चार कविताएँ

सवाई सिंह शेखावत


घर में
घर में सब कुछ ठीक नहीं है अब
सिवा उस नफरत के जो विनम्र दिखना सीख गई है
और छिपाना अपना खंजर चतुर सौम्यता से
हम बँट रहे हैं कैन्सर की कोशिकाओं की तरह
जी, कब का सुख चुका है वह गोंद
जिसने हमें जोडे रखा हर मुश्किल में
खोने के दुःख में पाने के सुख में
देह से आत्मा को अंत से आरंभ को

मैं फिर कहता हूँ मिट्टी में नुक्स नहीं है
खिल सकते हैं अब भी आत्मा के फूल
बशर्ते हम बोयें दिलों में मैत्री के बीज
सुनें दरवाजे तक आती जीवन-पदचाप को
लहू में घुले शहद और नमक से
जोडें रिश्तों की डोर पिघलती बर्फ में
और जगाए रखें सृजन की उम्मीद को!
सत्ता सार सुबोधनी
हर सत्ता-वंचित, त्याग की बात करता है
कृपालु उदारता और समावेशी चातुर्य की भी
निजी और सार्वजनिक जीवन की संधि में
लोग प्रायः एक गुप्त जीवन जीते हैं गुमनाम
जंदगी वह नहीं जो दरअसल उन्होंने जी
वह तो सिर्फ शोहरत थी जो बघारी गई
वे उम्र भर मसरूफ पाए गए
मशहूर होने के इसी घनघोर कारोबार में
चुप्पियों का उन्होंने हथियार की तरह इस्तेमाल किया
और गरियाते रहे हम हिंसक(?) व्यवहार को
अपने दुःख को खूब-खूब सार्वजनिक किया
और सुख को सीमित किये रहे खुद तक
अंततः वे खेत रहे इसी कुटिल अभियान में
लेकिन इतिहास ने उन्हें शहीद घोषित किया।
नंगापन
सनातन है यह बहस नंगापन दृश्य में है
या फिर उसे देखने वाली आँख में
नग्न होने पर भी पशु-पक्षी नंगे नहीं दिखते
पर कल मैंने साफ-साफ देखा
एक सजे-धजे आदमी का खुला नंगापन
शानदार पौशाक में चहलकदमी करते हुए
वह सलीम लंगडे पर हँस रहा था
विज्ञापन में खडी है एक स्त्री बिकनी पहने
उसकी उघडती देह में लोलुपता भरी नंगई
केप्शन कहता है ‘विश्वास है इसमें कुछ खास है’
समूचे दृश्य में है बजबजाती अश्लीलता
लहूलुहान हुई जाती है दृष्टी की नैतिक धार
अधनंगे अलबत्ता नंगे नहीं होते
लेकिन हमारा नैतिक विमर्श कहता है
गरीब भले ही नंगा हो लेकिन मन का चंगा है
हमें नहीं दिखती अपनी ही दृष्टि की खोट
जो गरीब में ईमानदारी का आदर्श खोजती है
और अनदेखा करती है अमीर के धत्कर्म को
वह शख्स जो रोते हुए पर गुर्रा रहा है
कल मैंने उसे देखा सरे राह
जबरे के सामने गिडगिडाते हुए
वह हो चुका था बेतरह अलफ नंगा
लेकिन फिर भी खिसियाते हुए खुश था
कि अब भी उसका सब कुछ दबा-ढका है।
चोटी पर
कुछ लोग चोटी पर हैं
जहाँ से हर चीज
छोटी दिखती है
और मामूली भी
बडा दिखने के घनचक्कर में
कुछ लोग जीवन भर छोटे बने रहते हैं
उन्हें नहीं व्यापता कोई खेद!
७/८६, विद्याधर नगर, जयपुर ३०२०३९ (राज.)
मो. ९६३६२९८८४६