चार कविताएँ

श्रीनिवासन् अय्यर


समुद्र यात्रा
लहरें खारी... खारी...
सूरज की छांव...
डगमगाते डग भरती
सांसों की नाव!!
रिश्ते
सिर्फ पत्तियाँ भर
न हों हरी...
जडें भी हों
...गहरी!!
मरुस्थल-१
हुलसाई मृगतृष्णा,
झुलसाये अभिप्रेत,
संवेदना के सूखते ही
आदमी रेत!
मरुस्थल-२
तुझ में
पपडायी जमीं...
तुझ में
सारी नमी...
कर
नेह से समरस...
मेह तू बरस...!!
१४०८, गायत्री नगर, हिरणमगरी-५, उदयपुर मो. ९८२९७७७०८७