दो गीत

कृष्ण मोहन अम्भोज


बँधे शहर से पाँव
आए थे कुछ
सपने लेकर
जब बँधे शहर से पाँव,
फिर भी मन के
भीतर-भीतर
कहीं बस रहा है गाँव।
छूटा वह बरगद का साया
दद्दा की थपकी सा,
सुधि में आता हरियालापन
सपनों की झपकी सा,
चुभ रहे हैं,
आँखों में अब तो,
यह धुँधवाते ठाँव।.......
तन से पूरे हुए शहर के
मन से आधे-आधे,
बैतालों सी कुछ यादें हम
धर लाएँ हैं काँधे,
शूल बनकर
चुभने लगा है
यह जीवन का दुहराव।...
भूख और रोटी बन बैठी
हिस्से दो पाटों के,
लगता है हम रहे न घर के
ना रहे घाटों के,
लगा गए हैं,
ना समझी में
हम मुस्कानों पर दाँव।...
टूट गए पुल
टूट गए पुल
धीरे-धीरे
हम-तुम मौन तटों से।...
कभी बीच में बहती थी इक
संवादों की धारा,
दीख रहा पोखर में पानी
कुछ गंदला कुछ खारा,
कसक उठी है
भीतर-भीतर
इक टीस तलछटों से।...
बना लिए हैं हमने अब तो
सम्बंधों के टीले,
कटुता की रेती में गुम हैं
स्वपि*ल शब्द रसीले,
दिखते जो भी
मनसूबे सब
औधें पडे घटों से।...
सौंधे रिश्तों सी, माटी की
छूट रही है जकडन,
काँप रहे हैं इन पडों के
फिर पुरखों जैसे मन,
हवा-बाढ ने
पीर न पूछी
ढहते हुए वटों से।
पचोर, राजगढ-४६५६८३ (म.प्र.)