
इस पकडा पकडी के चक्कर ने उडा दी है शस्य से भरपूर
खेत की धूप।
निष्ठुर दिवस के पत्तल में अंकन कर दिया है तुमने
मेरा परिचय
लोपामुद्रा
विषकन्या अथवा
वसुन्धरा
चतुर अँगुलियों से मन के कोने में रख दी है
भरे हुए पत्तों की करुण ध्वनि
पत्ते गिर-गिर कर जब समाप्त हो गए
तब तुमने सजा लिया उनको अपने सुन्दर कक्ष में
मेरी छाती में रख दिया गया है
एक पत्थर का टुकडा।
और फैंक दिया उसे ‘सती दाह’ की ज्वलन्त
चिता में।
आग से झुलसा हुआ मेरा काला शरीर
देखो देखो सनातन
चाँदी का शरीर
ताम्बे का शरीर
लोहे का शरीर
तुमने लूट ली है
मेरी खिलने की स्वाधीनता
और गँवा दिया है सर्वस्व।
मैं किस की कन्या हूँ
माता किसकी हूँ
किसकी तृष्णा हूँ
केशों में आग लगा के कौन मुझको
साथ में लेके घूमता है
तीनों काल
तीनों लोक
समय, तुम मुझको मत पूछना
मैं रोमन्थन नहीं कर सकती
ऐसा कठोर उत्सव का गीत।
के.सी. जैन एण्ड सन्स, कॉमर्स हाऊस, ए.टी. रोड
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