दो कविताएँ

हर्षदेव माधव


काश्मीर में बसते मित्र सतीश विमल को
(१)
हे प्रिय मित्र!
जिसका हाथ अपने कंधे पर हो
वह हो सकता है
अपना ही घातक।
सरोवर के पानी में
अचानक दिखाई दे आग की लपटें।
बाजार में
खाद्य सामग्री के बीच
प्रतीक्षा में हो स्फोटक पदार्थ।
शिकारे में घूमती हो
भद्रमुखी शत्रुता!
रक्षकों के किरदार में
आसपास हों
खून के भूखे-प्यासे भेडिये
हे प्रिय मित्र!
टेलीफोन का रिसीवर पकडने के समय
काँपते हैं तुम्हारे हाथ,
मकान का दरवाजा खोलते वक्त
भयभीत हो कर काँपता है तुम्हारा हृदय
वाहन में बैठने के वक्त
शंकित होता है तुम्हारा मन
परिचित स्थलों में अनुभव होता है
अपरिचितता का।
स्वजनों के बीच
लगता है परदेशवास।
हे प्रिय मित्र!
जीवन में
प्रतिक्षण
मौत की गोद में
तुमने सुरक्षित रखी है
अपनी शांति।
वह ही है
तुम्हारी विजय।
(२)
काश्मीर में होते हैं
चिनार के पेड
किन्तु उनकी शीतलता तो
तुम्हारे स्वभाव में है।
‘डल’ और ‘वुलर’ सरोवर भी हैं
परंतु
उनकी प्रसन्नता
तुम्हारी आँखों में है।
झेलम के प्रवाह का चैतन्य
तो है
तुम्हारे निर्भय व्यवहार में।
मशीनगन की आवाजें
तुमको विचलित नहीं कर सकती,
शत्रुओं की हिंसकता
तुमको हिला नहीं सकती,
देशद्रोहियों की बर्बरता
नहीं छू सकती
तुम्हारे धैर्य को।
‘कुछ लोगों’ की कायरता देखकर भी
कुरुक्षेत्र में
रथ पर बैठे अच्युत की तरह
तुम सहते हो हिमवर्षा।
क्या तुमने पा लिया है
लल्लेश्वरी की वाख का रहस्य?
या फिर अनुभूत कर लिया है
अभिनवगुप्त ने कोई गुफा में
जो पाया था शिवत्व-उसको?
८, राजतिलक बंगलोज, आबाद नगर के पास, बोपल
अहमदाबाद-३८००५८