काव्य : कुछ प्रश्न

रांगेय राघव


काव्य में चेतना का तात्पर्य
काव्य तो चेतना का ही पर्याय है, फिर नई और पुरानी का संघर्ष तो दूर, पहले इसे ही सोचना अवाश्यक है कि उसमें फिर चेतना का प्रयोग ही किसलिए किया जाए। क्योंकि यह या तो विरोधाभास-सा लगता है या इसमें यह दृष्टि है कि जो कुछ है, हमारी ही पीढी है और पहले काव्य में चेतना ही नहीं थी। इसलिए इसकी व्याख्या करना उचित है। काव्य तो सदैव से मानव-चेतना का प्रतिबिम्ब है। जब हम उसे काव्य में ढूँढते है, तब वह अप्रयास ही मिल जाती है। प्रकृति-वर्णन, लोक-वर्णन, समाज-वर्णन, व्यक्ति वर्णन से लेकर अंतःप्रकृति तक के वर्णन में वह हमें प्राप्त होती है। प्रतीक या पात्रों के माध्यम से वह ध्वनित हुआ करती है। अतः जब हम उसी पर केंन्द्रित होते हैं तब समग्र सृष्टि का मानव-मस्तिष्क में चेतन-रूप जो बिंबीकरण हैं, उसे नहीं देखते, वरन् उसे देखते हैं जो मानवात्मा के उत्थान को प्रकट करने वाली भावना है, जो उसे उदात्त बनातीहै। परिपाटी का सौन्दर्य पार करके जब लेखनी नई स्फूर्ति प्रदान करने में समर्थ होती है, तब हम उसे चेतना कहा करते हैं। क्योंकि बहुकृत्य-बहुकरणीय जीवन में कविता एक छन्दबद्धता ही नहीं, एक सौन्दर्य है जो जीवन के प्रत्येक कार्य-व्यापार में होती है। वह सौंदर्य ललित कलाओं के विविध रूपों में अपनी अभिव्यक्ति पाता है और लोकहित की कामना भी उसी सौन्दर्य के अन्तर्गत आती है। इस प्रकार जब हम काव्य में चेतना देखते हैं तो उस चेतना को नहीं देखते जो मानवीय विकास का परिणाम है वरन् उसे देखते हैं जो सर्वात्म को अपने में लीन करके उदात्त बनने की ओर पेरित करती है और सुन्दरता की अभिव्यक्ति को अपना सत्य और शिव
बनाती है।
नवचेतना की व्याख्या
प्रत्येक युग अपने साथ कुछ परिवर्तन लाता है। आदिकवि वाल्मीकि वास्तव में आदिकवि नहीं थे। उनसे पहले उपनिषदों और उनसे भी पहले वेदों के कवि थे। किन्तु महाभारत-युग के अंत में जब लोक-काव्य के रूप में गेय महाभारत में लोक-गाथाएँ संबद्ध हुईं तब वाल्मीकि रामायण की पुरानी कथा में भी नए संवर्धन प्रारम्भ हुए और क्योंकि उसमें मानव को प्रथम बार प्रतिष्ठित
किया गया, जिससे लोक में नई चेतना आई तो उसे आदिकाव्य कहा गया। यह ‘नर राम’ देवताओं से जीत चुका था। तो यह नव चेतना का ही उदाहरण है। महाभारत ग्रंथ यद्यपि पुराना है और वर्तमान वाल्मीकि रामायण का रूप परवर्ती है किन्तु रामकथा का युग महाभारत-युग से प्राचीन है। हो सकता है कि अपने मूल रूप में वाल्मीकि रामायण का छोटा-सा कलेवर महाभारत काव्य के रूपों से पुराना ही हो। उस दृष्टि से यह प्रथम नर-काव्य था। अतः इसे आदिकाव्य कहने का यह भी कारण हो सकता है। तो नवचेतना काव्य में प्रतिष्ठित सत्य, शिव और सुन्दर को नया रूप देने का ही नाम है। परिवर्तन का नाम नया है न कि पुराने को हेय या निंदनीय समझना। एक समय आता है जब पुराने की उपादेयता इसलिए घट जाती है कि उसके मानदण्डों से नए युग की समस्याओं का हल नहीं हो पाता। युग-युग के साधन बदलते हैं। पूर्वजों की दहलीज को लाँघकर उत्तराधिकारी नए भवनों का निर्माण करता है। इसलिए नएपन की माँग यह तो स्वीकार करती है कि पुराने की ही लकीर पीटते रहने से उसका काम नहीं चलता परन्तु वह यह नहीं कहती कि पुराना सब व्यर्थ है, उसे तिरस्कृत करना चाहिए। यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि ‘नया’ ‘पुराने’ की तब निन्दा भी करता है, जब ‘पुराना’ उसे ‘नया’ बनने से रोकता है, उसके रास्ते में बाधाएँ उपस्थित करता है। वह बाधाओं को नहीं चाहता क्योंकि वह परिवर्तित परिस्थिति में नए मूल्यांकन स्थापित करने की चेष्टा करता है। कालिदास ने इसीलिए कहा है कि पुराना होने से ही सब कुछ अच्छा नहीं हो जाता। न नया होने से ही ऐसा या इसके विपरीत होता है। मूर्ख तो परम्परा पकडे चलता है, जबकि बुद्धिमान दनों में से सोच-समझकर रास्ता निकालता है और सारतत्त्व को ग्रहण करता है।
उसका स्थायित्व और सार्वजनीन सत्य
तब प्रश्न यह उठता है कि युग तो बदलते ही रहते हैं, फिर साहित्य का स्थायित्व और सार्वजनीन सत्य क्या है? मानव-समाज के बाह्य परिवर्तनों की भाँति मनुष्य के
भाव-जगत् में उतना परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि वह मूलतः अपनी प्रवृतियों की नींव पर ही खडा होता है। अतः ‘भाव’ का स्थायित्व अन्य वस्तुओं की अपेक्षा कहीं अधिक है। जो साहित्य ‘भाव’ से सम्बन्ध रखता है। वह किसी भी वस्तु-विषय या रूप को लेकर भी, स्थायी तत्त्व अपने भीतर अधिक रखता है। मैंने इसी दृष्टि से नए काव्य
को देखा है।
युग के प्रश्न बदल जाते हैं। मानव अपनी पीढी-दर-पीढी चलती सांस्कृतिक परम्परा में उस एकसूत्र चेतना को देखता है, जिसमें मानव का उदात्त रूप, उसका सौन्दर्य चलता चला जाता हुआ दिखाई देता है। यह मानव का भावपक्ष ही है। उसका यथातथ्य चित्रीकरण अपने में कोई विशेषता नहीं रखता। वह तो उसको चाहता है जो उसे आगे का पथ दिखाए, उसके सामने पथ को चौडा करता चला जाए। इस दृष्टि से मैं समझता हूँ कि नया काव्य हमें अधीर होने की कोई दुश्चिंता प्रदान नहीं करता। ‘प्रतीक’ पात्र आए हैं नई समस्याओं के कारण जबकि ‘लघुत्व’ छोडकर हम ‘व्यापकत्व’ की ओर बढे हैं। परन्तु अभी मैं समझता हूँ कि वह युग आने का है जब ‘मनु और श्रद्धा’ जैसे मानवीय प्रतीकों के बाद वे पात्र आएगें जो कि प्रतीकों को अपने भीतर समेट लेने की क्षमता रखेगें। सरस्वती के ये वरद पुत्र उसीकी चेष्टा में रत रहेंगे तो अवश्य ही ‘युगवाणी’ को सच्चा प्रतिध्वनित करके ‘युग-युग की वाणी’ बन जाएंगे।
यही सार्वभौम सत्य आज का कवि सृष्टि और मानव के उस तादात्म्य में खोज रहा है, जिसमें उसे एक नए सत्य का स्वरूप प्राप्त हो सके। स्थायी साहित्य के लिए जिस जीवन-दर्शन और व्याख्या की आवश्यकता है। वह उसकी खोज में निरत हो गया है।
वस्तु और मनुष्य
वस्तु और मनुष्य-सम्बन्ध आज का नहीं, तब का है जब मनुष्य में सभ्यता का भी उदय नहीं हुआ था। प्रकृति में ही मनुष्य ने अपनी आँखें खोली थी। वह प्रारम्भ में जब कन्दराओं में भी रहना नहीं जानता था, तब भी
प्रकृति ने ही उसे चारों ओर से घेर रखा था। वस्तुतः प्रकृति ही उसकी शिक्षक बनकर रही है। प्रारम्भ से लेकर अब तक मनुष्य प्रकृति को ही समझने का प्रयत्न करता रहा है।
प्रारम्भ का जीवन अत्यन्त कठिन था। इसीलिए मनुष्य ने देखा कि उसकी मृत्यु प्रकृति का ही एक कार्य-व्यापार थी। अतः पशुओं और जन्तुओं से लडने के लिए उसने समाज का निर्माण किया। मनुष्य का समूह रहना प्रमाण है कि उसने यूथ-जीवन का आदर्श अपने से पूर्ववर्ती पशुओं से प्राप्त किया। जीवित रहने की इच्छा प्रकृति के महान क्रोड में पलती है और इसलिए उसके संहारक रूप से मनुष्य ने संघर्ष करने के लिए अपने यूथ-जीवन को निरन्तर विकसित किया।
सृजन, पालन और संहार- प्रकृति के ये तीन रूप हैं, जिनसे मनुष्य का सम्बंध है। मनुष्य ने उसके इन तीनों रूपों को परखा है और उन्हें अपने जीवन में उचित स्थान दिया है। यही कारण है कि उसने जिन तीनों देवताओें के रूप में त्रिमूर्ति स्थापित की है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहकर जिन्हें पुकारा है, उनके अन्य ऐतिहासिक कारणों के अतिरिक्त एक यह भी मुख्य कारण है कि उन्होंने प्रकृति के समस्त रूप को अपने भीतर समेट लिया है। प्रारम्भ की टॉटेम अवस्था से प्रकृति की शक्तियों को इन्द्र आदि के रूप में जो मनुष्य ने अवगाहना की है वह भी अपने जीवन से उसका तादात्म्य बैठाने का प्रत्यन किया है। हमारे साहित्य के आदिम स्वरों में हमें प्रकृति के प्रति एक भय और साथ ही एक आस्था के भी दर्शन होते हैं। इन दोनों ने ही क्रमशः हमारे साहित्य की परम्परा में विभिन्न रूपों में विकास किया है।
प्रकृति मनुष्य के इतने पास है कि उसने उसके मन के पक्ष को छुआ है, तभी उसे निरन्तर उसके काव्य में स्थान मिलता रहा है।
प्रकृति के काव्य में रूप और साधर्म्य का विकास
प्रकृति के काव्य में अनेक रूप हैं।
प्रकृति को पहले पक्ष में उपासना के आधार के स्वरूप में लिया गया। इसलिए हमें भक्ति के स्वरों में
उसका दर्शन मिलता है। इसी पक्ष का दूसरा स्वर है भय। जिसके स्तरों में हमें प्रकृति का आतंक प्रदर्शित होता है। किन्तु कालावधि व्यतीत होने पर हम ज्यों-ज्यों प्रकृति को समझते गए और सभ्यता की ओर अग्रसर होते गए, हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन होता गया।
प्रकृति एक उद्दीपन करने वाली वस्तु बनी और उसके माध्यम से मनुष्य अपने राग-द्वेष को घटता-बढता देखने लगा। इसमें स्मृति का हाथ काफी प्रबल हो उठा। वासनाजन्य विचारों ने इसमें अपना बहुत अधिक
सान्निध्य देखा। आलम्बन-रूप में प्रकृति को देखना दूसरा
दृष्टिकोण बना। इन दो रूपों के अतिरिक्त भी प्रकृति के काव्य में स्वरूप प्रस्तुत हुए। प्रकृति का स्वयं में भी सौन्दर्य होता है। महाभारत के प्रकृति-चित्रण में हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जिनमें प्रकृति अपने-आफ ही लिए अत्यन्त प्रभावोत्पादक ढंग से चित्रित की गई है।
प्रकृति में अपने उपास्य को खोजना और ब्रह्मस्वरूप समझकर एकमात्र रहस्य के अन्तर्गत उसे रखकर देखना भी प्रकृति के चित्रण का एक रूप है। प्राचीन और मध्यकालीन रहस्यवादियों का ऐसा ही दृष्टिकोण था। किन्तु अर्वाचीन काल में ब्रह्मरूप में तो कोई एकेश्वर नहीं माना गया तथापि प्रकृति की महानता में अपने को आत्मसात् करने की छायावादी कवियों ने चेष्टा की।
प्रकृति पलायन का भी केन्द्र-स्थल बनी। समाज की विषमता से ऊबे हुए मनुष्य ने प्रकृति की कमनीयता को ही अपने सामने रखा।
मध्यकाल में प्रकृति को उपदेशक के रूप में काव्य में चित्रित किया गया। यदि प्रत्यक्ष ऐसा नहीं किया गया तो प्रकृति के गुणों को तुलनात्मक रूप में मनुष्य के चरित्र से मिलाकर प्रस्तुत किया गया। यह प्रवृत्ति संतों और भक्त कवियों में हमें मिलती है।
किन्तु प्रकृति का एक और रूप रहा है, अप्रस्तुत का मूर्तीकरण। इस रूप में प्रकृति अपने-आपमें इतना प्रभाव नहीं रखती, जितना अपने आधार की उपमा या छवि विधान बनने में सार्थकता दिखलाती है।
समाज की रूढियों में बन्द हो जाने पर भी साहित्य ने परम्परा और परिपाटी की लीक पीटते समय भी प्रकृति की नितांत उपेक्षा नहीं की। उस समय भी हमें प्रकृति के उतने ही भाग के चित्र अवश्य मिल जाते हैं, जो कि राजमहलों में उजागर हो सकते।
आनन्द, शोक, रहस्य, विस्मय आदि अनेक प्रकार के भावों ने प्रकृति को प्रस्तुत किया है। किन्तु यह एक ऐसा विषय है, जो कभी भी पुराना नहीं पडा। जिस प्रकार मूलतः मनुष्य का भाव-पक्ष अभी तक न बदलने के बराबर ही बदल पाया है, उसी प्रकार प्रकृति का भी प्रभाव अभी तक प्रायः वही है।
अस्तित्व और सादृश्य
इसका कारण है कि हम यद्यपि अपनी-अपनी इकाई में व्यक्ति हैं, किन्तु रहते समाज में हैं और हमारी इकाई की सार्थकता तभी है, जब उसे समाज का आधार प्राप्त होता है। उसी प्रकार यह समाज भी प्रकृति से अपना सम्बन्ध रखता है।
वस्तुतः हमारे समाज के विभिन्न युगों में प्रकृति के प्रति विभिन्न दृष्टिकोण रहे हैं।
वैदिककाल में प्रकृति को मानवीय शक्तियों के रूप में अवतारित कर लिया गया था। उपनिषद्-काल में उस व्यपाकता को देखा गया जिसमें मनुष्य से परे की सार्वकालिक सर्वक्षमता प्रकृति की मूलात्मा बन गई। उसके उपरान्त बौद्ध-जैनकाल में प्रकृति का उद्दीपन-पक्ष संयम के दमन में दबा देने की चेष्टा की गई। उसके परवर्ती युगों में प्रकृति ने अनेक घात-प्रतिघात सहे हैं। ब्राह्मण और वैष्णव चिंतन ने प्रकृति को लावण्यमय ही अधिक
माना है।
यदि बाहरी भेदों पर ध्यान न देकर देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि मूलतः प्रकृति का जो दृष्टिकोण भारत में रहा है, यूरोप भी उससे दूर नहीं रहा है। यह और बात है कि विभिन्न युगों की विभिन्न विचारधाराओं का अलग-अलग प्रभाव पडता है।
प्रकृति वास्तव में समाज का एक दृढ आधार है और उसके बिना वह मानो अपने को अनस्तित्व में पडा हुआ अनुभव करता है। यही कारण है कि प्रकृति को मनुष्य समाज ने अपने से अभिन्न ही स्वीकार किया है।
मनुष्य की बाह्य परिधियाँ
मनुष्य प्रकृति का अंग है। जिस प्रकार पशु, पक्षी, आकाश और पृथ्वी इत्यादि प्रकृति के अंग है, उसी प्रकार मनुष्य भी है। मनुष्य विकास-क्रम में वैज्ञानिकों के मतानुसार पृथ्वी पर बहुत बाद में आया है। उसने इसी प्रकृति में अपना आवास बनाया है और यद्यपि उसका अहं सदैव यही कहता रहा है कि वह अन्यों की अपेक्षा उच्च स्तर का प्राणी है। तथापि वह प्रकृति के बहुगुणात्मक परिवर्तनों में से ही एक है। प्रकृति इतनी गुणवती है कि मूलतः मनुष्य का उच्चस्तरीय प्राणी होना भी उसके गुण का
पर्याय है।
इसके अतिरिक्त सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि अंततः मनुष्य की भी एक प्रकृति है। क्षुधा, पिपासा, काम, प्रजनन और मृत्यु उसके वे काम है जिनके प्रति वह अपने को विवश पाता है। किंतु यह तो प्राणिमात्र का धर्म है। अतः उनको ही अंत नहीं समझना चाहिए। मनुष्य में एक और भी पक्ष है। वह उसका आन्तरिक पक्ष है। जो उसका प्रवृत्ति-पक्ष है, वह तो सर्वसाधारण है, किन्तु वह पक्ष जिसमें उसकी सुख-दुःख की अनुभूति है, प्राणि-जगत् में उसकी तुलना नहीं कि जा सकती। इसी दृष्टि से जबकि अन्य प्राणी प्रकृति के अंगमात्र हैं। मनुष्य ऐसा अंग है, जो अपने अंगत्व को पहचानता भी है और निरंतर यह भी सोचता है कि ऐसा क्यों है? वैसा क्यों है? यह एक विचित्र बात है कि पूर्ण का अंग अपने को पूर्ण समझकर, वस्तु के भीतर होते हुए भी, उससे अलगाव अनुभव करके, फिर उससे सामीप्य का अनुभव करता है।
यही मनुष्य का भाव-पक्ष है। इस भाव-पक्ष का आधार उसकी प्रवृत्तियों पर निर्भर है। योगी लोग अपनी प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे लोगों को लोक में असाधारण माना गया है। इसलिए भरत मुनि ने योग-पक्ष
को काव्य के अंतर्गत नहीं माना है। क्योंकि उसमें सुख-दुःख की सहज और सर्वसाधारण की सी अनुभूति नहीं होती। लोक में द्वेष और राग दोने ही मनुष्य का संचालन करते हैं। यद्यपि प्रवृत्तिरूप में यह सब मानव में विद्यमान है, किन्तु उसके दमन की जगह उसका उदात्तीकरण ही काव्य का मुख्य कार्य माना गया है। एक दृष्टि से काव्य का उद्देश्य और योग का उद्देश्य समान है, परंतु एक में भावात्मक दृष्टिकोण को अपनाया गया है जबकि दूसरे में अभावात्मक ढंग को अपनाकर प्रकृति के कुछ अंश को अस्वीकार कर दिया गया है। योगी होने पर भी मनुष्य क्षुधा और पिपासा का तो निराकरण करता ही है।
सहज और भाव-पक्ष
विकास के दो पक्ष हैं।
बाह्य पक्ष में मनुष्य की सभ्यता है, जबकि आंतरिक पक्ष में उसकी संस्कृति है। सभ्यता मनुष्य-निर्मित वस्तुओं का लेखा-जोखा है और संस्कृति उसके हृदय-पक्ष का विवेक-पक्ष से वह सामंजस्य है, जिसमें नैतिकता बहुजनहित होकर विराजती है और उसकी सुदरता को अधिक से अधिक उभारकर बाहर लाने की चेष्टा करती है। इसी दूसरी बात ने प्राचीन काल में उन वार्ताओं और कथाओं को जन्म दिया था, जिसमें उसको पशु, पक्षी और वृक्ष भी बात करते हुए मिलते थे। सभ्यता ने नीरस व्याख्या की है। संस्कृति ने उस बहुरूप का एकात्म ढूँढने का सदैव ही प्रयत्न किया है और इसलिए व्यक्ति के विकास को भारत में आवश्यक माना गया है।
आत्मिक पक्ष यद्यपि त्याग-पक्ष में भारतीय जीवन में अधिक स्तुत्य माना गया है, परंतु उसे नकारात्मक नहीं स्वीकार किया गया। उसे सकर्मक रूप से तभी श्लाघ्य माना गया है जब उसमें मनुष्य-मात्र को आन्दोलित करने वाले भावों के साथ पाया गया है।
प्रवृत्ति और विवेक, दोनों ही भाव-पक्ष में सन्निहित होते हैं। मनुष्य अनेक कार्य करता है, किन्तु उसे उनके साथ ही सुख और संतोष की भी आवश्यकता होती है।

इसी को भाव-पक्ष से प्रकृति का तादात्म्य कहना चाहिए क्योंकि उसी में मनुष्य तृप्ति का अनुभव करता है।
आज भी जब हम विज्ञान की बात करते हैं तब वहाँ प्रकृति से केवल प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है, जबकी मनुष्य चाहता है सुंदरता।
सुंदरता अपने-आपमें कुछ भी नहीं है, वह तो प्रकृति के कार्य-व्यापारों का ही स्वरूप-भेद है। उसी को हमने बाहर से भीतर तक उतार लाने की चेष्टा की है, अपनी लघुता में उस विराट तत्त्व को समेटकर। प्राणी में सुंदरता की परख समान रूप से नहीं होती। मयूर मेघ को देखकर नाचता है, जिसे देखकर लगता है कि उसको उमंग आती है, जब वह मेघ को देखता है। परंतु यह स्वभावजन्य भी माना जा सकता है। मनुष्य में सुंदरता की अनुभूति बहुत अधिक होती है। यद्यपि सब मनुष्यों में यह भावना समान रूप से नहीं पाई जाती। बहुत-से लोगों की सुंदरता बहुत ही स्थूल होती है, जबकि उसकी अतिसूक्ष्मताकी ओर संस्कृति निरंतर प्रेरित करती रही है।
नये प्रतीक
नये युग ने प्रकृति को नये तरीकों में लिया है। आज भटकन का अंत नहीं है। मनुष्य क्या किसी बडी योजना का माध्यम-मात्र है? पहले ही भारत के कितने ही दार्शनिकों ने इसकी कल्पना कर ली थी। इस प्रकृति को चला कौन रहा है और यह सब है किसके लिए? इन्हीं प्रशनो को लेकर अनेकानेक कल्पनाएँ प्रत्येक धर्म में होती आई हैं। लेकिन वे मनुष्य की कल्पना-मात्र हैं। जिसे मनुष्य आज तक अपनी चरम सफलता, कर्मजाल से मुक्ति, स्वरूप-स्थिति, कैवल्य तथा निर्वाण आदि समझता रहा है, वह प्रकृति में सुख की इच्छा-मात्र है। मनुष्य अंततः प्रकृति के अंतर्गत है। सांसारिक अपने अभावों के कारण कुछ अधिक क्लेश उठाता है, लेकिन वह मात्रा का है, गुण का नहीं। आत्मा की आवागमन से मुक्ति, लय और मोक्ष मनुष्य की प्रकृति-विजय के पुराने प्रमाण थे। ब्रह्माण्ड की सीमा, उसके रहस्य अभी भी अज्ञात पडे हैं। मनुष्य क्या ‘निमित्त-मात्र’ है? यह प्रकृति से मनुष्य का नया संबंध है।
लघु मानवी संसार में विराट संसार प्रतिबिम्बित होता है। पुराना मनुष्य इसे दूसरे ही ढंग से सोचता था। आज भी मनुष्य यही जानना चाहता है कि इस जीवन का तात्पर्य क्या है? क्या उसके जीवन में वह स्थिति आ सकती है, जब वह किसी योजना का माध्यम होते हुए भी इस योजना में अपने ‘रोल’ को जान ले और अकर्मक रहता हुआ भी सकर्मक हो जाए? प्राचीन जादू से आज तक के विज्ञान की यही दौड रही है और देखा जाए तो मनुष्य का अब तक का ज्ञान महान्् सृष्टि के चक्र में अपना विशेष स्थान अभी तक नहीं बना पाया है। अभी तो वह पथ में ही है।
विराट की दृष्टि ने पूछा है- ब्रह्म, प्रकृति, उसका नियम आदि वाक-कौतूहल क्या समाप्त होने पर भी नये रूपों में नहीं आ गया? इस भटकन का अंत कहाँ है? उससे पहले तो मनुष्य अन्य पशु और कीडे-मकोडे आदि जीवित प्राणियों की तरह, किस भाँति इस धरती पर सुखी रहा जाए? इसीके साधन ढूँढता रहता है और उसे ही चरम लक्ष्य मानकर अपने को एक भ्रम में डाले रखता है। किंतु इन प्रतीकों के भीतर एक अंतः सलिला है। वह है समन्वय की। वह अब पहले से भी अधिक तादात्म्य चाहता है प्रकृति से। उसे आज भी वही सब सुन्दर लगता है जो उसके पूर्वजों को लगता था। उसके उपमान बदल गए हैं, वह नई-नई चित्र-छवियां (image) पैदा करता है। परन्तु क्यों? इसीलिए कि उसी अच्छे लगने वाले प्रकृति के रूप को अपने भीतर भर-भर लेना चाहता है। अंततोगत्वा उसने प्रकृति को उसके पुराने संबंध में ही ग्रहण करने की चेष्टा की है।
नया दृष्टिकोण
यही आज का दृष्टिकोण है, जिसे हम नया कह सकते हैं।
वैदिक कवि प्रकृति की शक्तियों को मानव-रूप में अपना काम करने को बुलाता था और अपने पूर्वपुरुषों की आत्माओं को प्रकृति की शक्ति के पास कर देता था। उपनिषद्-कालीन कवि ने प्रकृति के रम्य और भयानक
रूप को ‘साम’ रूप के हिंकार में देखा और चाहा था कि वह एकस्वरता को प्रतिष्ठापित कर सके। महाकाव्य-युग ने उसके स्थूल सौन्दर्य में परिवर्तित कर देने का प्रयत्न किया और मानवीय नैतिक मानदण्ड भी मिलाकर उसे उदात्त का रूप दिया।
संस्कृत का परवर्ती युग दरबारी काव्य में डूबने लगा। तब प्रकृति की वासना ने ही अधिक बल पकडा क्योंकि स्थूल ही उस समय दृष्टि को पकड सका।
सामन्तीय काव्य ने हिन्दी में अपनी उसी परम्परा को विकसित किया। सूफी कवियों ने प्रकृति में अपने रहस्य को प्रतिष्ठापित करके नए मानवीय मूल्य लाने का यत्न किया।
सन्त और भक्त कवि प्रकृति को मानव के सत् और असत् के संघर्ष में ही देखते रहे। उनके सामने विशुद्धतावाद भी था और यौन जीवन में भी उन्हें श्रृंगार के क्षेत्र में प्रेरणा दी, किन्तु वे नया कुछ नहीं कह सके।
रीति और रीतिमुक्त उत्तर-मध्यकालीन कवि-समाज ने प्रकृति को विशेष महत्त्व ही नहीं दिया। सेनापति ने भाषा के सौन्दर्य में संस्कृत के भावों का पिष्टपेषण किया, किंतु बच यों गए कि हिन्दी में वह सब नया था।
उपादेयतावादी कवियों ने भी प्रकृति के रूप को केवल अपनी बात को पहुँचाने और परिपाटी के रूप में लिया। प्रकृति के प्रति आँखें खुलीं जब छायावादी कवियों ने नया जागरण लाकर प्रस्तुत किया। छायावादी कवि गण ने प्रकृति के प्रति यूरोप से अवश्य प्रेरणा पाई किन्तु उनका दृष्टिकोण नया था। यद्यपि उसमें व्यक्तीकरण ने दुरुहता अवश्य उत्पन्न कर दी थी।
आज का कवि अपनी सारी परम्परा को जानता है और इसीलिए उसमें हम विविधता पाते हैं। यह विविधता संसार के किसी भी साहित्य के लिए श्रेयस्पूर्ण हो सकती है, क्योंकि इसमें प्रकृति अपने विभिन्न स्वरूपों में आकर अपने नए मूल्यों को प्रतिष्ठापित करती है।
(रांगेय राघव ग्रंथावली, खण्ड-१० से साभार)