त्रिलोचन : काव्य भाषा और रूप-विधान

डॉ. प्रीति प्रवीण खरे


त्रिलोचन की काव्य भाषा लोक और गाँव दोनों को प्रतिबिम्बित करने में सफल है। संस्कृत से लेकर गाँव तक पहुँचने वाला यह कवि उन सभी भाषाई दौरों से होकर गुजरता है जो हिंदी साहित्य के पचास वर्षों में सामने आए हैं। त्रिलोचन ‘‘सॉनेट’’ के जाने पहचाने कवि हैं। हिंदी में त्रिलोचन जी सॉनेट के पर्याय से हो गए हैं। उनकी भाषा के तेवर को समझने के लिए ‘‘सॉनेट’’ पर बात करना जरूरी हो जाता है। वे स्वयं मानते हैं कि सर्व प्रथम उन्होंने ही लिखे हैं, शमशेर ने बाद में।
मूलतः अंग्रेजी कविता से प्रभावित इस काव्य ढाँचे को उन्होंने अपने ढंग से तोडकर इसे भारतीय रूप प्रदान किया है। उनकी पुस्तक ‘‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’’ में संकलित सॉनेट सन् ४० और ५१ में लिखे गए हैं। भारतीय इतिहास की दृष्टि से यह अवधि इसीलिए महत्त्वपूर्ण है कि तीन वर्ष पूर्व ही भारत दो सौ वर्षों से भी अधिक की दासता से आजाद हुआ था। नेहरू जी के नेतृत्व में आधुनिकतावादी आंदोलन का दबदबा था और पश्चिम लेखन से प्रभावित साहित्य की भरमार होने लगी थी। यह एकदम स्वाभाविक ही था कि त्रिलोचन जी ने स्वयं को आधुनिकतावादी भगदड में शामिल नहीं
किया और निरंतर हिंदी की लोकधर्मी जातीय परंपरा से उनका रिश्ता गाढा
होता गया।’’
त्रिलोचन जी के मतानुसार ‘‘सॉनेट’’ के एक रूप में ८वीं और ६वीं पंक्तियों के बाद नया पैरा शुरू करने की पाबंदी रहती है पर यह पाबंदी मिल्टन ने भी नहीं मानी और ८वीं और ९वीं लाइन को उसने जोड दिया था। कुल मिलाकर देखिए तो उनका ‘‘ऑन हिज ब्लाईंडनेस’’ जो है बस एक वाक्य है, जो लम्बा चलता है। तो यही मैंने सोचा की ५वीं और ६वीं का विभाजन दे दीजिए, लेकिन प्रथम रखिए यह जरूरी नहीं।
त्रिलोचन जी ने जितनी संख्या में सॉनेट लिखे, हिंदी में उतनी संख्या में किसी ने नहीं लिखे होगें। उनके सॉनेट अपने देश की परिस्थिति, इतिहास, परंपरा और वातावरण को सुरक्षित रखते हैं। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि भाषा तुलसी से सीखी। उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘‘एक जगह वही हवा आई है मुझको जगा गई है जिसको उज्जैनी के कवि ने वायु कहा है।’’ इस
विभात वायु द्वारा ही मैं कालिदास की सारी शक्ति को अपनी पृष्ठभूमि में ले आता हूँ। बाकी बात मेरी रही आती है, वो ऐसी है कि यौवन का वर्णन, नर-नारी दोनों का वर्णन करने में सबसे अप्रमेय कवि मुझे कालिदास लगते हैं।’’ संस्कृत की पृष्ठभूमि हमेशा त्रिलोचन के काव्य में बनी रही। तुलसी, कालिदास और वाल्मीकि हमेशा उनके निकट रहे हैं। इसीलिए हिंदी कविता के संदर्भ में उन्होंने लिखा है-‘‘असल में हिंदी कविता में जो वाक्य अधूरे आते हैं यह मुझे बर्दाश्त नहीं था। मैंने देखा की अधूरे वाक्यों वाली कविता संस्कृत में नहीं हुई तो मैंने माना की हिंदी में वाक्य पूरे कर दिए जाएँ।’’ त्रिलोचन जी ने लोगों से कहा कि वाक्य पूरे करना सीखो पर वाक्य पूरे करने में अपनी जो बात है वह स्लिप नहीं हो जाए। पुराने लोग कहते थे कि पहले गद्य लिख लो कविता बाद में लिख लेना। आपका एक-एक वाक्य देखा जाएगा, तौला जाएगा तब माना जाएगा कि कवि हुए आप, तो यह मानना पडेगा कि त्रिलोचन का ध्यान हमेशा हिंदी को समृद्ध करने में था। उनकी प्रारंभ से अब तक की रचनाएँ पढे तो साफ है कि वाक्य गठन के साथ-साथ उनकी कविता में गीतात्मकता, छंद बद्धता भी ज्यादा है। वे ऐसे शब्द चुनते हैं जो सहज और बोधगम्य होते हैं। साथ ही एक माला में पिरोए हुए पुश्तों से प्रयुक्त होते आ रहे हैं। ग्रामीण शब्दों की विशेषता के साथ प्रयुक्त कर देना उनकी खूबी है, विधा चाहे सॉनेट हो या और कुछः-
हैं वो जन भी मस्त मिलेगें
और कहीं तो नहीं मिलेगीं,
चना चबैनी और गंगा जल के मस्ताने हैं
यह हस्ती और कहाँ है,
रोज-रोज ताजा है कभी नहीं है बासी,
आन-बान में कबीरा तुलसी की यह कासी।
‘‘अन कहनी भी कुछ कहनी है’’ का यह सॉनेट है, जिसमें भाषा के माध्यम से तथा शब्दों के प्रयोग से गाँव और जनमानस की झाँकी प्रस्तुत की गई है। वे मनः
प्रसादन, विषाद, तिमिर जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग भी करते हैं और आरर डाल, चना चबैनी, बतियाना आदि देशज शब्दों के साथ ही उर्दू और फारसी के ज्ञाता होने के कारण आवश्यकता के अनुसार इन शब्दों का भी उनकी कविताओं में खूब प्रयोग हुआ है। ‘‘गुलाब और बुलबुल’’ का कवि उर्दू और हिंदी को मिलाकर नए प्रकार की ग*ालें लिखता है।
शब्द तथा अर्थवत्ता की वस्तु और रूप का आपसी सम्बंध है। वस्तु या विचार की सही तस्वीर प्रस्तुत करना शब्द का कार्य है। अतः शब्दों का सही प्रयोग ही वस्तु का असरदार रूप सामने लाता है और यह त्रिलोचन का भाषा तेवर है। यह भी सही है। शब्द को शब्द के रूप में प्रस्तुत करना मात्र कवि का कार्य नहीं है। वह तो शब्द का एक चित्र प्रस्तुत करना चाहता है। अनुभूति और विचार की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से गुजरने के बाद कवि मस्तिष्क किसी निश्चित शब्द निर्णय तक पहुँचता है और यही शब्द कविता के सृजन का कारण बनता है। भाषा शिल्प के नाते त्रिलोचन अप्रतिम रूप से लोक समृद्ध कवि हैं। अवधी का ठेठ भाषिक संदर्भ उनके गीतों में ठौर-ठौर बिखरा पडा है। शब्द की तमाम शक्तियों का सटीक प्रयोग और उससे सजीव चित्रों की सर्जना में वे पारंगत हैं। यही कारण है कि तारों भरे आकाश में जुगनुओं की जुगजुगाती लय जैसे शब्द चित्र हिंदी गीत में सिर्फ त्रिलोचन के यहाँ ही देखे जाते है। उनकी भाषा के दो उदाहरण दृष्टव्य हैं
(१)
पावन गगन गान मधु भूमि व मान
सुचि का प्रखर तेज, नव कल्प का ज्ञान,
तप के बिना कब गला हिम का प्राण
मन की चुनी चाह फलती कहाँ है।
(सबका अपना आकाश- त्रिलोचन)
(२)
आँखे मूँदे पेट पर सिर टेक,
गाय करती है धमौनी,
पेड की छाया खडी दीवार पर है।
(अरधान-त्रिलोचन)
ये दो उदाहरण त्रिलोचन की भाषा के दो रूप प्रस्तुत करते हैं। एक में कवि तत्सम शब्दों को गूँथता चलता है क्योंकि वहाँ उन्हीं का महत्त्व है। ऐसे शब्दों से गीत की अर्थवत्ता बन रही है और दूसरे में कवि बिल्कुल देसी शब्दों का प्रयोग करता है। मुझे लगता है कि दूसरी तरह का उदाहरण ही त्रिलोचन की मानस प्रति छवि को प्रतिबिम्बित करता है। यूँ त्रिलोचन की इच्छा रही है कि वे तरह-तरह के शब्दों का महल खडा कर दें जो अभिजात का नहीं सर्वहारा का हो, उनका हो जो सब उनके अपने हैं। उनके भाव कुछ इस तरह इस कविता में मुखरित
हुए हैं
महल खडा करने की इच्छा है शब्दों का,
जिसमें सब रह सकें रम सकें, लेकिन साँचा
ईंट बनाने का मिला नहीं है, शब्दों का
समय लग गया केवल काम चलाऊ ढाँचा,
किसी तरह तैयार किया है।
(ताप के ताये हुए दिन-त्रिलोचन)
त्रिलोचन की कविता का तेवर बिल्कुल दूसरी तरह का है। उनकी कविता की एक पूरी पंक्ति दूसरी पंक्ति के बीच से बात पूरी करती है, जैसे की उपयुक्र्त उदाहरण में अंकित है। इस उदाहरण की अंतिम पंक्ति उनकी कविता की पंक्ति की ठीक आधी है। तुलसी और त्रिलोचन में अंतर जो झलके वे कालांतर के कारण है।
ये पक्तियाँ सॉनेट की हैं। वास्तव में उनकी भाषा का निखार दो तरह से देखा जा सकता है। एक तो सॉनेट विधा में और दूसरा उन कविताओं में जो केवल जन-जीवन के लिए लिखी गईं है। इसके अंतर्गत ‘नगई महरा’, ‘मैं और तुम’ ये कविताएँ प्रमुखता से आती हैं। यह सही है कि त्रिलोचन का लक्ष्य काव्य भाषा को समृद्ध
करना है।
छायावाद के कवियों की भाषा देखें तो स्पष्ट होता है कि इन कवियों का गद्य भी छायावादी तत्त्वों से भरपूर
था। अन्य कवियों की गद्य भाषा भी जीवन यथार्थ से जुडकर एक नवीन रूप में हमारे सामने आती है। आज के कवियों में त्रिलोचन की भाषा मकई के भुट्टे के दानों जैसी है, जो गरीब को रोटी की तरह प्यारी लगती है। इसमें एक सहजता है, हमदर्दी का भाव है और साथ देने का भाव भी है। त्रिलोचन खुद कहते हैं कि कभी-कभी शब्दों से काम नहीं चलता और यही कारण है कि वे भाषा का एक ऐसा रूप तलाशना चाहते थे, जो सबका अपना है। धरती से लेकर अमोला तक कवि भाषा के लिए ही प्रयत्नशील है। इसलिए वे सपाट बयानी पर विश्वास नहीं करते अपितु उनकी भाषा बात-चीत करती हुई जिंदगी में शामिल
होती है।
त्रिलोचन ने आदमी के चेहरे पढे हैं। उनके श्रम जिए हैं और गाँव तथा धरती की हर रूप की परख की है। उनके भाषा शिल्प की हर परत खोलते हैं। वे अपनी भाषा के माध्यम से नदी, हवा और पहाडों से बात करते हैं और उनकी बात सुनते हैं। नन्ही गौरेया जब उनकी खिडकी पर आकर बैठ जाती है तब त्रिलोचन की कविता उससे बात करने लगती है। तात्पर्य यह है कि ‘‘त्रिलोचन की कविता शब्दों का स्थापत्य है। त्रिलोचन के शब्द मानव आकृतियों के स्मृति पथ हैं। मनुष्य की तरह त्रिलोचन की कविता के शब्द जीवनपथ पर बे रोक-टोक आते हैं, परिहास करते हैं और जीवन का मर्म समझा जाते हैं। दरअसल त्रिलोचन की कविता के शब्द हैं दुःख से दबे हुए मानव। मानवीय शब्द लोक अनुभूतियों के स्मृतियों के रिकार्ड होते हैं। जीवंत शब्द भोलेपन का खिला रूप हैं। त्रिलोचन के शब्द वास्तव में अच्छी कृतियाँ हैं। त्रिलोचन की कविता व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र के बीच में शब्द और शब्द के अंतर्गत अर्थों की मात्रा मानव सभ्यता की यात्रा कविता ही, पाठक के मन में अभिप्रेत ध्वनियों का उत्साह पैदा करती हैं।’’
ग*ाल की आत्मा बनाए रखने के लिए निराला ने उर्दू का प्रयोग किया था। शमशेर की गजलों में उर्दू शब्दों के अत्यधिक प्रयोग से हिंदी के संस्कारगत लक्षणों को हानि पहुँचती सी लगती है। इस दृष्टि से निराला और
त्रिलोचन अधिक सफल रहे हैं। निराला ने गजल को हिंदी के दामन से दूर नहीं जाने दिया। यह सही है कि त्रिलोचन को अपनी भाषा के कारण गजल और रुबाई लिखने में अधिक सफलता मिली-
आप कहते हो तो अपनी भी सुना देता हूँ मैं
दिल के अंदर जो छुपा है वो दिखा देता हूँ मैं,
(गुलाब और बुलबुल- त्रिलोचन)
त्रिलोचन की भाषा भी अंगेजी के सॉनेट की तरह बडी सरलता से प्रकट करती है जो की दिगंत, अनकहनी भी कुछ कहनी है और ताप के ताये हुए दिन में उपलब्ध हैं। इनकी खूबी यह है कि उनके सॉनेट ने हिंदी कविता को समृद्ध किया है। दिगंत के एक सॉनेट की कुछ
पक्तियाँ देखें-
तुम्हें देखता हूँ तो आँखौं में स्वरूप का अंजन सा लग जाता है।
ऐसा लगता है, कि मैं तुम्हारे बिना निवासी अंध कूप का ही हूँ।
मन में उत्साह नहीं कुछ जागता है, कि मैं कुछ चलूँ, करूँ-धरूँ।
(दिगंत-त्रिलोचन)
यह त्रिलोचन की भाषा की विशेषता ही है कि वे अनुप्रास, यमक, उपमा, उत्पेक्षा आदि अलंकारों को सहज ही अपनी कविता में आने देते हैं। उनके शब्द और अर्थयुक्त अलंकारों के कुछ उदाहरण यहाँ पेश हैं-
१. हंस के समान दिन उड कर चला गया, अभी उड चला गया। (धरती-त्रिलोचन)
२. मन मिला तो मिल गए और मन हटा तो हट गए।
मन की इन मौजों पे कोई भी नहीं मतवाद था।
(गुलाब और बुलबुल - त्रिलोचन)
३. मेरा दिल वो दिल है कि हारा नहीं है।
कहीं तिनके का भी सहारा नहीं है।
(यमन, गुलाब और बुलबुल - त्रिलोचन)
त्रिलोचन की भाषा उनके भावों की अनुगामिनी है। यूँ तो शब्द योजना की दृष्टि से प्रगतिवादी कवियों की यथार्थ की गहराई में डूबी भाषा निःसंदेह अधिक सबल है। किंतु त्रिलोचन ने तो भाषा को ही एक कलात्मक ढंग प्रदान किया है। यूँ कहिए कि त्रिलोचन भाषा और शब्दों को, सौंदर्य कला का रूप देते हैं। शब्द योजना सम्बंधी विशिष्टता उन्हें प्राप्त है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भाषा को नया संस्कार दिया है। फिर सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि उन्होंने बडी खूबी से तत्सम, तद्भव और देशज भाषा को एक साथ मिलाकर रखा है। उन्होंने सर्वहारा वर्ग की शब्दावलियाँ अपनी रचनाओं में इसलिए भी रखी हैं ताकि रचनाएँ आम जनता के योग्य बन सकें। अवधी की विविध बोलियों का रंग उनकी जन कविताओं में रच-बस गया है। त्रिलोचन ऐसा मानते थे कि भाषा ही वह माध्यम है जहाँ कवि और उसके पाठक सह यात्री बन जाते हैं और जिंदगी की कथा कहते-सुनते हैं।
१९, सुरुचि नगर, कोटरा रोड, रिवेरा के सामने
भोपाल-४६२००३ (म.प्र.) मो. ९४२५०१४७१९