लेख : नरेश मेहता की सृजनशीलता

डॉ. उदय प्रताप सिंह


समकालीन लेखन में नरेश मेहता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका सृजनात्मक दायरा बहुत विस्तृत है। गहन-गम्भीर चिन्तन, बहुतों से न्यारी भाषिक संरचना, जीवन के प्रति उदात्त व विराट दृष्टि, प्रकृति और मनुष्य के अभ्यन्तर में देखने की अद्भुत क्षमता, कलात्मक और सकारात्मक सोच से सम्पन्न नरेश मेहता चिंतक, कवि और कथाकर के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी पूरी रचना-यात्रा में दार्शनिकता का पुट, समय का खतरा उठाते हुए भी विद्यमान है। उनका विश्वास है कि जीवन की पूर्णता में दार्शनिकता का घोल महत्त्वपूर्ण होता है। उनका काव्य-साहित्य उपनिषदों से रस ग्रहण कर चेतस बना है और अनुभव की परिपक्वता से गद्य-साहित्य पुष्ट हुआ है।
मालवा की उर्वर एवं सृजनशील परम्परा में नरेश मेहता का अन्यतम योगदान है। अपनी तीन दर्जन से अधिक कृतियों द्वारा उन्होंने रचनाधर्मिता की एक अमिट रेखा खींची है। काव्य में ‘उत्सवा’, ‘अरण्या’ और ‘पिछले दिनों नंगे पैर’, खण्डकाव्य में ‘संशय की एक रात’, ‘महाप्रस्थान’ और ‘प्रवाद पर्व’, मुक्तिबोध और अज्ञेय पर लिखी गई कविताएँ, उपन्यास में ‘यह पथ बन्धु था’, ‘धूमकेतु’, ‘एक श्रुति और उत्तरकथा’, निबन्धों में ‘काव्य का वैष्णव-व्यक्तित्व’, ‘काव्यात्मकता का दिककाल’ जैसी कृतियाँ उनकी रचनाधार्मिता की मिसाल हैं। उनके उदात्त चिंतन का आभास कृतियों की विषयवस्तु से हो जाता है। उनकी इसी रचनार्धमिता ने उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत कराया था।
नरेश मेहता का समाज-चिंतन वैचारिक स्तर पर इतना पुष्ट और प्रबल है कि यूरोप की सामाजिक सोच उनके समक्ष अपरिपक्व लगती है। यूरोप में समाज ही समाज है। व्यक्ति नदारद है। हमारे चिंतन में व्यक्ति प्रमुख है और समाज-गौण है। नरेश मेहता ने अपनी रचनाओं में इस स्वर को बडी प्रबलता से उठाया है। अकादमिक क्षेत्र में आज का रचनाकार सामाजिक सरोकार का प्रचलित मुहावरा उछाल कर रचना की प्रासंगिकता के औचित्य को सिद्ध करता है और भारतीय चिंतन की लम्बी परम्परा को वैयक्तिक सोच बताकर खारिज कर देता है। मेहता जी अपनी रचनाओं के माध्यम से इसके प्रतिपक्ष में खडे दिखायी पडते हैं। वे उपनिषद् की ज्ञान परम्परा को श्रेष्ठ बताते हैं। उनकी
दृष्टि में यूरोप का चिंतन रेखीय है और हमारा वृत्ताकार- ‘‘वहाँ संघर्ष ही सब कुछ है। गति, वह भी ‘स्ट्रेट’, सरल रेखा वाली। गति ही वास्तविक है इसलिए वहाँ जो हो चुका है वह पुनः नहीं होगा। इसके विपरीत भारत में रेखीय चिंतन नहीं हुआ है। हमने जब देखा कि ऋतुएँ एक रेखा में आती हैं, जाती हैं। सारे भूमण्डल का एक अयन में जो घूमना होता है, सूर्य का प्रतिदिन आना, दिन रात का एक वृत्ताकार में होना। जीवन और मृत्यु ये सब एक अयन में, एक वृत्त में, एक परिधि में घटित होती हैं। तब इस निष्पत्ति पर हम आये कि काल वृत्ताकार है।’’ इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि हमारे लिए काल महत्त्वपूर्ण है देश नहीं। अतः देशगत, भूगोलगत स्तर पर मनुष्य जीवन की ऐतिहासिकता में हमारी कोई रुचि नहीं है। यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि राम व अन्य देवता कहाँ पैदा हुए, कब पैदा हुए, हुए भी या नहीं। हमारी तो दिलचस्पी जातीय बोध में सुरक्षित स्मृतियों को समय के साथ जोडने में है। अतः राम या राम जैसे अन्य चरित्र इतिहास की सीमा में समाने योग्य नहीं है। रेखीय चिंतन में उनकी व्याख्या करना कठिन है। यही कारण है कि सहस्राब्दियों से बिना काल-सीमा का विचार किये हुए इस प्रकार के चरित्र हमारे साहित्य की अमूल्य-निधि बने हुए हैं।
धर्म, कविता, दर्शन और समाज के अन्तर्सबन्धों पर नरेश मेहता के विचार स्पष्टता व गम्भीरता के साथ प्रकट हुए हैं। प्रायः समीक्षक यह तय कर समीक्षा का वितान खडा करते हैं कि दार्शनिकता काव्य के अनुकूल नहीं होती। उसमें जीवन का उच्छल प्रवाह नहीं होता, वह स्वाभाविकता से दूर, भाषा का पुलिंदा होती है। शुष्कता और सीमा में बँधी होती है पर नरेश मेहता कहते हैं कि- ‘दर्शन का विचार पथ जब आचरण का रूप ग्रहण करता है तो धर्म बनता है और जब सृजनात्मकता का रूप ग्रहण करता है तो काव्य बनता है।’’ यही नहीं उनकी मान्यता में कोई वस्तु जड नहीं होती। सबमें चेतना का संचार होता है। उस चेतना का वाहक मनुष्य है। नर ही नारायण बनता
है। अपने अभ्यन्तर में उसका स्वरूप देखता है। जब उसे वह भाषा, सोच, प्रतिभा और कला के आधार पर पृथ्वी पर उतारता है तब वह ‘अवतार’ बन जाता है। भारत की सामाजिकता का प्रादुर्भाव इसी अर्थ में ग्रहण करने योग्य है। यह अकारण नहीं कि भक्तिकालीन कविता में सामाजिक सरोकार के बिन्दु सबसे चटख दीख पडते हैं। पश्चिम के विचारक सामाजिक होने का ढोल कितना ही क्यों नहीं पीट लें पर वहाँ पर एक भी ऐसी रचना नहीं जिसका धार्मिक रूप में पारायण हो और वह साहित्य की प्रतिनिधि कृति भी हो। भारत में ‘रामयाण’, ‘महाभारत’, ‘श्रीमद्भागवतगीता’ यहाँ तक कि तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ और जयशंकर प्रसाद रचित ‘कामायनी’ तक में वह स्वरूप दिखाई पडता है।
विचार और विवेक के स्तर पर नरेश मेहता का काव्य उपनिषदों की ज्ञान-परम्परा से प्रभावित लगता है। वह रामायण और महाभारत को आधुनिक सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। इस प्रस्तुति में समय का दबाव व प्रभाव दिखायी पडता है। ‘संशय की एक रात’ उनका प्रसिद्ध गीति-नाट्य है, जिसमें ईश्वर की समानान्तरता तक पहुँचे राम, रावण से युद्ध के प्रश्ा* पर विचार-पुनर्विचार करते हैं। यहाँ राम मात्र व्यक्ति के रूप में तर्क-वितर्क कर युद्ध की भयावहता से इसलिए नहीं बचना चाहते कि वह युद्ध भीरु हैं; अपितु युद्ध मनुष्यता का हन्ता है, संस्कृति का नाशक है। उनके मन में यह बात बार-बार आती है कि क्या अन्तिम उपाय युद्ध है? क्या युद्ध किसी समस्या का अन्तिम समाधान हो सकता है? मात्र सीता को रावण के घेरे से बाहर करने के लिए क्या इतने बडे नरसंहार की आवश्यकता है? सेतुबन्ध रामेश्वरम् में सेतु बाँधने के उपरान्त भगवत्ता की सीमा तक पहुँचे राम के मन का यह संशय कवि की विवेकशीलता को जगा देता है- मैं सत्य चाहता हूँ/ युद्ध से नहीं/ खड्ग से भी नहीं/ मानव का मानव से सत्य चाहता हूँ/ यदि मानवी प्रश्नों का उत्तर मात्र युद्ध है/ खड्ग है/ तो समर्पित है यह धुनष-बाण-खड्ग शिरस्त्राण/ मुझे
ऐसी जय नहीं चाहिए/ बाण-विद्ध पाखी सा विवश/ साम्राज्य नहीं चाहिए। मानव के रक्त पर पग धरती आती सीता भी नहीं चाहिए-सीता भी नहीं।’’ राम के मन की शंका अथवा संशय और द्वन्द्व राम मात्र का द्वन्द्व नहीं, लेखक का, पाठक का और हर योद्धा का द्वन्द्व है- ‘‘मैं केवल युद्ध को बचाता रहा हूँ बन्धु/ मानव में श्रेष्ठ जो विराजा है/ उसको ही हाँ/ उसको ही जगाना चाहता रहा हूँ बन्धु/ क्या यह सम्भव है? क्या यह नहीं?’’ राम के मन का यह वैयक्तिक द्वन्द्व यद्यपि सामूहिक विचार-विमर्श के बाद, युद्ध करने के निर्णय में परिणत हो जाता है। संवाद के बीच-बीच में छायारूप में दशरथ का आना, हनुमान व लक्ष्मण का तर्क-वितर्क इस द्वन्द्व को एक नयी दिशा देते दीख पडते हैं। लक्ष्मण का परिवाद इस सन्दर्भ में दर्शनीय है- ‘‘क्या इस प्रश्न के हम ही अन्तिम निर्णायक हैं? क्या हम ही अन्तिम मानवता हैं?’’
‘महाप्रस्थान’ नरेश मेहता का खण्डकाव्य है। महाभारत के शान्ति पर्व से कथा-सूत्र को ग्रहण कर स्वर्गारोहण तक की यात्रा का इसमें वर्णन है। इसमें पाण्डव, युधिष्ठिर का कुत्ता, द्रौपदी व धनुर्धर अर्जुन, महाबली भीम, नकुल और सहदेव की विवशता पर वैचारिक-दृष्टि से विचार हुआ है। यहाँ कवि का विवेक कला के हर मोड पर जाग्रत होता दिखता है। युद्ध की प्रेरक शक्ति द्रौपदी तो हिमाँधियों में ऐसी अदृश्य होती जा रही है कि उसका अस्तित्व ही संकट में पड गया है। पंचपतियों को पुकारती द्रौपदी हिमखण्डों के बीच हिमपिण्ड बन जाती है। युद्ध के बाद शांति की यह तलाश मनुष्य के शाश्वत मन की वैचारिक यात्रा है। ‘उत्सवा’, ‘अरण्या’, ‘पिछले दिनों नंगे पैरों’ तथा ‘मुक्तिबोध’ व अज्ञेय पर लिखी कविताएँ मनुष्य के विवेक को जाग्रत करती हैं। द्वन्द्व को उभारती हैं और स्वाभाविक प्रश्नो को तीव्रतर बना जाती हैं।
नरेश मेहता का गद्य-साहित्य काव्य-रचना की भूमि से पूर्णतः भिन्न है। निबन्धों व उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने समकालीन समस्याओं के बीच घिरे आदर्शवादी,
ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ और नैतिक मनुष्य की त्रासदी को निपुणता के साथ आधुनिक भावबोध के चरित्रों में पिरोया है। कहा जा सकता है कि उनका गद्य, पद्य की ही तरह समस्याओं को उभार देने में सफल हुआ है।
नरेश मेहता की जीवन दृष्टि मानवतावादी है। वह मानवीय पीडा का मार्मिक चित्रण करते हैं। नारी उत्पीडन की समस्या तो प्रायः उनके प्रत्येक उपन्यास का केन्द्रीय भाव है। ‘डूबते मस्तूल’ में रंजना के माध्यम से मध्यमवर्गीय आदर्श नारी की समस्या का चित्रण किया गया है। रंजना के जीवन में कई पुरुष आते हैं किन्तु कोई उसकी आत्मा के सौन्दर्य को नहीं पहचानता। पुरुष की इस प्रवंचना भरी दृष्टि से ऊबकर अंनतः वह आत्महत्या कर लेती है। ‘धूमकेतुः एक श्रुति’ में मातृहीन बालक ‘उदयन’ के मानसिक विकास का मनोवैज्ञानिक वर्णन है। जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियाँ बाल मन को किसप्रकार प्रभावित कर जीवन विकास को दिशा देती हैं- इसका विवेचन है। ‘यह पथबंधु था’, प्रेमचंद की परम्परा का ऐसा उपन्यास है जिसमें मूल्यों के प्रति निष्ठावान व्यक्तियों का टूट जाना उनकी नियति है। टूटे मूल्यों के आधार पर ही नए मूल्यों की परिकल्पना संभव है। यह बात और है कि उपन्यास रोमांस उत्पन्न करने में असमर्थ लगता है। पूरे उपन्यास में एक आदर्शवादी संस्कार सम्पन्न दम्पत्ति श्रीधर और सरो के जीवन की करुण कहानी व्यक्त है। श्रीधर जिन मूल्यों को लेकर स्वाधीनता-संग्राम में संघर्ष करता है, वे अंत में निरर्थक प्रमाणित होते हैं। उसका पूरा परिवार टूट जाता है और वह अपने को व्यर्थ अनुभव करता है। ‘दो एकांत’ में विवेक, वानीरा और मेजर आनंद के त्रिकोण पर टिके, आधुनिक जीवन में स्त्री-पुरुष के बीच बनते-बिगडते रिश्तों और उससे उत्पन्न तनाव का वर्णन है। ‘नदी यशस्वी है’, ‘धूमकेतुः एक श्रुति’ का अगला चरण है। इसमें उदयन किशोरावस्था में पहुँच गया है। वह अपनी अनंत बौद्धिक जिज्ञासाओं के साथ जीवन पथ पर अग्रसर है। यहाँ भी उसके मनोवैज्ञानिक विकास की कथा कही गई है। प्रथम
फाल्गुन में गोपा और महिम के माध्यम से ५०-६० वर्ष पूर्व के लखनऊ का जीवन वर्णित है। उत्तरकथा भाग दो में मालवा के कुछ ब्राह्मण परिवारों को केन्द्र में रखकर बीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध की कथा कही गई है। लेखक ने दुर्गा, वसुंधरा और गायत्री के माध्यम से तीन अलग-अलग संदर्भों में नारी-उत्पीडन का मार्मिक चित्रण किया है। इस बृहत् उपन्यास के केन्द्रीय पात्र शिवशंकर आचार्य हैं। वे बुद्ध की तरह इच्छा को ही दुःख का मूल मानते हैं और सब मिलाकर प्रतिरोधहीन समर्पण के दर्शन को स्थापित करते हैं।
नरेश मेहता मूलतः कवि हैं। उनका कवि मानस वैष्णव संस्कारों से युक्त है। उनके उपन्यासों में ये संस्कार बार-बार उभरते हैं। विचार के स्तर पर उनकी कविता शाश्वत मूल्यों की संवाहक है। नये संदर्भ गढती है और पुराकथाओं को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जीवंत बना देती है। उनका गद्य साहित्य समकालीन समस्याओं को शालीन ढंग से समाज के समक्ष रखता है। नरेश मेहता का पूरा साहित्य भारतीय चिंतन की शाश्वत डोर से बँधा जरूर है पर समकालीन सामाजिक समस्याओं में नया-नया रंग भी भरता रहा है।
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-सचिव