मोक्ष (राजस्थानी कहानी)

मदन सैनी


जीवन में व्यक्ति की क्या-क्या कामनाएँ नहीं होती। उसे रोटी, कपडा और मकान ही नहीं, मरणोपरांत मोक्ष हेतु भी तरह-तरह के यत्न करने होते हैं। जीवन के चारों पुरुषार्थों में से धर्म, अर्थ और काम तो व्यक्ति के हाथ में होते हैं पर मोक्ष पा लेना उसके हाथ में नहीं होता। इसे पाने के लिए पहले वाले तीनों पुरुषार्थों का पालन भली-भाँति करना होता है।
रामकृपाल इन्हीं पुरुषार्थों का पालन करते हुए अपने जीवन की गाडी हाँके जा रहा था। उसके जीवन में किसी बात की कमी नहीं थी। हाँ एक बडा अभाव जरूर था। उसके विवाह को कई वर्ष बीत गए थे, पर उसकी पत्नी के कोई बच्चा नहीं हुआ था। फिर भी दोनों पति-पत्नी बडे पे*म से हँसी-खुशी जीवनयापन कर रहे थे। वे पडौसियों के सुख-दुःख में भी बढ-चढ कर भाग लेते थे। उन्हें संतान का होना न होना इतना नहीं अखरता था, जितना कि लोगों के बोल अथवा उनकी नजरें।
एक दिन तो गजब ही हो गया। आषाढ में पहली वर्षा हुई थी। भिनसारे ही लोग खेतों में हल जोतने के लिए जाने शुरू हो गए थे। रामकृपाल आज कुछ जल्दी ही दिशा-मैदान जाकर लौट रहा था। सामने से आ रहा हरखा उसे देख उलटे पाँवों लौट पडा।
‘‘अरर.... अपशकुन हो गया।’’ हरखा आहिस्ते-से बडबडाया।
‘‘अरे, हरखा भाई! मुड क्यों गए? जाओ, खेत जोतो, मेरे मिल जाने से कुछ नहीं होगा। आप अपना काम करो। रामकृपाल ने कहा।
‘‘यह तो मैं भी जानता हूँ कि आफ मिल जाने से कुछ भी नहीं होगा। तभी तो वापस मुडा हूँ। बेकार मेहनत करने में क्या सार है?’’ कह कर हरखा अपने घर की ओर लौट पडा।
हरखा के बोल नावक के तीर की तरह लगे रामकृपाल को, पर वह क्या करता? चुपचाप घर आ गया। उसने दुःखी मन से सारी बातें धर्मपत्नी को कह सुनाई। दोनों दुःखी हो उठे। वे करते भी क्या? आखिर उन्होंने सयाने लोगों से सलाह ली। लोगों के कहे अनुसार तीर्थ-व्रत किए, सप्ताह बँचवाई और लोकदेवता भैरुजी की गठजोडे से ‘जात’ भी बोली।
लोगों का कहना था कि व्यक्ति को मोक्ष तभी मिलता है, जब दाह-संस्कार के वक्त उसका पुत्र उसे मुखागि* दे और कपाल-क्रिया भी वही करे।
रामकृपाल और उसकी पत्नी प्रभु से प्रार्थना करते कि भले ही उनके पुत्र न हो, पुत्री ही हो जाए और वह भी भगवान चाहे तो जन्म होते ही उठा ले। उन्ह कोई दुःख नहीं होगा, उलटे अपने आपको सौभाग्यशाली ही समझेंगे। क्योंकि फिर ‘निपूते’ कह कर लोग ताने तो नहीं देंगे और देखकर मुँह तो नहीं फेरेगें। उन्हें यह सोचकर दुःख होता होगा कि लोगों के दुःख-दर्द में बराबर हिस्सा बाँटते रहने पर भी लोगों की उनके प्रति भावनाएँ क्यों नहीं बदलती।
रामकृपाल की धर्मपत्नी उससे कई बार सवाल करती कि औरत होकर माता बनना ही जब उसके भाग्य में नहीं लिखा था, तो भगवान ने उसे धरती पर भेजा ही क्यों? वह कहती कि मैं कैसे जान पाऊँगी कि कोई औरत माँ कैसे बनती है और जब बच्चे को जन्म देती है, तब उसे कैसा लगता है? सुनकर रामकृपाल मौन रह जाता है। उसके कानों में लोगों के बोल गूँजने लगते... ‘‘व्यक्ति को मोक्ष तभी मिलता है, जब दाह-संस्कार के वक्त पुत्र उसे मुखागि* दे और कपाल-क्रिया भी वही करे।’’ वह सोच में डूब जाता.... बिना पुत्र कौन तो उन्हें मुखगि* देगा, कौन कपाल-क्रिया करेगा और कैसे मोक्ष मिलेगा?
विधि का विधान कौन जानता है। रामकृपाल के भाग्य में भी संतान-सुख लिखा था। उसकी धर्मपत्नी के ‘आस’ ठहरी। पति-पत्नी दोनों बहुत खुश हुए। तय किया कि भगवान से भीख माँगने पर ही उन्हें पुत्र या पुत्री के सुख का सुयोग मिलने वाला है। अतः यदि पुत्र हुआ तो उसका नाम भीखा या मंगता रखेगें और यदि पुत्री हुई तो उसका नाम भीखी या मंगती रख देंगे।
रामकृपाल पर रामकृपा हुई। उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया। पुत्र का नाम रखा गया मंगत! मंगत का पालन-पोषण बहुत ही लाड-प्यार से हुआ। बचपन में मंगत को जरा-सा बुखार ही हो जाता, तो माता-पिता
परेशान हो जाते। एक बार उसे निमोनिया हो गया, साँस तेजी से चलने लगा। नाभि से कुछ ऊपर कलेजे के नीचे गड्ढा पडने लगा। माता-पिता घबरा उठे। मंगत को गोद में लिए वे कुम्हारी दादी के घर पहुँचे। दादी ने उन्हें धैर्य बँधाया और मंगत के ‘चपकिया’ लगा दिया। दैवयोग से मंगत पुनः स्वस्थ हो गया। लेकिन इस घटना के बाद रामकृपाल के मन में गहरा डर बैठ गया। वह सोचने लगा कि यदि मंगत के कोई बीमारी हो जाती, तो क्या होता? गाँव में कोई योग्य वैद्य तक नहीं है। डॉक्टर का तो स्वप* देखना ही व्यर्थ है। भगवान ने चाहा तो गाँव के इस अभाव को वह अवश्य ही दूर करेगा..... एक-न-एक दिन वह मंगत को डॉक्टर बनाकर रहेगा। ऐसा होने पर गाँव में उसका कितना मान होगा। वह मन-ही-मन सोचता।
रामकृपाल का यह सपना भी साकार होता गया। मंगत स्कूल जाने लगा। गाँव में प्राथमिक शाला थी। उसके बाद पडौस के गाँव में जाकर मंगत ने उच्च माध्यमिक स्तर तक पढाई पूरी की। पढने में उसकी गहरी रुचि थी। विज्ञान में तो वह हमेशा अव्वल ही रहा। देखते ही देखते गाँव की सीमाएँ लाँघकर मंगत शहर के मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया। समय पंख लगाकर उडता रहा। मंगत डॉक्टर बन गया। रामकृपाल ने गाँव भर में मिठाइयाँ बाँटी। गाँव वाले भी बहुत खुश हुए।
पर, रामकृपाल का सपना, सपना ही रह गया। लोग उससे कहते, ‘‘क्या हुआ आफ वायदे का? आप तो कहते थे कि डॉक्टर बनने के बाद मंगत गाँव वालों की सेवा करेगा, पर डॉक्टर बनने के बाद उसने तो गाँव की तरफ मुँह तक नहीं किया।’’
रामकृपाल हँस कर कहता, ‘‘क्या बताऊँ, मैंने मंगत को बहुत समझाया पर वह कहता है कि गाँव के बजाय शहर में रह कर वह अधिक मरीजों की सेवा कर रहा है। यह भी कहता है कि गाँव में उसका मन भी नहीं लगता। अब मैं क्या करूँ? मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि वह जहाँ भी रहे सुखी रहे, बस।’’
वर्ष बीतते रहे। शहर के डॉक्टरों में मंगत ने अच्छी पहचान बना ली थी। एक बात जरूर थी कि उसके गाँव के लोग जब भी शहर में आकर उससे इलाज कराते तो वह उनसे फीस नहीं लेता था। रामकृपाल को इसी बात का संतोष था। उसे इस बात पर गर्व भी था कि उसका स्वप* पूरा नहीं तो आधा ही सही, साकार तो हुआ ही है। आज उसका बेटा एक सुयोग्य डॉक्टर तो है ही।
मंगत यदा-कदा गाँव भी आता था। गाँव के बुजुर्गों का मान भी रखता था। उनके स्वास्थ की जाँच-पडताल भी करता था। गाँव वालों को भी इस बात का गर्व था कि उनके गाँव का एक व्यक्ति शहर में बडा डॉक्टर है।
गाँव की आबादी बढती गई। अब इस गाँव में अस्पताल भी खुल गया था। प्राथमिक शाला क्रमोन्नत होकर माध्यमिक विद्यालय में बदल चुकी थी। गाँव सडक मार्ग से जुड गया था। गाँव से शहर आने-जाने के लिए जीपें-मोटरें सडक पर दौडने लगी थीं। पर मंगत गाँव आने की बजाय महानगरों में जाने की सोच रहा था। उसने अपनी शादी डॉक्टर शकुंतला से कर ली थी। शकुंतला को तो मंगत का गाँव बिल्कुल ही पसंद नहीं आया। शकुंतला की सलाह से ही वह अपना भाग्य महानगर में आजमाना चाह रहा था।
इसी बीच रामकृपाल के हार्ट-अटैक हुआ। वे चल बसे। मंगत अपनी धर्मपत्नी के साथ गाँव पहुँचा। पिता की अर्थी को कंधा दिया, मुखागि* दी, कपाल-क्रिया की और जार-जार रोया। बुजुर्ग लोगों ने उसका सिर सहलाया, पुचकारा और धैर्य रखने को कहा। पिता के मृत्युभोज के अगले ही दिन मंगत ने सवा महीने का घडा भरवाया और उसके बाद छमाही का घडा भरवाकर पत्नी सहित पुनः शहर आ गया। आते समय माँ से खूब आग्रह किया वह भी शहर चले, पर माँ ने साफ मना कर दिया। उसके बेटे बहु को गाँव अच्छा नहीं लगता, तो उसे फिर शहर कैसे अच्छा लगता। बेटे-बहु का मन यहाँ नहीं लगता तो उसका मन वहाँ कैसे लगेगा? पैसों की तो कोई कमी नहीं थी,
मन माने वहीं मौज करो। आखिर वे दोनों चुपचाप शहर चले आए पर शहर में भी वे सुविधाएँ कहाँ थी, जो महानगरों में मुहैया हैं।
मंगत अधिक दिनों तक शहर में नहीं रहा। पत्नी को लेकर मुंबई चला गया। मुंबई में उसका एक सहपाठी डाक्टर था। वहाँ उसका एक मेडिकल चैंबर था। उसी के कहने पर पति-पत्नी दोनों मुंबई पहुँचे और वहाँ जाकर उसके चैंबर में मैंबर बन गए। अब गाँव और शहर के बारे में सोचने तक का समय उनके पास नहीं था। गाँव में माँ के पत्र पहुँचते, पर उनका प्रत्युत्तर देते की फुर्सत
किसे थी।
मुंबई आए दो वर्षों में ही दोनों का मन लग गया। मुंबई में ही शकुंतला ने दो जुडवा बच्चों को जन्म दिया। दोनों में एक लडका था और एक लडकी। नाम रखे गए- रवि और निशा। दोनों बच्चे बहुत ही सुन्दर थे। वे पढने में भी बडे तेज निकले। माता-पिता डॉक्टर थे, तो बेटा-बेटी भी क्यों नहीं डॉक्टर होते। पढने-लिखने की सारी सुविधाएँ थीं। यहाँ की पढाई पूरी करने के बाद वे दोनों अमेरिका जाना चाहते थे। माता-पिता के पास धन का कोई अभाव नहीं था। दोनों को खुशी-खुशी अमेरिका भेज दिया गया।
गाँव से माँ के पत्र अभी आते थे, पर उनका जवाब कौन देता? माँ को पता लग चुका था कि उनके पौत्र-पोत्री हैं। वह एक बार उनका मुँह देख लेना चाहती थी पर माँ की यह चाह, चाह ही बनी रही।
कुछ दिनों बाद गाँव से पाँच लोगों का एक दल मुंबई पहुँचा। इस दल के सदस्य डॉक्टर मंगत के फ्लैट पर भी पहुँचे। वे लोग गाँव की श्मशानभूमि के चारों तरफ चार-दीवारी बनाने के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे। पर डॉक्टर दंपती ने साफ मना कर दिया। उन्होंने लगभग ताना देते हुए कहा कि श्मशानों को क्या कोई चोर ले जाने वाला है, जो आप लोग उनके चारों ओर दीवार बनाना चाहते हैं।
गाँव के लोग कुछ नहीं बोले। वे चुपचाप
लौट गए।
इस घटना के छह महीन बाद मंगत की माँ का देहांत हो गया। गाँव से तार आया था। डॉक्टर को अब जाकर माँ की याद आई। शकुंतला का मन नहीं था फिर भी उसे लोक-लिहाज वश गाँव आना पडा। पर इस बार गाँव में वे दोनों अकेले थे। गाँव वालों से इस बार उन्हें किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिला। दो घर-पडोसियों के अलावा गाँव का कोई व्यक्ति उसकी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ। इतना ही नहीं, गाँव के लोगों ने कह दिया कि श्मशान भूमि की चार-दीवारी बनवाने में डॉक्टर का कोई सहयोग नहीं मिला, इसलिए वह अपनी माँ का दाह-संस्कार गाँव की श्मशानभूमि में नहीं कर सकता।
थक-हारकर पडोसियों के सहयोग से गाँव के दक्षिण में एक साफ-सुथरी जगह पर मंगत ने अपनी माँ का दाह-कर्म किया और अपनी अपात्रता पर बहुत दुःखी हुआ। माँ के दाह-संस्कार स्थल पर उसने पडोसियों की सलाह से एक शिवालय और प्याऊ का निर्माण करवाया और गाँव की चल-अचल जमीन-जायदाद बेचकर एक ट्रस्ट बना दिया। इस ट्रस्ट में उसके पडोसी, वह खुद और उसकी पत्नी ही ट्रस्टी थे। ट्रस्ट का नाम उसने माता-पिता के नाम के साथ सार्वजनिक शब्द जोडकर रख दिया था। ट्रस्ट बना देने से शिवालय में पूजा-पाठ और प्याऊ चलाने की स्थाई व्यवस्था हो गई थी।
इतना सब-कुछ होने के बावजूद लोगों ने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई। कहा कि तुम्हारे भी बेटा-बेटी हैं। खुद के जाए-जन्में ही जब कुपात्र निकल जाएँ, तो दूसरों को कोई क्या दोष दे? क्या माँ-बाप इसीलिए संतान को जन्म देते हैं कि वह उनका जन्म बिगाडे? उस समय मंगत की जबान तालु में चिपक गई थी। उसे विदेश में पढे रहे अपने बच्चों की याद आने लगी। अब गाँव से उनका किंचित भी तनाव न रहा।

वे फिर मुंबई आ गए। मुंबई आते ही उन्हें रवि और निशा के मैरिज-कार्ड मिले। तब तक तो बहन-भाई दोनों अपनी-अपनी पसंद के लडका-लडकी से लव-मैरिज भी कर चुके थे। माता-पिता की रजामंदी के स्थान पर वर-वधू की रजामंदी के युग को डॉक्टर दंपती अच्छे से जानते थे पर उनके संस्कार ऐसे न थे कि इस समाचार से उनके चेहरे खिल उठे।
विवाह के बाद रवि और निशा अपने-अपने जोडीदार के साथ मुंबई आए। माता-पिता का आशीर्वाद लिया और सप्ताह भर रुके भी। उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि हमारे साथ आप लोग भी अमेरीका चलें। हम लोगों ने तो वहीं घर बनाकर रहने का इरादा कर लिया है। बेटे-बेटी की मनुहार पर मंगत और शकुंतला अमेरीका गए भी, पर वहाँ उनका मन नहीं लगा और वे पुनः मुंबई आ गए।
दिन बीतते देर नहीं लगती। मंगत और शकुंतला ने काम से सन्यास ले लिया। उनकी उम्र भी ढलने लगी थी। अब वे अपने दसवीं मंजिल पर लिए फ्लैट में ही सिमट कर रह गए थे। शकुंतला के पता नही कैसी पाजी बीमारी लगी कि किसी डॉक्टर की पकड में नहीं आई। मरने से पहले वह अपने बेटा-बेटी से मिलना चाहती थी। मंगत ने फोन भी किया, पर उन्होंने अपनी व्यस्तता का रोना रो दिया और कह दिया कि शीघ्र ही आने की कोशिश कर रहे हैं पर उन्होंने कोई कोशिश नहीं की। उनके आने की बाट देखते-देखते शकुंतला की आँखे पथरा गईं और एक दिन वह चल बसी।
मंगत अपने बच्चों के बारे में सोचता रहा। उसके माता-पिता भी शायद इसी तरह उसके बारे में सोचते रहे होंगे। रवि और निशा ने शीघ्र ही आने की बात कही थी। पता नहीं उनका शीघ्र कब पूरा हो? मुंबई के मिलने-जुलने वाले तो पहले ही किनारा कर चुके थे। मिलने की फुर्सत किसके पास थी? रवि की माँ ने रात दस बजे दम तोडा था। मंगत किंकर्त्तव्यविमूढ हो गया। उसकी चेतना को साँप सूँघ गया और जब होश आया, तो सुबह के सात बज रहे थे।

वह फ्लैट से नीच उतरा। नीचे एक पान वाले की दुकान थी। मंगत ने उससे अपनी आपबीती कही। संयोग से वहाँ एक ईसाई ड्राईवर की गाडी आई हुई थी। वह ड्राईवर मुंबई से बाहर जाने वाला था और पान वाले को जानता भी था। पान वाले ने मंगत की परेशानी समझ ली थी। उसने सलाह दी कि यह गाडी बाहर जा रही है। आप चाहें तो डेड-बॉडी इस गाडी से श्मशान तक भिजवाई जा सकती है। मंगत इसके लिए राजी हो गया। ईसाई ड्राईवर भला आदमी था। उसने पान वाले की बात मान ली। पान वाले और ड्राईवर की मदद से मंगत ने डैड-बॉडी गाडी में रखवाई और फिर ड्राईवर की बगल में बैठ गया। गाडी चल पडी।
मुंबई कि विशाल सडकों पर काफी देर तक गाडी दौडती रही। फिर उस महानगर के बाहर बियाबन जंगल में गाडी रोकते हुए ईसाई ड्राईवर बोला, ‘‘मुझे तो आगे जाना है। आप यहीं उतर जाइए। ठीक सामने वह रहा कब्रिस्तान।’’ कहते हुए उसने हाथ के इशारे से मंगत को कब्रिस्तान दिखलाया।
मंगत की चेतना को एक झटका-सा लगा। वह बोला- ‘‘हम लोग तो हिन्दू हैं। यहाँ कब्रिस्तान पर क्यों ले आए। हमें तो हिन्दुओं के श्मशान घाट पर ले चलो, प्लीज।’’ पर ड्राईवर के पास समय कहाँ था? उसने
मंगत की एक न सुनी और डैड-बॉडी वहीं उतार कर चलता बना।
कब्रिस्तान के चौकीदार ने डैड-बॉडी के साथ मंगत को देखा। वह उसके पास आया। कुछ देर तक दोनों में बातचीत होती रही। उन बातों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साथ-साथ जीवन का अंतिम समय ‘मृत्यु’ एक बडे सवाल की तरह उनके सामने था। मंगत ने चौकीदार से हिन्दुओं के श्मशानों के बारे में जानना चाहा। चौकीदार ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर दी। उसने कहा कि मैंने तो सुन रखा है कि हिन्दुओं में पाँच तरह के अंत्येष्टि-कर्म किए जाते हैं। उनमें जल, थल, वायु और अगि* के माध्यम
से मृत शरीर पंच तत्त्वों में विलीन होकर सद्गति पा लेता है। फिर आप किस बात का संकोच कर रहे हैं। मैंने कल ही एक कब्र की सफाई की है। यदि आप कहें तो यह डैड-बॉडी उसमें दफनाई जा सकती है। कब्र में दफनाने के बाद छह महीने में यह मिट्टी का शरीर मिट्टी में मिल जाता है। छह महीनों के बाद उस कब्र को पुनः साफ कर दिया जाता है ताकि फिर किसी नई डैड-बॉडी को उसमें दफनाया जा सके। मिट्टी देह का मिट्टी में मिलन ही मोक्ष है और यह क्रम यहाँ बराबर चलता रहता है।
‘मोक्ष’ शब्द मंगत के कानों में हथौडे की तरह बजने लगा। उसे मुखागि* और कपाल-क्रिया का स्मरण भी हो आया। इसके बाद गंगा नदी के पावन जल में मृतक के ‘फूल’ प्रवाहित करने का स्मरण भी आया। वह चौकीदार से बोला, ‘‘छह महीने बाद इस कब्र का स्मरण आपको कैसे रहेगा?’’
‘‘यह तो रजिस्टर में दर्ज रहता है।’’ चौकीदार बोला।
‘‘तब ठीक है, पर मेरी एक विनती है। छह महीनों बाद जब आप इस कब्र की सफाई करें, तो मुझे सूचना जरूर दे दें, ताकि मैं इनकी अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित कर सकूँ। वही मोक्ष देने वाली है....।’’ कहते-कहते उसका गला भर आया। आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे।
(मूल शीर्षक : मुगातर)
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