ऋवा कहती थी....

भूपेन्द्र उपाध्याय ‘तनिक’


‘‘इतनी दौड भाग ठीक नहीं प्रशांत’’, यह धन-दौलत, सुख-सम्पदा जीवन के लिए है। जीवन इनके लिए नहीं है। तुम से प्यार किया था। सजीव पुरुष की आकांक्षा में, यन्त्र की इच्छा में नहीं।
‘‘सचमुच मैंने उसे कभी समय नहीं दिया। दौडता रहा। दौडता रहा। सफलता और यश की सीढीयों पर। आज मेरे पास धन है, दौलत है, कोठी है, कार है, यश और मान है पर सब सूना-सूना व्यर्थ है, ऋवा के बिना।
प्रशांत सोचते-सोचते तडफ उठता है। उसका रक्तचाप उच्चता को पहुँचने लगता है। वह गोली लेता और अंगेजी शराब का पेग चढा सोने का प्रयास करता।
प्रशांत बीमा विभाग का एक सफल विकास अधिकारी था। एक साधारण एजेन्ट को इस पद तक पहुँचने में वह सब कुछ छोडना पडता है, जिनके लिए वह यह सब कुछ करता है। अपनों को छोडकर, उनका तिरस्कार कर आदमी दौडता है। भावना शून्य यंत्र की तरह। प्रशान्त जीवन के व्यापार में मान-सम्मान पाता ऊँचाईयों पर चढता रहा, सीढी दर सीढी और उधर ऋवा हर बार अपमान सहती रही। जब भी उसने कोई प्रस्ताव रखा प्रशान्त- ‘‘समय नहीं है।’’ कहकर टाल गया। फिल्म और ग्लेमर की शौकीन ऋवा विवाह के बाद रंगहीन हो गई थी। ऋवा इस रंगहीन जिन्दगी और अकेलेपन के कारण डिपेशन का शिकार हो चुकी थी। बार-बार होने वाली बीमारियों को सहने या कहें कि उनके साथ रहने की आदि ऋवा जब इन बीमारियों से बहुत परेशान हो जाती तो पडोसन के साथ जाकर डॉक्टर को दिखा आती। डॉ. अपने पालित धर्म के अनुसार छोटे से रोग के लिए ढेरों दवाईयाँ लिख देता। बस इसी तरह से कटी-फटी और कोल्हू के बैल की सी रटी-रटी जिन्दगी चलने लगी ऋवा की प्रशांत के साथ।
जब पुरुष के सान्निध्य का सुख स्त्री को नहीं मिलता है तब उसमें माँ बनने की इच्छा तीव्रतर हो जाती है। ईश्वर ने ऋवा की आकांक्षा पूरी की, उसके पैर भारी होने लगे। दुबली-पतली सी गौर काया और मन पर लदे हल्केपन की माया ने ऋवा को इतना कमजोर कर दिया था कि वह अकेली कहीं नहीं जा सकती थी।
ऋवा के गर्भवती होने की खुशी को व्यक्त करने का समय वह नहीं निकाल सका। प्रशान्त के बडे भाई ने जोर देकर टिटनेस के तीन टिके समय पर लगवा लेने की बात कही थी। पर आज कल करते-करते पूरे सात माह बीत गये।
प्रशान्त बीमा के कार्य से कश्मीर कॉन्फ्रेन्स में चला गया। वहाँ की झीलों की ठन्डी-ठन्डी लहरों में मस्ती लेता रहा और पर्वतों से पिघलती बर्फ को देखता जीवन विकास के स्वप* को देखता रहा। यहीं उसकी क्षेत्रीय विकास अधिकारी बनने की घोषणा होनी थी। प्रशान्त जहाँ जीवन के उत्कर्ष के तानेबाने बुन रहा था। वहीं मौत उसके जीवन के स्वपजो के एक कोने में बैठ विनाश की चिंगारी को हवा दे रही थी। प्रशान्त का स्वपज पूरा हुआ। वह खुशियों से भरा कश्मीरी साडियाँ, अग्रिम में खिलौने एवं मिष्ठान्न के पैकेट लेकर चल पडा अपने घर की ओर।
अभी तो उसे मित्रों की बधाई लेने की भी फूर्सत नहीं थी। एक छोटी सी पार्टी रख मित्रों व अफसरों की बधाई स्वीकार कर उनका कर्ज चुकाने की योजना मन में संजोए प्रशान्त ट्रेन की प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सफर कर रहा था। ऋवा से मिलने की इच्छा उसके मन में कुलाँचे भर रही थी। हर बार टेम्पो से घर जाता है किन्तु आज उसने स्पेशल टैक्सी की थी। जल्दी घर पहुँचने के लिए। किन्तु समय किसी के लिए नहीं रूकता न ही उसकी रफ्तार को सुपर फास्ट ट्रेन अथवा टैक्सी ही पकड
सकती है।
उसके घर पर शुभचिन्तकों और पडोसियों की भीड जुटी थी। वह जान गया था जिसके लिए उसने समय नहीं निकाला, वही समय पाकर चल बसी। प्रशान्त फूट-फूट कर रोता रहा। प्रशान्त शान्त मातम की मुद्रा में बैठा। हर कोई शोक संवेदना व्यक्त करने आता। प्रशान्त के बडे भाई साहब हर बार हर किसी को कहते, टिटनेस के तीन टीके समय पर लगवा लिए होते तो माँ भी बच जाती और बच्चा भी। घर में दीपक का उजाला हो जाता और ये विकास अधिकारी जी पापा हो जाते। प्रशान्त अब महसूस करने लगा था कि वह अपने कर्मों के कारण पापा नहीं बन पाया अपितु पापी बन गया है।
दिन पर दिन बीतने लगे। प्रशान्त के जीवन का तूफान शान्त हो गया। फिर वही पिछली जिन्दगी जीने लगा। आखिर स्त्री का दुःख कितना ठहरता। फर्श पर बिखरे पानी की तरह वाष्प होकर सूख जाता है। भाई साहब एवं परिवार के पुनर्विवाह के आग्रह तथा बार-बार आने वाले शादी के प्रस्तावों के फलस्वरूप प्रशान्त के जीवन में नई नवेली दुल्हन का प्रवेश हो गया। आँखों में सुहावने संकल्प लेकर यों तो प्रशान्त ने संकल्प लिया था कि ऋवा का-सा हाल अब नहीं होने दूँगा। किन्तु मनुष्य की लोभवृत्ति श्वान की टेढी दूम सी होती है। वह दो साल में पिता बन गया। पिता होना एक सहज घटना है किन्तु पितृत्व निभाना पुरुष का सच्चा पुरुषार्थ है।
पत्नी को टिटनेस के तीन टीके समय पर लगवा दिए, जिस कारण जच्चा बच्चा सुखपूर्वक अस्पताल से घर आ गये। जन्म के समय शिशु को बी.सी.जी. दे दिया गया था। अतः वह क्षय रोग के खतरे से बच गया तथा नर्स ने घर आकर डीपीटी के टीके भी लगा दिये। बच्चा, गलघोटू, कूकर खाँसी और खसरा जैसी जानलेवा बिमारियों से मुक्त हो गया।
पर लापरवाह पुरुष को उसकी लापरवाही कहाँ छोडती है? हर महीने अस्पताल जाकर बच्चे को पोलियो की दवा पिलाना वह चूक गया। आज कल-आज कल करते-करते बालक छः वर्ष का हो गया। अचानक तेज बुखार के प्रकोप से प्रशान्त के प्रसून को पोलियो ने घेर लिया। लाख दवाईयाँ करवाई किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। आज सुख, समृद्ध और सम्पन्न पिता का इकलौता पुत्र अपाहिज होकर जीवन की यन्त्रणा झेल रहा है।
जब भी प्रसून उसके सामने खडा होता तब-तब उसे ऋवा के कहे शब्द याद आते कि- ‘‘तुम लोगों का बीमा कर मृत्यु के बाद की गारन्टी देते हो पर जीते जी जीवन की गारन्टी के साधनों के प्रति उदासीन हो। प्रशान्त! तुम पछताओगे। जीवन के प्रति मोह उत्पन्न करो। कल के लिए नहीं, आज के लिये जीने का अभ्यास करो।’’
‘दयाल भवन’, सिंगवाव, बाँसवाडा (राज.) मो. ९४१३५२९६६१