वह खुशगवार सुबह

भागचन्द गुर्जर


यह भी विडम्बना ही है कि कई बार माता-पिता अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को अपने बच्चों पर लादने लगते हैं। चाहे वे उस बोझ को उठाने लायक हों
या नहीं।
दसवीं का रिजल्ट आ गया था और निखिल इस बार भी रह गया था। यह तीसरा साल था निखिल का दसवीं में। शायद इस बार तो वह पास हो भी जाता, पर इस बार कोर्स ही बदल गया और पढाई उसके लिए पहाड हो गई।
निखिल के पिता संजय माथुर बैंक में सहायक प्रबन्धक के पद पर कार्यरत हैं। शाम साढे छः के लगभग वे घर पर पहुँचे। उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। उन्होंने नेट पर रिजल्ट देख लिया था। बैंक के अन्य सह कर्मचारियों ने उनसे पूछा भी कि माथुर साहब आफ लडके का क्या हुआ? पर माथुर साहब साफ झूठ बोल गये कि सर्वर डाउन चल रहा है। घर जाकर देखूँगा
क्या हुआ?
पता नहीं क्यों माथुर साहब हर बार इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं। पिछली बार बहाना बनाया कि बेटे के नम्बर पचास प्रतिशत से भी कम आये इसलिए मैंने कह दिया कि दुबारा दे दो परीक्षा, इससे क्या होगा? सत्तर प्रतिशत से ऊपर आये तो बात बने और उससे पहले बहाना बनाया कि परीक्षा के समय निखिल की तबियत बहुत खराब हो गई थी और वह परीक्षा में ही नहीं बैठ सका।
वे घर में प्रवेश कर चुके थे और निखिल को बार-बार कोस रहे थे। उन्होंने श्रीमती माथुर को सुनाया, ‘‘कहाँ गया वह तुम्हारा लाडला। मेरी नाक कटा के रख दी। विज्ञान, गणित और अंग्रेजी तीनों में फेल हो गया नालायक। सप्लीमेंट्री भी आता तो कुछ करते।’’
श्रीमती माथुर रसोईघर से बाहर आई। वह भी माथुर साहब का क्रोध देखकर समझ गई की मामला संगीन है। वे बोली, ‘‘अभी एक घन्टा पहले ही निकला है। कह रहा था नेट पर रिजल्ट देखकर आता हूँ और मार्कशीट भी निकलवा कर लाऊँगा। वैसे तुमको कैसे पता की वह फेल हो गया।’’ माथुर साहब ने क्रोधित स्वर में कहा, ‘‘मैंने देख लिया है रिजल्ट। वैसे भी रिजल्ट तो उसने भी देख लिया होगा। फेल हो गया तभी तो घर से बाहर निकल गया। इतना ही मुझसे डर था तो पहले पढाई क्यूँ ना कर ली?’’
श्रीमती माथुर ने कहा, ‘‘छोडो भी अब। क्यों उसके पीछे ही पडे रहते हो? जरूरी नहीं कि सारे ही बच्चे पढाई में होशियार हों। अब वह जैसा है वैसा है।’’
माथुर साहब ने कहा- तुम्हें ही गया है, वो भोंदू, ढपोरशंख।
श्रीमती माथुर ने पीछा छुडाया हाँ चलो.... ऐसा ही समझ लो।
माथुर साहब और भी कुछ कहने वाले थे कि तभी उनके मोबाईल की घन्टी बजी। बडे बेटे राजीव का फोन था। राजीव रूडकी आई.आई.टी. से इन्जिनियरिंग कर रहा।
‘‘हैलो पापा... नमस्ते।’’
‘‘नमस्ते बेटा।’’
‘‘निखिल कहाँ है पापा?’’
‘‘पता नहीं? तेरी मम्मी कह रही है आस-पास के किसी साइबर कैफे में गया है, मार्कशीट निकलवाने।’’
‘‘पापा प्लीज आप उसे डाँटना मत।’’
‘‘क्यूँ ना डाँटू? वह हर साल मेरी नाक कटवाता रहे और मैं उसे कुछ भी ना कहूँ।’’
‘‘पापा ट्राई टू अण्डरस्टेण्ड। दोपहर में मेरी उससे बहुत लम्बी बात हुई थी। बहुत नर्वस था वह। बहुत बहकी बहकी बातें कर रहा था। पापा प्लीज आप समझा करो। हर पर्सन का नेचर अलग होता है। आप उसके फेल होने को अपने इगो पर क्यों लेते हो। मुझे डर है कि वो कुछ कर ना बैठे।’’
‘‘क्या करेगा वह डरपोक? अभी आयेगा। रोयेगा-धोयेगा और अपनी माँ के आँचल में दुबक कर सो जायेगा।’’
‘‘ऐनी वे पापा आप उसे डाँटना मत।’’
‘‘ठीक है-ठीक है कुछ नहीं कहूँगा मैं। अच्छा तुम वीकेण्ड पर आ रहे हो ना।’’
‘‘नहीं पापा वैसे भी दस पन्द्रह दिन बाद तो छुट्टियाँ आ ही जायेंगी। तभी आ जाऊँगा। मॉम से बात कराओ पापा।’’
‘‘लो राजीव का फोन है।’’ कहते हुए माथुर साहब ने मोबाईल श्रीमती माथुर को पकडाया।
‘‘हैलो... हाँ बेटा... खुश रहो। ठीक है... ठीक है...। मैं समझा दूँगी। ठीक है... बेटा... बाय।’’
‘‘लो बन्द कर दो।’’ मोबाईल माथुर साहब को देते हुए श्रीमती माथुर ने कहा, ‘‘आप हाथ-मुँह धो लीजिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।’’
माथुर साहब ने चाय पी ली। श्रीमती माथुर ने खाना भी बना लिया और समय भी रात आठ का हो गया तब भी निखिल घर नहीं लौटा तो घर में एक अजीब सी मायूसी छाने लगी। निखिल घर से बाहर कम ही जाता है और जाता भी है तो आधे एक घन्टे में वापस आ ही जाता है। इसी कारण उसके दोस्त उसे घरघुस्सु कहते हैं।
फिर श्रीमती माथुर ने कहा भी माथुर साहब से कि आस-पास में देखकर आओ, वह इतनी देर नहीं लगाता कहीं। पर माथुर साहब बोले, ‘‘कहाँ जायेगा? अभी आ जायेगा दुःखी राम! आस-पास में किसी दोस्त के साथ अपना गम साझा कर रहा होगा।’’
पर जब रात ९ बजे तक भी वह नहीं लौटा तो माथुर साहब को भी चिन्ता होने लगी। उन्होंने कपडे बदले। वे बाहर निकल ही रहे थे कि तभी एक बार निखिल के कमरे में गये। उन्होंने लाईट जलायी। पलंग के पास ही टेबिल पर उन्हे एक कागज दिखा। वह कागज पेपर वेट के नीचे दबा हुआ था और इस तरह रखा हुआ था कि कमरे में घुसने वाले को तुरन्त नजर आ जाये। मथुर साहब ने काग*ा लपका। वह एक पत्र की शक्ल में था। इस तरह-
आदरणीय पापा! सादर प्रणाम। मम्मी को भी प्रणाम। पापा मुझे याद नहीं पडता की कभी आपने मेरे सर पर लाड से हाथ भी फेरा हो या कभी मेरी पीठ भी थपथपाई हो। उस दिन भी नहीं जब मैं स्कूल की चित्रकला प्रतियोगिता में फर्स्ट आया था और मुझे इनाम भी मिला था। अब इसमें आपका क्या दोष? कमी तो मुझमें ही है ना। भला मैं कौनसा पढाई में आगे बढ पाया। चित्र-वित्र बना लेने से क्या होता है। असली चीज तो पढाई ही है।
क्या करूँ पापा? मैं पढना तो चाहता हूँ पर पढ ही नहीं पाता हूँ। गणित और विज्ञान मेरे बिल्कुल भी पल्ले नहीं पडते। मैं अपने आपको बहुत निकम्मा पाता हूँ।
पिछले साल बडे सर ने आपको कितना समझाया था कि माथुर साहब निखिल इस तरह दसवीं पास नहीं कर पायेगा। बहुत कमजोर है। आप इसे ओपन से दसवीं करवा दें और चित्रकला, गृह विज्ञान, कम्प्यूटर आदि सब्जेक्ट दिलवा दें। यह पास हो जायेगा। फिर ग्यारहवीं और बारहवीं चाहे रेग्यूलर दिलवा दें। मेरा तो कहना है कि आप इसकी चित्रकला को विकसित होने दें, यह बहुत अच्छा कलाकार बनेगा। बारहवीं के बाद आप आर्ट एण्ड क्राफ्ट सब्जेक्ट से ही डिप्लोमा भी करवा सकते हैं।
पर घर आकर आपने मुझे ही लेक्चर पिलाया था और मेरे चित्र बनाने पर गुस्सा हुए थे। आपने कहा था, ‘ये चित्र-वित्र बनाने में कुछ नहीं रखा है,पढाई पर ध्यान दे। गधे पढाई करेगा तभी तो नौकरी लगेगी। देखता नहीं कितना कॉम्पीटीशन का जमाना है। ८०-९० प्रतिशत आने वालों को भी संघर्ष करना पड रहा है। सोच तेरा क्या होगा? तू तो उनसे बहुत पीछे है। दो साल हो गये तुझे। अब क्या पंचवर्षीय योजना बनायेगा? और वह राजीव, वह भी तो तेरा भाई ही है ना। तुझसे केवल दो साल ही बडा है और देख कितना होशियार है। उसकी इन्जिनियरिंग कम्पलीट होने को आई पर तू अभी दसवीं में ही अटका हुआ है।
पापा! अब मैं आपको कैसे समझाऊँ कि मेरे में और राजीव भैया में बहुत फर्क है। वे तो शुरू से ही पढाई में होशियार रहे हैं। मैं अपनी कमजोरी समझता हूँ। क्या करूँ मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। अभी भी कई बार मैं उन्यासी और उन्नहत्तर में उलझ कर रह जाता हूँ और हरदम गलती कर देता हूँ और परीक्षा के दिनों में तो आपने साफ कह दिया था कि इस बार अगर तू फेल हुआ तो तेरी खैर नहीं। मैं तुझे घर के बाहर निकाल दूँगा। फिर चले जाना किसी होटल पर चाय के कप-प्लेट धोने।
पापा मैंने रिजल्ट देख लिया है। आपने भी देख लिया होगा। मैं इस बार भी फेल हो गया हूँ और अब मैं घर छोडकर क्या यह दुनिया ही छोडकर जा रहा हूँ। मैं नहीं चाहता कि आपकी शान में बट्टा लगे और लोग कहें कि फलाने माथुर साब का बेटा पढ नहीं सका। मैं कहीं भी डूब मरूँगा पर आपको अपनी शक्ल नहीं दिखलाऊँगा। मैं आपको, मम्मी को और राजीव भैया को बहुत प्यार करता हूँ। पर मैं क्या करूँ? मैं आफ प्यार का कर्ज नहीं उतार पा रहा। बार-बार फेल होकर आपी शान में गुस्ताखी किये जा रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप, मम्मी और राजीव भैया मुझे इसके लिए माफ करेंगे। आपका निखिल।
पत्र की लिखावट में आसुँओं की बूंदों से कहीं कहीं अक्षर अस्पष्ट हो गये थे। माथुर साहब समझ गये कि पत्र लिखते हुए निखिल खूब रोया है। वैसे भी आँसू तो उसकी पलकों में ही रहते हैं। पत्र पूरा होते होते माथुर साहब की आँखों से भी आँसू झरने लगे और हाथ काँपने लगे। आज उन्हें एहसास हुआ था कि पैरों तले से जमीन कैसे खिसकती है।
तभी श्रीमती माथुर निखिल के कमरे में आ गई उन्होंने जब माथुर साहब को यूँ रोते और कँपकपाते हुए देखा तो वह बुरी तरह घबरा गईं। उन्होंने झट से वह कागज उनके हाथों से लिया और पढने लगी। पत्र पूरा पढ चुकने के बाद वह बुरी तरह चीखने-चिल्लाने लगी। वह विलाप करते हुए बोली, ‘‘हे राम जी! खा गये मेरे लाल को। कितना समझाया पर तुम नहीं माने। तुमने तो अपने मन की करी। तुम्हारी जिद ने छीन लिया मेरा बेटा।’’
माथुर साहब ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा- ‘‘प्लीज सीमा तुम ऐसे मत करो। धीरज से काम लो।
कुछ नहीं होगा अपने निखिल को। मैं अभी ढूँढ कर लाता हूँ उसे।’’
तुरन्त माथुर साहब बाईक लेकर निकल पडे। निखिल के दोस्तों के यहाँ गये। गिनती के दो चार ही मित्र थे उसके और सभी ने कहा कि आज तो निखिल उनके पास आया ही नहीं। माथुर साहब इधर-उधर भागा-दौडी
करने लगे और उधर श्रीमती माथुर अपने घर में भगवान के आले के सामने आकर रोने-कलपने लगी।
निखिल जब घर से निकला था तब शाम के पाँच बजे थे। वह सबसे पहले गोविन्द देव जी के मन्दिर में गया। शाम की ग्वाल झाँकी होने में पन्द्रह मिनट की देरी थी। वह वहीं मन्दिर में झाँकी खुलने का इन्तजार करने लगा। वह अक्सर वहाँ दर्शन करने जाता था इसलिए एक दो परिचित मिले तो उन्हें निखिल के इरादे की भनक भी ना लगी।
झाँकी से फ्री होकर वह गोविन्द देव जी के बाग वाले गेट से बाहर निकला और ताल कटोरा तालाब की ओर जाने लगा। जब वह तालाब पर पहुँचा तो देखा वहाँ तो पुलिस का सख्त पहरा है। एक दो पुलिस वाले वहाँ हमेशा ही रहते हैं। आज रिजल्ट घोषित हुआ था तो अनहोनी की आशंका से एहतियात के तौर पर आज पुलिस वालों की संख्या ज्यादा थी। उन्हें वहाँ देखकर निखिल की हिम्मत नहीं हुई कुछ करने की। वह सामने बने पार्क में चला गया। वह दूर एक कोने में पडी बैंच पर जाकर बैठ गया। जहाँ उसे कोई देख ना सके। पार्क में खेलते हुए बच्चों को देखा तो उसे भी बचपन की वे घटनाएँ जो इस पार्क से जुडी थी, याद आने लगी। कितनी ही बार वह मम्मी के साथ यहाँ आया था। राजीव और वह दोनों ही यहाँ खूब मस्ती करते थे। उसे याद आया एक बार यहीं फिसल्ल पट्टी से किसी लडके का धक्का लग जाने के कारण वह गिर पडा था। सिर में चोट भी आ गई थी। मम्मी उसकी चोट पर, जहाँ खून बह रहा था, अपनी हथेली रखते हुए उसे तुरन्त पास के क्लिनिक पर ले गई थी और पट्टी करवायी थी।
वह इसी तरह पुरानी यादों में खोया वहाँ बैठा रहा। जब पार्क में शाम उतरने लगी और पेड की टहनियों के मध्य लालिमा लिए हुए सूरज छिपने लगा तो उसे अपनी मम्मी और घर की याद आई। वह रोने लगा। उसने अपने आप से कहा, ‘‘मम्मी तो खूब रो रही होगी और पापा, उनका क्या? या क्या पता किसी ने वह पत्र देखा ही
ना हो। कुछ भी हो वैसे भी मुझे तो यह दुनिया छोडकर जाना ही है।’’
आठ बज गये थे। अंधेरा घिर आया था। पार्क की लाईटें जल गई थी। फव्वारे रंग बिरंगी छठा बिखेर रहे थे पर निखिल उन्हें बस निर्लिप्त भाव से देखे जा रहा था। कुछ देर बाद वह पार्क से बाहर आया और ताल कटोरा के गेट पर नजर डाली। अभी भी पुलिस वाले वहीं थे। वह पुनः पार्क में उसी बेंच पर आकर बैठ गया।
अपने आप को लील लेने का ज्वार जो उसके मनो-मस्तिष्क पर छाया हुआ था। वह अब शिथिल पडने लगा था। अब वह अपने न होने से होने वाली स्थिति के बारे में सोचने लगा था और उसे कुछ कुछ अहसास होने लगा था कि जो वह करने जा रहा है वह गलत है। पर अब उसकी घर जाने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। क्या कहेंगें पापा, बडा मरने चला था। अरे! उसके लिए भी हिम्मत चाहिए।
रात १० बजे तक वह वहीं बैठा रहा। १० बजे पार्क के गार्ड ने सभी को बाहर निकाल दिया। वह भी बाहर आ गया। उसने देखा की पुलिस वाले अभी भी वहाँ खडे हैं। अपने को खत्म कर लेने का उसका इरादा शिथिल तो पडा था पर पूरी तरह मिटा नहीं था। वह अजीब मनःस्थिति से गुजर रहा था। तभी उसे जलमहल का ध्यान आया। शायद वहाँ पुलिस का पहरा न हो और वह जलमहल की ओर जाने लगा।
उधर जब माथुर साहब निखिल को खोजने निकले तब उनके दिमाग में निखिल की लिखी वह लाईन ‘कहीं भी डूब मरूँगा’ कौंध गई और वे तालकटोरा की तरफ निकल गये। उन्हें पता था कि अधिकांशतः आस-पास के किशोर यहीं आकर ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। माथुर साहब यह भी जानते थे कि निखिल बहुत आगे जा भी नहीं सकता। उनकी नजर में वह दब्बू व डरपोक था। तभी उनके मन में एक द्वन्द्व सा छिड गया। वे सोचने लगे, ‘मैं क्यों झूठे दिखावे में आ गया? मुझे इस तरह उस पर दबाव नहीं बनाना था। हे भगवान! मुझे क्या पता था कि वह ऐसा कुछ कर बैठेगा। उसके प्रिन्सिपल ने भी तो
कितना समझाया था पर मैं ही नहीं माना। बस एक बार निखिल मिल जाये। मैं अब उस पर कोई पाबन्दी नहीं डालूँगा। हे भगवान! बस वह मिल जाये।’
इन्हीं खयालों-खयालों में ताल कटोरा आ गया। वहाँ पुलिस वालों को देखकर उन्हें लगा कि क्या वह अनहोनी हो गई। वे बुरी तरह सिहर गये। उनके हाथ पैर काँपने लगे। वे पुलिस वालों से दरियाफ्त करने लगे। पुलिस वालों ने कहा की अभी यहाँ ऐसी कोई घटना नहीं घटी है और हम तो खडे ही यहाँ ऐसी घटना की रोकथाम के लिए हैं। माथुर साहब को तसल्ली हुई, उनकी जान में जान आई। वे यहाँ आये तब दस बजकर बीस मिनट का समय हुआ था। यहाँ लौटकर उन्होंने आस-पास की सभी जगहों के कई फेरे लगाये। पूरी चार दीवारी छान मारी। हर जगह दो-दो, तीन-तीन बार गये। वे चकरघिन्नी की तरह घूमते ही रहे पर उन्हें निखिल नहीं मिला।
जब वे निराश होकर एक जगह बैठे तो उन्हें निखिल के पत्र में लिखी बातें याद आने लगी। वे अपने आप से कहने लगे, ‘निखिल ने ठीक ही कहा। मैंने कब उसे अपना स्नेह दिया? हमेशा बस पढाई-पढाई ही करता रहा। मैंने कभी उसके कोमल हृदय की थाह नहीं ली। क्या करूँ? मुझे भी मेरे पिता ने ऐसा ही अनुशासित और सख्त रवैये वाला जीवन दिया और मैं उसे ही कामयाबी की सीढी समझने लगा। मैं भी उसी लीक पर अपने बच्चों को हाँकने लगा बल्कि मैं तो इस मामले में पिता से भी दो कदम आगे निकल गया। उसी का नतीजा है ये। हे! भगवान अब क्या होगा? निखिल नहीं मिला तो मैं उसकी मम्मी को क्या जवाब दूँगा?’
आखिर थक हार कर वे साढे बारह बजे घर पहुँचे। कुछ पडौसी और नजदीकी रिश्तेदार भी घर आ चुके थे। राजीव को अभी किसी ने खबर नहीं की थी। श्रीमती माथुर को बार-बार बेहोशी के दौरे पड रहे थे। सुबह थाने में रिपोर्ट करवाने की सोचकर किसी तरह चिन्ता फिक्र में वह रात गुजरी।
सुबह-सुबह माथुर साहब ने अखबार के अन्दर के पृष्ठ पर साइड में एक खबर पढी तो उनके होश फाख्ता
हो गए। खबर थी...‘जलमहल में डूबने से युवक की मृत्यु’। प्रथम दृष्ट्या पुलिस की नजर में आत्महत्या का मामला। अभी शव की शिनाख्त नहीं हो सकी। शव को पोस्टमार्टम के लिए एस.एम.एस. की मोर्चरी में
रखवाया गया।
खबर पढते ही माथुर साहब का सिर चकराने लगा। वे अपने आपको कोसने लगे कि मैं जलमहल की तरफ क्यों नहीं गया। यह बात मेरे ध्यान में क्यों नहीं आई।
हे भगवान! ये क्या हो गया? फिर उनके मन ने समझाया कि जरूरी नहीं कि वह निखिल ही हो और कोई भी हो सकता है। उन्होंने अपना कलेजा मजबूत किया। चुपचाप बिना किसी को बताये कपडे बदले और शव की शिनाख्त के लिए जाने लगे। वे मन ही मन कह रहे थे कि हे भगवान! वह निखिल ना हो। जब वे उठकर गेट की तरफ आने लगे तो उन्हें ऐसा लगा कि कदमों में वह ताकत ही न रही जो उनका भार उठा सके। जैसे अभी लडखडा कर गिर पडेंगे।
तभी दरवाजे की घन्टी बजी। माथुर साहब ने दरवाजा खोला। सामने निखिल था। वे आश्चर्यचकित से निखिल को ताकने लगे। उनके मुख से कोई बोल ही
नहीं फूटा।
निखिल बोला ‘‘देखो पापा में सही सलामत हूँ। मैं तो बहुत कमजोर निकला। क्या मुझमें साहस की कमी है कि मुझसे यह कदम भी नहीं उठाया गया।’’
माथुर साहब ने उसे बाँहों में भर लिया और बेतहाशा चूमते हुए बोले, ‘‘ना बेटा- ना तू कमजोर नहीं। तू तो बहादूर बेटा है मेरा। आत्महत्या तो कायर लोग करते हैं, जो जीवन से हार जाते हैं। तू तो बहुत साहसी बेटा है मेरा। दोनों आँखों से आँसू झरने लगे थे, और वह खुशगवार सुबह माथुर साहब के जीवन में एक यादगार घटना के रूप में दर्ज हो गई थी। आखिर वह सुबह एक पहाड सी रात जो काटकर आई थी।
१२२८/७, चौमू हवेली, गंगापोल, जयपुर-३०२००२
मो. ९८२९४५७५९०