मेरी बात और है...(डायरी )

मालचन्द तिवाडी


गुनाहे-बेलज्ज्जत
२मई, २०१६
आज सुबह-सवेरे ही मन कुछ उदास हो गया गोया इस उदासी की कोई छाप मैंने अपनी दिनचर्या पर न पडने दी। सवेरे हस्बेमामूल उठकर हमारे पालतू लेब्राडोर रेट्राइवर नस्ल के खानदानी कुत्ते रोनी को दिशा-मैदान से फारगती के लिए घुमाने ले गया। लौटकर अपने घर के पगोथिये पर गली में बैठा अखबार पढता रहा और वहीं बैठकर चाय भी पी। हाँ, हमारी गली की एक गठीले बदन की मादक-सी स्त्री को रोज की तरह अपनी आँखों के आगे से गुजरते समय चोर नजरों से निहारा भी। यह काम मेरी इस घर में रिहायश के साथ शुरु हुआ था, जो अद्यावधि जारी है। इसम और लज्जत तब शामिल हो गई जब कोई डेढ दशक पहले मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि फलाँ की लुगाई कहती है कि आपको दूर से देखकर उसको वहम होता है कि उसके पतिदेव आ रहे हैं। स्त्रियों के पास अपने मन को ऐसी किसी अटपटी रीति से प्रकट करने का कौशल खूब होता है। बात यों दो तरफा होकर भी इकतरफा बनी हुई चली आती है और देखते ही देखते वह नानी बन गई और मैं दादा। दोनों में से एक के भी शील को कोई नफा-नुकसान न हुआ और दिल बहलता रहा तो इसमें किसी को क्या आपत्ति भला? अलबत्ता मेरी पत्नी को तो मेरे इस मुलायम मगर मरगिल्ले रिश्ते का पूरा इल्म है, परन्तु ऐसा कत्तई मुमकिन नहीं कि उसके पतिदेव को अलाँफलाँ महाराज के कानों को इसकी भनक भी लगी हो। लग जाती तो रामदाने के इन लड्डुओं की बूंदी कभी भी सडक पर बिखर अपावन हो चुकी होती। बहरहाल, औरत वो दरमियाने कद की है, लेकिन बात निकली तो देखिए खामखाह कितनी लम्बी हो गई।
हाँ, याद आया, आज सवेरे पाँच बजे से थोडा पहले आँख खुली तब सपना देख रहा था। सपने में श्रीडूंगरगढ निवासी मेरा एक मित्र किसी कन्या का विवाह संपन्न करवा रहा था। तयशुदा तौर पर मैं भी इस शादी में शरीक था और बार-बार उसकी पहले ही ब्याही जा चुकी चारों लडकियों के नाम ले-लेकर पूछ रहा था कि आखिर उनमें से यह किस वाली लडकी की शादी है? वह जिंदगी के मसलों की तरह सपने में भी मुझे नादान समझकर मेरे सवालों को
टाले जा रहा था। आखिरकार मेरे बार-बार पूछने से उकताकर बोला- ‘‘यार, यह लडकी उनमें से नहीं है, जिन्हें मैं समझता हूँ कि मैंने पैदा किया है, यह तो तुम्हारी भाभी की गोद ली हुई पोषिता बेटी है।’’ सवेरे पगोथिये पर बैठकर अखबार पढते हुए मेरा मन बार-बार मचल-मचल रहा था कि मैं उसको एक बार फोन कर ही डालू। मगर अक्ल थी कि मुझे बरज-बरज रही थी कि इतना सवेरे-सवेरे फोन करना, सो भी निहायत गैरजरूरी, बिल्कुल भी समझदारी की बात नहीं। मैं अक्ल की आवाज कम ही सुनता हूँ, मगर आज मुझसे उसकी बात टाली न जा सकी। मजा यह रहा कि कोई साढे नौ बजे खुद उसका फोन आ गया। मैंने सपने की बात उसको बताई और पूछा कि बता तूने मुझे किस लिए याद किया? असल में जब भी उसका फोन आता है। मुझे खुशी के साथ-साथ एक आशंका भी लगी रहती है कि वह दूसरी बात न छेड बैठे जो उस मेरे यार ने अब तक तो एक बार भी छेडी नहीं है। हुआ यह था कि १० दिसम्बर २०१३ को मैंने अपने छोटे बेटे सुकान्त की शादी की थी और अपनी पतली हालत का पतला-सा इशारा करते ही इस मित्र ने मेरे बैंक खाते में एक लाख रुपए जमा करवा दिए थे। वह रुपया मैं अब तक कहाँ लौटा पाया हूँ। बस, एक डर-सा लगा रहता है कि वह माँग न बैठे। मैंने बडे बेटे को करवाए बेनतीजा कारोबार की खातिर लोगों से ढाई-तीन लाख का जो कर्ज लिया था, उसको चुकाने के लिए भी मुझे अपने पेंशन खाते पर दो लाख का लोन लेना पडा। इस लोन की ईएमआई के चलते माहवारी पेंशन और कम हो गई जो छठवाँ वेतन आयोग लागू होने से पेश्तर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेने के कारण पहले ही स्वल्प मात्र थी। भारी मुसीबत आन पडी। भला हो हिन्दी अकादमी, दिल्ली का कि सहभाषा सम्मान स्वरूप एक लाख रुपए मुहय्या करवाकर मेरी पतवार थाम ली। चलिए , यह सब तो चलता रहेगा मगर असल बात यह है कि असल बात का सिरा कभी हाथ से छूटना नहीं चाहिए और तय मानिए, असल बात यह है कि जन्दगी फिर भी खूबसूरत है। हेमंत दा का गीत याद
आ रहा है न- ‘जिंदगी कितनी खूबसूरत है, आइए आपकी जरूरत है!’ अपनी तो और भी खूबसूरत ठहरी क्योंकि किसी के आने-जाने की भी कोई जरूरत
शेष नहीं।
पुण्य और प्रसाद
१६ मई, २०१६
कल बडे बेटे निर्मल के परिश्रम-प्रसाद से आरूढ हुए कूलर में पानी भरने की गरज से मैं आज बडे सवेरे ही ऑफिस चला आया। घर से साथ लाई बाल्टी को भैरव मंदिर की सार्वजनिक टोंटी के नीचे रख ऑफिस में झाडू-बुहारी भी कर डाली। वैसे यह काम रोजाना शंकरसिंह करता है। फिलहाल वह जोधपुर गया हुआ है। उसका अधिकांश बचपन पुरुषों की कोलाहल भरी संगत में बीता है, यह बात मुझसे छिपी नहीं है। जिन लोगों को बचपन में स्त्रियों का प्रगाढ स्नेह-सान्निध्य नसीब नहीं होता, उनका जीवन जाने कितने छोटे-छोटे सुंदर सलीकों से महरूम रह जाता है। शंकरसिंह झाडू निकालता बेशक है, लेकिन वह सफाई नहीं आती जो एक स्त्री के हाथ में स्वाभाविक रूप से मौजूद रहती है। मैं उसे अक्सर प्यार से टोकता भी हूँ कि बचपन में बहनों से सिर्फ झगडना ही नहीं चाहिए, उनके गुणसूत्रों में पीढियों से प्रवहमान कुछ सद्गुणों को आत्मसात भी कर लेना चाहिए। मेरा सौभाग्य रहा कि मैं पाँच बडी बहनों का अत्यन्त दुलारा छोटा भाई रहा और आज पाता हूँ कि मेरे जीवन में जाने कितना सारा सौंदर्य अपनी उन बहनों के साहचर्य का ही पुण्य-प्रसाद है। एक बडा खूबसूरत वाकया, जो मेरी चीन-यात्रा में पेश आया, बरबस याद आ रहा है। वर्ष २००७ का जून महीना। भारत-चीन सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना के अर्न्तगत दस विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों का एक दल दस दिन की चीन-यात्रा पर गया। उनमें मैं भी और मुझ गरीब के सौभाग्य से हिन्दी के दो दिग्गज कवि केदारनाथ सिंह जी और नन्दकिशोर जी आचार्य भी शामिल। शायद शंघाई की बात है। एक सवेरे जब में नाश्ता करके लौट
रहा था, तो देखा कवि श्रेष्ठ केदारनाथ सिंह जी अपने कमरे के द्वार पर कुछ पशोपेश में पडे-से खडे हैं। मैंने कारण पूछा तो बोले, ‘‘चल अन्दर!’’ उनके कमरे के अन्दर पहुँचकर देखा कि कविराज के कोई आठ-दस कुर्ते बिस्तर पर पसरे हुए विश्राम कर रहे हैं। ‘‘तुझे इन्हें धबी वोले तरीके से तहाना आता है।’’ कविराज ने मुझसे पूछा। जवाब में मैं तुरन्त सक्रिय हुआ और एक-एक कुर्ते को ऐसे तहाकर रखा, मानो अभी-अभी लॉण्ड्री से धुलकर आए हों। कविवर मेरे हाथों की फूर्ती और तहाने के सलीके को मुग्धभाव से निहारते रहे। काम निपटाकर मैंने खेल-खेल में हाथ कुछ ऐसे झाडे मानों किसी अपने से बडे पहलवान को दंगल में पटखनी देकर हटा होऊँ । केदारजी ने विस्मित-चकित भाव से पूछा, ‘‘अरे! कहाँ से सीखा यह सब!’’ मेरे मुँह से तत्क्षण निकला, ‘‘अपनी बहनों से, और किससे!’’ एक इस छोटे से हुनर ने केदारजी के मन में मेरे प्रति जिस प्रियता का बीजारोपण किया, उसकी फसल तो मैं आज तक काट रहा हूँ। मुझे याद आता है। मेरी पुस्तक ‘बोरूंदा डायरी’ पढकर उन्होंने मुझे तत्काल फोन किया था और देर तक मुग्धमना बतियाते रहे थे। किताब में मैंने प्रसंगवश उनकी एक कविता का बडा रोचक सन्दर्भ भी दे रखा था। मेरे उस शाब्दिक खेल पर वे बडे रीझे थे। उन्होंने कविता में ‘उस’ सर्वनाम का प्रयोग किया था। मैंने चुटकी ली थी कि केदारजी ने जाने किसका पाणि-ग्रहण करके यह सुन्दर गीति-कविता लिखी होगी और कवियोचित चतुराई से उस संज्ञा को सर्वनाम के ओट कर दिया होगा। बहरहाल, स्त्रियों की उपस्थिति ही इस संसार को न केवल सह्य वरन सुंदर भी बनाए हुए है। इस बात को जितना जल्दी हो कुबूल कर लेना चाहिए। अलबत्ता केदारजी की उस कविता का भी प्रायः यही प्रतिपाद्य कहा जा सकता है। हाँ, अपवाद तो हर नियम का होता है और अपवाद के बारे में यह भी तो कहा जाता है कि अंततः वह नियम की ही पुष्टि ही करता है। याद तो फेसबुक पर लिखी प्रोफेसर रामजी तिवारी की एक बात और आ रही है, पर सोचता हूँ लिखूँ कि नहीं! तिवारी
साहब ने लिखा कि केदारजी ने पढने के प्रबल आग्रह के साथ उनको ‘बोरूंदा डायरी’ दी और देते समय कहा, ‘‘पढकर जान जाओगे कि बिज्जी की तरह हर लेखक के नसीब में मालचन्द तिवाडी नहीं होता’’
भावदुष्टो न शुध्यति
१७ मई, २०१६
आज ऑफिस कुछ देर से आया। मेरे घर धीरू भाई बंबानी मेहमान जो ठहरे। मेरा छोटा बेटा सुकान्तअपने साहबजादे को बंबानी नाम से पुकारता है। शेष घर के सब लोग उसको खुशवर्धन को अंगे*जी के दो आद्याक्षरों में एकदम छोटा कर के केवी के नाम से पुकारते हैं। उसको लगता होगा कि बंबानी बुलाने से उसका बेटा भी अंबानी या अडानी की तर्ज पर इस देश का कोई बडा धनपति निकल आएगा। मैंने अपने बडे बेटे का नाम उसके जन्म के दिनों के एक तुफानी तेज गेंदबाज ग्राहम यॉलप के क्रिकेटिया नशे में यॉलप रख दिया और उसकी जिंदगी ऐसी होकर रह गई है कि न तो वह किसी को बोल्ड कर सकता है और न कोई तेज गति की आऊटस्विगर गेंद फेंककर स्लिप में कैच करवा सकता है। उसके सारे उदाहरण तो खुद ही और अक्सर पहली गेंद पर क्लीन-बोल्ड होने या स्लिप में पकडे जाने के हैं। अलबत्ता छोटे का नमा मैंने बांग्ला भाषा के प्रतिभाशाली अल्पायु कवि सुकान्त भट्टाचार्य की स्मृति को अपने जीवन में अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सुकान्त तिवाडी रखा और वह बजाय कवि के दिल्ली में योग-शिक्षक और स्पा-थेरेपिस्ट बनकर गुजर-बसर लायक कमाने-खाने लगा है। शायद इन्हीं परिस्थितियों को एंटीसिपेट करते हुए महान शेक्सपीयर ने अपनी महान थीसिस पेश की होगी- नाम में क्या रखा है। ऐसी एक थीसिस हमारे अपने बिहारी के एक दोहे में भी पाई जाती है। मगर इधर मद्य-विमुख होने के कारण रोज रात को नींद के आह्वानार्थ मुझे शून्य दशमलव शून्य पाँच मिलीग्राम की एल्प्राजोलाम कीएक टिकडी खानी पड रही है। गीता में बेशक लिखा है कि क्रोध से स्मृतिभंश होता
है, उसके लेबोरेट्री टेस्ट का कोई प्रमाण-पत्र तो मेरे पास नहीं, लेकिन एल्प्राजोलाम की कारस्तानी तो प्रत्यक्ष ही जानिए कि बिहारी का दोहा ही याद नहीं आ रहा है। यों मुझ पर असर रघुवीर सहायजी का भी है जिन्होंने पूरे एक संग्रह भर कविताएँ लिखकर अपने इस काव्य-एजेंडे का नाम ही रखा- भूलने के विरुद्ध। एक जमाना था तब मैं जोश मलीहाबादी साहब की ‘यादों की बारात’ में अक्सर शामिल पाया जाता था। किताबों ने ही मेरी जिंंदगी को सोना बनाया है और उन्हीं की कई-एक पुरानी जिल्दों ने उसे कबाड में भी तब्दील कर छोडा है। पाक-कला में बीमारी के दर्जे की दिलचस्पी रखता हूँ और कहीं कोई पढी हुई रेसिपी अपनी रसोई में आजमाना चाहता हूँ तो अक्सर पत्नीजी की फटकार सुननी पडती है, ‘किताबें पढ-पढकर जिंदगी खराब करली सो तो कोई बात नहीं, मेरी रसोई का सामान तो न बिगाडा कीजिए।’ लेकिन आज मैं बडा सुर्खरू होकर ऑफिस आया हूँ। मेरे टिफिन में घीया-कोफ्ता की तरकारी एक खाने में यों सजी पडी है कि खाने के पेश्तर ही आपकी आँखें न चमक पडे तो कहिएगा और फिर जब उसमें से फूटती गंध आफ नथुनों पर दस्तक दे देगी तब तो आपकी देह की गुप्त गंथियाँ ऐसे सक्रिय होंगी कि आपकी जीभ पानी-पानी होकर रह जाएगी। बाह्येन्द्रियों से प्राप्त स्टिमुलेशन आफ शरीर के किसी-न-किसी भीतरी भाग को गीला किए बगैर कब छोडता है, चाहें तेा कोई ताजा-तरीन वाकया भी याद कर देखिए।
इधर राजस्थानी की दो और हिन्दी की एक कहावतें मुझे बडी परेशान किए दे रही हैं। राजस्थानी की कहावत तो एक है और दूसरा मुहावरा है, लेकिन दोनों को ही प्रयोग मेरे उस्ताद मरहूम विजयदांन देथा प्रचुर मात्रा में किया करते थे। कहावत है- ‘मियां तो मियां अबै पिंजारा ई मियां’ और मुहावरा है- ‘मुँह से पादना’ यानी मुख-मार्ग से अपान-वायु का त्याग करना। भूल न जाऊँ सो हिन्दी कहावत को भी दर्ज किए देता हूँ और वह है- ‘सूत न कपास और जुलाहे से लट्ठमलट्ठा।’ शंकरसिंह भोजन सही समय पर अर्थात ठीक डेढ बजे कर लेने का प्रस्ताव
दे रहा है और ऐसे संजीदा और कीमती प्रस्ताव उसकी तरफ से साल में एकाध बार ही आते हैं। सोचता हूँ अविलंब मानकर इस प्रस्ताव का सम्मान रख लेना चाहिए। सो कहावतों-मुहावरों से होने वाली परेशानी का किस्सा एक बारगी बरतरफ करता हूँ। फिलहाल भोजन। इत्यलम्।
तो भोजनोपरान्त के सत्र में आपका पुनः स्वागत। एक बार विजयदान देथा अनेक बार की तरह मेरे घर पर मेहमान थे। यद्यपि उनको मेरे घर के मामले में मेहमान कहना व्यर्थ ही है। वे जिस तरह घर में प्रवेश करते ही मेरी पत्नी को ‘बीनणी बेटा’ कह कर अपनी दैनन्दिन जरूरतों की फेहरिश्त सुना देते थे, वह कोई मेहमान को शोभा देने वाली बात तो थी नहीं। अलबत्ता ऐसा जरूर लगता था कि सहसा घर के आँगन में एक घेर-घुमेर पीपल का वृक्ष उग आया है और उसके बडे-बडे पत्तों से रात की बारिश का शेष पानी बूंदों की शक्लों में फिसल-फिसलकर पूरे घर के तन-मन को भिगोये दे रहा है। तो उस रात बिज्जी ने सोने से पहले पढने के लिए कोई किताब माँगी और मैंने बिना अधिक विचार किए उन्हें सुधीश पचौरी कि किताब ‘उत्तर आधुनिक साहित्य विमर्श’ पढने के लिए थमा दी। परिणाम? बिज्जी ने सवेरे चार बजे से मुझे आवाज लगाना शुरू किया- ‘‘मालू! ओ मालू!’’ मैं निर्लज्जता और ढिठाई दोनों को धारे सोता रहा। मगर पाँच बजने को आए तो लपककर उठना ही पडा और उठते ही उनकी सेवा में जा पहुँचा। ते तमतमाये खडे थे। बोले, ‘‘सच बता, मेरी कसम है तुझे, इस सुधीश पचौरी का लिखा तेरी समझ में आता है? लिखता है- पण्य परिणिताएँ! मैं बूढा हो गया हिन्दी में कलम घिसते, ऐसा विलक्षण पद-प्रयोग तो मुझसे कभी हो ही न पाया मालू। यह तो सरासर वाणी का दुरुपयोग ही हुआ।’’ वे क्षणभर ठहरे और मुख पर गहन वितृष्णा के भाव लाकर ठेठ एक खास राजस्थानी मुहावरे का प्रयोग किया। मुख से वाणी का निकसन कुछ इस रीति से करना कि वाणी में कोई भाव-दुर्गन्ध समाहित हो जाए। इसको सटीक अभिव्यक्ति देने के लिए राजस्थानी लोकचित्त ने यत्किंचित् जुगुप्सा
की भी परवाह न करते हुए कैसा तिलमिलाता मुहावरा घड दिया और विजयदान देथा गहरी मनोव्यथा का शिकार होने पर इसका प्रयोग करने से कत्तई गुरेज नहीं किया करते थे। वैसे मुझे एक अति प्राचीन संस्कृत श्रोक भी याद आ रहा है, जो मात्र एक पदबंध के बल पर मेरी स्मृति में अंगद का पाँव बन कर रह गया। श्रोक सुनिए-
गंगातोयेन कृत्स्त्रेन मृदभारैश्च नगोपमैः।
आमृत्योश्चाचरन् शौचं भावदुष्टो न शुध्यति।
अब रही बात इस कहावत की कि ‘मियां तो मियां अबै पिंजारा ई मियां।’ अर्थात जो हस्क्षेप की पात्रता रखते हों वे तो ठीक, मगर जिन्ह अलिफ-बे तब का इल्म नहीं वे भी दार्शनिक मुद्राएँ अख्तियार कर दीन-ईमान के मामले में बडी-बडी बातें बघारें तो यह कहावत हालात का बयान बखूबी कर देती है। आजकल और खासकर बीकानेर के स्वनामधन्य राजस्थानी लेखकों की फेसबुकिया दीवारों पर तो पिंजारा भाईयों में बडबोले बयानों की वह जंग छिडी हुई है कि वहाँ एक और चिंदी चिपकाने भर को जगह मिलना मुश्किल और सूत न कपास और जुलाहे से लट्ठमलट्ठा तो इतने से ही साफ है कि जिनका साहित्य अवबोध आत्मविज्ञापन तक ही सीमित हो, उनके लिए साहित्य मानों अभी-अभी बस इसी घडी अस्तित्व में आया है जबकी उनकी तूफनी प्रतिभा ने लिखने के लिए कलम या टाइप करने के लिए फेसबुक के की-बोर्ड के साथ अपनी अँगुलियों को बस उलझाया-उलझाया भर है। न कोई था न कोई हमारे सिवा, हम भर देगें भंडार ओ दिलरूबा! गोस्वामी जी जाएँ छाछ लाने जो लिख गए कि ‘गावहिं प्राक्रत जन गुनगाना। गिरा लागि सिर धुनि पछिताना।।’ गिरा क्या कोई भी सिर धुने इनकी बला से। वारी जाऊँ जरा इन भले मानसों से गिरा का अर्थ ही पूछ देखिये कि साहब पता तो चले, गोस्वामी जी किस के सिर धुनने और पछताने की पीडा प्रकट कर रहे हैं। साहित्य के इन समस्त स्वनामधन्यों को वन्दनोपरान्त आज मैं अपनी वाणी को अब यहीं विश्राम देता हूँ। इत्यलम्।
मुन्नू
२३ मई, २०१६
अभी-अभी शमीम बीकानेरी साहब का फोन आया। उनके यहाँ से शादी का निमंत्रण-पत्र आया पडा है। २५ मई को उनके छोटे भाई सईद अहमद सिद्दीकी की दो बेटियों सुरैया और अजरा तथा एक बेटे वकार अहमद की शादियाँ हैं। मैंने शमीम साहब से कहा कि मैं बच्चों की शादी में जरूर शरीक होता मगर क्या किया जाय मौका ही ऐसा पेश आ गया। उन्होंने मुझे तसल्ली दी और गालिब का एक शेर पढा-
-एक हंगामे से मौकूफ है घर की रोनक
नौहाए-गम ही सही नग्मा-ए-शादी न सही
इस मुल्के-हिन्दुस्तान के ये दो शायर ऐसे हैं कि जदगी के किसी मरहले के लिए मौजूं पंक्तियाँ आपको इनके यहाँ मिल ही जाएँगी- एक तो गोस्वामी तुलसीदास और दूसरे मियां असद्दुला खाँ गालिब। गोस्वामी जी ने तो पहले ही कह रखा है कि यह संसार नदी और नाव के संयोग जैसा है। नाव पानी पर तैरती है मगर पानी कब नाव में भर जाए, कोई नहीं कह सकता। कबीर का करुण सच भी बरबस इसलिए याद आ रहा है कि अपने उस्ताद विजयदान देथा इसे अपने आखिरी दिनों में बार-बार दोहराते थकते न थे, कहते ‘‘मालचंद, इतने निष्करुण सत्य को ऐसे सहज रूपक में कबीर के सिवा कोई कह सकता था भला?’’ इस के बाद वे अपने स्वर को मद्धम पर साधते गुनगुनाने लगते, ‘‘जगत चबेना काल का, कछु मुख में कछु हाथ!’’
शमीम साहब ने अपनी बात के शुरू में ही अखबार का हवाला दिया था। कल के अखबार में ही तो मेरी सब से बडी बहिन रामप्यारी देवी के २० मई अपराह्न हुए निधन के चलते उसके पीहर पक्ष अर्थात हमारे घर होने वाली दैनिक शोक-बैठक का इश्तिहार शाया हुआ है। मैं अपनी इस बडी बहिन को राजस्थानी संबोधन में ‘बाई’ कहकर पुकारा करता था। वैसे तो संसार की सभी बहिनें भाइयों के लिए मंगल की मूर्ति ही हुआ करती हैं लेकिन
फिर भी मैं सोचता हूँ, हर बहिन की अपनी एक विलक्षण स्मृति हुआ करती है। मैंने फेसबुक पर अपनी बाई की तस्वीर शाया कर एक छोटा-सा ट्रिब्यूट लिखा कि आज तो मेरी बाई के सम्मुख हर तरह की समृद्धि हाथ बाँधे खडी थी, मगर जिन दिनों मैं उसके पास सबसे ज्यादा रहता-पलता था, बाई के घर-आँगन के हर कोने से अभाव ही अभाव झाँका करता था। बाई मुझसे उम्र में कितनी बडी थी। इस सवाल के जवाब में इतना बतला देना ही पर्याप्त है कि बाई की पहली संतान मेरी भानजी शारदा उम्र में मुझसे पूरे अढाई बरस बडी है और दूसरे नंबर की सरला मेरी एकदम हमवयस्क। मैंने लिखा, बाई अपने अभाव के उन दिनों में अपनी बेजोड जुगत और हाथों के करिश्मे से जो अन्न पकाकर अपने बच्चों के साथ मुझे भी परोसा करती थी, उसका बल आज शायद मेरी देह से कहीं अधिक मेरी आत्मा में संचित है। मैंने बाई के स्तन्य का पान तो नहीं किया, मगर उस अन्न में बाई के पसीने की एकाध बूँद तो जरूर टपकी होगी, जिसने जीवन के तमाम तरह के असह्य अपशकुनों के बीच भी मेरे मन को कभी थकने न दिया। निराला ने ‘राम की शक्तिपूजा’ में राम के ऐसे ही मन को तो उकेरा है। जब कहा है कि ‘पर रहा एक मन और राम का जो न थका’। मेरे पास हमेशा गिरता-पडता मगर सदा-सर्वदा फिर से अजेय बनकर खडा हो जाता यह जो एक मन है, मैं आज उसके लिए बाई के उस अन्न का ऋण उसका छोटा पुत्रस्थानीय भाई होने के अपरिमित आत्मगौरव के साथ स्वीकार करता हूँ। पीपल और खेजडी के लट्ठों की उस चटखती अगि* के प्रति मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ कि उसने एक अद्भूत नर्तन करते हुए मेरी बाई की भौतिक काया को पंचतत्त्वों में विलीन कर दिया। बाई मुझे घर के नाम से और बहुत धीमे स्वर में बुलाया करती थी, ‘‘मन्नु!’’ अब तो कभी-कभार अपने किसी निविड एकान्त में मैं खुद ही बाई का-सा स्वर साधकर खुद को पुकार लिया करूँगा, ‘‘मुन्नू’’ बाई की समस्त घनीभूत स्मृति मानों उसके द्वारा मेरे लिए संयुक्त इस एक इकलौते शब्द में ही समा कर रह गई है- मुन्नू!
पुनश्चः
२३ मई, २०१६
हमारे घर में मतलब ‘प्रहलिका’ में बाई की शोक-बैठक का आज पहला दिन था। कुछेक रिश्तेदारों के अलावा स्वनामधन्य भाई साहब जनार्दनजी कल्ला भी संवेदना प्रकट करने आए। साहित्यिक मित्रों में बुलाकी शर्मा, नीरज दइया, रोजेन्द्र जोशी, हरीश बी. शर्मा, संजय आचार्य ‘वरुण’, इरशाद और राजेश आए और काफी देर बैठे-बतियाये। घर के सदस्यों में मेरे अग्रज मदनलालजी तिवाडी- जिन्हें मेरे बचपन से मैं ही नहीं मेरे मुहल्ले सोनगिरी कुआँ का निवासी हर शख्स ही ‘मदु भा’ कहकर बुलाता रहा है- तो अपरिहार्य रूप से मौजूद थे ही; मेरे छोटे बहनोई रामेश्वरजी तिवाडी, दिवगंत भाईसाहब गिरधारीलाल तिवाडी का बडा पुत्र मेरा भतीजा शंकर और एक चचेरा भाई हरि भी मौजूद थे। साहित्यिक मित्रों में बुलाकी का बाई से खूब मिलना-जुलना रहा है। एक जमाना था जब बुलाकी और मैं इस तरह साथ रहते थे कि अपने किसी अच्छे-बुरे अफसाने का नाम हम चाहते तो ‘दो बैलों की कथा’ भी रख सकते थे। तब ना बुलाकी दुनियादार था और न मैंने ही किसी बडे साहित्यिक कारनामें को अंजाम दिया था कि नजदीकियाँ अजब इत्तफाक से दूरियाँ बन जाती। फिल्मी गीतकार ने तो कुछ यों लिखा है कि दूरियाँ नजदीकियाँ बन गईं अजब इत्तफाक है।..... मगर मेरे और बुलाकी के मामले में इत्तफाक बेचारे की कोई भूमिका ही नहीं है। सारा खेल हमारी अपनी-अपनी वक्त के साथ कारण-अकारण बदली हुई मनःस्थितियों का है। वह पुरानी अकुंठ मैत्री किसी लुप्तगामी जीव-प्रजाति के जीव की तरह कभी-कभार ही दिखाई पडती है, मगर दुर्भाग्यवश उसके संरक्षण के निजी या राजकीय यत्न लगभग
शून्य ही है।
द स्केप्टीकल ट्वैन
२८ मई २०१६
फेसबुक वाले मित्र भी कमाल के जीव हैं। वहाँ लाईक का बटन असल में शिष्टाचार का बटन है। इधर मैं
भी शुरु जवानी से लेखक-मित्र चेतन स्वामी के दीर्घ कुसंग के कारण उसकी लाईलाज कौतुक-वृत्ति के कतिपय कीटाणुओं से संक्रमित ठहरा। अभी पिछले सप्ताह ऐसा ही एक कौतुक मैंने फेसबुक पर कर डाला। बीकानेर के अजातशत्रु अध्यव्यवसायी बुजुर्गवार बी.डी. जोशी साहब ने मेरे प्रति अपनी सहजप्रियता से परिचालित होकर अपनी निजी लायब्रेरी की कुछ दुर्लभ पुस्तकें अनुग्रहपूर्वक मुझे भिजवा दी थीं। उन किताबों में अद्धितीय अमरीकी लेखक मार्कट्वैन का एडमंड फुल्लर द्वारा सुसंपादित एक बेजोड रीडर (चुनिंदा रचनाओं का संचयन) भी था। उसके एक अध्याय ‘द स्केप्टीकल ट्वैन’ में ट्वैन महाशय के कुछ ऐसे पद्यांश संकलित थे जिन्हें आप हास्यमिश्रित गंभीर विचारों के बेजोड नमूनों की श्रेणी में बखुशी रख सकते हैं। मैंने बस यों ही सहज कौतुकवश वहाँ से उठाकर दो अंश अपने स्टेटस के खाने में रख दिए। वे अंश क्या कह रहे हैं और कैसी अंग्रेजी में कह रहे हैं, इसका जरा आप भी मुलाहिजा कर लें ः-
1. There is no character, howsoever good and fine, but it can be destroyed by ridicule, howsover poor and witless. Observe the ass, for instance. His charactor is about perfect, he is the choicest spirit among all the humbler animals, yet see what ridicule has brought him to. Instead of feeling complimented when we are called an ass, we are left in doubt.
2. If you pick up a starving dog and make him prosperous, he will not bite you. This is the principal difference between a dog and
a man.
इन दोनों अंशों के गद्य को अगर वर्गीकृत करना हो तो आप इन्हें किस श्रेणी में रखना पसंद करेंगे? मुझे एक श्रेणी सूझ रही है- हिंस्र विनोदी गद्य। हिन्दी में इस तरह के गद्य-लेखन के निपुण-निष्णात किसी एक लेखक का नाम मुझसे पूछिए और मैं पल भर की देर किए बिना बता डालूँगा- अशोक वाजपेयी। आपका विमत शिरोधार्य। विरोध और विखंडन भी चाहे तो आप बाद में करते रहिएगा। लेकिन प्रसंग जिसके निवेदन में वाजपेयी जी यूँ
ही प्रसंगात् आ धमके वह यह था कि मार्क ट्वैन की इस अंग्रेजी वक्रोक्ति को लाईक करने वालों की संख्या देखकर मैं हैरानी में पड गया। उनमें से कितनों को तो मैं भलीभाँति जानता हूँ कि वे अंगे*जी भाषा के ज्ञान के मामले में किस कदर फटेहाल हैं, मगर साहब हौसला देखिए कि मार्क ट्वैन सरीखे लेखक को भी शाबासी देते उन्हें कोई झिझक तक नहीं। यह सब देखकर मुझे मराठी कवि दिलिप चित्रे का साहित्य आकदमी के सभागार में दिया गया एक अत्यंत करुण व्याख्यान याद हो आया। उस व्याख्यान में चित्रे साहब ने एक अमरीकी विद्वान द्वारा छत्रपति शिवाजी पर पूना की विश्वविख्यात भण्डारकर लायब्रेरी के सहयोग से शोध करने और फिर उस पुस्तक को अंगे*जी भाषा में प्रकाशित करवाने पर कुपित हुए शिवसैनिकों द्वारा भण्डारकर लायबेरी को आग के हवाले कर देने का आत्मा को झकझोर देनेवाला वर्णन किया था। उन्होंने अनेक तथ्यों के हवाले से बताया था कि भारतीय ज्ञान की इस विपुल संपदा को आग में जलाकर नष्ट करने वाले जिन अठहत्तर शिवसैनिकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर कचहरी में उनका चालान पेश किया था, उनमें से मात्र दो को छोडकर शेष छिहत्तर लोगों को अंगेजी भाषा की वर्णमाला तक का ज्ञान नहीं था।
यों आज बडे तडके फेसबुक ने मुझे बडे ही अचिंत्य कोटि के पावन आँसुओं में नहलाया भी था, पर उसका बयान शायद कल करूँ। हाँ, इतना बताता चलूँ कि उसमें साहिर के लिखे और सुधा मल्होत्रा व मुकेश के गाए एक युगल गीत का हवाला था-
तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको,
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है।
‘प्रहेलिका’, सोनगिरी कुआँ, बीकानेर-३३४००५ (राज.)
मो. ९४६००२२८२४