उसकी रोशनी में

सोहन दास वैष्णव


पूस का महीना जिसमें बडा शीत झर रहा था। रात दस बजे सूरत में हाइवे की किसी होटल पर यात्रियों के भोजन के निमित्त बस आधे घण्टे के लिए ठहरी थी। मैंने भी भोजन किया, सिगरेट का कश लिया, फिर बस में सवार हो गया। कानों में ईयर फोन डालकर, रिपीट मोड पर महेन्द्र कुमार की मधुर आवाज में ‘गुमराह’ फिल्म का गीत शुरु कर दिया-
‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।’
मुझे जाना उस शहर है, जो पहाडियों की तलहटी में बसा है और अपने में गजब का सौन्दर्य समेटे हुए है। जहाँ कभी दो जवाँ दिल धडके, सुलगे थे और उस दिन उसके कंठ ने एक अद्भूत राग छेडा था और मैं उस राग में सराबोर हुआ था। उसकी स्मृति मात्र से छलक जाती हैं बरसात की बूँदे, पलकों की कोर पर।
बस ने थोडा फासला तय किया होगा कि मेरी भी आँख लग गई। नींद भी बडी अजीब ची*ा होती है। कई अच्छे प्रसंग तो कम्बख्त इस नींद के कारण अधूरे रह गये। रतनपुर बॉर्डर में एंट्री करते ही रोड शायद ऊबड-खाबड था, बस तरुणी की तरह हिचकोले खाती हुई चल रही थी। मेरा सिर काँच से टकराया तो नींद में व्यवधान पडा। आँखे मसली, घडी में देखा, अभी रात बाकी है। जाहिर है, कम से कम तीन घण्टे और लगेंगे दिन फूटने में। अभी भी शब पर सन्नाटा छाया हुआ है। बस सर्द गुबार को चीरती हुई भागी जा रही थी।
सुबह के आठ बज गए थे। यहाँ शीत थोडा कम है। उदियापोल पर बस से उतरा भी नहीं था कि रिक्शा वाला सामने आ खडा हुआ। मेरे पास अपना लगेज था। मैं बस से नीचे उतर आया। मैं यहाँ मेरे प्रिय मित्र पीयूष की शादी में शरीक होने आया था। उसने जब शादी का निमंत्रण पत्र भेजा, तब साफ लिखा था कि शादी में नहीं आया तो फिर देखना। अब इस ‘देखना’ शब्द का मतलब मैंने मेरे तंई निकाल लिया। हालाँकि सफर बहुत लम्बा था। तकरीबन आठ सौ किलोमीटर। आने का मन तो नहीं था , लेकिन दो बातें थी। एक तो इस ‘देखना’ शब्द का दबाव जो मुझसे सहन नहीं हो रहा था। दूसरा इस शहर से जुडी यादें, जिन्हें अपने आप से अलग करना चाहूँ पर कभी कर नहीं पाया। आँखे मूँदकर भीतर झाँकने की कोशिश की, एक सलोनी छवि
आज भी हृदय में विद्यमान है। उसके साये में मैंने स्वयं को सदैव रोशन होते देखा है। उसके होने मात्र से मेरे अन्दर का आषाढ भीगने लगा था और मन हमेशा हिरन की तरह कुलाँचे भरने लगता था। उसे गाने का बहुत शौक था। रात भर अपनी मधुर आवाज में मुझे अलग-अलग रागों से परिचय करवाती थी पर अब तो मन की चित्रशाला में राग-रंग नहीं है। वहाँ मात्र यादों के चित्र गडे रह गए हैं। यादें भी जैसे उजाड में संग्रहालय बनकर रह गई हैं।
‘‘किधर चलना है साब!’’ ऑटो वाले ने पूछा।
‘मीरा गर्ल्स कॉलेज के सामने वाली गली में।’
‘आइए बैठिए!’ कहते हुए उसने मेरा लगेज ऑटो में रख दिया था।
‘अरे! तुम ने बताया नहीं कितना चार्ज लगेगा।’
‘क्या साब! सुबह का टाईम है, शुरुआत आफ हाथ से होनी है, पचास रुपया लगता है। जो भी जी आए, दे देना।’
ऑटो में बैठा मैं उसकी ‘जो भी जी आए दे देना’ वाली बात पर गौर कर रहा था। सोच रहा था, धर्म संकट वाला मामला है। सुबह का वक्त भी है, पचास से कम देना भी ठीक नहीं होगा। मैं भी उसे अपने तंई कहाँ निराश करने वाला था।
रास्ते में सिगल पर ऑटो थोडी देर लाल बत्ती के हरा होने के इन्तजार में खडा रहा। यह चेटक सर्कल था। मैंने नजर दौडाई। सिगल के दाँई और ‘चेटक सिनेमा’ हुआ करता था। अब वह नहीं रहा, उसे तोड कर शायद कॉम्पलेक्स बनाया जा रहा है। पाँच सालों में बहुत बडी तब्दीली आई है। सिनेमा वाली जगह दिखी तो मन अतीत की स्मृतियों को कुरेदने लगा। यादों का सिरा पकडे, मैं आज तक उसकी रोशनी के कतरे तलाश रहा हूँ। यादें उसके आस-पास भटक कर दो अश्रु-कणों में बह
जाती हैं।
दस साल इस शहर में रहा था। इस शहर को अन्दर बाहर से समझने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगा।
तब यहाँ इतनी चकाचौंध भी नहीं थी। समय के चक्र के साथ इस शहर ने विश्व पटल पर अपनी रेखाएँ खींच दी हैं। उन दिनों यहाँ मात्र यही एक टॉकीज हुआ करता था। यहीं पर मैंने सुरभि के साथ पहली फिल्म देखी थी बालकनी में बैठकर।
वह शायद दिसम्बर का कोई शनिवार था। वह हॉस्टल में रहती थी। हॉस्टल की चीफ वार्डन लडकियों को ज्यादा समय तक बाहर नहीं रहने देती थी। उन्हें आठ बजे तक किसी भी हालत में हॉस्टल में पहुँच जाना होता था। शनिवार को ही उसने वार्डन से कह दिया कि आज वह घर जा रही है, सोमवार तक लौट आएगी। शाम को पाँच बजे वह अपना बैग उठा कर मरे कमरे पर आ
गई थी।
‘आज तुम आ गए हो तो अपने हाथ से खाना भी बना कर खिला दो।’
‘क्या? खाना! मुझे कौनसा खाना बनाना
आता है।’
‘फिर तुम्हें क्या आता है? हमारी शादी हुई तो मुझे खाना बना कर कौन खिलाएगा?’
‘कौन खिलाएगा का क्या मतलब? बाहर से मँगवाएगें।’
‘क्या पुरुष शादी इसलिए करते हैं कि घर में पत्नी के होते हुए, उन्हें खाना बाहर से मँगवाना पडे।’
‘पुरुषों की तो पुरुष जाने मैं तो अपनी बात कर रही हूँ।’
उसकी बातें सुनकर एक पल मुझे अपनी माँ की याद आ गई। कितना सारा घर का काम करती है और एक यह है आधुनिक भारतीय नारी, जिसे खाना तक बनाना नहीं आता।
‘अरे! महाशय, कहाँ खो गए? मैं तो यूँ ही मजाक कर रही थी। खाना तो बाद में, पहले मैं तुम्हारे लिए एक कप चाय अभी तैयार किए देती हूँ।’
उस दिन पहली बार उसके हाथ की चाय पीकर मन को कल्पना के पंख लग गए थे।
‘मैं खाना भी स्वादिष्ट बनाती हूँ, पर आज नहीं। आज तो मूवी देखने चलना है, ६:३० बजे का शो है ना।’
‘ओह! मैं तो भूल ही गया था, पाँच मिनट में तैयार हो जाता हूँ।’
हम जल्दी से सिनेमा पहुँच गए थे। अब तो मल्टीप्लेक्स का जमाना आ गया है। सिनेमा घर के बाहर मुख्यद्वार के ऊपर रंगीन पर्दा लगा हुआ था, जिस पर फिल्म के नायक-नायिका का चित्र बना हुआ था। अभिनेत्री थोडे अल्प वस्त्रों में थी, जिससे पोस्टर का बोल्ड वातावरण अंगडाइयाँ ले रहा था। मैं टिकिट विंडो पर जाता, उससे पहले ही उसने मना कर दिया- ‘‘पोस्टर इतना गंदा है
तो फिल्म कितनी गंदी होगी? चलो फतहसागर घूमने चलते हैं।’’
‘अरे! क्या फतहसागर चलते हैं? किसने कहा कि फिल्म गंदी है?’
‘तुम तो पागल हो, पोस्टर नहीं दिखता क्या, कितना खराब सीन दिया है।’
‘ओह! कितनी भोली हो तुम। फिल्म वाले इस तरह का पोस्टर बाहर नहीं लगाएँगे तो लोग फिल्म की ओर कैसे आकर्षित होंगे? वैसे फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो। टीवी पर कई दिनों से इसका एड भी आ रहा था। रिव्यू में भी इसे अच्छी बताया गया है। कसम से!’
वह मूवी देखने में थोडा असहज महसूस कर रही थी परन्तु मैंने जैसे-तैसे उसे मना लिया। उसके चेहरे पर अचानक मुस्कान थिरकी और वह मान गई।
सिनेमा हॉल में बालकनी तो जैसे हमारे लिए ही सुरक्षित थी। हॉल में एकाध सिर इधर-उधर बिखरे नजर आ रहे थे। फिल्म थोडी ही चली थी कि गीत आ गया। गीत आया जो आया, मेरे लिए मुसीबत की घंटी बजा गया। नायक नायिका दोनों आलिंगनबद्ध, शांत धडकनों में उत्तेजना का संचार करता दृश्य! अचानक उसने मेरी आँखों पर अपनी हथेली रख दी।
‘आप यह सीन नहीं देख सकते।’ उसने
कहा था।’
जब तक फिल्म खत्म हुई, मेरे साथ यही चलता रहा। उस दिन तो मैं वह मूवी आधी-अधूरी ही देख पाया। फिर एक दिन अपने दोस्तों के साथ जाकर अच्छी तरह देखी। यह फिल्म सुरभि के साथ मेरी पहली और आखरी फिल्म थी। छोटी-सी तकरार को लेकर उसने मुँह क्या मोडा, दोस्ती के गहरे और मजबूत रिश्ते का तार-तार कर गई। वह मुहब्बत की मिसाल थी पर उसने वापस कभी मेरी ओर झाँक कर नहीं देखा। इस बात को पाँच वर्ष गुजर गये। पता नहीं वह कहाँ होगी पर मैं हूँ कि आज भी मुझे उसके साथ तक का इंतजार है। कभी सोचता हूँ कि यह जदगी भी क्या जदगी है, जो उसके बिना
गुजारनी पडे।
‘साहब कौनसे मकान के बाहर रोकना है, बता देना।’ ऑटो वाले ने कहा।
‘उस सामने वाले मकान के बगल में ही
रोक देना।’
पीयूष मुझे देखते ही सामने दौड आया और बाँहों में जकड लिया।
‘मुझे पता था, तुम अवश्य आओगे। मेरे लिए न सही, पर किसी खास वजह के लिये और हाँ... तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है।’
‘और वो क्या खबर है?’
‘शाम को तुम्हें अपने आप पता चल जाएगा। थके हुए हो, अभी तुम आराम करो।’
‘अच्छा पीयूष! एक बात बात यार, कभी सुरभि दिखाई दी क्या, मेरे जाने बाद।’
‘हाँ... मिली थी, तुम्हारे लिए कोई संदेश दिया था। शाम को रिसेप्शन के समय बताऊँगा।’
अब मेरे लिए यह दिन निकालना भारी पडेगा। मन तो करता है कि अभी दिन ढल जाये और रिसेप्शन शुरु हो। काश! वह आज भी मेरा इंतजार कर रही होगी। उसका हृदय इतना पाषाण नहीं हो सकता।... फिर उसने मुझसे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की? पीयूष को क्या
बताया होगा उसने? ये भी ठहरा नालायक! बात अभी क्यों नहीं बताई मुझे?
मैं बेसब्री से रिसेप्शन शुरू होने का इंतजार कर रहा था। आखिर दिन ढल भी गया और रिसेप्शन में मेरी आँखों ने वो देखा जो पीयूष मुझे दिन में बता नहीं पाया। सुरभि शादी में आई थी। उसके चेहरे का रंग उडा हुआ था। उसके साथ तकरीबन दो साल का सुन्दर बच्चा भी था। बिल्कुल सुरभि पर गया था। मैं उससे आँखें बचा रहा था पर शायद उसे मेरी उपस्थिति का पहले से जायजा था। वह अनिमेष मेरी ओर देख रही थी पर यह बच्चा किसका है? कहीं सुरभि ने....?
पीयूष से मुझे पता चला कि सुरभि जब मुझसे रूठ कर गई, तब घर वालों के दबाव में उसने शहर के एक रईस लडके से शादी कर ली थी पर शादी के तीन साल में ही उनके रिश्ते में दरार पड गई और वह गुमनाम-सी बन कर रह गई।
मैंने कितना समझाया था। उसे हरदम अपना भगवान समझा। उसे हवा की खरोंच तक न लगने दी पर वह मुझे नीचा दिखा गई। मैं उसके दिल और दोस्ती की आज भी कद्र करता हूँ और हमेशा करूँगा। साथ ही कभी-कभी एक अपराधबोध भी मेरे अन्दर जाग्रत होता है, जिसका अहसास मुझे हमेशा सालता रहेगा पर हैरानी है कि वह मुझे अकेला और तन्हा छोड गई। लगता नहीं कि अब किसी और के साथ निबाह हो सकेगा।
उसे नहीं पता कि आज भी मैं उसे कितना प्यार करता हूँ पर आज मेरे कदम उसकी ओर उठ नही पा रहे हैं और होंठ भी खामोश हैं। आँखों में जलधारा लिए, मैंने भी नजरें घुमा लीं। आज मुझे सिर्फ गुलजार याद आये...- ‘कहीं तो उसके गोशा-ए-दिल में दर्द होगा, उसे ये जिद है कि मैं पुकारु, मुझे तकारु है वो बुला ले, कदम उसी मोड पर जमें हैं, नजर समेटे हुए खडा हूँ.....।’
१८१, उत्तरी आयड, रूप वाटिका, सुथारवाडा
उदयपुर-३१३००१ (राज.) मो. ९७९९८२८२९१