एक मुश्किल जवाब

गौरीकांत शर्मा


बहुत सही कहा था मनीषा ने। खुद को मसरूफ रखने के लिए कुछ काम करना शुरू कर। मशविरा कामयाब रहा। जॉब पर जाने से रोशनी को सचमुच बेहतर लगने लगा था। वह चाहती भी तो यही थी। भुला देना चाहती थी बीते कल की टीस को। मनीषा के दिए हौसले ने जदगी को एक बार फिर से पटरी पर ला खडा किया। रोजाना सुबह की तैयारी फिर ऑफिस। खुद को सहेजने की जद्दोजहद में दिन कहीं निकल जाता है। ज्यादा मुश्किलात भी नहीं आई, ११ साल के आशीष और १४ की विनीता को वक्त ने वक्त से पहले ही समझदार बना दिया था। इस तरह दो-तीन साल मुट्ठी से कब सरक गए पता नहीं चला। अनुपम के नहीं रहने का ठहरा हुआ दर्द अब कम चुभने लगा था या यों कहें कि पीछे छूट चला था।
रोशनी अपने नाम की तरह ही रोशनी बिखेरते रंग-रूप लिए माँ-बाप के साये में बिना किसी परेशानी से बडी हो गई थी। ऊपरवाले ने बडी उदारता से उसे सब कुछ दिया था। सुंदरता के साथ बुद्धिमानी का बहुत ही कम पाया जाने वाला गठजोड उसे हमउम्रों की भीड से अलग करता था। अभिभावकों ने कोई कमी महसूस नहीं होने दी। उसने भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने में कसर नहीं छोडी। स्कूल, कॉलेज की कोई प्रतियोगिता, कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं रहा, जिसे रोशनी ने अपनी मौजूदगी से रोशन न किया हो। हर दर्जे में अव्वल, हर काम में सबसे आगे और हँसमुख ऐसी कि दोस्त लोग शहद पर मक्खियों की मानिंद घेरे रहते। पिता कहते कि उनकी बच्ची सात पीढियों का नाम रोशन करेगी। माँ आज के दौर की स्याह घटनाएँ सुन-सुन कर सिहर उठती थी। मन ही मन अपने ईश्वर को याद करती हुई अपने जिगर के टुकडे की खैर माँगती रहती। कहती ईश्वर से कि मेरी उम्र भी मेरी बच्ची को दे देना पर इसके चेहरे पर शिकन की गुंजाइश मत रखना।
तो क्या सभी दुआएँ कबूल नहीं होतीं?
शायद रोशनी के मामले में यही हुआ था। माँ की कई दुआएँ कबूल हुई किंतु कुछ बेअसर रहीं। बेशिकन चेहरे की दुआ माँगी गई थी मगर उस चेहरे पर शिकन की लकीर उभर आई थी। यही कोई तीन साल लम्बी लकीर। उसके बाद तो यह झुर्रियों के रूप में चिपक कर रह गई। कबूली गई दुआओं
में अच्छे घर के अनुपम से रोशनी का ब्याह और विनीता-आशीष शामिल थे। जो नहीं कबूली गई वो अनुपम की अचानक उभर आई बीमारी के तौर पर सामने आ डटी। जिस बेटी पर खुद की देखभाल का भार तक नहीं पडने दिया, उसी पर दो बच्चों की परवरिश के साथ ही असाध्य रोग से पीडित पति की देखभाल का पहाड टूटा। माँ का कलेजा जार-जार हुआ जाता था।
विनीता गर्भ में थी तब माँ ने रोशनी को फूलों की तरह अपनी हथेली पर रखा। यह सोच कर कि पहली बार विशेष ख्याल रख लूँ, अगली बार खुद ही अपनी देखभाल कर लेगी। माँ को याद है बचपन से लेकर आज तक एक छींक पर रोशनी के पिता का दिल हूक उठता था। बडे नाज के साथ पली है लाडो। तभी इतनी चिंता रहती है। झुँझला कर कभी बोल भी देती कि माँ अब बच्ची नहीं हूँ मैं, तू खामखाह परेशान न हो। खुद का ख्याल रख लूँगी मैं। पर माँ तो आखिर माँ है। आज तक कई अपनी माँ से ज्यादा समझदार और जिम्मेदार बन पाया है भला? मीठी डपट के साथ माँ लगी रहती उसकी देखभाल में।
जब कोमल सी विनीता ने पहली किलकारी भरी तो खुशी के आँसू से आँखों की कोरें भीग गई थी माँ की। उसे अपनी पहली प्रसव पीडा याद आ गई थी शायद। घर में यों तो कोई कमी नहीं थी और सास भी उसे अच्छे ढंग से रखती थी। बस दादी सास थोडी तानाशाह किस्म की थी। घर को घर बनाने में दादी सास ने बहुत त्याग किया था। कई समझौतों की नींव पर खडा था उसका जीवन। यही वजह थी कि परिवार को भविष्य के लिए सजग रहने की हिदायत देने की कोशिश में वह थोडी सख्त मिजाज हो गई थी। बुढापे का भी तो असर था। दादी सास ने अपने जमाने की रवायत का हवाला देते हुए गर्भवती पतोहू के खानपान पर होने वाले खर्च पर लगाम कसे रखी और शरीर को हरकत में रखने के लिहाज से काम में झौंके रखा। आखिरकार कमजोर माँ का पहला बच्चा सातवें महीने में दो दिन तक उसे माँ होने का अहसास
कराने के बाद सदा के लिए छोड गया। दादी सास के सिधारने के बाद माँ ने रोशनी को जन्म दिया लेकिन तब तक वह ठान चुकी थी कि उसके साथ जो हुआ वह अपनी संतान के साथ दोहराने नहीं देगी। रोशनी का इतना ख्याल रखने के पीछे यही वजह रही थी।
जिन हालात से रोशनी दो चार हो रही थी, माँ उनके बारे में सोच-सोच कर हलकान हुई आती थी। मन में सवालों का गुबार उठता था। कोई जवाब नहीं मिलता। वह खुद को उस गुबार में गुम पाती। बेटी के भविष्य को लेकर दिल बैठा जाता। बिन सास-सासुर के घर में गुजर-बसर के लिहाज से कोई कमी नहीं थी लेकिन घर के मुखिया का बिस्तर पकड लेना किसी त्रासदी से कम नहीं था। अचानक आए इस तूफान से रोशनी की जदगी बिखरने लगी। माँ-पापा ने इकलौती संतान की हिचकोले खाती जदगी की पतवार बनने की भरपूर कोशिश की। लेकिन पुरानी पतवार कब तक साथ देती। बेटी की बेबसी का बोझ लिए एक के बाद एक छह माह के भीतर ही दोनों इस जहान को अलविदा कह गए। रोशनी पर मानों कयामत बरपा गई हो।
तीन साल.... हाँ पूरे तीन साल तक रोशनी ने दिन देखा न रात। डॉक्टर्स की तमाम उन बातों को दरकिनार करते हुए- जो उम्मीद को बुझाने वाली होती, रोशनी ने अनुपम की खूब सेवा की। माँ-पिता के अवसान के बाद भी नहीं टूटी। इस विश्वास के साथ कि वह किस्मत से जीत जाएगी। लेकिन किस्मत की रफ्तार उसकी सेवाटहल की गति से तेज थी। इस तेजी ने उसकी खुशियों पर विराम लगा दिया था। किसी दरवाजे-खिडकी से खुशियाँ झाँकती न थी। दोनों बच्चे भी बडे होते जा रहे थे। घर में पसरे सन्नाटे में दोनों मासूमों का बचपन सहमा-सहमा बढने लगा। उस दौर में रोशनी में पता नहीं कहाँ से ताकत आ गई थी, जिसके बूते पर सारी कठिनाइयों से जद्दोजहद करती रही मगर टूटी नहीं। मनीषा ने उसे टूटने नहीं दिया। ईश्वर द्वारा रोशनी को दी गई नेमतों में से एक थी मनीषा। पक्की दोस्त। दाँत-काटी रोटी सी।
इस खयाल से कि कहीं बच्चों की परवरिश में कमी न रहे और अनुपम की देखभाल भी होती रहे, रोशनी ने अपने चहरे पर एक स्थायी मुस्कान ओढ ली थी। यही मुस्कान तब शिकन में तब्दील हुई, जब अनुपम की चला-चली की बेला आई। आखिर दस दिन का घोर कष्ट भोगने के बाद अनुपम चला गया। पीछे छूट गई रोशनी के चेहरे पर शिकन की लकीर। जिस उम्र में सपनों की परवाज अपने अंजाम की ओर बढती है, रोशनी के आकाश की हद खत्म हो गई। विराट शून्य सामने खडा था। आकाश के पार किसी बलैक हॉल की तरह।
कहते हैं कि जाने वाले के साथ जाया नहीं जाता। और किसी के जाने से जदगी का सिलसिला नहीं रुकता। एक अस्थाई ठहराव सा जरूर आता है मगर जदगी चलती रहती है। तीन सालों से लगातार चलती जा रही रोशनी इस ठहराव पर पस्त होकर पड जाना चाहती थी। मगर बच्चों के भविष्य की चिंता उसे समय के साथ चलने को विवश कर रही थी। किसी तरह उसने बिखरी जदगी को समेटा और मनीषा की सलाह पर जॉब शुरु किया।
इंसान आता अकेला है मगर यहाँ गुजर-बसर के लिए साथ चाहता है। यह अजीब-सी लेकिन सच बात है कि नितांत अकेलेपन से हमें डर लगता है। रोशनी की जिंदगी पटरी पर सरपट दौडने तो लगी लेकिन तन्हा शामें कभी-कभार खलने भी लगीं। बच्चों से बहलाव अपनी जगह लेकिन खुद के मन का क्या..? बयालीस साल कोई ज्यादा उम्र नहीं होती। जिंदगी में जाने कितनी शामें और रातें इसी तरह तन्हा कटी हैं, यह सोच कर ही रीढ की हड्डी में सिरहन सी होने लगती। ‘क्या किसी को साथी बना लेना चाहिए?’- यह सवाल उसके जेहन में गाहे-ब-गाहे उठने लगा। लेकिन यह इतना आसान भी न था। बहन सी सहेली मनीषा के मशविरे भी रास्ता दिखाने में नाकाम साबित हो रहे थे। उधर युवावस्था की दहलीज की ओर बढ रही बेटी ने खुद के इर्द-र्गिद अपनी दुनिया बना ली, जिसमें माँ की बजाय फ्रेंड्स के लिए ज्यादा जगह
थी। बेटा जरूर करीब लगता था लेकिन जानती थी कि वह भी अगले कुछ सालों में ऐसी ही अपनी दुनिया में गुम
हो जाएगा।
ऐसे में विनय किसी ताजा हवा के झौंके की तरह रोशनी की जिंदगी में दाखिल हुआ। सहकर्मी विनय के साथ दफ्तर में वह काफी सहज महसूस करती लगी। एक प्रोजेक्ट पर दोनों एक साथ काम कर रहे थे, लिहाजा वक्त भी ज्यादातर साथ ही गुजरता था। रोशनी को अब घर की बजाय दफ्तर बेहतर लगने लगा। तलाकशुदा विनय के एक बेटा है, लेकिन उसे उसकी बीवी अपने साथ ले गई। सिलसिला कुछ यों चला कि ऑफिस का काम घर तक आने लगा। काम के साथ विनय भी। अनकही बात मानों दोनों समझ गए और अनजाने ही एक-दूसरे का ख्याल रखने लगे। देर तक ऑफिस में काम तो कभी-कभार साथ में डिनर पर जाना इस सिलसिले में शामिल हो गए। हसरतों को पंख लगे तो रोशनी जदगी को नई दिशा देने की कोशिश में लग गई। उसने विनय को अनुपम की जगह देने का फैसला मन ही मन कर लिया। शायद विनय भी यही चाहता था। रोशनी का दिल कहता कि यकीनन वह यही चाहता था।
कई सवाल भी मुँह बाये आ खडे हुए। सोचती कि वह जो कर रही है, क्या सही है? जब वीरान सी लम्बी राहों का खयाल आता तो उसे अपना फैसला जायज लगने लगता। विनय को इस तरह अपनी जदगी में जगह देना उसके बच्चों के भविष्य के लिहाज से ठीक है या नहीं, यह उधेडबुन भी चलती रहती। कई दिनों से बच्च से इस बारे में बात कर उनकी राय जानना चाह रही थी। उसके मुताबिक उसने बच्चों को अनुपम की लंबी बीमारी के दौरान और उसके जाने के बाद माँ-बाप दोनों का भरपूर प्यार दिया है। बेहतर परवरिश के बूते वह मानती थी उसके हर फैसले पर बच्चे आसानी से स्वीकृति दे देगें।
उस रोज रोशनी ऑफिस से घर के लिए जरा जल्दी निकली। उसने तय कर लिया कि बच्चों को बता कर ही रहेगी कि वह विनय अंकल को अपने घर, अपनी
जदगी का हिस्सा बनाना चाहती है। घर पहुँची तो देखा कि वहाँ का नजारा ही अलग था। विनीता ने अपने कमरे ही नहीं, पूरे घर में अफरा-तफरी मचा रखी थी। सारा सामान उलट-पुलट, अस्त-व्यस्त और ऊपर नीचे। गुस्से से पाँव पटकती बेटी को देखकर रोशनी को समझ नहीं आया। उसने प्यार से बेटी को बाँहों में भरकर थपकी दी और बोली- ‘‘क्या हुआ मेरा बच्चा, इतना गुस्सा किस बात पर ?’’
‘‘आप हमें छोडकर चली जाएगीं न ममा?’’ बेटी ने सीधा सवाल दागा।
‘‘नहीं तो मेरा बच्चा, मैं आपको छोडकर कहीं नहीं जाने वाली। मगर बात क्या है ये तो बताओ!’’ रोशनी ने बडे ही प्यार से पूछा।
‘‘वो मेरी क्लासमेट है ना अदिति, झूठी कहीं की! कहती है कि तेरी ममा तो विनय अंकल से शादी करने वाली है। फिर वो आशीष और तुझे छोडकर चली जाएगी। मेरा उससे झगडा भी हो गया इस बात पर। उसे दो चाँटे मारकर मैंने कहा कि मेरी ममा वर्ल्ड की बेस्ट ममा है। वो हमें छोडकर कहीं नहीं जाने वाली। उसे सही जवाब दिया न ममा मैंने?’’ एक ही साँस में पूरी बात कहते हुए विनीता फफक पडी। उसने आँसुओं से तर चेहरा रोशनी के सीने में छुपा लिया और सुबकने लगी। रोशनी ने बडी कठिनाई से खुद को संभाला। वह समझ गई कि सुगंध की तरह हवा के साथ बात फैल चुकी है और अंजाम दुर्गंध की तरह सामने न*ार आ रहा है। इस घटनाक्रम की उसने कल्पना भी नहीं कि थी। बेटी को सीने से चिपकाए वह सोफे पर ढेर हो गई। विनीता की प्रतिक्रिया ने उसे झकझोर कर रख दिया। बेटी द्वारा अदिति को दिए जवाब से उपजे सवाल का उसे कोई जवाब नहीं सूझा। दिमाग में ढेरों सवाल आ खडे हुए। बच्चों की रजामंदी का जो उसे यकीन था, एक झटके में बिखर गया। अब वह विनय
को दिया जाने वाला जवाब सोच रही थी, जो वाकई मुश्किल था।
‘मातृछाया’, शिक्षा निकेतन के पीछे, पानेरियों की मादडी
उदयपुर (राज.) मो. ९४६११८०७४७