राजस्थान का कथा-संसार

राजाराम भादू


राजस्थान कोई दूरस्थ प्रायः द्वीप नहीं है। यह उत्तर भारत की सामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का अविभाज्य अंग है और इसी के सापेक्ष आगे बढ रहा है। तथापि हर क्षेत्र की अपनी विशिष्टताएँ होती हैं। उन्हीं के संदर्भ में हम प्रदेश की सर्जना का संक्षिप्त विहंगावलोकन कर रहे हैं।
राजस्थान देश के हिंदी प्रदेशों में शामिल है और अनेक मामलों में यहाँ की स्थितियाँ भी हिंदी की मुख्यधारा से विच्छिन्न नहीं है। यहाँ साहित्य सर्जना का आरंभ हिंदी के एक भाषा के रूप में उभार से होता है जो कि स्वाभाविक भी है। भारतीय स्वातंत्र्य संघर्ष से हिंदी के उभार और विकास का संबंध ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। राजस्थान में भी हिंदी और नागरी का प्रचार-प्रसार करने वाली सार्वजनिक संस्थाएँ और संगठन रहे हैं और इनमें से कई अपने पुरातन रूप में अभी भी विद्यमान हैं। प्रदेश में हिंदी को प्रोत्साहन देने में आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलनों की महती भूमिका रही है। यहाँ ब्रिटिश सत्ता के साथ देशी रियासतों के विरुद्ध भी प्रजामंडल के बैनर तले लंबे आंदोलन चले और उन्होंने भी हिंदी को बढावा दिया। कई रियासतें जो स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देती थीं। उन्होंने हिंदी को अपनी शासकीय भाषा का दर्जा दिया। प्रदेश में शिक्षा को बढावा देने में मारवाडी सेठों का बडा योगदान रहा और इस शिक्षा ने नई पीढी को हिंदी के संस्कार दिए। भाषा की विकास प्रक्रिया के साथ ही साहित्य सृजन आरंभ हुआ और इसमें भी गुणात्मक परिष्कार आता गया। इसके विधिवत अकादमिक अध्ययन उपलब्ध हैं। इसलिए हम यहाँ इसके और अधिक विस्तार में नहीं जा रहे।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में जिस वीरगाथा काल का उल्लेख किया है, उसके अधिकतर साहित्यकार राजस्थान से हैं। वे पद्य में वर्णित आख्यान और इतिवृत्त ही हैं। आधुनिक कथा-कहानी के स्थापित होने से पहले हिंदी क्षेत्र की तरह यहाँ भी कथा-उपन्यास लिखे जा रहे थे। बूंदी के लेखक महता लज्जाराम शर्मा ने कई उपन्यासों की रचना की जिनमें ‘स्वतंत्र रंभा परतंत्र लक्ष्मी’ और ‘धूर्त रसिकलाल’ काफी चर्चा में रहे। ‘उसने कहा था’ जैसी क्लासिक कहानी के लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी इसी प्रदेश से थे। आधुनिक कहानी के प्रगतिशील दौर में राजस्थान मुख्यतः रांगेय राघव के
कारण जाना जाता रहा। हालाँकि उस दौर में परदेशी, ज्ञान भारिल्ल और ईश्वर चंदर ने भी अनेक उपन्यासों-कहानियों की सर्जना की।
रांगेय राघव के बाद कहानीकारों की एक पूरी पीढी हिंदी परिदृश्य में आती है, जिनमें यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, हेतु भारद्वाज, स्वंय प्रकाश, आलम शाह खान और मोहर सिंह यादव शामिल हैं। नई कहानी, अकहानी और समानांतर कहानी के दीर्घकालीन आंदोलनों के बीच राजस्थान के अशोक सेक्सरिया, मणि मधुकर, अशोक आत्रेय और शरद देवडा छाए रहे। पानू खोलिया का अधिकांश लेखन भी उनके राजस्थान प्रवास के दौरान ही सामने आया। मन्नू भंडारी और रमेश उपाध्याय का लेखन राजस्थान से जाने के बाद शुरू हुआ।
यहाँ उल्लेखनीय है कि राजस्थान में, विशेषकर कथा लेखन में महिलाओं की सक्रियता हर दौर में लगभग पुरुषों के समानांतर है। पिछली दोनों कतारों के साथ मनमोहिनी, सावित्री रांका, सावित्री परमार, सुमन मेहरोत्रा और अजरा नूर इस परिदृश्य की सक्रिय रचनाकारों में रही हैं। स्त्री-विमर्श का जो तीव्र उभार नई शताब्दी के साथ हुआ, ये उससे पहले से लिख रही थीं और स्वतःस्फूर्त तरीके से स्त्रियों के प्रशनो को उठा रही थीं।
सृजन के क्षेत्र में नई पीढी आगे आने के लिए पचास साल इंतजार नहीं करती। कई बार तो अगले दशक में ही नई पीढी सामने आ जाती है। इसलिए इसे पीढी की बजाय कतार कहा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। तो अगली कतार में हसन जमाल, कमर मेवाडी, हबीब कैफी, श्याम जांगिड, अशोक सक्सेना और सुभाष उपाध्याय आदि कथाकारों ने अपनी पहचान बनायी। यह जनवादी कथा लेखन का दौर था और यथार्थवाद पर फिर से आग्रह बढ गया था।
समकालीन कहानी में राजस्थान की ओर से शिरकत करने वाले कथाकारों में रामानंद राठी, मालचंद तिवाडी, सत्यनारायण, लवलीन और रघुनंदन त्रिवेदी मुख्य हैं। ये
‘सारिका’ से सामने आए तो ‘हंस’ से इन्होंने अपनी पहचान हासिल की। इन्हें राजेंद्र यादव की सराहना मिली और उनसे जीवंत संफ-संवाद बना रहा। दुखद रहा कि लवलीन और रघु असमय चले गए।
शताब्दी के उत्तर्राद्ध तक हिंदी कहानी, नयी कहानी, अकहानी, समान्तर और प्रगतिशील, जनवादी इत्यादि जिन आन्दोलनों से गुजरी, हमारे प्रदेश के कथाकारों ने भी अपनी रचना दृष्टि और अभिरुचियों के मुताबिक इन धाराओं से सम्बद्धता का निर्वाह किया।
इस शताब्दी के शुरुआती दशक में एक बार तो ये लगने लगा था कि जैसे राजस्थान में कहानी में अब कोई आ ही नहीं रहा है। ऐसे में चरणसिंह पथिक उम्मीद की तरह आए। उनका साथ फिर रामकुमार सिंह और दुष्यंत ने दिया। यहाँ हिंदी कहानी की यात्रा के भिन्न पडावों को इंगित करने लिए हर कतार में कुछ समूहों के नाम प्रस्तुत कर रहा हूँ। बेशक इन कतारों के इधर-उधर भी कई कहानीकार आते रहे हैं और इन्होंने अहम काम किया है। शायद मेरे लिए उन्हें कतारबद्ध करना मुश्किल रहा है। उदाहरण के लिए राम जायसवाल ने पेंटिंग के अलावा कहानियाँ भी लिखी, ठीक ख्यात चित्रकार रामकुमार की तरह, वे नई कहानी के दौर में सक्रिय थे। शचींद्र उपाध्याय का लंबा सृजनकाल रहा है। हरदर्शन सहगल दशकों से नियमित लिख रहे हैं। मूलतः पत्रकार ईशमधु तलवार कहानियाँ भी लिखते रहे हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ राजस्थान से चलकर वापस यहाँ आ गई हैं। उनके साहित्य में अभिनव शैली के साथ अक्सर राजस्थानी जनजीवन की प्रतिच्छायाएँ मौजूद रहती हैं। हरिराम मीणा एक एक्टिविस्ट की तरह साहित्य में आदिवासी प्रश्नो को उठा रहे हैं। दलित प्रशनो के रत्नकुमार सांभरिया ने अपनी कहानियों में प्रमुखता दी है। उन्होंने दलित कहानी को एक शास्त्रीय फ्रेमवर्क देने की कोशिश की है। मनीषा का स्त्री-विमर्श को लेकर अपना खास अभिमत है।
अप्रवासी भारतीयों की तरह यदि अप्रवासी राजस्थानी रचनाकारों को भी गिनती में लाएँ तो मन्नू भंडारी की तरह अलका सरावगी, प्रभा खेतान, कुसुम खेमानी और मधु कांकरिया भी शामिल हो जाएंगी। प्रभा खेतान तो अपने आखिरी दिनों में यहाँ बहुत सक्रिय थीं। बाकी सबका भी प्रदेश से अभी भी जीवंत और रागात्मक रिश्ता है। इनके लेखन में भी प्रदेश जगह पाता रहा है। यह अलग बात है कि राजस्थान के लेखकों की सॉलिडेरिटि कलकत्ते से नहीं बन पाती।
बहरहाल, इस संक्षिप्त खाके के बाद प्रदेश के कथा लेखन पर कुछ प्रश्न जो गाहे-बगाहे उठते रहे हैं। हालाँकि बेहतर तो यह होगा कि प्रदेश की सृजनशीलता का गहन आत्मपरीक्षण किया जाये। कथाकार स्वयं प्रकाश ने राजस्थान हिंदी साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का एक विशेषांक राजस्थान की कहानी पर संपादित किया। इसके संपादकीय में उन्होंने असंतोष जाहिर करते हुए यहाँ के कथा-परिदृश्य को काफी अंधेरा बताया था। हमने तो तब भी उनसे असहमति ही जताई थी। लेकिन इतना तो मानना ही पडेगा कि संख्या की दृष्टि से सृजन की स्थिति भले ही बेहतर हो, लेकिन पेदश से ऐसी उत्कृष्ट कृतियाँ तो कम ही निकल पाती है जिन्हें समूचे हिंदी प्रदेश में महत्ता मिले। यहाँ विमर्श का स्तर भी वैसा नहीं जैसा दिल्ली को छोड भी दें, तो बिहार अथवा मध्यप्रदेश में मिलता है।
एक और बात अक्सर बेचैन करती है। राजस्थान की लोक संस्कृति बहुत समृद्ध है और यहाँ आख्यानों की दीर्घकालिक और लोकप्रिय परंपरा रही है। देवीलाल सामर, कोमल कोठारी और विजयदान देथा की त्रयी ने लोक संस्कृति के भिन्न-भिन्न आयामों पर जीवन-पर्यंत काम किया। इस लोक से राजस्थान का कथा-लेखन कोई सर्जनात्मक संबंध क्यों नहीं बना पाया जैसा बिज्जी दा ने बनाया। हालांकि उन्होंने जैसा और जिस तरह का बनाया उसे लेकर भी काफी बहस है। उत्तर आधुनिकता के मौजूदा दौर में हमारा कथा-लेखन हमारे ही अतीत की
आख्यान धारा से विच्छिन्न है। इसे सिर्फ आधुनिकता से उत्पन्न कह कर टालना शायद मुश्किल है।
इस शताब्दी की शुरुआत से कथा-लेखन के क्षेत्र में विमर्शों की प्रतिच्छाया रही है। लेकिन यहाँ वैसी तीव्र टकराहट और आक्रामकता नहीं दिखायी देती, जैसी साहित्य के दिल्ली जैसे केन्द्रों पर परिलक्षित होती है। ऐसी कोई अनिवार्यता भी समकालीन कथा-लेखन के साथ नहीं जुडी है। किन्तु रचनाकारों से यह अपेक्षा तो स्वाभाविक ही है कि उनकी सृजनात्मक उत्पेरणाएँ, कलात्मक मूल्य और असहमतियाँ यदा-कदा प्रकट हों। सभी जवाब रचना से मिलना कहाँ संभव होता है।
अंततः जब नई पीढी साहित्य ही नहीं, बल्कि हिंदी से ही विरत होती जा रही है, तो भी यहाँ संदीप मील और भागचंद गुर्जर के साथ उमा, इरा टांक और तस्नीम जैसी संभावनाशील कथाकार आ रही हैं। रचना का पथ एक कठिन साधना का पथ है और जिसमें हिंदी में लिखना तो बिना किसी प्रतिफल उपक्रम है। ऐसे में कतार का समूह भले छोटा होता जाए, लेकिन उसकी दस्तक ही बडी बात है। हमने कहा था कि यहाँ हिंदी मातृ बोलियों से शक्ति लेकर स्वातंत्र्य संघर्ष के दौर में सर्जना की भाषा बनी। तब से संघर्ष और प्रतिरोध राजस्थान के साहित्य का केंद्रीय स्वर है और इस संदर्भ में अभी तक कोई विचलन नहीं है।
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