तीन गजलें

अब्दुल मलिक खान


लडकपन की गलियाँ ढूँढें
बडे बडे गम पी कर, छोटी छोटी खुशियाँ ढूँढें,
इस तपते हुए सहरा में, छोटी सी इक बगिया ढूँढ,
खिल चुके फूल सभी, मौसमें बहार गया
दरख्तों की टहनी में, क्यूँ और अब कलियाँ ढूँढें,
उम्मीद महलों की लिये, चलते रहे शाहाना डगर,
हरम न मिला न सही, अब कोई कुटिया ढढें,
टूटकर कर बिखर गया ये आईना अब न जुडेगा,
हर गोशे में इसके हँसती हुई अँखियाँ ढूँढें,
अरसे से जो सितारा चमकता था अर्श पर,
कहीं अब न मिलेगा, चाहे सदियाँ ढूँढें,
काहे बर्फ ने सोचा बहुत, है मेरा वजूद क्यों,
अब मिलना है गर उससे, बहती हुई नदियाँ ढूँढें,
याद बहुत आएँगे वो दिन, वो पेड आम इमली के,
हाथ में पत्थर, यार से कहते, पत्तों में छिपी अमियाँ ढूँढें,
दुनिया की खाक छानकर, किसको है क्या मिला,
पाना है गर सुकून तो लडकपन की गलियाँ ढूँढें। ?
तूफां ठहर गए
रहनुमाई में जिनकी, कितने घर सँवर गए।
आशियाने उनके मगर, क्यों कर बिखर गए।
वादे किए जिन्होंने, साहिल दिखाएँगे,
छोडकर मझधार में, जाने किधर गए।
बडे बेताब थे, परवाज को नादान परिन्दे,
हालात के चूहे मगर, पर कुतर गए।
चेहरे पे जब नकाब थी, भाते थे वो बहुत,
बेनकाब जब से हुए, दिल से उतर गए।
कितना गुमान था उन्हें अपनी खदाई का,
ठोकर से एक वक्त की, तिनके बिखर गए।
हालात कुछ ऐसे, सियासत ने बनाए,
शैतान जन्दा रह गया, इन्सान मर गए।
जन्दगी लगने लगी, हर शख्स को ऐसी,
जाना था किस जगह, और कहाँ उतर गए।
ललकारा समन्दर ने कश्ती के हौसले को,
बुलन्द देखकर इरादे, तूफाँ ठहर गए। ?
डर लगने लगा है
गुजरी पुरानी यादों से डर लगने लगा है,
अपनी ही औलादों से डर लगने लगा है,
करते रहे जो आज तक मजलिस में बैठकर,
उनके खोखले वादों डर लगने लगा है,
डरते नहीं थे आज तक जो बादशाह से,
उनको अब प्यादों से डर लगने लगा है,
न जाने क्या गुल खिलाएगी ये नई पीढी,
इनके बेखौफ इरादों से डर लगने लगा है,
इन्साँ की शक्ल तो देती सुकून है लेकिन,
ओढे हुए अजीब लबादों से डर लगने लगा है,
तमीज न तहजीब न मरातिब का लिहाज जिन्हें,
उन उभरते अमीरजदों से डर लगने लगा है,
मुफलिसों के नाम है हिट लिस्ट में जिनकी,
ऐसे मगरूर जिहादों से डर लगने लगा है। ?
रामनगर, भवानीमण्डी, जिला-झालावाड-३२६५०२ (राज.)