हिन्दी कविता के बहाने से....

डॉ. बृजेन्द्र कुमार अगिहोत्री


हिन्दी का साहित्यिक स्वरूप जिस प्रकार विकसित हुआ है, उसका बीजारोपण दसवीं शताब्दी से बहुत पूर्व पालि, प्राकृत और अपभ्रंश भाषा के रूप में हो चुका था। परिनिष्ठित अपभ्रंश का स्वरूप दसवीं शताब्दी के पश्चात लोकभाषा में लिखित साहित्य में उपलब्ध होता है। धीरे-धीरे लोकभाषा का यह साहित्य अपभ्रंश से दूर हटता गया है और पिंगल के प्रयोग तथा प्रादेशिक बोलियों के प्रभाव से बदलता गया। यह साहित्य अपभ्रंश के शौरसेनी और अन्य रूपों के मिश्रण से जो स्वरूप ग्रहण करता गया, वह हिंदी भाषा के निकट आता गया।
साहित्य अपने समय और समाज का प्रतिबिम्ब होता है। अगर हम हिंदी काव्य साहित्य का अवलोकन करें तो पातें है कि हिंदी के प्रथम महाकाव्य- ‘पृथ्वीराज रासौ’ में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की गाथा है। हिंदी के पहले बडे कवि कबीर के कृतित्व का एक बडा अंश इस संघर्ष को प्रशमित करने पर खर्च हुआ है। हिंदी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ में भी इसी हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व की कथा का विस्तार दिखाई पडता है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि इन सभी प्रसंगों में सांप्रदायिकता की भावना कहीं दृष्टिगत नहीं होती। न हिंदू कवि चंदवरदाई में, न मुस्लिम कवि मलिक मोहम्मद जायसी में और न हिंदू न मुस्लिम कहे जाने वाले कबीरदास में। यह हिंदी काव्य और साहित्य परंपरा की जीवंतता का सबसे बडा प्रमाण है कि जिनका जन्म हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के साथ होता है और जो इस संघर्ष का अनेक रूपों में चित्रण करते हैं, परंतु जिनकी रचनाओं में सांप्रदायिक दृष्टि का संस्पर्श भी नहीं होने पाता।
जार्ज ग्रियर्सन, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी काव्य में भक्ति के उदय की व्याख्या तीन अलग-अलग रूपों में करते हैं। ग्रियर्सन के लिए यह एक बाह्य (ईसाई) प्रभाव है, आचार्य शुक्ल के लिए यह बाह्य-आक्रमण की प्रतिक्रिया है और आचार्य द्विवेदी इसे भारतीय परंपरा का स्वतः स्फूर्त विकास मानते हैं। ये क्रमशः विदेशी, देशी और लोकपक्ष को महत्त्व देने की अलग-अलग परिणतियाँ जान पडती हैं। इन तीनों परिणतियों का स्रोत दक्षिण भारत में माना जाता है। दक्षिण के वैष्णव भक्त संतों को ‘आलवर’ कहा गया है। तमिल भाषा में ‘आलवर’ का शाब्दिक अर्थ- ‘पेमभक्ति-सागर
मग’ है। आलवरों की चतुःसहस्री वाणी के चौबीस प्रबंधों को ‘दिव्य प्रबंध’ शीर्षक से हिंदी भवन, शांतिनिकेतन द्वारा आठ खण्डों में प्रकाशित किया गया है। तमिल ‘दिव्य प्रबंध’ को आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रमुखतः कृष्ण-काव्य का आदि-रूप कहा जा सकता है। कृष्ण-लीला का वैसा विस्तार तो यहाँ नहीं, जैसा कि सूरदास या अष्टछाप के अन्य कवियों में मिलता है परंतु कुछ महत्त्वपूर्ण लीलाएँ संकेत रूप में अवश्य उपलब्ध हैं यथा- पूतना-वध, केशी-संहार, गोर्वधन-धारण और रास-प्रसंग आदि। भगवन श्रीकृष्ण की दाम्पत्त्य भाव से आराधना का यहाँ अपेक्षया विस्तार है। अनेक कवियों ने इस भूमिका में प्रवेश किया है परंतु कलियन (संत परमाल) के काव्य की तो मुख्य चेतना ही यही है। दाम्पत्त्य-भाव की अनुभूमि में संत शठकोप ने एक विलक्षण प्रयोग किया है- अपने को नायिका परिकल्पित करने के दौरान वे नायिका से नायक हो जाते हैं। गोपी से कृष्ण बन जाते हैं और कृष्ण का भी कुछ वैसा रूप धारण करते हैं, जिस रूप में कृष्ण ने श्रीमद्भागवतगीता में अपना विभूति-योग अर्जुन के समक्ष प्रदर्शित किया था। आलवरों के भक्ति-प्रसंग में यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि वह कृष्ण-भक्ति पर बल अवश्य देते हैं पर उसे वे सांप्रदायिक रूप में स्वीकार नहीं करते। अनेक स्थलों पर कृष्ण के साथ राम के चरित्र का गायन भी हुआ। अनेक संदर्भ ऐसे हैं, जहाँ राम और कृष्ण, शिव और विष्णु के संपृक्त रूप सामने आते हैं।
किसी भाषा साहित्य का किसी धर्म-संप्रदाय विशेष से अनिवार्य संबंध नहीं होता, सभ्यता और संस्कृति से होता है। जिसे इतिहास की अंतक़िया में ‘धर्म का सत’ कह सकते हैं। बहुत कुछ होम्योपैथी सिद्धांत के अनुसार संस्कृति के घोल में धर्म-संप्रदाय का तत्त्व जितना हल्का होता जायेगा, संस्कृति-सभ्यता की प्रभविष्णुता की मात्रा उतनी बढती जाएगी। संस्कृति-सभ्यता के अलगाव के कारण बांग्लादेश देशमुक्ति-मुक्ति लडकर एक ही धर्म-संप्रदाय को मानने वाले पाकिस्तान से अलग हो गया।
दूसरी ओर इस्लाम में दीक्षित हो जाने पर भी इंडोनेशिया अपने पुराने हिंदू संस्कृति-सभ्यता के प्रभावों को पूरे सम्मान के साथ बनाए हुए है। पुरुष-स्त्री के नामों से रामायण-कथा के विविध रूप और चरित्र उनके जन जीवन में समाये हुए है। प्रसिद्ध भाषा-वैज्ञानिक और साहित्य-चिंतक डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने भाषा और धर्म के प्रसंग में एकदम सही समाधान किया है- ‘‘हिंदी के संबंध में एक भ्रम के निवारण की नितांत आवश्यकता है। वह यह कि हिंदी हिंदुओं की भाषा न होकर हिंदियों की भाषा है।’’
(हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सत्ताइसवें अधिवेशन, शिमला के साहित्य परिषद्, १९३६ के अध्यक्ष पद से दिया गया अभिभाषण)।
इस दृष्टि से देखने पर हिंदी के भक्ति साहित्य की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रणेता कबीरदास ने जहाँ धार्मिक रूढियों का सर्वत्र जमकर खंडन किया, वहीं सूक्ष्म-चेतना उनमें निरंतर अंतर्व्याप्त रही। आत्मालोचन की अत्यंत प्रखर परंपरा हिंदू जनमानस की विशेषता रही है। कबीरदास जिसका श्रेष्ठतम रूप में प्रतिनिधित्व करते है। इसीलिए कबीरदास को लाडने-पुचकारने के बावजूद किसी अन्य साहित्य या संस्कृति परंपरा में यह साहस नहीं होता कि उन्हें हथियाने की थोडी भी कोशिश करे। कबीरदास को हिंदी आलोचना के केंद्र में लाने का श्रेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को है। जन-मन में तो कबीरदास पहले से व्याप्त थे। महाकवि वही है जो पेम-तत्त्व के अनुसार काव्य-सृजन करे, जिसे सच-झूठ की अभिव्यक्ति में आसक्ति न हो। मलिक मुहम्मद जायसी के शब्दों में- ‘कवि सो पेम तंत कविराजा/ झूठ-साँच जेहि कहत न साजा।’ सूरदास के काव्य कृष्ण-भक्ति, काव्य और संगीत का ऐसा संगम है, जिसके प्रभाव ने व्यापक धार्मिक असहिष्णुता के उस कठिन समय के मध्य, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- ‘जीने की चाह बनी रहने दी’
सूफी काव्य ने यदि हिंदुओं को अपनी ओर आकृष्ट किया तो कृष्ण-भक्ति काव्य ने मुस्लिमों को। इससे यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि तद्युगीन समय में ‘भक्ति धर्म
की रसात्मक अनुभूति’ किस प्रकार रही है और किस प्रकार भक्ति भाव काव्य की प्रेरक-शक्ति बनता है, न कि सीधे धर्म, संप्रदाय या मतवाद। हिंदी साहित्य का केन्द्र परिवार का जीवन रहा है, जो एक प्रकार से आदि महाकाव्यों- ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की परंपरा से सीधे चला आता है। हिंदी रचनाकार मूलतः परिवार में विकसित जीवन-मूल्यों को संजोकर रखता है। ‘पद्मावत’ और ‘रामचरितमानस’ का रचना-विधान इन्हीं जीवन-मूल्यों की सुरक्षा में तत्पर दृष्टिगत होता है। परिवार का मुख्य आकर्षण परिवार में पनपने वाला ‘बाल्य-जीवन’ है, जहाँ वयस्कों के तनाव भी शमित हो जाते हैं। गृहस्थ परिवार की संपूर्ण दिनचर्या बाल कृष्ण के निमित्त ‘सूरसागर’ में देखी जा सकती है। सूरदास की काव्यभाषा में बोलचाल का ऐसा गहरा संस्कार दिखाई पडता है, जिससे उनके द्वारा वर्णित गृहस्थ जीवन, जीवन का चित्रण अपने आप में प्रामाणिक दिखता है। शायद यही कारण है जिससे सूरदास को ‘बाल्य-जीवन का अद्भुत चितेरा’ कहा जाता है। कला और सहजता का ऐसा विलक्षण संयोग इस चित्रण में हुआ है जो कि यहाँ की संदर्भगत रचनात्मक आवश्यकता है। इस क्रम में लगेगा कि समस्त अलंकारों का चरम साध्य स्वभावोक्ति हो जाना है। सूरदास के अलंकृत पद भी प्रायः प्रत्येक प्रसंग में, यथा-विनय, बाल-वर्णन, मुरली विषयक तथा अन्यत्र भी अलंकृत पदों की तुलना में अधिक कलात्मक बन पडे हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सामान्य जन के मध्य ये अलंकृत पद ही विशेष रूप से प्रचलित हैं। दूसरी ओर ये विविध वर्णन-क्रम ‘सूरसागर’ को एक मुक्तक-प्रबंध का स्वरूप प्रदान करते हैं। जहाँ मुक्तक पदों का विन्यास कुछ ऐसा हुआ है कि एक सूक्ष्म कथा का ताना बाना स्वयमेव प्रसारित हो जाता है। अद्वैत और भक्ति को साथ-साथ स्वीकार करने पर भक्त-कवियों ने सगुण रूप में अलग-अलग इष्टदेव मानते हुए भी राम और कृष्ण की अवतार रूप में तात्त्विक एकता पर बल दिया है। यह अकारण
नहीं है कि मुख्यतः कृष्ण-चरित्र के गायक कवि सूरदास, कुछ पद भले ही प्रतीकात्मक रूप में ही रामचरित विषयक भी रचते है और रामचरित के अमर कवि गोस्वामी तुलसीदास ‘कृष्णगीतावली’ की रचना करते हैं। यह काव्यात्मक सौजन्य शिष्टाचार मात्र न होकर कवि की रचनात्मक आस्था का विस्तार जान पडता है। वस्तुतः राम-कृष्ण की एकरूपता की भावना दक्षिण में आलवर भक्तों के समय से चली आती है। इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि भक्ति काव्य में, केवल भक्ति-भाव को छोडकर किसी और प्रकार की एकांतिकता को प्रश्रय नहीं दिया गया है। स्वयं सूरदास ने राम और कृष्ण की एकता का संदर्भ बडे कोमल और मार्मिक स्वरूप में चित्रित किया है। बालकृष्ण को सुलाने का उपक्रम चल रहा है। यशोदा उन्हें रामकथा सुना रही है- ‘‘सुनि सूत, एक कथा कहौ प्यारी’’ कथा का समापन होता है- रावन हरन सिया कौ कीन्हौं/ सुनि नंद-नंदन नींद निवारी/ चाप-चाप कहि उठे सूर प्रभु/ लछिमन देहु, जबनि भ्रम भारी। अर्द्ध निद्रा में सो रहे बाल कृष्ण को पिछला राम-अवतार स्मरण हो आता है और वे तंद्रा में छोटे भाई लक्ष्मण स राक्षसों के वध के लिए अपना धनुष माँगने लगते हैं। माँ यशोदा तब स्वभावतः यह सुनकर चकित और विभ्रमित हो जाती है।
समन्वय और सामंजस्य से भी एक उच्चतर भावभूमि समरसता की हो सकती है। समग्र की परिकल्पना समरसता की प्रक्रिया से सर्वाधिक पूर्ण रूप में संभाव्य जान पडती है। वस्तुतः तो समरसता रचना का चरम साध्य कही जा सकती है, जिस बिंदु पर रचना सीधे संस्कृति बन जाती है अर्थात् समरसता संस्कृति का सहज प्रवाह है। ईश्वर में आस्था और मानव का पूर्ण सम्मान- ये दोनों दृष्टियाँ तुलसी में एक-दूसरे से जुडी हुई दृष्टिगत होती हैं- सिया राममय सब जग जानी/ करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी। जैसी पंक्तियाँ इस गहरे आत्मविश्वास पर ही लिखी जा सकती है। जहाँ ईश्वर और मानव दोनों की एक साथ प्रतिष्ठा हो। ‘सिया-राम’ यदि उनकी भक्ति के आश्रय-
स्थल हैं तो ‘सब जग’ उनकी रचनाधर्मिता के आश्रय-स्थल हैं। ईश्वर और मानव की एकरूपता स्वीकारने के कारण ही ‘रामचरितमानस’ का संपूर्ण परिवेश दैवीय-हस्तक्षेप के बीच-बीच में आने के बावजूद पूरी तरह से मानवीय है। काव्य में इस नितांत मानवीय आधारभूमि का एक कारण और प्रमाण यह भी है कि यहाँ सामान्य परिवार संपूर्ण रचना के केन्द्र में है। भारतीय संदर्भ में ‘परिवार’ व्यक्ति और समाज को जोडने वाली अनिवार्य कडी है। व्यक्ति को सामाजिक मूल्यों का प्रशिक्षण देने वाली प्राथमिक पाठशाला ‘परिवार’ ही है। स्नेह, सहिष्णुता, सेवा के मूल्य आदि व्यक्ति सर्वप्रथम परिवार से ही सीखता है। व्यक्ति और समाज के मध्य उपजने वाले द्वंद्व को समरस और व्यवहार की नोकों को बराबर करने वाले परिवार का दायित्व है। यह भारतीयता ही ‘रामचरितमानस’ की आरंभ से अंत तक मुख्य रचना-चिंता है। भक्ति काव्य को हिंदी कविता का ‘स्वर्ण युग’ कहने का सीधा तात्पर्य होता हैकि यहाँ काव्य की रचनात्मक क्षमता अपने श्रेष्ठतम रूप में है। पर इस काव्य का एक अन्य स्तर पर जो वैशिष्टय है, उसकी ओर प्रायः ध्यान नहीं जाता। भक्ति काव्य हिंदी समाज की उदारतम चेतना का दस्तावेज है। कबीरदास, जायसी, तुलसीदास और मीराबाई इस युग के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। यह मान्यता सर्व-स्वीकृत है। इसका निहितार्थ है कि यहाँ हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण-दलित, पुरुष-स्त्री.... समाज के सभी वर्गों का यह साझा रचनाकर्म है, भले ही वे सामान्य तौर पर समाज में अपना अलगाव बनाए रखते हों। इस आधार पर हिंदी जीवन की व्यापक समरसता का अन्यतम प्रमाण हिंदी भक्ति काव्य को मान सकते हैं। फिर आधुनिक काल में नए-नए प्रचलित ‘दलित साहित्य’ या ‘स्त्री साहित्य’ जैसे शब्द हिंदी की अपनी समावेशी परंपरा से बेमेल बैठते हैं। वस्तुतः हिंदी भक्ति काव्य हिंदी समाज की अनेक रूढियों के बावजूद उसकी प्रबल जीवनी शक्ति का गतिशील और उज्ज्वल साक्ष्य है। फिर यह भी संयोग से कुछ अधिक ही है कि ये कवि
मिलकर संपूर्ण हिंदी प्रदेश के विविध जनपदों अथवा बोली-क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं- पूर्व में भोजपुरी (कबीरदास) से लेकर अवधी (तुलसीदास-जायसी), ब्रज (सूरदास-तुलसीदास) होते हुए पश्चिम में राजस्थानी (मीराबाई) तक। भक्ति काल के काव्य में मीराबाई का नाम बहुत श्रद्धा और पेरणा के तौर पर लिया जाता है। मीराबाई का काव्य उन विरल उदाहरणों में से है जहाँ रचनाकार का जीवन और काव्य एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। इनके काव्य में जीवन और काव्य का परस्पर संफ एक-दूसरे को समृद्ध करता दिखाई पडता है। इसका अर्थ यह भी है कि जीवनवृत्त से अलग किये जाने पर इस काव्य की सर्जनात्मक क्षमता घट जाती है। मिलता-जुलता नारी चरित्र होने के कारण गोपियों की विरह-भावना का अध्यारोपण मीराबाई की रचनाओं में सहजता से देखा जा सकता है। इनके काव्य को सूरदास द्वारा विस्तार में चित्रित गोपियों की विरहोन्मुखता के विवरण के रूप में माना जाता है। बाद में भक्ति में श्रृंगार की भूमिका प्रबल हो गई जो एक प्रकार से भारतेंदु के समय तक प्रायः उसी रूप में दिखाई पडती है। भक्ति और श्रृंगार की विभाजक रेखा अत्यंत सूक्ष्म है। भक्ति की अनुभूति की सघनता को व्यक्त करने के लिए अनेक बार राधा-कृष्ण के चरित्र और दाम्पत्त्य जीवन में विविध प्रतीकों का सहारा लिया गया। कबीरदास जैसा बीहड प्रकृति का कवि भाव-विभोर होकर कहता है- हरि मोरा पिउ, मैं हरि की बहुरिया। भक्ति-संबंध की निकटता को अभिव्यक्त करने के लिए तुलसीदास जैसे मर्यादा-प्रिय कवि ‘रामचरितमानस’ का प्रबंध संपादन करते हुए सब कुछ कह लेने के पश्चात कामिहि नारि पिआरि जिमि। जैसी उपमा देते हैं। यह तत्कालीन परिवेश का प्रभाव नहीं तो और क्या है? कालांतर में राधा-कृष्ण के चरित्र अपने वास्तविक स्वरूप से हटकर मात्र दाम्पत्त्य जीवन के प्रतीक अवशिष्ट रह गए। पेम और भक्ति की संपृक्त अनुभूति धीरे-धीरे क्षीण पडती गयी और प्रेम का श्रृंगारिक रूप केंद्र में आ गया। भाक्तिकाल के रीतिकाल में
रूपांतरण की यही प्रक्रिया है। रीतिकाल के ऐहिक वातावरण में विनय का भाव प्रधान न रहकर, कृष्ण-लीला का वर्णन प्रधान हो गया। रीतिकालीन काव्य की विशिष्टता इस बात में है कि उसकी मूल प्रेरणा ऐहिक है। इस समय का रचनाकार ईश्वर और मनुष्य दोनों का चित्रण मनुष्य रूप में ही करता है। रीतिकाव्य के विवेचन में डॉ. नगेन्द्र कहते हैं- ‘इसका स्वरूप प्रायः सर्वत्र ही गार्हस्थिक है।’ यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह गार्हस्थिकता सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास और जायसी जैसे कवियों की परिकल्पना से भिन्न है। रीतिकाव्य में अभिव्यक्त गार्हस्थिकता का क्षेत्र केवल अन्तः पुर तक ही सीमित प्रतीत होता है।
मनुष्य की अवधारणा के रूप में हिंदी साहित्य में अनेक बार परिवर्तित होने के साथ परम तत्त्व को लेकर मनुष्य के संबंधों में भी परिवर्तन दिखाई पडते हैं। हिंदी साहित्येतिहास के आदिकाल में मनुष्य का ईश्वर की महिमा से युक्त रूप में वर्णन हुआ है। भक्तिकाल में यह चित्रण ईश्वर का मनुष्य-रूप में हुआ है। रीतिकाल में ईश्वर और मनुष्य दोनों का मनुष्य रूप में चित्रण देखा जा सकता है। आधुनिक काल में मनुष्य सभी तरह के चिन्तन का केन्द्र बनता है और ईश्वर की धारणा व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है। फलतः साहित्य और अन्य कलाओं में ईश्वर का चित्रण प्रासंगिक नहीं रह जाता। जब हिंदी की आधुनिक कविता का प्रारंभ ब्रजभाषा को छोडकर खडीबोली से होता है तो हिंदी के काव्य का विषय-क्षेत्र भक्ति और श्रृंगार से हटकर राष्ट्रीयता की ओर अग्रसर होता दिखाई पडता है। आगे चलकर काव्यभाषा का आधार ब्रजभाषा से खडीबोली में प्रतीत होता है। जहाँ क्रमशः द्विवेद्वी युग के प्रचलित अप्रस्तुत विधान के मध्य से बिंब की नयी पहचान प्रकट होती है, जिस बिंदु पर समस्त भाव-बोध एकबारगी जटिलतर होता है और संश्ष्टता की ओर झुकाव बढता है। उदाहरण स्वरूप भक्ति का स्वरूप आध्यात्मिक पेम में परिणत होता है और ईश-वंदना का स्थान देश-वंदना ले लेती है। इसके पश्चात् नवविकसित राष्ट्रीयता की
क्रमशः सूक्ष्मतर होती अभिव्यक्ति है- देशभक्ति से राष्ट्रीयता और राष्ट्रीयता से सांस्कृतिक चेतना, जो धीरे-धीरे जनचेतना का रूप ग्रहण करती है। हिंदी कविता में खडीबोली का व्यापक आरंभ श्रीधर पाठक की कविताओं में दिखाई पडता है। राष्ट्रीयता की तीव्र अनुभूति भारतेंदु की रचनाओं में दिखाई पडती है। परंतु खडीबोली और राष्ट्रीयता का प्रभावी सहकार पहली बार मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में दिखाई पडता है। द्विवेदी युग में कविता की भाषा और संवेदना दोनों बदलती हैं। द्विवेदी युग और छायावाद को जोडने वाले जयशंकर प्रसाद ने ब्रज और खडी बोली दोनों में रचनाएँ की। उनके प्रथम संग्रह ‘चित्राधार’ में काव्य का अंश ब्रज भाषा में है, गद्य खडी बोली में काफी कुछ भारतेंदु हरिश्चंद्र की तरह का बँटवारा इनकी रचनाओं में भी देखा जा सकता है। जयशंकर प्रसाद के ब्रजभाषा युक्त काव्य में ईश-वंदना की बहुलता है परंतु खडीबोली में ईश-वंदना का स्थान मातृभूमि-वंदना ले लेती है। भाषा और संवेदना के साथ परिवर्तन का यह साक्ष्य जितना रोचक है, उतना ही तद्युगीन हिंदी कविता की रचना-प्रक्रिया को समझने में उपयोगी भी है। परमात्म-तत्त्व अब ईष्ट-देव के रूप में नहीं रह जाता, सगुण का स्थान निर्गुण ले लेता है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के भक्तिकाव्य की भावभूमि को बहुधा प्रणति की संज्ञा दी जाती है। कुछ ऐसी ही भावभूमि छायावादोत्तर काल के प्रमुख कवियों की कविताओं में भी दिखाई पडती है। निराला द्विवेदी युग के व्यवस्थित काव्य-प्रकारों के मध्य विद्रोह के लिए भी जाने जाते हैं। ‘आधुनिकता’ मूलतः काल-प्रवाह का गुण है। परिवर्तन अनायास है जो अच्छाई की ओर भी उन्मुख हो सकता है और हीनता या बुराई की ओर भी। विकास की परिकल्पना में उत्कृष्टता अन्तर्निहित है। इस संदर्भ में ‘आधुनिकता’ की व्याख्या प्रख्यात साहित्येतिहासकार रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में इस प्रकार की जा सकती है- ‘‘वह (आधुनिकता) विकास के लिए सजग प्रयत्न है या कि इतिहास चक्र को द्रुततर चलाने की प्रक्रिया
है। यों परिवर्तन और विकास के आगे का चरण आधुनकिता है।’’ (हिंदी काव्य का इतिहास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृ.१४५)
आधुनिकता की अवधारणा मूल्यबोधी होने पर भी मूलतः कालबोधी प्रतीत होती है। परिवर्तन प्रकृति का सामान्य और शाश्वत नियम है, विकास बेहतर दिशा में चलने का उपक्रम और आधुनिकता इतिहास की गति को द्रुततर करने का सजग मानवीय प्रयास है। परिवर्तन अनादिकाल से अबाध रूप से चला आ रहा है। विकास मनुष्य की सभ्यता का आरंभिक लक्षण है और आधुनिकता की प्रक्रिया स्व-चेतनता के बढते हुए दबाव से संबद्ध है। आधुनिकता की पृष्ठभूमि में एक ओर बीसवीं शताब्दी के आरंभ में हुए फ्रायड, एडलर और युंग के मनोविश्षण संबंधी अध्ययन हैं तो दूसरी तरफ लेनिन और कार्ल माक्र्स द्वारा किया गया सामाजिक-आर्थिक विकास का विश्षण है। इसी के अनुरूप पश्चिमी देशों में आधुनिकता मनोविश्षण और विज्ञान के विकास से संबद्ध देखी जा सकती है।
प्रायः आधुनिकता और समसामयिकता में विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विज्ञान और इतिहास के संदर्भ में आधुनिकता और समसामयिकता के अंतर को समझा जा सकता है। समसामायिकता अनिवार्यतः कैलेंडर पत्रों के कालक्रम से जुडी होती है। प्रत्येक युग के रचनाकार अपने युग-संदर्भ में समसामयिक कहे जा सकते हैं। जबकि कैंलेंडर पत्रों के कालक्रम को सजग भाव से आगे बढाने का उपक्रम आधुनिकता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि कोई रचनाकार समसामयिक तो हो सकता है किंतु यह आवश्यक नहीं कि वह आधुनिक भी हो। आधुनकि साहित्य के काव्य-चिंतन में मनुष्य सभी मूल्यों का स्रोत और उपादान है, साथ ही वह स्वयं ही उसके विघटन का कारण भी है। हजारों वर्षों में निर्मित और विकसित मानवीय मूल्य अब विघटित होते जा रहे हैं। यह वर्तमान सभ्यता की चिंता का केंद्रीय विषय है। अगर हम हिंदी साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते है
कि मानवीय मूल्यों के संक्रमण और मूल्यहीनता की स्थिति अनेक बार आई है। संक्रमण का रोना प्रत्येक युग के रचनाकारों ने रोया है। परंतु यह मानना होगा की अब तक के मानवीय मूल्यों में आए संक्रमण अपनी प्रकृति में संशोधन और सुधार के लिए अधिक थे। ‘आधुनिक काल’ के नामकरण की सार्थकता इस बात में है कि यहाँ देश, समाज और संस्कृति के संदर्भ में विकास का सजग प्रयत्न है और इसके लिए शताब्दियो´ से हिंदी क्षेत्र के संस्कार में बसी ब्रज भाषा को छोडकर नयी भावभूमि खडी बोली में उदित होती है। साहित्य और देश पहली बार आधुनिक काल में एक-दूसरे से इस रूप में जुडते हैं। आधुनिक काल में देश-पेम, देश-वत्सलता और देश-भक्ति के बाद राष्ट्रीयता का भावबोध होता है। यह सजगता से आगे क्रमशः उत्तेजित मनःस्थितियों का विकासक्रम है। भारतेंदु से लेकर प्रासद-निराला तक राष्ट्रीयता के कई रूप देखे जा सकते हैं। फिर ‘नयी कविता’ में राष्ट्रीयता का सूक्ष्मतर रूप उभरता है। आधुनिक कविता के विकास-क्रम में देश-भक्ति, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक चेतना और जन अस्मिता की पहचान साहित्य और देश के संबंधों की उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती प्रतिक्रियाएँ हैं। देश-भक्ति या स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रयोग में देश-वत्सलता की स्थिति आधुनिक काल में स्पष्ट दृष्टिगत होने लगती है- धन बिदेस चलि जात तऊ जिय होत न चंचल/ जड सामान दवै रहत अकिल हट रचि न सकत कल (प्रबोधिनी)।
यदि कविता के भीतर से देश-काल के संदर्भ निकालने हों तो कह सकते हैं कि यह भिटौरा (भृगुधाम, फतेहपुर) में गंगा के पावन तट पर स्थापित शिवलिंग का स्तवन है। इस तरह अपनी व्यापक काव्य-अनुभूमि में वह परमतत्त्व के किसी रूप को संबोधित हो सकती है। छायावाद से ‘नयी कविता’ तक आते-आते हिंदी कविता की संवेदना-क्षमता और विस्तृत होती देखी जा सकती है। प्रो. नामवर सिंह के अनुसार- नयी कविता से आशय ‘प्रगति’ और ‘प्रयोग’ दोनों के कल्पित कगारों को तोडती हुई समग्र
नूतन काव्यधारा से है (कविता के नए प्रतिमान, नामवर सिंह, प्रस्तावना, पृ.-७)। ‘नयी कविता’ में मनुष्य और उसके समग्र अनुभव को पकडने का प्रयत्न किया गया है। अनुभूति का जनतंत्रीकरण ‘नयी कविता’ की मौलिक विशेषता कही जा सकती है। हिंदी साहित्य के संपूर्ण इतिहास में ‘नयी कविता’ का युग साहित्य में पहली बार स्वाधीन और प्रजातांत्रिक देश में रचा गया। नेरश मेहता और शमशेर बहादुर सिंह ‘नयी कविता’ के अग्रणी कवि माने जाते हैं। ये दोनों रचनाकार ‘दूसरा सप्तक’ में सहयोगी और मूलतः प्रकृति, पेम और सौंदर्य के चितेरे कवि माने जाते हैं। ये दोनों रचनाकार अपने आरंभिक रचनाकाल में कार्ल माक्र्स के चिंतन को स्वीकार करते हैं और लंब समय तक ‘साम्यवादी आंदोलन’ से जुडे रहते हैं। कालांतर में ये दोनों रचनाकार अध्यात्म की ओर उन्मुख होते हैं। नरेश मेहता विस्तार में, शमशेर बहादुर सिंह संकेतात्मक रूप में।
समकालीन साहित्य का नवीनतम अंश (भूखी विद्रोही पीढी, अन्यथावाद, अनर्थकता के आंदोलन, कथा-साहित्य के अनेक नामों के तहत ‘सेक्स’ का बढता मदन भाव आदि) जहाँ तक इन स्थितियों का अंकन करता है वह एक मायने में सही और प्रामाणिक है। उसका मूल विद्रोह परम्परागत जीवन की अर्थहीनता को लेकर है, जो समझ में आता है। इस संदर्भ में किया गया अनेक सामाजिक स्थितियों का नितांत उघरा चित्रण उपलक्षण मात्र है परंतु इस समूचे बिखराव को नए सिरे से सजाना और उसमें सार्थकता के तत्त्व खोजना... यही तो मनुष्य और मनुष्यता का लक्षण और दायित्व है। यह ठीक है कि जीवन में परंपरागत ढंग से प्रतिष्ठित अर्थ आज बेमानी और कृत्रिम लग सकता है। तब उचित यह होगा कि पुराने अर्थ को निरस्त करके हम नए अर्थ का सृजन करें क्योंकि जीवन में अर्थ को नकारकर तो हम मानवीय वैशिष्ट्य को ही नकारते हैं और मनुष्य को सामान्य पशु के धरातल पर उतार देते हैं। इस दृष्टि से साहित्य के लिए सबसे बडी
चुनौती अर्थहीन लगने वाले मानव-जीवन में नए अर्थ-संदर्भों के निर्माण की है। ये अर्थ-संदर्भ सर्वथा नए हों, परंपरागत मान्यताओं से बिल्कुल अलग हों परंतु जीवन और साहित्य अथवा सृजन के लिए-सृष्टि-प्रक्रिया जीवनधारियों की है। सृजन केवल मानवीय वैशिष्टय-अर्थ संदर्भ हो, यह मौलिक अनिवार्यता है। इस प्रकार अर्थहीनता मानवीय नियति नहीं वरन अर्थ का सृजन मानवीय
नियति है।
संदर्भ :
१.हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अनुपम प्रकाशन, पटना।
२.हिंदी साहित्य का गद्य इतिहास, रामचंद्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
३.हिंदी काव्य का इतिहास, डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
४.आधुनिक हिंदी साहित्य पर विचार, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।
५.भारतीय साहित्य और हिंदी जाति के साहित्य की अवधारणा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, ५ मील, गंगटोक
सिक्किम-७३७१०२ मो. ९९१८६९५६५६