मूर्ख

भगवान अटलानी


चाचाजी की मुंबई में फैक्ट्री है। मैं और मेरी दादी माँ अम्मा-अब्बा के साथ जयपुर में रहते हैं। गर्मी की छुट्टियों में हर साल मैं और दादी माँ बिना नागा मुंबई आते हैं। बहुत छोटा था, तब से दादी माँ के साथ आना-जाना हो रहा है। मेरे स्कूल खुलने से पहले मैं और दादी माँ लौटकर वापस जयपुर आ जाते हैं।
मुझे याद है, जब मैं बहुत छोटा था- शायद पहली या दूसरी कक्षा में पढता था- तो मुंबई जाते हुए अहमदाबाद में गाडी बदलने के बाद दादी माँ मुंबई की बजाय किसी और जगह जाने वाली गाडी में बैठ गई थीं। हम लोग कई दिनों तक गाडियों में घूमते रहे थे। मैं नासमझ था। बात की गंभीरता की जानकारी नहीं थी, इसलिए मस्त था। मुझे लगता था कि इस बार दादी माँ मुझे गाडी में बहुत मौजी खिला रही हैं। दादी माँ परेशान थीं। मुझसे कुछ बाँटने का तो सवाल ही नहीं उठता था। किसी और से भी खुलकर जानकारी लेना उन्हें सुरक्षित नहीं लगता था। यात्रियों, सहयात्रियों की बातचीत और भंगिमाओं के आधार पर वे कोशिश करतीं कि मुंबई कैसे पहुँचना चाहिए, इसकी जानकारी हासिल की जाए। इससे ज्यादा मुझे कुछ याद नहीं है। दादी माँ से जरूर मैंने कई बार इस सिलसिले में पूछा है, किंतु स्नेहपूर्ण मुस्कान के साथ उन्होंने मेरी जिज्ञासाओं को हमेशा टाल दिया है।
इस साल आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करके नौवीं में आया हूँ। पढाई में होशियार हूँ। हर साल कक्षा में पहला नंबर आता है मेरा। स्कूल की तरफ से आयोजित होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता में, नाटकों में भाग लेता रहता हूँ। इसलिये किसी से बात करने में हिचकिचाहट महसूस नहीं होती। अच्छा-बुरा सब कुछ समझता हूँ। जरूरत पढने पर अपने समझे हुए को लिखकर या बोलकर बता भी सकता हूँ। कुल मिलाकर कह सकता हूँ कि दादी माँ के साथ किसी समय मैं मुंबई आता था, अब दादी माँ मेरे साथ मुंबई आती हैं।
चाचाजी, चाचीजी तथा उनसे जुडे हुए बाकी लोग भी मेरी समझदारी और होशियारी से प्रभावित हैं। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों, चाचाजी को ऐसा लगता रहता है कि मेरी वह समझदारी व होशियारी जयपुर के लिए तो ठीक है, मुंबई के लिए कम ही नहीं, बहुत कम है। यही कारण है कि मुंबई में व्यवहार और सावधानी के बारे में हिदायतें देते हुए उनके तौर-तरीकों से यह
जाहिर होता रहता है कि मुंबई को समझने के मामले में मैं एक प्रकार से मूर्ख हूँ। मुंबई की तुलना में छोटा शहर है जयपुर। लेकिन जयपुर में रहने वाले मुंबई में रहने वालों के मुकाबले समझ के स्तर पर मूर्ख है, यह बात मेरा बाल मन मानने को तैयार नहीं होता।
यों भी शहरों का छोटा या बडा होना व्यक्ति के विकास से सीधा जुडा हुआ नहीं होता। मुंबई में रहने वाला आदमी भी कम समझ का हो सकता है और जयपुर में रहने वाला होशियार, तेज-तर्रार व जहीन। आखिर शहर की जनसंख्या, आकार-प्रकार, सडकें, यातायात-प्रणाली, व्यस्तता, सहूलियतें और सीमाएँ ही तो तय नहीं करती हैं कि उसमें रहने वाले लोग कितने समझदार या नासमझ होगें। समझ तो व्यक्ति के अपने परिवेश, परिवार के वातावरण और अपनी बुद्धि से उपजती है।
मैंने कभी चाचाजी से कुछ कहा तो नहीं है लेकिन जिस तरीके से वे मुझे हिदायतें देते हैं, वह मुझे कभी अच्छा नहीं लगता। जब वे कहते हैं कि यह मुंबई है, जयपुर नहीं। तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी ही नहीं, जयपुर और जयपुर में रहने वाले तमाम लोगों का चाचाजी मजाक उडा रहे हैं। चाचाजी मुंबई की व्यवहारिक जरूरतों से मुझे परिचित कराएँ, मुंबई में जो सावधानी रखनी चाहिए उसके बारे में बताएँ, सडकों को पार करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए यह शिक्षा दें, यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन वे मेरी समझ पर अविश्वास क्यों करते हैं?
कभी आजमाकर तो देखें कि मुझे जो व्यवहार मुंबई में करना चाहिए, करना आता है या नहीं? कभी भरोसा करके तो देखें वे मुझ पर। अम्मा- बाबा और दादी माँ ने बडों के सामने वाद-विवाद करने या उनसे बहस करने की सीख नहीं दी, इसलिए चाचाजी जो कुछ कहते हैं, मन-ही-मन असहमत होते हुए भी, मन-ही-मन उसका बुरा मानते हुए भी मैं उनसे कभी कुछ नहीं कहता। कुछ कहने का अर्थ होगा, उनसे बहस करना। बहस करो तो चाचाजी बुरा मान जाएगें। जो कुछ वे कहते हैं, एक
प्रकार से स्थायी हो जाएगा। उनकी गलत धारणाओं में परिवर्तन लाने के लिए मैं बहस नहीं कर सकता किंतु क्या किया जा सकता है या क्या किया जाना चाहिए, यह बात भी मेरी समझ में नहीं आती है।
बुआजी और उनकी ससुराल से छोटे-बडे मिलाकर सात लोग चाचाजी के पास आए हैं। सब मुंबई घूमने आए हैं और चाचाजी फैक्ट्री के किसी काम में व्यस्त हैं। इसलिए मुंबई में रहने वाले अपने साले को उन्होंने यह जिम्मेदारी दी कि वे सब लोगों को मुंबई दिखाएँ। चाचाजी की बारह साल की बिटिया जूही भी घूमने के लिए साथ गई। मुझे मिला कर दस लोगों का मुंबई घूमने का कार्यक्रम बना। शाम से ही चाचाजी ने मुझे अपने खास लहजे में हिदायतें देनी शुरू कर दीं- ‘चलती लोकल ट्रेन में न चढना और न उतरना। किसी भिखारी को कुछ मत देना। इस बहाने जेबकतरे जेब पर नजर रखते हैं। जेबरा क्रासिंग से ही सडक पार करना। सडक पार करने से पहले दोनों तरफ देखकर तसल्ली कर लेना कि कोई बस या टैक्सी तो नहीं आ रही है। सडक पर चलते हुए इधर-उधर देखने या किसी से बात करने मत खडे हो जाना। अपने लोगों से भटक गए तो मुंबई में घर पहुँचना मुश्किल हो जाएगा।’
वे सब बातें क्योंकि समझाने के तरीके से नहीं कहीं जा रही थी। इसलिए हमेशा की तरह खामोशी से सुनने के बावजूद मुझे अच्छा नहीं लगा। चाचाजी और किसी से कुछ कहना चाहें, तब भी मेरा नाम लेकर हिदायतें देने की आदत है उन्हें। हिदायतों के हर अध्याय का समापन करते हुए वे यह जोडना नहीं भूलते- ‘यह जयपुर नहीं है।’ इस बार भी उन्होंने उसी लहजे में उसी तरह हिदायतें दीं।
मामाजी के साथ हम लोग सारा दिन मुंबई में घूमते रहे। जुहू और चौपाटी पर समुद्र के पानी में धमा-चौकडी की। मरीन ड्राईव देखा। नरीमन प्वाइंट पर अभ्रस्पर्शी अट्टालिकाओं के दर्शन किए। कमला नेहरू गार्डन से एक-एक जगह पहचानकर उसका आनंद लिया। महालक्ष्मी
में साधु बेला देखा, गेट-वे ऑफ इंडिया पर बोटिंग की। घर से जो भोजन सामग्री साथ ले गए थे, हैंगिंग गार्डन में उसे खाया। रात को दस बजे घूम-फिरकर हम लोग उस स्टेशन पर पहुँचे, जहाँ से बीस मिनट पैदल चलकर हमें घर आना था।
स्टेशन पर उतरते ही एक विचार मेरे दिमाग में कौंधा। मैंने सबकी तरफ देखते हुए कहा, ‘‘मैं जल्दी-से-जल्दी घर पहुँचता हूँ। दरवाजा खटखटाऊँगा। चाचीजी दरवाजा खोलेगीं। उनसे पूछूँगा कि सब लोग अभी नहीं आए हैं क्या? चाचीजी को बताऊँगा कि चौपाटी पर मैं एक साइनबोर्ड देखने के लिए रूक गया था। बाकी सब लोगों से बिछुड गया, इसलिए अब अकेला घर आया हूँ। आप लोग पहुँचकर मेरे बारे में पूछिएगा। मुझे भला- बुरा कहिएगा और बिना सच्चाई बताए सो जाइएगा। चाचाजी को सारी बात कल सुबह बताऐगें। बडा मजा आएगा।’’
मेरी योजना में चाचाजी के बार-बार किए जाने वाले अविश्वास का मजाक के स्तर पर ठोस जवाब था। योजना सुनकर सबको बहुत आनंद आया। मेरे प्रस्ताव में बिना कुछ जोडे उन्होंने मुझे जल्दी घर पहुँचने की इजाजत दे दी। बाकी सब लोग धीरे-धीरे घर लौटे।
योजनानुसार मैंने दरवाजा खटखटाया। जैसी कि आशा थी, चाचीजी ने ही दरवाजा खोला। चाचाजी शाम को एक बार घर आकर फिर निकल जाते हैं और इसके बाद ग्यारह-बारह बजे तक लौटते हैं। मैंने बहुत परेशान, भयभीत और उदास लहजे में चाचीजी से पूछा, ‘‘बाकी लोग अभी पहुँचे नहीं है क्या?’’ यह प्रश्ा* पूछते हुए मैं दरवाजे पर खडा रहा।
चाचीजी अंदर जाने के लिए मुड चुकी थीं। मेरा प्रश्ा* सुनकर वह वापस पलटीं और बोलीं, ‘‘क्यों,’’ तुम ‘‘साथ तो थे, लेकिन मैं चौपाटी पर एक साइनबोर्ड देखने खडा हो गया था। वे लोग इधर-उधर हो गए।’’
‘‘तो तुम अकेले आए हो?’’
‘‘जी हाँ। वे लोग नहीं लौटे हैं तो मैं एक बार स्टेशन जाकर देख आता हूँ।’’ मैं मुडकर चलने लगा। ‘‘अब स्टेशन जाकर क्या करोगे? स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार तो कर नहीं रहे होंगे वे लोग। जब तुम आ सकते हो तो क्या वे लोग घर पर नहीं आ सकते? तुम्हारे चाचाजी बार-बार कहते हैं, इसके बाद भी तुम्हारे ऊपर कोई असर नहीं होता। मुंबई को जयपुर समझते हो।’’
इसके बाद चाचीजी लगातार मुझे कुछ-न-कुछ कहती हुई डाँटती रहीं। खाना-पीना मुंबई में घूमते हुए इतना हो गया था कि मुझे भूख नहीं थी। फिर अपने झूठ पर सच्चाई का पुख्ता मुलम्मा भी चढाना था। इसलिए पाँव से सिर तक चादर डालकर मैं चुपचाप लेटा हुआ सोने का नाटक करता रहा।
पंद्रह-बीस मिनट के बाद दरवाजे पर फिर खटखटाहट हुई। चाचीजी ने ही फिर दरवाजा खोला। मैं जिन लोगों के साथ गया था, वे सब लौट आए थे। दरवाजा खुलते ही उन्होंने मेरे बारे में पूछा। चाचीजी ने उन्हें बताया कि मैं थोडी देर पहले ही लौटा हूँ और आते ही सो गया हूँ। सबने अपने-अपने तरीके से मेरे खोने की बात कही। कुल मिलाकर सबने वही बात कही, जो मैंने कहीं थी। चाचीजी को तिल मात्र भी संदेह नहीं हुआ कि हमने उनको मूर्ख बनाने के लिए कोई षड्यंत्र रचा है।
मेरे खिलाफ तो वह पहले से ही बोल रही थीं। सब लोगों की बात सुनने के बाद उनका आलोचना का स्वर और तीखा हो गया। मैं लेटा हुआ आनंदित हो रहा था। इच्छा हो रही थी कि उठूँ और ठहाके लगाते हुए चाचाजी को सारी बात बता दूँ। लेकिन नहीं, झटका चाचीजी को लगना चाहिए। जिस तरीके से चाचाजी टोंकते हैं, उसमें परिवर्तन लाना मेरा उद्देश्य है। अगर अभी मैं सारी बात बता देता हूँ तो मेरा उद्देश्य पूरा नहीं होगा। होंठों पर मुस्कराहट और सिर से पाँव तक चादर ओढे हुए बिना हिले-डुले मैं इस तरह पडा रहा, गोया नींद में होऊँ।
चाचीजी ने भोजन तैयार कर रखा था। पेट तो सबका भरा हुआ था, फिर भी जितना भाया, सबने भोजन किया और सोने के लिए चले गए। थके हुए हम सब लोग थे, किन्तु चाचाजी को गुस्से में देखने का रोमांच थकावट के बावजूद मुझे सोने नहीं दे रहा था। मुझे इंतजार था चाचाजी का। आने के बाद चाचीजी उन्हें सारी बात बताएगीं। चाचाजी भडकेगें। फिर मेरे बारे में जो कुछ उनके मन में आएगा, कहेगें। वही मेरे कान सुनना चाहते थे। उनका मुँह देखना तो मेरे लिए संभव नहीं होता, किन्तु उनके कहे हुए शब्द अमृत की तरह मैं कानों से पीना चाहता था।
चाचाजी पता नहीं कब आए। भरपूर इच्छा के बावजूद मैं उनके आने तक नींद को अपने आपसे दूर नहीं रख पाया। चाचीजी ने सारी बात उन्हें जरूर बताई होगी। चाचाजी ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी होगी। मुझे भला-बुरा भी कहा होगा, किन्तु नींद के कारण वह सुनना मेरे लिए संभव नहीं रहा था।
सुबह उठने के बाद मैं जानबूझकर चाचाजी से कतराने की चेष्टा करता रहा। मुझे मालूम था कि यदि सामने नहीं पडूँगा तो चाचाजी मुझे बुलाकर खरी-खोटी सुनाएगें। कल मैंने जो कुछ किया था वह अनेक बार दी हुई चेतावनियों के बाव*ाूद की गई गुस्ताखी थी। डाँट-डपट करना लाजिमी था उनके लिए। वह बुलाएगें। मैं अपराधी की तरह धीरे-धीरे उनके सामने जाकर खडा होऊँगा। उनकी डाँट-फटकार अधिक तेज और पैनी होती जाएगी। मैं खामोशी से उनकी कही हुई बातें सुनता रहूँगा। मेरी अपेक्षा के अनुरूप थोडी देर बाद आवाज देकर उन्होंने मुझे बुला लिया। पिछले दिन की हुई घटना के बारे में उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा। न घटना का विवरण, न मेरा स्पष्टीकरण। गुस्से और नाराजगी के साथ उन्होंने जोर-जोर से मुझे प्रताडित करना शुरू किया। मैं चुपचाप खडा सिर झुकाकर उनकी लताड सुनता रहा। आखिर चाचीजी ने ही आकर मेरा बचाव किया, ‘‘छोडिए धीरे-धीरे सीख जाएगा। अभी बच्चा है।’’
इसके बाद चाचीजी ने मुझे जाने का इशारा किया। यद्यपि चाचाजी बाद में भी कुछ-न-कुछ कहते रहे, जिसे मैं बकायदा सुनता रहा, किन्तु आमने-सामने खडे होकर उनकी मुद्रा देखने का सुख चाचीजी ने मुझसे छीन लिया।
थोडी देर के बाद धीरे-धीरे सब लोग उठकर आए। चाय का दौर शुरू हो गया। चाचाजी, चाचीजी साथ बैठे थे। मैं जानबूझकर वहाँ नहीं था। तभी हँसते हुए बुआजी ने पिछली शाम का विवरण छेड दिया। उन्होंने चाचाजी को सारी बात बताई तो एक तरफ हँसी के मारे बेहाल हुए सब लोग थे और दूसरी तरफ बुरी तरह झेंप रहे चाचाजी एवं चाचीजी थे।
मुझे आवाज लगाकर बुआजी ने बुलाया तो वहाँ जाने की बजाय दूसरे दरवाजे से मैं घर से बाहर निकल गया। सब लोगों की उपस्थिति में चाचाजी के सामने जाकर उनको लज्जित करना या उनका मजाक उडाना मैं नहीं चाहता था। आखिर वे मेरे शुभचिंतक हैं। मुंबई के बारे में अगर मुझे हिदायतें देते हैं तो उनका उद्देश्य मेरा भला करना ही होता है। मेरे विरोध का कारण उनकी हिदायतें नहीं है। मेरा विरोध सिर्फ उस तरीके से है, जिससे वे हिदायतें देते हैं। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि चाचाजी मुझे वही समझें, जो मैं हूँ- न उससे कम और न उससे ज्यादा।
इस घटना के बाद चाचाजी मुझे अगर कभी कुछ कहते हैं तो उनके बोले हुए शब्द नपे-तुल होते हैं। निश्चय ही उनकी बात सुनकर मुझे या किसी और को कभी ऐसा नहीं लगता है कि वे मुझे मूर्ख समझकर कोई बात कह रहे हैं।
डी-१८३, मालवीय नगर, जयपुर-३०२०१७ मो. ९८२८४००३२५