अगला जन्म

वेदप्रकाश अमिताभ


बात हँसी मजक में शुरु हुई थी। विवाह वाले घर में काम तो बहुत से होते हैं, तमाम लोकाचार अलग से। लेकिन ठलुओं की भी कोई कमी नहीं थी। कुछ रिश्तेदार तो जैसे पिकनिक मनाने आए थे। किसी ने हँसी-हँसी में पूछ लिया था- ‘‘कौन-कौन लोग अगले जन्म में भी एक दूसरे के जीवन साथी बनना चाहेगें?’’ चाचा जी ने चुहल की थी- ‘‘अगले जन्म में मैं तो पत्नी बनना चाहूँगा। इन पत्नियों के ऊँचे ठाठ होते हैं। दिन भर पलंग तोडती रहती है और हम जैसे पति न दिन देखें न रात, न शीतलहर न बरसात, रोजी-रोटी के लिए यहाँ-वहाँ भागते-फिरते हैं।’’ चाचीजी ने नहले पे दहला लगाया था- ‘‘सचमुच भगवान ने किसी की बीवी बना दिया तो आटे-दाल का भाव मालूम पड जाएगा। हम लोग सुबह से शाम तक चूल्हे-चौके में खटती रहती हैं और तुम लोग बिजार की तरह छुट्टा डोलते रहते हो।’’ मौसी जी ने भी चाचीजी के सुर में सुर मिलया था- ‘‘तुम मरद क्या जानो, औरत ने कितनी तकलीफ झेल कर, तुम्हें पाला-पोसा है? कैसे खुद गीले में सोई हैं, तुम्हें सूखे में सुलाया है?’’
जब सब लोग अपने-अपने विकल्प बता चुके तो किसी ने कहा कि यह सवाल बूढी दादी अम्मा से भी पूछ लिया जाय। देखें, क्या जवाब मिलता है? एक परिजन ने असहमति जताई थी कि उनसे क्या पूछना? उन्हें दादाजी के साथ रहते पचास साल हो गए हैं। वे तो ‘मेड फॉर इच अदर’ हैं। दोनों को कभी लडते-झगडते नहीं देखा गया। उन दोनों की इच्छा यही होगी कि सात जन्मों तक उनका साथ बना रहे। फिर भी दादी की मुँह लगी धेवती नहीं मानी थी। उसने जाकर पूछ ही लिया था- ‘‘नानी आप तो अगले जन्म में नानू को ही जयमाला पहनाना चाहोगी?’’ सबकी ‘दादी अम्मा’ को सवाल समझने में थोडा समय लगा था। फिर वे जैसे भभक उठी थीं- ‘नहीं लल्ली नहीं......’
लल्ली उनकी इस उग्र प्रतिक्रिया से सहम गयी थी। उसने जिसे भी ‘दादी अम्मा’ का जवाब सुनाया था, वही हतप्रभ रह गया था। लल्ली को क्या पता गुलामी क्या होती है? वह नए जमाने की पढी-लिखी किशोरी, जीन्स, मोबाइल और बाईक की आधुनिकता में जीने वाली। उसे क्या पता था कि यह सवाल पूछकर उसने कितनी भूली-बिसरी यादों को सोते से जगा दिया था। पिछले पचास वर्षों के कितने दंश एक साथ चुभने और सताने लगे थे।
पिता के घर से विदा की बेला में माँ और चाची ने उन्हें बार-बार समझाया था- पति परमेश्वर का अवतार होता है। हमेशा हुकुम मानना। सास-ननद की जली-कटी को बर्दाश्त करना। जिस घर में तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी निकलनी है। उन्होंने इस पाठ को अच्छे विद्यार्थी की तरह रट लिया था और इसे अमल में भी लाती रही थी। सास ने दहेज देखकर मुँह बिचकाया था। वे चुप रही थी। ननद के व्यंग्यवचन वे हँस कर झेल गयी थी। पति कम बोलने वाला और अपनी माँ का दुलारा ‘श्रवण कुमार’ था। दूसरे शहर में नौकरी करता था लेकिन कई साल तक अपने साथ नहीं ले गया था क्योंकि सास को डर था कि बहू, बेटे को कुछ उल्टा-सीधा न पढा दे। पति के साथ रहने लगीं तब उसे अच्छी तरह पहचान पाई थी। पति चुप्पा जालिम था। वह चीखता-चिल्लाता नहीं था। सीधे हाथ चला देता था। वे पीहर जाने को तरस जाती थीं। पर उसे उन पर तरस नहीं आता था। उसे औरत जात पर ही विश्वास नहीं था। जब कभी मजबूरी में उन्हें पीहर भेजना पडा, तो वह भी साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। देखने वाले तारीफ करते थे- देखो लुगाई से कितना प्रेम करता है कि आँखों से ओझल नहीं होने देता।
पति का एक रूप उन्हें तब देखने को मिला था, जब वे पहली बार माँ बनी थीं- एक बिटिया की माँ। तब सास ने जो हाय-तोबा की सो की, पति के ऊपर तो जैसे वज्रपात हो गया था। लडकी पैदा होने पर उसे लगा जैसे उसकी मर्दानगी पर आँच आ गई हो। बहुत दिनों तक उसने बिटिया को गोद में नहीं लिया था। जब दुबारा उनके पैर भारी हुए तो पति जिद पर आ गया था कि कोख की संतान की जाँच कराऊँगा। वे भी अड गयीं थी कि छोरा हो या छोरी, उसे जन्म देगीं। गाली-गलौज, मार-पीट सब कुछ झेला उन्होंने। संयोगवश दूसरी संतान लडका हुआ तो परिवार में खूब खुशी मनायी थी। लेकिन इन कटु प्रसंगों से वे पति से दूर होती गईं। उन्होंने बच्चों की देखभाल में खुद को खपा दिया था।
‘मम्मी... मम्मी अछनेरा वाले आए हैं... बेटी की आवाज सुनकर उनकी तंद्रा भंग हुई और वे वर्तमान में लौट आई थीं। यही बिटिया थी, जिसका मुँह बाप ने कई दिनों बाद देखा था। जिसे पढाने के लिए उसने कितनी आनाकानी की थी- ‘कहा करेगी पढ-लिख के, कलट्टर बनेगी?’ कलक्टर तो नहीं बनी, पर पढी खूब। आज बडे कॉलेज में प्रोफेसर है। सारे रिश्तेदारों में उसकी पढाई की धाक है। अब तो बाप भी पीठ पीछे अपनी पीठ ठोंक लेता है- आखिर बिटिया किसकी है। बिटिया की एक मात्र संतान है- वही लल्ली। डाकदरी की पढाई कर रही है।
बेटी को मेहमानों की खातिरदारी के निर्देश देकर वे फिर धीरे-धीरे अतीत के पन्ने पलटने लगीं। इस लडकी को पढाने के लिए उन्हें कितना जूझना पडा था। उन्होंने घूंघट ऊँचा कर के कह दिया था- छोरा संग छोरी भी पढेगी। मरद नहीं माना तो उन्होंने उपेक्षा, चुप्पी और भूख हडताल जैसे हथियार उठा लिए थे। औरत को पैर की जूती समझने वाले पति को झुकना पडा था। उसने पढाई की हामी तो भर दी थी लेकिन उन्हें एक-एक पैसे के लिए तरसाने लगा था। तब उन्हने एक और फैसला लिया था। पति से साफ कह दिया था कि सिलाई मशीन उसके पास है। वे पास-पडोस से काम माँग कर पढाई का खर्चा उठाएँगी। पति को लगा था कि इससे तो बदनामी हो सकती है। घर की आग में बाहर वालों का तापने का मौका मिलेगा। इसलिए वह गृहस्वामी के फर्ज निभाने लगा था। अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही। भगवान ने उनकी पत कुछ ऐसी रक्खी कि छोरी हर क्लास में अव्वल ही रही। जिस बेटे पर उनके पति को नाज था। वह बाप के लाड-प्यार में ऐसा बिगडा कि राम-राम करके बारहवीं पास कर पाया। परचूनी की दुकान से जैसे-तैसे घर चला रहा है। उसने भी पढने-लिखने की कीमत बाद में समझ ली थी। आज उसी के बेटे की शादी में लोग जुटे हैं। यह लडका अपनी बुआ के पास रह कर पढा है।
बच्चों के सामने उन्होंने अपने और पति के बीच की खाई को जितना हो सका, छिपाकर ही रखा है। डोकरा बाहर वाले कमरे में पडा रहता है। दोनों वक्त रोटी के समय घर के भीतर आता है तो आमना-सामना हो जाता है। पास-पडोस के लोगों को लगता है कि पति-पत्नी हों तो ऐसे हों। उन्हें क्या मालूम, पति आज भी एकांत में डंक मारने से बाज नहीं आता है।
उफ- वे कहाँ खो गयीं थी। घर में कई काम उन्हें देखने-भालने हैं।आज मुँह लगी धेवती ने कुरेद दिया तो उन्होंने जाने क्या कह दिया। मुँह से कुछ गलत-सलत तो नहीं निकल गया? नहीं इसमें गलत क्या? वे तो यही समझ पाई हैं कि औरत के जन्म से तो जानवर और पंछी का जनम कहीं अधिक भला और अच्छा है। तभी उनके मुँह से निकल पडा था- ‘नहीं लल्ली नहीं। मैं अगले जन्म में तुम्हारे नाना की घरवाली नहीं बनना चाहती। एक जनम की गुलामी कमती है क्या?’
डी-१३१, रमेश विहार, अलीगढ-२०२००१ मो. ९८३७००४११३