पीडा प्रिय महानुभाव की कथा (व्यग्य)

बुलाकी शर्मा


वे पीडा-प्रिय है। पीडित रहने में उन्हें संतोष मिलता है। स्वयं को संतोष देने के लिए वे हरेक क्रिया में पीडा को खोजते हैं। पीडा उनका स्वागत करती खडी दिखाई देती है। पीडा को पाने के लिए बहुत जतन करते हैं वे। घर में ऐसी स्थितियाँ निर्मित करते हैं ताकि उन्हें पीडा से साक्षात् हो सके। धर्मपत्नी से तकरार करेंगे। वह पूजा-पाठ कर रही होती है तो टोकेगें कि पूजा-पाठ में कुछ नहीं रखा, करना ही है तो मन को शुद्ध करो.... मन चंगा को कठोती में गंगा। प्रत्युत्तर में धर्मपत्नीजी चिल्लाती हैं कि करके तो देखो पूजा-पाठ... कहना सोरा है करना दोरा... एक घंटे पालथी मार कर भगवान की फोटो के सामने बैठ कर बता दो। मैं जो कहोगे करने को तैयार हूँ। वे धर्मपत्नीजी की बात सुन, पीडा का अहसास करते हैं। पति परमेश्वर माना जाता है... वह कुछ भी कहे... कुछ भी करे... पत्नी को मुँह में मूँग डालकर सहना चाहिए। वह जीभ चला रही है.... बहस कर रही है... ओह कैसा अनर्थ हो रहा है..। वे औरतों के बदलते स्वरूप को लेकर पीडित होते रहते हैं। उनकी धर्मपत्नी यदि टीवी पर कोई पसंदीदा सीरियल देख रही हो... यदि बच्चों के साथ हँसी-मजाक कर रही हो तब भी वे बीच में मुँह फँसायेगें ही... कोई ऐसी चुभती बात कहेगें कि धर्मपत्नी के साथ बच्चे भी बोलना चालू हो जाएगें और वे पीडा के समंदर में डुबकियाँ लगाने लगेगें- आज की हवा ही ऐसी है... खान-पान ही ऐसा है... न घरवाली सुनती है और न बच्चे...। घोर अनर्थ।
वे पडोसियों में भी पीडा खोजते हैं। किसी के किस्से होते नहीं तो घडते हैं। घड कर उन्हें सच के रूप में परोसते हैं। तुम्हारी छोरी इन दिनों ज्यादा ही बन- सँवरकर स्कूटी पर कॉलेज जाती है। उसको मैंने एक छोरे के साथ स्कूटी पर घूमते जयपुर रोड पर देखा... उससे यूँ चिपकी बैठी थी, जैसे कि उसमें समा जाएगी... ठीक लक्षण नहीं है भैय्या.. छोरी को कब्जे में रखो.. नहीं तो नाम डूबा देगी तेरा...। ऐसी बातें सुन कर पडौसी का गुस्सा सातवें आसमान से भी ऊपर जाएगा ही। वह उन्हें लतियाना शुरू करेगा- पहले अपने घर को संभला लो जी। आपका वो बनिया भायला दिन भर आफ घर में बैठा क्या करता है जी। आपकी घरवाली आपसे तो सीधे मुँह बात नहीं करती और उसके सामने बैठ दाँत निकालती रहती है... हमारी आँखें फूटी हूई नहीं है जी... हाँ हमारी
बेटी के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है... वह कॉलेज में पढती है... किसके साथ घमती है.... यह चिंता हमारी है.... समझ गए न जी...। और वे अपमान की पीडा का बोझा सिर पर रख कर वहाँ से पूरे संतोष के साथ रवाना हो जाते हैं।
उनको इतने वर्षों में यह समझ में नहीं पडा की वे ऐसा कोई कृत्य-या कुकृत्य नहीं करते जिससे सामने वाले का दिल दुखे, फिर भी लोग जो हैं उनके व्यवहार से गुस्सा क्यों होते हैं। वे जो भी करते हैं स्वंय को पीडित करने के लिए करते हैं। भूल से भी कभी उनके होंठो पर मुस्कान आ जाए तो वे चिंताग्रस्त हो जाते हैं.... मुस्कान आयी तो कैसे? मुस्कान का उनके जीवन में क्या प्रयोजन? पीडा ही उनका प्रिय आभूषण है। वे पीडित रहकर ही
स्वयं को तरोताजा अनुभव करते हैं। वे पीडित बने रहने के लिए दूसरों को प्रताडित करते हैं; मिथ्या किस्से गढते हैं, सामने वाले को उद्वेलित-उत्तेजित करने के लिए कटु वचनों का सहारा लेते हैं।
ऐसा वे सिर्फ और सिर्फ स्वयं को पीडित करने के लिए करते हैं। वे किसी को पीडित नहीं करना चाहते, वरन स्वयं होना चाहते हैं। इस प्रक्रिया में कोई दूसरा अपने को पीडित-प्रताडित महसूस करे तो उसमेंभला वे कहाँ दोषी हैं?
आप से भी अनुरोध है कि आप उनकी भावना के अनुरूप उन्हें पीडित होने में यथा सम्भव सहयोग करें क्योंकि व्यक्ति ही व्यक्ति के काम आता है।
सीताराम द्वार के सामने, जस्सूसर गेट के बाहर, बीकानेर (राज.)
मो. ०९४१३९३९९००
श्रद्धांजलि
समकालीन हिन्दी कथा साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर दूधनाथ सिंह, प्रतिष्ठित कवि एवं आलोचक बलदेव वंशी तथा हिन्दी गीति-काव्य को मंच पर गरिमा के साथ प्रस्तुत एवं प्रसिद्ध करने वाले कवि-गीतकार सुरेन्द्र दुबे के निधन पर हार्दिक श्रद्धांजलि ।
-राजस्थान साहित्य अकादमी परिवार