हिन्दी साहित्य के बहुआयामी रचनाकार महाप्राण निराला

गोपाल जी गुप्त


हिन्दी साहित्य के आकाश में मणिसदृश सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य को अपनी प्रखर रश्मि से आलोकित करने वाले, साहित्य के विवादास्पद साहित्यकार, कवि, कथाकार, रेखाचित्रकार, निबन्धकार पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ शब्द को भी मंत्र सदृश बनाने में सक्षम रहे हैं। विवादास्पद होने के बावजूद अपनी बहुमुखी प्रतिभा से पाठकों को अतिप्रिय रहे। वसन्त ऋतु उनकी प्रिय ऋतु रही तथा वाग्देवी सरस्वती उनकी आराध्या। उनके लिए ये दोनों ही सृजन के प्रेरणास्रोत तथा अनेक प्रतीकार्थों के संवाहक है। निराला वसन्त पंचमी को अपनी जन्मतिथि मनाते रहे तथापि उनका जन्म विक्रम संवत. १९५५ की माघशुक्ला एकादशी (२१ फरवरी सन् १८९९) को हुआ था। (डॉ. राम विलास शर्मा के अनुसार निराला ने स्वयं निश्चय किया कि वह अपनी जन्मतिथि वसन्त पंचमी को मनाएगें)
निराला स्वभाव से उग्र, विचार से क्रान्तिकारी, बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न निराले व्यक्ति थे, जिन्होंने काफी उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान, भेदभाव सहा तथा प्रकाशकों के अमानुषिक व्यवहारों एवं साहित्यिक खेमेबाजी का हलाहल पीया और सबसे जूझते हुए इलाहबाद के दारागंज में अपना जीवन व्यतीत किया। उन्होंने साहित्य को अनेक काव्य कृतियों, कहानी संग्रह, रेखा चित्र, जीवनी, निबन्ध से समृद्ध किया। उनके गीत ‘‘मौन मधु हो जाए/ माया मुकता की आड में/ मन सरलता की बाढ में/ जल बिन्दु सा बह जाए/’’ जैसी अर्थव्यंजना उनके अनेक गीतों में परिलक्षित होती है। अनेक भाषाओं के ज्ञाता निराला का रुझान संगीत की ओर भी था। किन्तु वह राग रागिनियों की रुढियों में नहीं बँधे थे। वह अच्छे रेखा चित्रकार भी थे, जिसकी झलक उनकी रचनाओं में मिलती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार संगीत को काव्य और काव्य को संगीत के निकट लाने का सर्वाधिक प्रयास निराला ने ही किया। उनकी कविताओं में एक ओर तो अनुभव की व्यापकता, आसक्ति और पे*म की प्रगाढता की प्रवाहमान सरिता धारा है तो दूसरी ओर संघर्ष की झलक, आक्रोश, स्वाधीनता के प्रति गर्जना भी है।
वसन्त के प्रति उनका अनुराग रचनाओं में प्रतिबिम्बित होता है। वह वसन्त का आह्वान करते हुए लिखते हैंः- अति की मृदुगति ऋतुपति की/ प्रिय
सालों पर, प्रिय आओ/ पिक के पावन पंचम में/ गाओ वन्दन ध्वनि गाओ/ तो वसन्त के बहाने अपनी व्यथा पीडा भी व्यक्त करते हैंः- मैं जीर्णसाज बहुछिद्र आज/ तुम सुन्दर सुरंग सुवास सुमन/ मैं हूँ केवल पदमल आसन/ तुम सहज बिराजे महाराज/ वसन्ता गमन उनके लिए सुखदायी है जो उन पर मोहक प्रभाव भी उत्पन्न करती हैः- सखि वसतं आया/ भरा हर्ष वन के मन/ नवोत्कर्ष छाया/..... आवृत्त सरसी उर-सरसिज उठे/ केसर के केशकली के छुटे/ स्वर्ण शस्य अँचल पृथ्वी का लहराया। वह इसी वासन्तिक प्रेमानुराग के चलते वसन्त के पर्याय (कवि) बन गए और कह उठे- रंग गई पग-पग धन्य धरा/ वर्णगन्ध धर मधु मकरन्द भर/ तरु उर की अरुणिम तरुण तट/ खुली रूप कलियों में पग भर/ स्तर-स्तर सुपरिसर। इतना ही नहीं वसन्त को नवजीवन का संचारक कहते हुए स्वयं को मृत्युभय से मुक्ति की घोषणा तक कर डालीः- अभी न होगा मेरा अन्त/ अभी-अभी ही तो आया है/ मेरे वन में मृदुल वसन्त।
सम्पर्ण छायावादी काव्य ही नहीं अपितु आधुनिक कालीन काव्य में सम्पूर्ण विस्तार में स्वानुभूति की विविधता, रचनात्मक समृद्धि एवं प्रौढतर काव्य व्यक्तित्व के लिहाज से जितना प्रासंगिक काव्य निराला का है उतना किसी अन्य कवि का नहीं। उनकी प्रबल बौद्धिक चेतना उनकी आधुनिकता का प्रखर बिन्दु है। उनका वास्तविक उत्कर्ष अपने युग की भावना एवं कल्पना मूलक कविता में बुद्धितत्त्व के समावेश में है। उनकी काव्य-रचनाओं में असयंम तथा अतिवाद दुर्लभ है। उनके अनुभव जगत में आधुनिक व्यक्ति के अन्तरसंघर्षों एवं अन्तरविरोधों की सघन बुनावट है। परिवेश एवं व्यक्तिचेतना का तनाव एवं उसकी अन्तक्रिया उनके अनुभव जगत में तीखे रूप में मौजूद है किन्तु उनके अनुभव जगत् और रचना के प्रति-संसार में अन्तरविर्रोध नहीं है।
वह मूलतः स्वच्छन्दतावादी मानसिकता के रचनाकार हैं तथा इस रोमानी आन्दोलन के ऋणात्मक पहलुओं से भी मुक्त हैं। स्वच्छन्दतावाद के जितने निषेधात्मक पक्ष उनकी रचनाओं में उजागर हुए हैं, उतने अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। उन्होंने स्वछन्दतावाद के काव्य के विस्तृत, व्यापक आयाम भी दिए हैं। उनके काव्य-विकास के प्रारम्भिक चरण, परिमल, में ‘‘जूही की कली’’ का उन्मुक्त प्रणय व्यापार है। तो ‘‘तुम और मैं’’ में प्रखर दर्शन भी है। एक ओर ‘‘बादल राग’’ तथा ‘‘जागो फिर एक बार’’ क्रांतिघोष है तो ‘यमुना के पति’ में गहन सांस्कृतिक चेतना है, ‘शिवाजी के पत्र’ की राष्ट्रीयता ‘विधवा’ एवं ‘भिक्षु’ में व्यापक मानवतावादी प्रगतिशीलता भी दिखती है।
‘राम की शक्तिपूजा’ उनकी कालजयी रचना है। आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के अनुसार ऐसा ‘‘स्वल्प आकार-प्रकार का परम प्रौढ प्रबन्ध काव्य विश्व की किसी भाषा में नहीं लिखा गया है।’’ डॉ. नगेन्द्र इसे ‘आधुनिक हिन्दी कविता का गौरव शिखर’ बच्चन सिंह तथा दूधनाथ सिंह इसे निराला के जीवन संघर्ष एवं आत्म संघर्ष की कविता कहते हैं।
इलाहबाद में सडक के किनारे पत्थर तोडती महिला को देख उन्होंने सजीव चित्र प्रस्तुत कर दियाः- वह तोडती पत्थर/ देखा मैंने उसे इलाहबाद के पथ पर। तथा भिक्षुक को देख कर उनकी करुणा उपजी और कह उठे- पेट पीठ दोनों मिलकर एक/ चल रहा लकुटिया टेक/ मुट्ठी भर दाने को/ भूख मिटाने को/ मुहँ फटी पुरानी झोली को फैलाता/ दो टूक कलेजे को करता पछताता।
जब वह कविता की मुक्ति की बात करते तथा मुक्तछन्द की चर्चा करते तब साहित्यकारों के व्यंग्य बाण भी सहते परन्तु निराश होने के स्थान पर वह दृढ बने रहे।
वस्तुतः उनकी रचनाओं में व्यापकता विषयों की विविधता वाली नहीं न मात्र शैलीय विविधता है बल्कि यह
काव्य-चेतना एवं काव्यात्मा की व्यापकता है, जो नित नूतन राहों का अन्वेषण करती है। उन्होंने मुक्तछन्द के साथ संगीत में निबद्ध गीत ‘कुकुरमुत्ता’ ‘बेला’ ‘नए पत्ते’ के मुकाबले ‘राम की शक्तिपूजा’ ‘तुलसीदास’ ‘सरोजस्मृति’ जैसी वृहत्तर रचनाएँ ही नहीं ‘अर्चना’ ‘आराधना’ की प्रशान्त भूमि भी सौंपी।
अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व सन् १९६० में उनकी अन्तिम कविता ने उनकी काव्य साधना को शीर्ष शिखर पर पहुँचा दिया, वह इसमें लिखते हैं-
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है/ आशा का प्रदीप जलता है हृदय कुंज में/ अन्धकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है/ दिग्निर्णय ध*ुव से जैसे नक्षत्र कुंज में/ लीला का संवरण समय फूलों का जैसे/ फूलों फलों या झरे अफल पातों के ऊपर। और साहित्यकाश का यह तारा १५ अक्टूबर १९६१ को अनन्त निद्रा में विश्राम करने चला जाता है। यह कविता उनके बाह्य संघर्ष को काफी दूर तक व्यंजित कर देती है।
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