कवियों के गुरु कमलाकर ‘कमल’

डॉ. शीताभ शर्मा


ब्रह्माण्ड में आदित्य-तेज तम को नष्ट करता है किन्तु महान विभूतियाँ धरा पर देह धारण कर दिव्य गुण तेज से हृदय अंधकार को विदीर्ण करती हैं। धरा पर वही देश धन्य है, जहाँ महान विभूतियाँ पैदा होती हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में भटकते लोगों को रास्ता दिखाने का महान कार्य, व्यथित मनों पर मरहम का कार्य महान विभूतियों ने किया है। जिन्होंने निःसकोच व निःस्वार्थ रूप से
अपने समग्र जीवन दर्शन, अपनी समस्त क्षमताओं को मानव कल्याण
हेतु समर्पित कर दिया। इसी परम्परा में उदार विभूति कवि कमलाकर
‘कमल’ हैं-
हम उसे ही कवि कहें जो आग लिखना जानता हो।
काल सी अपनी अखण्डित शक्ति को पहचाना हो। के उद्घोषक कलाकार का जन्म २८ जनवरी १९१५ को रेवई ग्राम (म.प्र.) में हुआ। जब आप ढाई माह के थे तो मातृ सुख छिन गया और १४ वर्षीय किशोरावस्था में पितृ-साया भी न रहा। अपने काका सुधाकर से आपने काव्य शिक्षा ग्रहण की और अपने कुल के ध्येय वाक्य ‘‘कर कलम रुके तो कर कलम कराईयै’’ के अनुरूप आप जीवन पर्यन्त साहित्य साधना में रत रहे।
आप पुष्टिमार्ग में दीक्षित ब्राह्मण, मन से संत, मस्तिष्क से दार्शनिक थे। आप आस्तिक रहे पर अंधविश्वासों से परे। बाह्याडम्बरों व रूढियों का विरोध आप जीवन भर करते रहे। आपकी निम* पंक्तियों में यही भाव व्यक्त
हुआ है-
अए मुसलमां तू किसी भी मौलवी पर मत फिदा हो।
हिन्दू भी बोले पंडित से अरे, पंडित विदा हो।।
पादरी का काम दुनिया का निरा नुकसान करना।
पंडितों का काम हरदम दूसरों का माल हरना।।
प्रातः चार बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक पाँच सौ के लगभग विद्यार्थियों को निःशुल्क हिन्दी काव्य शास्त्र, हिन्दी साहित्य, इतिहास पढाते रहना तथा उनके अन्दर के साहित्यकार की खोज कर उसका परिष्कार करना आपकी दिनचर्या थी। हिन्दी उत्थान हेतु आपने साहित्य सदावर्त नामक संस्था की स्थापना की और हिन्दी की सेवा में रत रहे। आपने ‘प्रकाश’ मासिक हिन्दी
पत्रिका का सम्पादन किया जो १९३८ई. से १९४२ ई. तक साहित्य संवर्द्धन करती रही। पत्रिका में उच्च कोटि के निबन्ध लिखकर गद्य के क्षेत्र में भी अपना स्थान बनाया। हिन्दी की उपेक्षा से आप व्यथित थे।
कमलाकर जी ने सन् १९३३ से १९५६ तक लगभग पैंतीस हजार हिन्दी अध्येता तैयार किये। साहित्य सदावर्त संस्था के संस्थापक कमलाकर जी को आज भी लोग गुरू कमलाकर के नाम से सम्बोधित करते हैं। आपने हिन्दी को अनेक साहित्यकार एवं कई विद्वान दिये। कवि कमलाकर की विनम्रता और उदारता इतनी थी कि वे अपने शिष्यों को हिन्दी साहित्य जगत के सहयोगी के रूप में तैयार करते थे न कि विद्यार्थी के रूप में। इस शिष्य परम्परा में जिनके नाम लोक में गूँजते रहेगें, उनमें स्व. श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश, स्व. श्री मण्डन मिश्र, स्व. श्री बुद्धि प्रकाश पारीक, श्री सुधाकर शास्त्री, डॉ. कमला बेनीवाल, श्री कैलाश चतुर्वेदी, श्री पुरुषोत्तम उत्तम, श्री सत्येन्द्र चतुर्वेदी, ब्रजभाषा पे*मी साहित्यकार डॉ. विष्णु चन्द्र पाठक, स्व. श्री चन्द्र कुमार सुकुमार इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं।
ब्रजभाषा खडी बोली हिन्दी और संस्कृत भाषात्रय में आपने काव्य रचना की। आपका सम्पूर्ण साहित्य आधुनिक भाव बोध से युक्त है।
कमलाकर आधुनिक जयपुर साहित्य के ऐसे विलक्षण और अपूर्व हस्ताक्षर हैं जिन्होंने हिन्दी भाषा में राष्ट्रीय आन्दोलन और आजादी के पश्चात् की भावनाओं से आप्लावित पर्याप्त रचनाएँ लिखी हैं, वहीं दूसरी ओर भक्ति काल की अनन्य भक्ति-भावांजलि तथा रीतिकाल के कलात्मक सौन्दर्य के साथ ब्रजभाषा माधुर्य की रसमयी रचनाएँ इनके सन्त स्वभाव से व्यक्त हुई हैं। कमलाकर उस पूरी पीढी के सशक्त हस्ताक्षर हैं जो ब्रजभाषा के माधुर्य में लिपटी हुई है तथा जिन्हें राष्ट्र भाषा हिन्दी पर गर्व है, किन्तु साहित्य जगत को वर्तमान में कमलाकर के संबंध में यही ज्ञात है कि पद्माकर की पाँचवी पीढी में एक वंशज हुआ, जो उदार व्यक्तित्व और गम्भीर साहित्य
का रचनाकार रहा है। उन्होंने निःस्वार्थ व लोक कल्याण भाव से साहित्य रचा। कमलाकर का साहित्य स्वतः स्फूर्त भावना का प्रतिफलन है। इनका काव्य पूर्वज परम्परा की श्रृंगारिकता से मुक्त आधुनिक भाव-बोध का रसमयी काव्य है। भारत-भारती के लिए आपका जीवन समर्पित रहा, आपकी निमपंक्तियाँ यही व्यक्त कर रही हैं-
भारती की अर्चना में तन समर्पित मन समर्पित।
पेम से श्रद्धा सहित, विश्वास पूर्वक धन समर्पित।।
वंश परम्परा के अनुरूप रीतिकालीन काव्य शैली में आपकी रचनाएँ आरम्भ हुई। पुष्टिमार्गीय भक्ति-भावधारा में राष्ट्रीय आन्दोलन व समसामयिक रचनाओं की युगानुकूल भावना का समावेश होकर राष्ट्र-प्रेम, धर्मनिरपेक्षता, श्रमदान, त्याग, बलिदान की कर्मप्रधान अभिव्यक्ति पेरणादायी एवं यथार्थ परक है। इनके काव्य की नींव जो सदाचरण, दया, करुणा, परोपकार, सात्विकता, जनकल्याण भाव तथा कर्मप्रधान मानव की परिकल्पना है। कमलाकर का काव्य मानवीय मूल्यों का संवाहक है, जिसकी अन्तर्वस्तु का आधार प्रगतिशील चेतना है-
न देव काम आयेगा, न दैव काम आयेगा।
मनुष्य को मनुष्य ही, सदैव काम आयेगा।
कवि हृदय व्यक्ति परिष्कार से काव्य आरम्भ कर एक अभिनव सा परिष्कृत विश्व चाहता है। कवि का काव्य संसार कहाँ से आरम्भ होकर किन-किन परिस्थितियों और पडावों से गुजरता हुआ कहाँ तक जाता है, इसका बडा ही मर्मस्पर्शी एवं चमत्कारिक चित्रण आफ कवि नामक महाकाव्य म हुआ है।
संस्कृत भाषा में आफ काव्य हैं- ‘अथहिन्द भूम्यष्टकम्’, ‘अथ भारत जनन्यष्टकम्’ तथा ‘अथ भारती-भूम्यष्टकम’ इत्यादि। इसी तरह ब्रजभाषा में भी आपकी काव्य कृतियाँ हैं, यथा- ‘सूरदास’, ‘त्रिवेणी’, ‘तुलसीदास’, ‘कृष्ण महिमा’, ‘कमल हजारा’ इत्यादि। हिन्दी भाषा में जो काव्य संग्रह आपने लिखे हैं उनमें कुछ खास उल्लेखनीय हैं- ‘त्रेता’, ‘प्रतापबावनी’, ‘कमल पदावली’, ‘अमर
भारती’, ‘अष्टदल’ इत्यादि। गद्य लेखन के क्षेत्र में कमलाकर जी ने पाँच कृतियाँ लिखी हैं। लेकिन कमलाकर का विशद काव्य आज भी प्रकाशन की बाट जोह रहा है। बाल्यकाल से ही आप राष्ट्रीय आन्दोलन से जुडे रहे। आप गाँधी से प्रभावित रहे। गाँधीजी के नमक आन्दोलन के दौरान सजा भी भुगती। आपकी साहित्यिक सेवाओं को सदा राजकीय व सामाजिक सम्मान मिलता रहा।
रीतिकालीन महाकवि पद्माकर की पाँचवी पीढी के सशक्त हस्ताक्षर अमल-धवल कमलाकर ‘कमल’ की अभिलाषा कर्म द्वारा ज्ञान के आलोक में निष्काम कर्म
की रही-
नन्दनों के स्वर्ग की मुझको नहीं परवाह है।
कुछ कहीं पर भी नहीं, अभिनन्दनों की चाह है।।
अब ना मेरे भाल पर कोई तिलक चन्दन करे।
चाह बिल्कुल भी नहीं जन चरण वंदन करे।।
कर्म के द्वारा पहुँचकर ज्ञान के आलोक में,
चाहता हूँ मैं रहूँ, निष्काम होकर लोक में।।
हिन्दी विभाग, कानोडिया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर (राज.) मो. ९४१३८३६३४