लालचन्द उर्फ चन्दू (रेखाचित्र)

निशान्त


चन्दू मेरे कडूम्बे में है। मेरे सगे ताऊ के बेटे का बेटा। मेरा भतीजा लगता है। मेरा हम उम्र है। बचपन में कभी साथ खेलते थे। फिर भी मुझे धोक देता है। मुझे काका कह कर तो बुलाता ही था। यह तो कायदा ही है। कुछ साल पहले तक इससे इतनी आत्मीयता या मेल-जोल नहीं था। कडूम्बा बडा होने के कारण सब से मेल-जोल रखा भी नहीं जा सकता। फिर यह तो रहता भी टिब्बा क्षेत्र के गाँव में था और मैं नहरी क्षेत्र के गाँव में। दोनों गाँवों के बीच लगभग सौ किलोमीटर की दूरी है। नौकरी लगने पर मैं अपने कार्यस्थल वाले कस्बे में रहने लगा। वह भी इसकी रिहाईश से कोई निकट न था। इसके गाँव में पडने वाली हमारी जमीन मेरा बडा भाई सम्भाला करता था। मैं भाई के पास जब जाता था तो थोडी-बहुत देर के लिए चंदू के पास भी हो आता था। लेकिन जब से भाई साहब स्वर्ग सिधारे हैं मुझे मेरे हिस्से का खेत चन्दू को देना पडा है।
हिस्से पर खेत लेने वाले कई थे। एक-दो साल कईयों को दिया भी लेकिन उनके साथ दिक्कत थी कि जब मैं खेत सम्भालने जाता तो उनके यहाँ रात-बासे के लिए कोई व्यवस्था न थी। मैं खेत दूसरों को देता और रात-बासा चन्दू के यहाँ करता। एक बार चंदू ने खेत माँग लिया। मैंने खुशी-खुशी उसे दे दिया। हम उम्र होने के कारण चन्दू के साथ अच्छा टाईम पास हो जाता है। बच्चे और घरवाले सभी चाव से रखते हैं। अब थोडी-सी मजबूरी चन्दू के यहाँ रुकने की भी बयां कर दूँ। उस गाँव का हमारा पुस्तैनी घर-मकान गिर चुका है। जब तक भाई था, सम्भाले रहा। बाद में बिना सम्भाल के गिर गया। मेरे भाई के बेटे वहाँ नहीं रहते। वे भी मेरी तरह अपना खेत हिस्से पर देते हैं। छोटा भी ऐसे करता है। ऐसे में घर दुबारा खडे करने की *ाहमत कौन उठाता? हाँ, पडौसी जमीन न दबा लें, इस डर के मारे पक्की चारदीवारी जरूर कर दी है।
अब तक जो लिखा गया वह चन्दू पर कम और मुझ पर ज्यादा था। वास्तव में चन्दू पर लिखने के लिए जिस चीज ने मुझे बाध्य किया, वह था उसका मस्त जीवन। चन्दू क्या है? एक छोटा-सा किसान। फिर भी उसके चेहरे पर लाली है। मैं अच्छी-खासी पेंशन लेता हूँ। खेती भी है। फिर भी मुझ में खून की कमी है। चन्दू मेरे साथ रोटी खाता है। बडी-बडी चार रोटियाँ खा जाता है जबकि मैं बडी मुश्किल से दो ही खा पता हूँ। सब्जी से मुँह जलता है। इसलिए वह भी कम खाई जाती है।
चन्दू के जैसा बडा दुःख भी मैंने अपनी जिन्दगी में नहीं देखा। कई साल पहले चन्दू का जमाई चल बसा था और पिछले साल एक जवान लडका। फिर भी चन्दू मस्त है। भीतर कहीं दुःख तो होगा ही लेकिन वह रोता नहीं। कमाई की बात यूँ है कि जिस लडके के साथ यह रहता है, अच्छा कमाता है। अपना केन्टर किराये-भाडे पर चलाता है। पुत्र-वधू कई पशु पालती है। खेती के कार्यों में भी सहयोग करती है। वैसे घर के सभी छोटे-बडे जीव अपने-अपने डौळ के अनुरुप कार्य करते हैं। दूध से भी थोडी आमदनी हो जाती है।शुरु में मैंने चन्दू के चेहरे पर लाली की बात कही है। इसका मतलब यह नहीं कि चन्दू कभी बीमार हुआ ही नहीं। उसने मुझे बताया कि एक बार उसे बडे जोरों के दस्त लगे। हनुमानगढ के एक नर्सिंग होम में भर्ती हुआ, तब जाकर ठीक हुआ। एक बार उस पर लकवे का भी अटेक हुआ था। सरदारशहर के वैद्य-हकीम से ठीक हुआ। उन्होंने इसे हमेशा गर्म पानी से नहाने की हिदायत दी थी। नहीं तो यह घोर सर्दी में भी ठण्डे पानी से नहाता था। हाँ। इसके नहाने का समय सूर्योदय से पहले का ही रहता है। इसके एक पाँव में कुछ दर्द भी रहता है। यूँ चलता-फिरता तो है लेकिन कभी-कभी चलते-चलते लचका लग जाता है तो ठहरना पडता है।इतनी दिक्कतों के बावजूद चन्दू दूर के खेतों में रखवाली के लिए रहता है। एक वक्त की रोटी भी खुद बनाता है। एक वक्त की रोटी किसी के साथ खेत में चली जाती है। आषाढ-सावण की गर्मी में झोंपडी में या खेजडी की छाया में रहता है। भरपूर बारिश के इलाके वाले लोग यह न सोचे कि आषाढ-सावन में हमारे यहाँ मौसम बडा सुहावना रहता है। राजस्थान में वर्षा के बाद बडी उमस और तपत रहती है। बादल जाने के बाद महीने तक नहीं लौटते। ऐसे में गर्मी का क्या अंत? कई बार पडौसी भी खेतों में नहीं रहते। वह अकेला ही रहता है। किसी से बोल-बंतल भी नहीं हो पाती। वैसे चन्दू मोबाइल रखता है। उसमें उसने भजन भरवा रखे हैं। उन्हें सुनता रहता है। चिलम तो पीता ही है। उसे शायद चिलम ही कोई ताकत देती है। हालाँकि डॉक्टर लोग तम्बाकू को बुरा बताते हैं।चन्दू को मैं जब भी फोन लगाता हूँ और हालचाल पूछता हूँ तो कहता है- बस मौज है। पूछता हूँ कि इतनी मुश्किलों में कैसे रह लेते हो? तो वह कहता है- हम तो रोही के जिनावर हैं। वाकई वह रोही का जिनावर है तभी तो उसे रोही के जिनावर साँप-दुमुँही से डर नहीं लगता। जबकि इसके तो बाप की मौत भी भरी जवानी में दुमुँही के काटने से हुई थी। एक मैं हूँ जो साल में एक बार खेत देखने जाता हूँ तो भी साँप-दुमुँही से डरता रहताहूँ।
वार्ड : ६, निकट वन विभाग, पीलीबंगा, जिला-हनुमानगढ-३३५८०३ मो. ०८१०४४७३१९७