लाँचिंग

संगीता सक्सेना


‘‘किस सोच में डूबे हो भाई?’’ पीछे से आते प्रकाश ने चाय की थडी पर पडे टीन वाले स्टूल पर बैठे अविनाश के धौल जमाई। ‘‘डूबने उतराने के दिन तो तेरे हैं यार। मैं तो बस काम धंधे की सोच रहा था कि जाऊँ या नहीं?’’ अविनाश ने प्रकाश की आँखों की खुमारी महसूसते हुए कहा। हफ्ते भर पहले ही प्रकाश का ब्याह हुआ था। सो घर की व्यस्तताओं के चलते वह काम धंधे से कटाव किए हुए था। जयपुर में रहते दोनों दोस्तों का दस बरस का लंबा साथ था। सुख-दुःख का साथ निभाया था दोनों ने। रहते भी साथ ही थे। हाउसिंग बोर्ड के ई डब्ल्यू एस डी मकानों में। काम भी एक ही था- सामान ढोने वाली गाडियों की ड्राइवरी। बँधे हुए कमीशन के आधार पर खूब काम मिल जाता था, ठेकेदार के मार्फत। अलग-अलग कंपनियों की गाडियों से माल बताई हुई जगह पहुँचाते-पहुँचाते वे दोनों राजस्थान के ज्यादातर इलाकों से वाकिफ हो गए थे। माल समय पर डिलीवर करने के कारण ठेकेदार भी अच्छे ऑफर सबसे पहले उन्हें ही देता। उसकी भी साख का मामला जो था।
‘‘अब कुछ बोलेगा भी यार’’ प्रकाश ने भी चाय वाले को चाय का ईशारा कर वहीं बैठते हुए कहा ‘‘एक नई कोल्ड ड्रिक की लाँचिंग है। बाडमेर में कल शाम को छः बजे। सप्लाई यहीं से जानी है कल सुबह १० बजे।... घंटे का रास्ता है। लाँचिंग तक पूरी गोपनीयता रखी जानी है। ठेकेदार फेरी का डबल पैसा देने का लालच दे रहा है। कोई और जाने को तैयार नहीं है। मैं भी अकेला हूँ। एक तो बिल्कुल समय पर माल पहुँचाने की बात नहीं तो लाँचिंग नहीं हो पाएगी। दूसरे ठेठ रेगिस्तानी रास्ता। उस पर जेठ की सूखी लू भरी हवाएँ।’’ गरमी तो यहीं तेवर दिखा रही है रास्ते में क्या होगा?’’ अविनाश ने एक साँस में सारी आशंकाएँ सामने रख दी। ‘‘तो चल न, मैं चलता हूँ भाई, वैसे भी हफ्ता भर हो गया बैठे-बैठे। मैं भी सोच ही रहा था कल परसों से काम पर आने की। अपने जैसे मजूर कमाएगें तो ही जीएगें न।’’ ‘‘नहीं यार तू रहने दे, भाभी को आए अभी चार दिन ही तो हुए हैं। तू मौज मना। कोई और मेरे साथ जाने को राजी हुआ तो ठीक नहीं तो जरूरी तो नहीं इतनी रिस्क लेकर जाया ही जाए माल लेकर।’’ अनिच्छा जताई अविनाश ने। ‘‘शादी में खरच-खरच के कडकी हो गई यार। फिर काम तो करना ही है। डबल पैसे मिल रहे
हैं तो क्यों छोडा जाए भाई। ऐसे मौके बार-बार नहीं
आते भाई।’’
‘‘सोच ले.... तेरी नई-नई शादी, भाभी बुरा मान जाएगी...अभी और कर लेना छुट्टी दो चार दिन।’’
‘‘उसकी फिकर छोड तू मैं समझा दूँगा उसे। ठेकेदार को हाँ कर दे। कल चलते हैं।’’ प्रकाश ने अविनाश के खाली गिलास में अपना गिलास टिकाया।
मामला सब तय हो गया। अगली सुबह दोनों सवा आठ बजे काम पर जाने को निकले। साथ में था दरारें खाई कोल्ड ड्रिंक्स की पुरानी बोतलों में भरा ठण्डा पानी। रेगिस्तानी तपिश से लडने का हथियार। अविनाशको विदा दे रहे थे तीन जोडी छोटे-बडे हाथ, उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चों के। प्रकाश को विदा दे रहे थे माँ की आशीषें और नेह राग लिपटी दो आँखें किवाडों की ओट से। सबसे विदा ले दोनों ठेकेदार के ठिकाने की ओर चल पडे पैदल-पैदल गाडी उठाने को।
क्या शानदार गाडी थी? अंदाजन बारह बाई छः फूट की। इतनी जगह में तो उनकी पूरी गृहस्थी रह जाए- सोचा प्रकाश ने। छोटे-बडे बुलबुलों के बीच ढक्कन खुली दो बोतलें। बोतलों से छलकता रंगीन पेय। रंगीन पेय को पीने लपकती छोटे और कसे कपडों में छरहरी बाला- देख के ही नशा हो जाए। तृप्त से तृप्त व्यक्ति की प्यास जगा दे। गाडी के तीनों तरफ ऐसे ही खनकते विज्ञापन। पता ही नहीं चल रहा अंदर सामान रखने का दरवाजा किधर है? दोनों को गाडी को फटी-फटी आँखों से निरीक्षण करते देख ठेकेदार बोला, ‘‘क्यों भइया मजा आ गया न गाडी देखकर ही। मल्टीनेशनल कम्पनी की है। पीछे पूरा का पूरा फ्रीजर है। ताकि गरम रास्ते से गुजरने के बाव*ाूद शाम को लाँचिंग तक बोतलें चिल्ड बनी रहें।’’ ‘‘और आगे?’’ ‘‘आगे ड्राइविंग सीट तो नार्मल है।’’ ठेकेदार का जवाब सुनकर प्रकाश के मुँह पर गन्दी सी गाली आते-आते रुकी, ‘‘साले हरामजादे.... इसे भी ए.सी. बना देते तो कमीनों का क्या घिस जाता।’’ प्रकाश का ए.सी. में ड्राइवरी
करने का अभी-अभी देखा सपना तुरंत टूट गया। ‘‘पर इसका दरवाजा कहीं दिखाई नहीं दे रहा?’’ अविनाश में धैर्य रखने का माद्दा प्रकाश से अधिक था। ‘‘भइया है तो पीछे ही पर गाडी ऐसे डिजाइन की है कि पता न चले और न ही कोई खोल सके इसे। यहाँ से कम्पनी के अधिकारी ने कोड से बन्द किया है इसे। वहाँ दूसरा अधिकारी कोड से ही खोल सकेगा इसे। अभी पूरी गाडी को कवर से ढका जाना है। समझ लो बडी गोपनीय चीज ले जा रहे हो तुम लोग।’’ ठेकेदार खामखाह फूल रहा था। गोपनीय काहे की? लाँचिंग के बाद तो सब देख ही लेंगे।’’ ‘‘पर तब तक तो सात तालों में बंद दुल्हन ही है न भाई। चलो अब निकलों तुम दोनों सफर पर नहीं तो देर हो जाएगी। मिनट- मिनट बँधा हुआ है।’’
प्रकाश बैठा ड्राइविंग सीट पर और अविनाश उसकी बगल में। दोनों निकल पडे अपनी पीठ पर ठंडी बोतलों का ढेर लादे। उस पर बनी बाला प्रकाश को अपनी नई-नई बाला की गुनगुनी याद दिला रही थी। उसी के लिए कुछ अच्छा कर पाने की चाह में ही तो वह आज इस फेरी पर निकला था। अविनाश ने गरमी से लडने के अपने हथियार चेक किए। दो बोतलें तो थी हीं। ठेकेदार ने एक और देकर दरियादिली दिखायी। पर पानी अभी से गरम होने लगा। सूरज के चढते-चढते सुबह की ठंडक गर्म हवाओं में तेजी से तब्दील होती जा रही थी। ये तब्दीली अविनाश की चिंताएँ बढा रही थी। उसने साथ के ड्राइवरों से सुन रखा था, इस रास्ते की भयावहता के बारे में। इसीलिए टाल रहा था। पर जब प्रकाश ने साथ देने की बात की तो उसके मन में भी लालसा जाग गई डबल कमाई की। इस रास्ते के रेत के टीले के टीले कब जगह बदल लें तेज हवाओं से पता न चले। ईश्वर न करे इन बदलते टीलों के नीचे कोई जीव आदमजात हो या चौपाया फँस जाए। पूरे रास्ते में न बावडी न नल। पानी के नाम पर पसीना-पेशाब भी नसीब न हो। बस टीलों के बीच सर्प सी लहराती पतली काली सडक दिखाई देती थी। सडक पर
हर फलांग पर ललचाती मरीचिका। ऐसे रेतीले इलाके में ड्राइवरी पर दोनों ही पहली बार निकले थे। सडक के दोनों किनारों पर हवा से उडती भागती रेत वैन की गति से टक्कर लेने की कोशिश में लगती। रेत की इन पहाडियों/ ढूहों में हरियाली के नाम पर कुछ नजर आता था तो बस नागफनी। वो भी वहाँ जहाँ रेत को लम्बे समय तक एक जगह पर इकट्ठा रहने का मौका मिल पाया था। अविनाश जल्दी से जल्दी इस रेतीले खतरनाक समुद्र को पार कर जाना चाहता था। सफर पर निकले डेढ ही घंटा हुआ था पर... घंटे का रास्ता गर्मी के मारे लंबा लगने लगा।
तीन बजे तक घूँट-घूँट गला तर करते दो बोतले खाली हो चुकी थी। प्रकाश के थकने पर अब गाडी अविनाश चला रहा था। प्रकाश के दुबारा बोतल के हाथ लगाते ही अविनाश बोला, ‘‘यार रहने दे थोडा, खत्म हो गया तो क्या करेंगे?’’ ‘‘पीठ पर जो दुल्हनियाँ लादे जा रहे हैं वो साली कब काम आएगी? उसी से बुझाएंगे प्यास’’ ‘‘छोड दे बेटा उसकी आस। फटकने भी न देगी वो पास।’’ गर्म वातावरण में यह हास-परिहास ठंडे छींटे दे गया। पर बहुत देर तक सिर्फ तसल्ली से काम नहीं चलता। कुछ दूर बढते ही प्रकाश का जी घबराने लगा। गाडी रोकते न रोकते उसे उल्टी हो गई। बोतल का बचा पानी काम आ गया।
‘‘रास्ते में कोई झुग्गी-झोंपडी ही नजर आए तो पानी की जुगाड बिठाता हूँ। जब तक हिम्मत रख प्रकाश।’’ खुद बैचेनी और घबराहट को छिपा अविनाश ने प्रकाश की हिम्मत को बनाए रखने के लिए कहा। ‘‘नहीं भाई अब बर्दाश्त नहीं होता सिर भयंकर भारी हो रहा है। भीतर सब कुछ सूखा-सूखा लग रहा है।’’ प्रकाश के हाथ पैर ढीले पड गये थे। अविनाश ने उसके माथे पर हाथ लगा देखा तो तेज ताप था या धूप से गर्म था पता नहीं चला। उसे प्यार से थपथपा कर गाडी की स्पीड फूल कर दी। गाडी तीनचार किमी ही चली होगी कि ढिचाक...ढिचाक...ढिच..ढिच... बंद हो गई।
‘‘अरे! यह क्या?’’
‘‘ओफ्फो! शायद टंकी खाली हो गई होगी?’’
‘‘टंकी तो फुल कराई थी ना अपन ने?
फिर क्या?’’
स्टार्ट करने की हर कोशिश नाकामयाब होने के साथ प्रकाश अविनाश की चिंताएँ कोढ में खाज के जैसे बढ रही थी। हलक सख रहा था।
‘‘टंकी ही खाली हो गई है यार।’’
‘‘पर फुल कराई थी न।’’
‘‘इंजन नया है न ज्यादा खपत ले गया।’’
‘‘अब?’’
‘‘अब क्या? जहाँ पेड न पंछी, ढोर न डंगर , पानी न पसीना, वहाँ डीजल क्या मिलेगा?’’
‘‘अविनाश क्या करेंगें अपन? पानी पहले ही खत्म हो चुका है।’’ प्रकाश की भयभीत घुटी आवाज दूर कहीं कुएँ से आती लग रही थी। सारा दारोमदार अविनाश पर ही था। ढाढस दिया उसने प्रकाश को, खुद को।’’, कोई गाडी या ट्रक निकलता है तो उससे तेल माँगते हैं और कोई चारा भी नहीं है।’’ वैसे उसे पता था कि आधे घण्टे से उहें क्रास कर कोई वाहन नहीं गुजरा है। ये उम्मीद करना जेठ के महीने में बारिश की उम्मीद करने जैसा है।
अविनाश बडी देर से लघुशंका को रोके हुए था। वहीं पास ही निबट कर आया तो देखा प्रकाश की आँखें मुंद सी गई हैं। ‘‘प्रकाश..प्रकाश क्या हुआ?’’
‘‘कुछ नहीं नींद आ रही है।’’ ‘‘पागल है क्या? ऐसी झुलसन में नींद कैसे आ सकती है तुझे?’’
‘‘उठ, अभी अपने डीजल का इंतजाम
करते हैं।’’
‘‘डीजल का भी, पानी का भी।’’
‘‘हाँ.. हाँ पानी का भी।’’ उसकी आँखें बंद होने साथ-साथ उसकी बोली भी बंद हो गई।’’
‘‘हे भगवान! क्या हो रहा है? मेरे दोस्त को थोडी हिम्मत दो। ऐसे तो कहीं ये....। ऐसे भुनते-भुनते मैं भी गया यहीं तो... दोनों का ही...। नहीं नहीं हम दोनों को
जरूरत है बस पानी की। फिर सब ठीक हो जाएगा। भाड में गई लाँचिंग और ऊपर से गई डबल मजूरी। जब जिंदा ही नहीं रहेंगे तो इस दुनियांदारी से क्या मतलब।’’ अकेले ही सोचने वाला और अकेले ही करने वाला बचा अविनाश।......... ढोकर ले जा रहे हैं ठंडा पेय और खुद प्यासे मर रहे हैं। उसने पास पडा नुकीला पत्थर उठा लिया गाडी का लॉक तोडने के लिए। पर दिखे तो टूटे न। अंदाज लगाकर वैन के पीछे की दीवार पर पत्थर के ताबडतोड कई वार किए। खुलना तो दूर एक जुम्बिश तक नहीं आई। खुल जा सिम-सिम जैसे तिलस्मी मंतर की मूठ जो मारी थी इसमें, खुलता कैसे? हर तरफ से गाडी इतनी मजबूती से बंद कि छेद तक न हो सके। मृत्यु से भी अधिक हठीली, अधिक गठीली थी कोल्ड ड्रिंक की यह गाडी। नहीं हो सकता कुछ। समय बढ रहा था और अविनाश की चिंताएँ भी। लाँचिंग की नहीं। जिंदा बचने की। अब तो बस एक ही धुन, चैतन्यता रहते बस कैसे न कैसे किसी बस्ती में पहुँच जाएँ और पानी मिले। गाडी से जूझकर थकहार कर बैठ गया अविनाश। अपना और ज्यादा खून पानी सुखाने से कुछ फायदा नहीं था। प्रकाश को छूकर देखा। नब्ज चल रही थी पर चेतना नहीं थी। वह पछता रहा था। डीजल का एक केन भी रख लेता तो ठीक रहता। दूसरी गाडी की राह देखते आधे से अधिक घंटा निकल गया था कि हवाओं में घुली मिली किसी वाहन की आवाज सुनाई पडी। सारी शक्ति बटोर अविनाश उठ खडा हुआ उसे रोकने। ट्रक ही था। बीच सडक में खडे होकर दोनों हाथ हिला-हिला कर रुकवा ही लिया उसे। पानी तो ट्रक वाले के पास भी नहीं था पर खलासी की समझदारी से डीजल का एक केन दस लीटर वाला जरूर रखा था। डबल रेट में केन को खरीदा जाना तय हुआ। तभी प्रकाश की बिगडती हालत देखकर अविनाश के दिमाग में एक और सावधानी कौंधी, ‘‘भइया पता नहीं इस बियावान में पेट्रोल पंप कितनी दूर होगा, होगा भी तो उस पर पेट्रोल मिले भी या नहीं...।’’
‘‘अब वह तो तुम्हें बाडमेर की सीमा में पहुँच कर ही मिलेगा। इतने डीजल में गाडी वहाँ तक
पहुँच जाएगी।’’
‘‘पर भइया दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है न। मैं सोच रहा था कि अपने ट्रक के पीछे बाँध लेते इस गाडी को तो बडी महरबानी हो जाती।’’ ठीक है। पर मैं ठेठ वहाँ तक नहीं जाऊँगा, बीच से ही मुड जाऊँगा।’’
‘‘जहाँ तक हो भइया छोड देना।’’
ट्रक के पीछे बँधी गाडी चल पडी। प्रकाश पूरी तरह बेहोश था। सीट पर ही लुढक गया था। अविनाश को एक हाथ उसे संभालने में भी लगाना पड रहा था। अविनाश किसी भी तरह जल्दी से जल्दी उसे ले जाना चाहता था वहाँ, जहाँ पानी मिले, अपनी पीठ पर प्यास बुझाने का समंदर लादे।
करीब पचास साठ किमी का रास्ता ऐसे तय हो गया। फिर एक मोड पर ट्रक से वैन को अलग करते हुए खलासी बोला, ‘‘अब बस यहाँ से पाँच दस किमी है बाडमेर। जल्दी जाओ इसे पानी पिलाओ नहीं तो
यह मर....।’’
धन्यवाद दिया न दिया, आधे शब्द सुने न सुने अविनाश ने वैन भगाई शहर की ओर। दिए गए पते के हिसाब से कोल्ड ड्रिंक की लाँचिंग का आयोजन स्थल शहर के बाहरी इलाके में ही था। छः बज चुके थे। दिया गया समय साढे पाँच बजे का था। पर इस बेखबर अविनाश को एक ही धुन थी जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँचे। इसलिए नहीं कि इस वजह से वहाँ लाँचिंग रुकी होगी बल्कि इस आस में कि वहाँ उसके भाई जैसे दोस्त को पानी जरूर मिल जाएगा। पता था अविनाश को कि अगर उसके मोबाइल की बैटरी खत्म नहीं हो गई होती तो उसके टुन-टुन करते वैन को ड्राईव करना भी मुश्किल होता। कार्यक्रम स्थल पर बस दुल्हन ही नहीं पहुँची थी। बाकी सब तैयार था। टाई बेल्ट कसे कर्ता-धर्ता मोबाइल पर गुस्सा उतारते स्थल के बार ही चिंता में आगे पीछे हो रहे थे। दूर से ही
आती कम्पनी की वैन के मुखौटे पर लगा कम्पनी का लोगो चमकता देखते ही सबके मुँह चमचमाने लगे। पल भी न लगा कि बहुप्रतीक्षित वैन के पहुँचने की खबर मोबाइल पर तैरते-तैरते मंच तक पहुँच गई। चमकती दिखने के बाद वैन के वहाँ तक पहुँचने के तीन मिनट भी घंटों से भारी लगे कर्ता-धर्ताओं को। अविनाश के लिए तो पल-पल ही पहाड था।
वैन पहुँची ही थी रिसोर्ट के आगे कि देरी के कारण गुस्से से भरे सभी कम्पनी अधिकारियों ने सवालों का ढेर पलट दिया अविनाश पर। परंतु उसके सारे सवाल जवाब अटके थे प्रकाश की सांसों में और वैन की तरफ इकट्ठे मजमें में से वैन के यूनिक डिजीटल लॉक का कोड जानने वाले मिस्टर बाहेती ने चुस्ती-फूर्ती से अपने काम को अंजाम दिया। कुछ अंको के मंत्रों से खास-ओ-आम आबादी की प्यास को बुझाने के सामान का ताला बिना ‘खुल जा सिमसिम’ बोले ही खुल गया। दस वेटर्स की पूर्व प्रशिक्षित टीम कैरेट्स को मंच स्थल तक पहुँचाने के लिए तैयार थी। कडी निगरानी में लाल चमकते कपडे में लिपटे सभी कैरेट्स निर्धारित स्थान की यात्रा के लिए यात्रायित होने लगे।
इधर अविनाश वैन को रोकते ही भागा। आयोजन स्थल के भीतर की तरफ कि पानी जुटा सके। चार घंटे से अधिक समय से बेहोश पडे प्रकाश के लिए। ‘‘ऐ कहाँ घुसा जा रहा है।’’ गार्ड ने उसकी बदहवासी को घुडकी पिलाई। ‘‘पानी.... पानी चाहिए थोडा...।’’ दो शब्द भी पूरे नहीं बोले जा रहे थे अविनाश से। ‘‘बाहर ढूँढ जाके। यहाँ नहीं है तेरे लिए पानी। वी.आई.पी. पार्टी है, पता भी है केवल कार्ड से एन्ट्री है यहाँ।’’ ‘‘मैं यहाँ की कोल्ड ड्रिंक वाली गाडी का ही ड्राईवर हूँ भाई। गाडी में चार घण्टे से मेरा दोस्त बेहोश पडा है पानी के बिना।..... भाई दया करो....’’ प्यास बुझावन पेय को मीलों से ढो कर लाने वाला पानी के लिए गिडगिडाते हुए गिर पडा। गार्ड के दिल में कुछ संवेदना थी। वही कुलबुलाई। वर्दी पहन ली तो क्या, था तो वह भी उसके जैसा ही। दूसरे गार्ड को अपनी ड्यूटी थमा कर दौडता सा अंदर गया। कहीं से सील बंद पानी की बोतल का इंतजाम कर लेकर आया।
अविनाश को पकडाकर बोला, ‘‘ले, जल्दी भाग संभाल जाके उसे।’’
बोतल को संजीवनी बूटी सा सहेज अविनाश सारी निचुडी शक्तियाँ बटोर कर उठा। वैन की तरफ भागा। सीट पर लुढके पडे प्रकाश का मुँह खोल पानी उसके मुँह में डाला, सूखे गले ने पानी अंदर गुटका, ‘‘गुडम.. गुडम.. गुड..गुड’’ ‘‘अक्कू...अक्कू।’’ अविनाश ने और थोडा पानी उसके मुँह में उडेला। एक पल को प्रकाश की निस्तेज आँखें खुली। दो हिचकी के साथ बंद हो गई। दो घूँट पानी को ही गंगाजल मान तृप्त हो चुका था वह और उसकी आत्मा। अनहोनी की आशंका ने कँपा दिया अविनाश को। नहीं, नहीं मेरा सारा जतन बेकार नहीं जा सकता। प्रकाश को कुछ नहीं हो सकता। अविनाश को यहाँ वही गार्ड हितेषी लगा जिसने बोतल जुटा कर दी थी। वह भागा उधर ही। गार्ड कुछ समझे उससे पहले ही वह उसे खींच ले आया वैन तक। वैन में निश्चेष्ट पडे प्रकाश और पास पडी आधी खाली पानी की बोतल को देख उसे कुछ बताने की जरूरत ही नहीं पडी। दिल सहलाया। नाक से आती हवा टटोली। नब्ज नापी और न सिर हिला दिया, ‘‘कुछ नहीं बचा मेरे भाई इसमें। मिट्टी है यह।’’ उसने अविनाश को थपथपाया, ‘‘भाई घर ले जा वापस इसे अब जल्दी से जल्दी।’’ सांत्वना दे गार्ड अपने डयूटी स्थल की तरफ लौट चला। संवेदनाओं से ड्यूटी भारी थी।
घर ले जाऊँ इसे। कैसे? उसके उस घर में जो अभी अभी बसा था, चार दिन में ही उजड गया। कौन सा मुँह लेकर जाऊँ इसकी ब्याहता के सामने? इसकी माँ कैसे बर्दाश्त कर पाएगी जवान बेटे की मौत? सिर पकड कर बैठ गया वह वहीं। ढेर सारे सवालों में घिरे प्यासे अविनाश को चक्कर आ रहे थे। बेहोशी छा रही थी।
भीतर शानदार लाँचिंग हो चुकी थी। सबकी प्यास बुझाने वाले प्यास बुझावन शीतल पेय की और बाहर
मृत्यु की ।
७२/१२३, नीड, पटेल मार्ग, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०
मो. ०९४१३३९५९२८