दो गीत

ज्योतिपुंज


बरगद तुम्हें नमन
मन मन खन खन तव गुंजन
पल्लव नैसर्गिक कीरतन
घनी छाँव के बाबा बरगद, गद् गद् तुम्हें नमन
बाबा बरगद तुम्हें नमन।
जगंल बस्ती गाँव ठाँव औ नगर डगर में वास किया
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे अरू गिरजाघर उल्लास किया
जहाँ सैंकडों साल तपस्यारत रहकर आबाद हुए
कडी धूप बरसात भयानक तूफाँ का परिहास किया।
निस दिन तेरा अभिव्यंजन
अभिव्यंजन में दुःख भंजन
भीष्म पितामह शर शय्या के
तेरी साँस अमन...... बरगद तुम्हें नमन....
बाल किलोलें तेरे नीचे, युवकों के यौवन बोलें
तरुणाई की गाथाएँ श्रगार भाव में रस घोलें
ये प्रौढ-पुरातन चौपालों की अनुभव शाली चौकी है
तो न्याय तुला सी पंचायत बन लोगों के झगडे तोलें।
जहाँ हुए रंजन-मंजन
नित्य नये नर्तन कीर्तन
तेरी बडवाई में झूलें
करत किशोर रमन..... बरगद तुम्हें नमन....
पुरा कथा का गायक है अरू मानवता का याचक तू
पीढी दर पीढी का वाहक, उत्सव का है वाचक तू
ईद, दिवाली, होली, शादी, सभा, गमी का साया बन
भले बुरे परिणाम बताता, नीर क्षीर आलोचक तू
युगों युगों का है स्पन्दन
अलख निंरजन मांय मगन
तेरे आशीषों के साये
करते देश चमन.... बरगद तुम्हें नमन.......
मन-मन खन-खन तव गुंजन
पल्लव नैसर्गिक कीर्तन
घनी छाँव के बाबा बरगद, गद्गद् तुम्हें नमन
बाबा बरगद तुम्हें नमन।
उष्मा भरा निमंत्रण
उष्मा भरा निमंत्रण हो तो
मन भर के जाएँ
छाछ राबडी कांदा रोटी
गद्गद् हो खाएँ।
आँखों में आमंत्रण मीठे
कुमकुम की थाली
निश्छल प्रेम भाव से भीगी
अमृत की प्याली
अपना सब कुछ दे दूँ उसको
ऐसा हो जाए
अधरों से कुछ कहें कि तब तक
अँखियाँ रो जाए।
उनके गलियारों में जाकर
क्यूँ मनहूस हुए
स्वारथ की रबडी चाट-चाट कर
ठंडे जूस हुए
जहाँ खरीदा पीया उसी ने
खाली हो जाएँ
दीप बुझा तो काले भद्दे
साये मंडराए।
प्रकृति की सौन्दर्य पताका
जिसने फहराई
मीरा जैसी प्रेम दीवानी
मन में गहराई
ईश्वर के हाजिर नाजिर हो
प्रेमी हो जाएँ
एक दूसरे में खोकर बस
इक रस हो जाएँ।
बाहर के उजियारे जितने
भीतर भाव नहीं
औषध से उपचारित होवें
ऐसे घाव नहीं
रिसते नासूरों से जीना
कडवा हो जाए
अपनी छाती पर दुश्मन के
झंडे फहराएँ
ए-१/१०४, वैशाली अपार्टमैंट, सेक्टर-४, उदयपुर (राज.)