तीन गजलें

कुमार विजय ‘राही’


(१)
हवा के साथ चलना ही पडेगा
हमें घर से निकलना ही पडेगा
मेरे लहजे में है तासीर ऐसी,
कि पत्थर को पिघलना ही पडेगा
पुराने हो गये किरदार सारे,
कहानी को बदलना ही पडेगा
वो जो मंजिल को पाना चाहता है,
उसे ‘राही’ सँभलना ही पडेगा
(२)
मगरूरी में किसको किसना ध्यान रहा
दरिया भी अपने को सागर मान रहा
जब टूटा था थोडे दिन बेजान रहा
फिर भी ‘दिल तो दिल है’, दिल नादान रहा
मेरा कातिल मेरे अन्दर था लेकिन,
मरते दम तक मैं उससे अनजान रहा
दुःख ने ही जीवनभर साथ दिया मेरा,
सुख तो केवल दो दिन का मेहमान रहा
जो भी तर थे पारावार मिला उनको,
और प्यासों के हिस्से रेगिस्तान रहा
वो भी मुझको दो दिन में ही भूल गया,
मेरा भी आगे रस्ता आसान रहा
सारी दुनिया घूमा हूँ मैं हालाँकि,
मेरे दिल में प्यारा हिन्दुस्तान रहा
(३)
तन्हाई से जब उकता के बैठ गया
मैं फिर मयखाने में आ के बैठ गया
पत्थर को पत्थर ही अच्छे लगते थे,
सो अपने तबके में जा के बैठ गया
आज गली से मैंने देखा था उसको,
चंदा छत पर ही शरमा के बैठ गया
दो घंटे तक बात नहीं कि जब उसने,
क्या करता मैं, मुँह लटका के बैठ गया
आखिर दीपक ने ऐसी क्या ठानी है,
देखो आगे आज हवा के बैठ गया
लोगों ने पूछा... जब उसके बारे में,
‘राही’ अपनी नज्म सुना के बैठ गया
बिलौना कलां, तह. लालसोट, जिला-दौसा, (राज.)
मो. ९९२९४७५७४४